ममता सभर मेरी मा

17 मार्च

मुझे याद नहीं कि बचपन में कभी सिर्फ इस वजह से स्‍कूल में देर तक रुकी रही होऊं कि बाहर बारिश हो रही है। ना। भीगते हुए ही घर पहुंच जाती थी। और तब बारिश में भीगने का मतलब होता था घर पर अजवाइन वाले गर्म सरसों के तेल की मालिश। और ये विदाउट फेल हर बार होता ही था। मौज में भीगूं तो डांट के साथ-साथ सरसों का तेल हाजिर। फिर जब घर से दूर रहने लगी तो धीरे-धीरे बारिश में भीगना कम होते-होते बंद ही हो गया। यूं नहीं कि बाद में जिंदगी में लोग नहीं थे। लेकिन किसी के दिमाग में कभी नहीं आया कि बारिश में भीगी लड़की के तलवों पर गर्म सरसों का तेल मल दिया जाए। कभी नहीं। ऐसी सैकड़ों चीजें, जो मां हमेशा करती थीं, मां से दूर होने के बाद किसी ने नहीं की। किसी ने कभी बालों में तेल नहीं लगाया। मां आज भी एक दिन के लिए भी मिले तो बालों में तेल जरूर लगाएं। बचपन में खाना मनपसंद न हो तो मां दस और ऑप्‍शन देती। अच्‍छा घी-गुड़ रोटी खा लो, अच्‍छा आलू की भुजिया बना देती हूं। मां नखरे सहती थी, इसलिए उनसे लडि़याते भी थे। लेकिन बाद में किसी ने इस तरह लाड़ नहीं दिखाया। मैं भी अपने आप सारी सब्जियां खाने लगीं।

मेरी जिंदगी में मां सिर्फ एक ही है। दोबारा कभी कोई मां नहीं आई, हालांकि बड़ी होकर मैं जरूर मां बन गई। लड़कियां हो जाती हैं न मां अपने आप। प्रेमी, पति कब छोटा बच्‍चा हो जाता है, कब उस पर मुहब्‍बत से ज्‍यादा दुलार बरसने लगता है, पता ही नहीं चलता। उनके सिर में तेल भी लग जाता है, ये परवाह भी होने लगती है कि उसका फेवरेट खाना बनाऊं, उसके नखरे भी उठाए जाने लगते हैं। लड़कों की जिंदगी में कई माएं आती हैं। बहन भी मां हो जाती है, पत्‍नी तो होती ही है, बेटियां भी एक उम्र के बाद बूढ़े पिता की मां ही बन जाती हैं, लेकिन लड़कियों के पास सिर्फ एक ही मां है। बड़े होने के बाद उसे दोबारा कोई मां नहीं मिलती। वो लाड़-दुलार, नखरे, दोबारा कभी नहीं आते।

लड़कियों को जिंदगी में सिर्फ एक ही बार मिलती है मां…।

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होली के मायने..

12 मार्च

होली के 3 अर्थ हैं….!!

(1) होली

आर्थात हम भगवान के “हो लिए” ।तन, मन, धन, समय, स्वांस, संकल्प, सब भगवान के लिए है । भगवान के दिए हुए हैं।

(2) होली

अर्थात जो बात “होली”सो होली ।अर्थात विगत बात (past is past)जो हो गया सो हो गया।

(3)होली

अर्थात पवित्रता (purity) holi अर्थात his holiness .

ये तीनों ही अर्थ हमारे लिए बहुत ही कल्याणकारी हैं meaning full हैं ।

हम भगवान के अनुसार जीवन जियें । बीती बातों का चिंतन न करें। जीवन को दिव्यता से भर ले।ऐसी सच्ची होली मनानी हैं।

होलिका दहन….!!

अचेतन मन में ना जाने कितनी इच्छाएं, कितने प्रदूषित बिचार कितनी ईर्ष्याऐं, अंदर ही अंदर चेतना को बोझिल और प्रदूषित एवं परेशान करती रहती हैं। होली का यह उत्सव आज हमें वह अवसर उपलब्ध कराता है, जब हम अपने अन्दर जमा इस कूड़े- कचरे को बाहर निकालकर अपनी चेतना को हल्का और निर्मल बनायें।

इस पावन पर बाहर और भीतर दोनों जगह स्वच्छ और पवित्र रहने के संकल्प लें…!!

आप सभी को होली की शुभकामना….!!

घर कब आओगी बेटी ?

10 मार्च

अभी तो गरमियों की छुट्टियाँ लगने में दो-ढाई महीने हैं, अभी से कैसे बताऊँ कब आऊँगी? गरमियों में स्नेहा की एक्सटरा क्लासेस भी तो हैं। और फिर उसकी म्यूज़िक क्लासेस भी तो हैं।

अपने पापा का घर आने का आग्रह सुन अवंतिका ने एक ही साँस में उन्हें इतना कुछ बता दिया। पापा भी बेटी की बात सुन और कुछ ना बोले। बस इतना ही कहा,”हम्म, समझ सकता हूँ” और फ़ोन माँ को पकड़ा दिया। माँ ने भी कहा,”पता नहीं क्या हो गया है। कल से तुझे बहुत याद कर रहें हैं। कल सुबह से ही शुरू हैं की कब गरमियों की छुट्टियाँ लगेंगी कब अवंतू घर आयेगी?”

बोलते बोलते माँ का तो गला ही भर आया।

तीन साल बीत चुके थे अवंतिका को अपने घर गये हुये। हर साल कुछ ना कुछ एेसा निकल ही आता था की वह दस दिन के लिये भी अपने घर ना जा सकी थी। हाँ, माँ और पापा ज़रूर मिल आये थे उसके ससुराल जा कर उससे पर वह ना आ पायी थी अपने घर।

माँ ने थोड़ा ज़ोर दे कर कहा,”हो सके तो इस बार घर आजा। पापा को बहुत अच्छा लगेगा”।

इस पर अवंतिका ने माँ से कहा,”माँ, तुम तो समझती हो ना। आख़िर तुम भी तो कभी ना कभी इस दुविधा में पड़ी होगी”।

माँ ने भी लम्बी साँस छोड़ते हुये हामी भर दी।

अवंतिका ने कहा,” अच्छा चलो अब कल बात करतें हैं। स्नेहा के टेनिस क्लास का समय हो गया है।

पूरा दिन भागमभाग में निकल गया और रात को थककर जब वह सोने के लिये अपने कमरे में आई तो सोचा था लेटते ही सो जायेगी पर आज नींद को तो जैसे बैर हो गया था उससे। बिस्तर पर लेटे लेटे वह मम्मी पापा से हुयी बातों के बारे में सोचती रही। पूरे दिन की व्यस्तता में समय ही कहाँ था की वह इस बारे में कुछ सोचती भी। वह सोचने लगी कैसे हर बार मम्मी पापा उसके आने की राह देखतें हैं और उसके किसी भी कारणवश ना जा पाने की वजह समझ कर चुप रह जातें हैं। काश! वह भी कहते, नहीं हम कुछ नहीं समझते। हमें कुछ नहीं सुनना तुमको घर आना ही होगा। काश! अपनी बेटी पर थोड़ा हक़ वह भी जता पाते। क्यूँ हर बार वह सब समझ जातें हैं। क्यूँ वह कभी भी ज़िद्द नहीं करते। इन्हीं सब बातों के बीच कब उसकी नींद लगी पता ही नहीं चला।

सुबह छ: बजे नींद खुली। उसने अपने नियमित काम फुरती से निबटाये। स्नेहा को स्कूल भेजा और मयंक को ऑफ़िस। फिर रोज़ की तरह एक हाथ में नाश्ते की प्लेट और दूसरे हाथ में माँ पापा से बात करने के लिये फ़ोन लिया। वह अपने कमरे में आकर पलंग पर बैठी ही थी की मोबाइल पर अपने पापा के मैसेज पर उसकी नज़र पड़ी। मैसेज रात साढ़े बारह बजे का था।

मैसेज खोला तो उसमें लिखा था,”तेरी हर ज़िम्मेदारी का एहसास है मुझे बेटी पर इस बार अपने बूढ़े पिता की जिद्द ही समझ ले इसे। इस बार तेरी एक ना सुनुँगा। इस बार तुझे घर आना ही होगा।

अवंतिका की आँखें नम हो गयीं। वह फिर सोचने लगी की कैसे बिना कहे ही आज भी उसके पापा उसकी हर बात समझ जातें हैं।उसने अपने पापा को मैसेज किया,”पापा, काश! हर बार आप ऐसे ही जिद्द करते और मैं आपकी जिद्द के आगे हार मान कर अपने घर आ जाती। काश! हर बार आप इतना ही हक़ जताते और हर बार मैं लौटती अपने आँगन में जहाँ मेरा बचपन फिर से लौट आता है।

उसकाफोन बज उठा। पापा का ही फ़ोन था। बिना एक पल गँवाये उसने फ़ोन उठाया। दोनों के गले भरे हुये थे। पापा ने बस प्यार से इतना ही कहा,”बेटी इस बार तुझे लेने मैं ख़ुद आँऊगा”।

शायद आपकी और मेरी कहानी भी अवंतिका की कहानी से कुछ हद तक मेल खाती है। आइये इस बार अपने बचपन का कुछ हिस्सा मम्मी पापा को लौटा दें। आइये इस बार गरमियों की छुट्टियाँ अपने मायकें में ही बिता दें।

नेट की रचना है…..!!

मेरा ही स्वाभिमान क्यों चोट खाता है

1 मई

जब कोई किसी पर कहीं ज़ुल्म ढाता है,
मेरा ये अंतर मन क्यों टूट जाता है,
जब कोई फूलों को पैरों में बिछाता है,
मेरा ही स्वाभिमान क्यों चोट खाता है |

माली चुन चुन कर फूल बेंच देता है,
कीमत मिल जाने पर खूब इतराता है,
दूसरी सुबह में चमन फिर फूल जाता है,
मेरा ही स्वाभिमान क्यों चोट खाता है |

जिसके उगते ही जो पुलकित हो जाती है,
पक्षी चहकते हैं कलियाँ खिल जातीं हैं,
वो रवि जब धरती पर आग बरसाता है,
मेरा ही स्वाभिमान क्यों चोट खाता है|

जो दर्द सह कर वंश को चलाती है,
जो घर की खुशियों में जीवन लुटाती है,
उस कन्या जन्म पर घर आंसू बहाता है,
मेरा ही स्वाभिमान क्यों चोट खाता है |

कुछ हंस के देते हैं कुछ हंस के लेते हैं,
कुछ लेने देने को इज्जत समझते हैं,
जब दहेज़ के लिए वर, वधू को जलाता है,
मेरा ही स्वाभिमान क्यों चोट खाता है |

जिसके स्वागत में वो अँखियाँ बिछाती है ,
खुद भी संवरती है घर भी सजाती है,
वो पति जब पत्नी को आँखें दिखाता है,
मेरा ही स्वाभिमान क्यों चोट खाता है |

लाल को निहार कर बलिहारी जाती थी,
उसको सीने से लगा थकन उतर जाती थी ,
वो बेटा, माता को ब्रद्धाश्रम लाता है
मेरा ही स्वाभिमान क्यों चोट खाता है |

निर्मला सिंह गौर

ये कविता मुझे बेहद पसंद आई इसीलिये इसे मैं ने अपने ब्लोग पर रखी है….मेरा इस मे कोई योगदान नहीं है…मैं इन कवियत्रीजी को बधाई देती हूं…

संकीर्णता की चेतना

21 मार्च

हाल ही में मेरे परिवार में भतीजे की शादी का अवसर था । सभी कुछ भली भांति चल रहा था ।  हर और आनंद ही आनंद छाया हुआ था । अचानक शादी की अगली रात मेरे  भाई और  मेरे जीजाजी में कुछ बात को ले कर कहासुनी हो गई । वैसे ये कहासुनी के पीछे ग़लतफ़हमी ही हुई थी या यूं समझे कि काफी समय से मन में चल रहे मनगढ़ंत सवालों से जूझ रहे थे दोनों के मन । जो भी हो पर कहीं न कहीं दोनों के विश्वासों पर ठेस लगी थी । मामला बिचकता जा रहा था । तभी मेरे कानों ने सुना…भई इन्हों से अपने पितृ या देवी-देवताओं के लिये कोई चूक तो नहीं हो गई ? ज्यादातर हम हिन्दू इस बात से डरते हैं कि अगर हम ने नियमित रूप से और ठीक प्रकार से अपने गाँव के देवताओं को संतुष्ट नहीं किया , तो देवता और देवियाँ परेशान हो जाएंगे और इसके कारण हमारे अच्छे बुरे अवसरों में नकारात्मक घटनाएं घट सकती है । इसलिए अवसर के मौके पर देवताओं का तुष्टीकरण करने हेतु उनकी पूजा की जानी चाहिये । इस प्रकार की पूजा के पीछे जो आधार है वो डर है, विशेष तौर से अगर हम अपने अनुष्ठान संबंधी दायित्वों में चूक करेंगे , हमें दंडित होना पड़ेगा या फिर हम किसी तरह से पीड़ा पाएंगे ।

मेरा नीजि तौर से मानना है कि हमारे भगवान क्रोध, पीड़ा पहुंचाना, न्याय , प्रतिशोध या संकीर्णता की चेतना में नहीं रह सकते । वे प्रेम एवं प्रकाश के प्राणी हैं , हम पर अपना आशीर्वाद बरसाते हैं , बावजूद इसके कि हम असफल हों, कमजोर हों या हम में और कमियाँ हों। इस विश्वास की मूल भूत भावना को रखते हुए ही हमारा हिंदू धर्मएक आनंद पर आधारित धर्म है , जिसमे किसी को पितृ या भगवान से कभी भी डर ने की आवश्यकता नहीं है , इस बात के लिए कभी परेशान होने की आवश्यकता नहीं है कि अगर हम पूजा नहीं करेंगे तो पितृ या भगवान आहत हो जाएंगे या हमें किसी तरह की सजा देंगे। पूजा उच्चतम मायनों में प्रेम का बाहर निकल कर बहना है । भगवान प्रेम हैं और कुछ और नहीं परंतु प्रेम हैं और हमारे पूर्वज तो हमारे अपने हैं वे भला हमें दुःखी कैसे कर सकते हैं ?

सही कहूं तो हमारा हिंदू धर्म एक ऐसा आनंदमय धर्म है , जो कि पश्चिम के धर्मों में प्रचलित सभी मानसिक ऋण के भार से मुक्त है । यहाँ श्रद्धा  है , ये अंधश्रध्धासे मुक्त है । जब नकारात्मक घटनाएँ घटती हैं, जैसे कि शादी में विध्न, बच्चे कि मौत , बाढ़ या अचानक बीमारी, बड़े लोग जरूरी अनुष्ठानों में हुई कमियों को ढूंढते हैं , यह मानते हुए कि देवता उनसे हुई पूजा के किसी पहलू की कमी के लिए दंडित कर रहे हैं । अगर हम इन तथ्यों में विश्वास रखें तो मुझे आशा है कि भगवानों कि प्रकृति कि बेहतर समझ से ऐसे अंधविश्वासों पर काबू करने में मदद मिलेगी ।

हिन्दू दर्शन यह सिखाता है कि हमारे जीवन में जो घटता है , वह चाहे सकारात्मक हो या नकारात्मक , वह हमारे पूर्व जन्म के किए गए कार्यों का परिणाम होता है । एक चिंताजनक स्थिति स्वयं के द्वारा पैदा किया गया दुर्भाग्य है । भगवान द्वारा दिया गया दंड नहीं । जीवन जो आनंद और दुख, उत्साह और अवसाद , सफलता और विफलता, स्वास्थ्य और बीमारी , अच्छे और बुरे समय का अनुभव होता है वह महज एक इत्तफाक ही होता है । पुजा अनुष्ठान उन्हें संतुष्ट करने या उनके गुस्से को शांत करने हेतु नहीं किए जाते बल्कि उनके प्रति प्रेम व्यक्त करने एवं उनका आशीर्वाद और मार्गदर्शन लेने का आवाहन करने हेतु किए जाते हैं ।

अनुष्ठान द्वारा तुष्टीकरण का एक शास्त्रीय उद्देश्य भी है कि  नकारात्मक ऊर्जा से बचा जाये जो हमारे जीवन को परेशान करती हैं । एक अन्य दृष्टिकोण से अगर हम देवी-देवता एवं पितृओं के दयालु स्वभाव को समझने का प्रयास करें और ऐसा करते हुए मन में बसे पुराने भय को निकाल दें , तो हमें भगवान या देवी-देवता व पितृओं को एक माता पिता के रूप में और स्वयं को एक बच्चे के रूप में देखना होगा । सच्चे मायने में तो ये हमारे लिये एक सम्पूर्ण माता पिता के समान हैं , क्योंकि चाहे हम कुछ भी करें , ये हमें सदेव आशीर्वाद और प्रेम भेजते हैं । जब हम गलती करते हैं वे कभी हम से नाराज़ नहीं होते एवं हमें कभी दंडित नहीं करते । इन का प्रेम उत्तम प्रेम है , जो हर समय मौजूद रहता है , सभी हालत में ।

 कमलेश अग्रवाल

अनुभूति

2 मार्च

एक बार एक व्यक्ति नाई की दुकान पर अपने बाल कटवाने गया| नाई और उस व्यक्ति के बीच में ऐसे ही बातें शुरू हो गई और वे लोग बातें करते-करते भगवान के विषय पर बातें करने लगे|

तभी नाई ने कहा – “मैं भगवान के अस्तित्व को नहीं मानता और इसीलिए तुम मुझे नास्तिक भी कह सकते हो”

“तुम ऐसा क्यों कह रहे हो”  व्यक्ति ने पूछा|

नाई ने कहा –  “बाहर जब तुम सड़क पर जाओगे तो तुम समझ जाओगे कि भगवान का अस्तित्व नहीं है| अगर भगवान होते, तो क्या इतने सारे लोग भूखे मरते? क्या इतने सारे लोग बीमार होते? क्या दुनिया में इतनी हिंसा होती? क्या कष्ट या पीड़ा होती? मैं ऐसे निर्दयी ईश्वर की कल्पना नहीं कर सकता जो इन सब की अनुमति दे”

व्यक्ति ने थोड़ा सोचा लेकिन वह वाद-विवाद नहीं करना चाहता था इसलिए चुप रहा और नाई की बातें सुनता रहा|

नाई ने अपना काम खत्म किया और वह व्यक्ति नाई को पैसे देकर दुकान से बाहर आ गया| वह जैसे ही नाई की दुकान से निकला, उसने सड़क पर एक लम्बे-घने बालों वाले एक व्यक्ति को देखा जिसकी दाढ़ी भी बढ़ी हुई थी और ऐसा लगता था शायद उसने कई महीनों तक अपने बाल नहीं कटवाए थे|

वह व्यक्ति वापस मुड़कर नाई की दुकान में दुबारा घुसा और उसने नाई से कहा – “क्या तुम्हें पता है? नाइयों का अस्तित्व नहीं होता”

नाई ने कहा – “तुम कैसी बेकार बातें कर रहे हो? क्या तुम्हें मैं दिखाई नहीं दे रहा? मैं यहाँ हूँ और मैं एक नाई हूँ| और मैंने अभी अभी तुम्हारे बाल काटे है|”

व्यक्ति ने कहा –  “नहीं ! नाई नहीं होते हैं| अगर होते तो क्या बाहर उस व्यक्ति के जैसे कोई भी लम्बे बाल व बढ़ी हुई दाढ़ी वाला होता?”

नाई ने कहा – “अगर वह व्यक्ति किसी नाई के पास बाल कटवाने जाएगा ही नहीं तो नाई कैसे उसके बाल काटेगा?”

व्यक्ति ने कहा –  “तुम बिल्कुल सही कह रहे हो, यही बात है| भगवान भी होते है लेकिन कुछ लोग भगवान पर विश्वास ही नहीं करते तो भगवान उनकी मदद कैसे करेंगे|”

सारांश

विश्वास ही सत्य है| अगर भगवान पर विश्वास करते है तो हमें हर पल उनकी अनुभूति होती है और अगर हम विश्वास नहीं करते तो हमारे लिए उनका कोई अस्तित्व नहीं|  

नेट के सौजन्य से…

प्रायश्चित

6 दिसम्बर

एक बार कुछ विद्यार्थी रसायन विज्ञानं प्रयोगशाला में कुछ प्रयोग कर रहे थे. सभी विद्यार्थी अपने अपने प्रयोगों में व्यस्त थे कि अचानक एक लड़के की परखनली से तेज बुलबुला उठा और उसकी छिट्कियाँ सामने प्रयोग कर रही लड़की की आँखों में चला गया.

पूरी प्रयोगशाला में हाहाकार मच गया, सभी खूब परेशांन हुए, आनन फानन में उस लड़की को अस्पताल पहुँचाया गया, वहाँ डाक्टरों ने बताया कि वो अपनी आँखें खो चुकी है. ये सुन कर उस लड़की के घर वालों ने उस लड़के को कोसना शुरू कर दिया और स्कूल वालों ने उस लड़के को स्कूल से निकाल दिया.

अब वो अंधी लड़की अपनी नीरस ज़िन्दगी बिता रही थी, जो शायद किसी की लापरवाही की वजह से वीरान सी हो गयी थी, अब उस लड़की की ज़िन्दगी में कोई भी रंग कोई मायने नहीं रखता था. घर वाले भी वक़्त बेवक्त उस लड़के को कोसते रहते थे जिसने उनकी लड़की की ज़िन्दगी खराब कर दी थी. आज कल के ज़माने में तो किसी के सामने हूर परी भी बैठा दो तो भी लड़के वालों को उससे भी ज्यादा खूबसूरत चाहिए होती है. फिर उस बिचारी की वीरान ज़िन्दगी में रंग भरने की बात सोच पाना भी असंभव सा था. खैर वक़्त बीतता गया और उस लड़की को उस वीराने की आदत हो गयी. क्योंकि अब उसकी ज़िन्दगी में कही से भी उजाला आने की कोई गुंजाइश नहीं थी.

अचानक एक दिन एक बड़े इंजीनियर का रिश्ता उस अंधी लड़की के घर आया. यही नहीं लड़का खुद उसके घरवालों से उसका हाथ मांगने अपने माँ बाप के साथ आया था. घर वाले मन ही मन बहुत खुश हो रहे थे कि बैठे बिठाये उन्हें अपनी अंधी लड़की के लिए लड़का मिल गया लेकिन लड़की इस बात से काफी दुखी थी. शायद इसलिए कि वो किसी की ज़िन्दगी खराब नहीं करना चाहती थी. इसलिए उसने लड़के को अन्दर बुलाया और बोली कि मैं अंधी हूँ आपके घर का कोई काम मैं नहीं कर पाउंगी, आपको मुझसे कोई सुख नहीं मिल पायेगा, आप एक इंजीनियर हैं इसलिये आपको तो एक से बढ़कर एक लड़कियां मिल जायेंगी. आप प्लीज़ अपनी ज़िन्दगी खराब मत कीजिये. इस पर वो लड़का आगे बढ़ा और घुटनों के बल बैठकर लड़की का हाथ पकड़कर बोला :

प्लीज़ तुम इस शादी के लिए हाँ कहके मुझे मेरा प्रायश्चित कर लेने दो, मैं वही हूँ जिसने तुम्हारी ज़िन्दगी वीरान की है और आज मैं प्रायश्चित करना चाहता हूँ. प्लीज़ मना मत करना. ये सुन कर वो लड़की रोने लगती है, ये सोच कर नहीं कि उसकी ज़िन्दगी खराब करने वाला उससे शादी करना चाहता है. बल्कि ये सोच कर कि इस दुनिया में ऐसे लोग भी है जो अपनी गलती को स्वीकारना जानते हैं ।।

By Anmolvachan.in   10/11/2014