Archive | नवम्बर, 2011

परीक्षाओं से क्यों घबराते हैं छात्र ?

30 नवम्बर

परीक्षाओं से क्यों घबराते हैं छात्र , ये प्रश्न आज की २१ वीं सदी का सब से पेचीदा सवाल बना हुआ है | क्यों ? ये हमे सोचना है | मेरा मानना है कि हमारी जो शिक्षा पध्धति है उसमें ही कहीं न कहीं कमी रह गई है | आजकल छात्र ने परीक्षाओं में कितने अधिक अंक पाये हैं उसी योग्यता पर उसकी कुशलता का लेखाजोखा निर्भर है | न केवल उस छात्र के लिए बल्कि उसके माता-पिता एवं परिवार के अन्य सभ्यों के लिए भी ये बात सम्मान तथा गौरव की होती है | मतलब साफ है कि आज की शिक्षा-प्रणाली के अनुसार , परीक्षाएं छात्रों की बुध्धि प्रतिभा के लिए अमोघ अस्त्र बन गई है | छात्र जानते हैं कि उनकी सामाजिक एवं आर्थिक स्थिरता तथा उनका समूचा भविष्य इन परीक्षाओं पर स्थित है | हमारे समाज में महज छात्रों का ही नहीं , अपितु उनके परिवार का कद भी छात्रों को मिलने वाले अंक के प्रतिशत से नापा जाता है और ये ही कारण है कि परीक्षा के नाम से ही छात्र घबरा जाते हैं | उन्हें एक भय सताने लगता है कि अगर किसी कारणवश उनका प्रदर्शन परीक्षाओं में अच्छा नहीं हुआ तो उनका गौरव, कीर्ति, मान-सम्मान, अभिभावकओं व शिक्षकों की उम्मीदों पर पानी फिर जायेगा | यही भय उनके दिलों-दिमाग में तरह-तरह की चिंताएं , शंकाएँ उत्पन्न करने लगता है | उनका अपने आप से ही भरोसा उठने लगता है और वे डर ने लगते हैं इस परीक्षा रूपी भूत से | ये ही वजह होती है की बार-बार वे परीक्षाओं में असफल होते दिखाई देते हैं |

कई बार वे इतने हताश हो जाते हैं कि आत्महत्या तक कर लेते हैं , सिर्फ इस सोच के चलते | हमे ये आत्महत्याएँ रोकनी है | अपनी सोच बदलनी है | कम नंबर आने से आप की दुनिया नहीं लुट जायेगी ये सोच को छात्रों में लानी है | अगर एक बच्चा भी आत्महत्या करता है तो हम भी कहीं न कहीं उसके गुनहगार हैं | मेरा मानना है कि अभिभावकों द्वारा अपने ब्च्चोंसे उनके बुतेसे अधिक उम्मीदें होना एवं शिक्षा प्रणाली में त्रुटि होना ही छात्रों  की घबराहट का मुख्य कारण है | अगर उन्हें सही मार्गदर्शन तथा नियमित अभ्यास का ज्ञान दिया जाये तो ये समस्या से उभरा जा सकता है | दूसरी बात जो मेरे मन में उठ रही है वह ये है कि किसी भी छात्र की योग्यता को परीक्षा में आये अंको के आधार से न जाँच ; बल्कि उनकी कार्यकुशलता तथा उनके व्यावहारिक द्रष्टिकोण के आधर पर ही मापा जाना चाहिए | आज आप को ऐसे कई उदाहरन अपने आस-पास ही मिल जायेंगे | कम अंक प्राप्त करने वाला छात्र भी आगे चलकर बहुत अच्छा कर पाया हो | सामान्य दिखने वाले गांधीजी अगर राष्ट्रपिता बन सकते हैं , ४ कक्षा पास महिला अगर मुख्यमंत्री बन सकती हैं तो सिर्फ परीक्षा में कम अंक प्राप्त करने वाला छात्र क्यों नहीं आगे आ सकता ? सो आज आवश्यकता है तो सिर्फ इस बात की कि छात्रों को अंकों की कसौटी पर न परखा जाये पर उनके अंदर छुपी प्रतिभा को देखा जाये तभी इस प्रश्न को हम सही रूप दे पायेगें | आज से ही प्रण ले लें कि हम अपने बच्चों को स्वतंत्ररूप से पढ़ाई कर ने देगें तथा उन पर किसी भी तरह का दबाब  नहीं लायेंगे तभी जाकर वे अपना सही प्रदर्शन दिखा पायगें |

कमलेश अग्रवाल

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वाद-विवाद – “क्या लोकपाल/लोकायुक्त भ्रष्टाचार रोक पायेगा?”

29 नवम्बर

१६ नवम्बर को  नगर राजभाषा कार्यान्यन समिति, अहमदाबाद के द्वारा वाद-विवाद का आयोजन किया गया था जिसमें केंद्र सरकार के विभिन्न कार्यालयों से कर्मचारियों को आमंत्रित किया गया था | वाद-विवाद का विषय था “क्या लोकपाल/लोकायुक्त भ्रष्टाचार रोक पायेगा?” करीब २५ प्रतिस्पर्धी अलग-अलग संस्था से इस वाद-विवाद में हिस्सा लेने आये थे | मैं भी मेरे कार्यालय राष्ट्रिय व्यावसायिक स्वास्थ्य संस्थान की ओर से हिस्सा लेने पहुंची | कुछ गडबडी के कारण ३:३० दोपहर की जगह २:३० छप गया था सो हम सभी १ घंटा जल्दी पहुंच गये | वक्त तो काटना ही था सो गप-सप शुरू हुई | कौन – कौन पक्ष में बोलनेवाले हैं और कौन प्रतिपक्ष में ? मालूम हुआ की ज्यादा प्रतिस्पर्धी प्रतिपक्ष में बोलना चाहते हैं | मतलब की ५:१ |

ये सुन एक बार के लिए तो मैं थोड़ी सी घबराई क्योकि मैंने पक्ष में जो बोलना था !! फिर सोचा क्यों घबराना ? मैं ने जो मुद्दे  लिए हैं  वे सभी सोच-समज कर ही तो लिए हैं  | मैं ने अपने आप को सम्भाला और स्वस्थ हो बैठ गई | मेरा नम्बर दूसरा ही था सो एक वक्ता के बाद मुझे ही बोलना था | मैं ने जो मुद्दे बोले, वे मैं अपने ब्लॉग के माध्यम से आप तक रखना चाहती हूँ |

मुझे यकीन है की अगर सशक्त एवं मजबूत लोकपाल/लोकायुक्त लाया जाये तो अवश्य ही भ्रष्टाचार को रोकने में कामयाबी मिल सकती है | माना कि भ्रष्टाचार रूपी विष- बेल चहूँ ओर फ़ैल चुकी है | इसे उखड फेंकना वैसी ही बात होगी जैसे कि गमले में बरगद के पेड़ को लगाना | पर अगर मन में हो विश्वाश पुरा हो विश्वाश तो असम्भव भी सम्भव हो पता है | इसी को हमे कर बताना है | मैं आप सभी से पूछना चाहती हूँ कि अगर आप पर कोई हमला कर दे तो क्या उस वक्त आप हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहोगे ? अपना स्व बचाव करना नही चाहोगे ? चाहोगे न तो कैसे करना होगा ये काम ? कोई हथियार का ही सहारा लेना होगा न | बस सशक्त एवं मजबूत लोकपाल/लोकायुक्त भी भ्रष्टाचार रोकने के लिए हथियार का ही काम करेगा | अगर घोडा बेलगाम हो जाये तो लगाम नही खीचनी पडती ? क्या बेकाबू हुए बेल के नाक में नकेल नही डाली जाती ? बस सशक्त एवं मजबूत लोकपाल/लोकायुक्त भी भ्रष्टाचार रोकने के लिए लगाम और नकेल का ही काम करेगा | पर हमे इस लगाम और नकेल को मजबूत बनाना होगा इतना ही नही उस का सही ढंग से इस्तमाल करना होगा| इन बातों में अगर हम सफल हो पाते है तो कोई शक नही कि हम भ्रष्टाचार को न रोक पाये |

आप शायद सोच रहे होंगे कि मैं कुछ ज्यादा ही आशावादी हूँ | वो तो मैं हूँ ही | क्यों कि आज सूचना के अधिकार के आने भर से ही बहुत फर्क आया है | आप और मैं एक सरकारी तन्त्र के हिस्से हैं, सूचना के अधिकार के आने मात्र से हम कितने सक्रिय हो गये हैं | क्यों ? क्योकि हम जान चुके हैं कि किसी भी वक्त कोई भी हम से इस कानून के तहत पूछ सकता है कि मेरे पेंशन का क्या हुआ ? क्यों देर हो रही है? ये सडक पर कितनी लागत लगी थी ? वगैरा – वगैरा..

इसमें कोई संदेह नही कि कानून का हम पर पुरा प्रभाव पड़ा है जिसके चलते हम दौड़ने लगे हैं | हम भारतीय डंडे कि भाषा ही जानते हैं | यही कारण है …आज शासन पक्ष ये सशक्त एवं मजबूत लोकपाल/लोकायुक्त के गठन में आना-कानी कर रहा है | आप कहेंगे कि कानून तो दहेज-प्रथा रोक ने का भी तो है तो क्या दहेज लेना या देना बंद हो गया ? क्या जाति-प्रथा के कानून बन जाने मात्र से जातिवाद खत्म हो गया ? मैं मानती हूँ कि पूर्ण रूप से खत्म नही हुआ पर लोग डर ने तो लगे हैं | शिकायत होने पर या पकड़े जाने पर बचा नही जायेगा इस बात का खौफ तो पनपा है | बस ये ही डर प्रभावशाली लोकपाल/लोकायुक्त के आने से दिखाई देगा | इस बात में कोई किन्तु-परन्तु की गुंजाईश नही है |

अरे भई, ये कलमाड़ी , राजा , कनिमोली आज जेल में क्यों हैं ? सख्त कानून लागु होने से ही न ! क्यों कर्नाटक के मुख्यमंत्रीजी को गद्दी छोड़ नी पड़ गई ? क्योंकि कर्नाटक में सशक्त लोकायुक्तका गठन किया हुआ था , अन्यथा क्या वे कुर्शी छोड़ते ? तो मेरा मानना है कि लोकपाल/लोकायुक्त भ्रष्टाचार जरुर रोक सकता है, अगर प्रशासन उसे प्रभावशाली ढंग से लागु करे तो | कभी भी कानून गलत नही होता , कमी होती है तो उसके सही ढंग से लागु न करने में | अन्नाजी का यही अनुरोध है कि बरसों से इसे क्यों बक्से में बंद किया हुआ है ? क्यों इसे नही लाया जा रहा है ? इस से तो जनता को यही संदेश जाता है कि प्रशासन में बैठे लोग खुद भ्रष्ट हैं और यही कारण है कि वे इसे लाने में आना-कानी कर रहे हैं |उनकी नियत में ही खोट है |

ये सुनते ही आप में से कई सोच रहें होंगे कि अन्नाजी को साथ देनेवाले उनके टीम के सदस्य भी तो दूध के धुले नहीं हैं |  उन पर भी तो उँगलियाँ उठ रही है | वे भी तो भ्रष्ट हैं | में इस के उत्तर में ये कहना चाहूंगी की ये तो आप कि सोच की कमी है , कारण की लबालब भरे भ्रष्टाचार के तलाब में अगर आप पथ्थर फेंकोगे तो क्या आप का कीच के छींटों से बचना संभव है ?प्रशासन में बैठे सत्ताधीशों ने आज तक जनता को भ्रमित ही तो किया है | २०० साल पुरानी हमारी मानसिकता यों ही थोड़े बदलेगी ? उस के लिए तो हमारा जागृत होना बेहद जरूरी है |  मेरा आप सभी से अनुरोध  है कि अपनी  सोच को बदले और प्रशासन  में बैठे दुर्योधनों को पहचानों | एक साथ  एकजुट हो इस मुहीम को आगे बढाओ |

  हमारे प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्रबाबू ने कहा था ” अगर संविधान कमजोर होगा पर उसे लागु कर ने वाले सशक्त एवं निष्ठावान होंगे तो देश आगे बढ़ पायेगा पर अगर संविधान मजबूत होगा पर उसको लागु करनेवाले सशक्त एवं निष्ठावान नहीं होंगे तो देश आगे नहीं बढ़ पायेगा |” आज उनका ये विधान बिलकुल सत्य नजर आ रहा है | हमे चाहिए कि हम इन तानाशाहों को उतार फेंके और या तो उन्हें मजबूर करें कि वे एक सशक्त एवं प्रभावी लोकपाल/लोकायुक्त बिल जल्द से जल्द लायें ताकि हम अपनी आनेवाली  पीढ़ी को एक नया भ्रष्टाचार मुक्त भारत दे पायें ताकि वे आनेवाले कल में फिर दोहरा सकें ” डाल-डाल पर सोने कि चिड़िया करती है बसेरा, वह भारत देश है मेरा ,वह भारत देश है मेरा…जय भारती …जय भारती “

कौन कहता है कि आकाश में छेद नहीं हो सकता ? एकबार द्रढता से पथ्थर उठा के तो देखो ….

 इसी शब्दों के साथ …जयहिंद ,जय भारत

कमलेश अग्रवाल

( I got second prize in this competition )

आराम कहाँ?

24 नवम्बर

 किन्नरी जब घर लौटी तो उसे कुछ ज्यादा ही थकान लग रही थी | उसे पता नही चल रहा था कि क्यों ? तभी उसे ख्याल आया कि आज नोकरानी नहीं आई थी | यही कारण है कि वह थकान महसूस कर रही है | वह जब से उठी है तब से दौड़ ही तो रही है | बैठ ने को वक्त ही कहां मिला उसे ? अभी राजन के आने में तो देर है तब थोडा सुस्ता ही लिया जाये और ये सोच वह सोफे पर ही बैठ गई | भूख जोरो की लगी थी पर उठने को मन नहीं हो रहा था | ५ मिनिट भी नहीं हुए होगे कि राजन आगये | आते ही बोले ,”अरे यार बहुत भूख लगी है जल्दी से कुछ खाने को दे दो और सुनो आज खाना जरा जल्दी ही दे देना, ९ से पहले सो जाने की इच्छा है |”इतना सुनते ही किन्नरी उठी और रसोईघर की ओर चल दी | उसने फटाफट आलू काटे ,पोहा भिगोया और थोड़ी ही देर में उसे राजन के सामने परोसा | किन्नरी आराम भूल ,सीधी रसोई की और चल दी | ८:४५ पर खाना तैयार कर उस ने राजन को आवाज लगा कहा कि खाना तैयार है कहो तो लगा दूं | राजन ने टी वी देखते हुए कहा,” लगा दो मैं बस यो आया”| राजन खाना खा सोने चले गए और किन्नरी बर्तन साफ करने रसोईघर में | अभी बस फारिक ही हुई थी कि फोन बज उठा | भन्नाई सी उस ने फोन उठाया और जैसे ही हेलो कहा, सामने से आवाज सुनाई दी, कहो मैडमजी क्या हाल है ? पहचाना की नहीं ? अरे भई मैं दिव्या | किन्नरी तब तक संभल चुकी थी | बोली,”पहचानती कैसे नहीं ? पुराने दोस्तों को भी कही भुलाया जाता है ? और सुनाओ कैसी कट रही है ? क्या जयपुर में ही हो या फिर मियाजी के तबादले की शिकार हो कही और जा बैठी हो ? भई तुमने तो घाट-घाट का पानी पीना सिख ही लिया | दोनों ठहाके मार हंसने लगीं | बाते तो बहुत थीं करने को पर वक्त का घ्यान रख दोनों ने वही रुकना मुनासिब समझा | दिव्या से बात कर किन्नरी बड़ा अच्छा महशूस कर रही थी और पुरानी बातों को याद करते करते कब उसकी आंख लग गई, उसे पता ही न चला |

सुबह उठ वही काम की भाग-दौड़ | वही घोड़े, वही मैदान | आफिस पहुंच जैसे ही वह अपनी कुर्सी पर बैठी, उसकी नजर भूमि पर गई | भूमि बड़ी थकी हुई लग रही थी | किन्नरी ने जब भूमि से थकान का कारण पूछा तो बोंली,”क्या बताऊँ किन्नरीजी, मैं रातभर सोई ही नहीं , पूरी रात बेटा उल्टी ही करता रहा | २ बजे जाकर उसे थोड़ा आराम आया | आफिस आना भी जरूरी था ; कल मिटींग भी तो है ; तैयारी भी करनी है | सुबह दीदी को बुलाया तब जाकर निकल पाई हूँ| ” भूमि की परेशानी मैं खूब समजती हूँ | मैं ने भी जब बच्चे छोटे थे तब बहुत सी राते ऐसी ही बिताई थी | माँ होना बड़ी बात है, चाहे वह घर में रहनेवाली हो या नोकरिपेशा | बच्चोके सामने उसे आराम की परवा कहां ? भूमि के साथ बैठ मिटींग की तैयारी की ताकि वह थोड़ी चिंता-रहित हो | फिर दोनों ही अपने अपने कार्य में व्यस्त हो गये |

थोड़ी देर बाद कुछ काम से जैसे ही मैं बहर आई , सामने से आराधना आती दिखी | काफी जच रही थी | मैंने कहा,” क्या बात , बड़ी जच रही हो | मेरेज-अन्वेर्सरी है क्या ?” उसने कहा,” छोड़ यार , ४० साल के बाद क्या मेरेज-अन्वेर्सरी | आज जेठके लडके  का रोका था बस जचने का यही कारण है | यार इतनी थक चुकी हूँ कि कोई अगर यहा बिस्तर लगा दे तो सो ही जाऊँ | दो दिन से इतनी भाग-दौड़ है कि क्या बताऊँ |”

भूमि और आराधना की बात सुन कुछ सोचती हुई जब किन्नरी अपनी कुर्सी पर आकर बैठी तो अनायस ही उसे विचारों ने घेर लिया | उसने अपने मन से पूछा कि क्यों कामकाजी महिलाए इतनी व्यस्त रहती हैं ? लोगो की निगाहों में तो वे मस्त मौल्ला हैं पर वे ही जानती हैं कि ये दो खांडे कि धार पर चलना कितना मुश्किल है ?

 ये कहानी किन्नरी , दिव्या या आराधना की नही पर उन सारी कामकाजी महिलओं की है जो इन हालातों की शिकार हैं | आप भी समज गये न कि हमे आराम कहाँ ? उठिए और लग जाइए हाथ बटाने|

कमलेश अग्रवाल

हर दिन नया जन्म , हर रात नई मौत

4 नवम्बर

 भागती हुई जिन्दगी में अपने आप को हम भुला चुके हैं | हमारे पास अच्छे -बुरे कर्मों के अवलोकन के लिए वक्त ही नहिं हैं तभी तो हम अपने बुरे कर्मों के लिए प्रायश्चित भी कहां कर पाते हैं !!  इसी उधेड़बुन के चलते आत्मज्ञान का पाना कहां सम्भव हो पायेगा ?  ऐसी परिस्थिति में हमें चाहिए कि हम कुछ ऐसा निर्णय लें जो हमें इस द्विधा से मुक्ति दिला पाए |  मेरे जहन में एक बात उठती है, क्यों न हम हर दिन नया जन्म लें और हर रात को मौत में तब्दील कर दें | हम सभी जानते हैं कि स्वस्थ शरीर का हमारे मन के साथ घनिष्ठ सबंध है | यदि हमें नेक इंसान बनना है तो हमें अपनी दुर्लब्ताओं एवं कमियों से छुटकारा पाना होगा | अपनी कमियों से छुटकारा पाकर ही हम एक स्वच्छ विचार-धारा के साथ जीवन को उत्कृष्ट कर सकते हैं ; साथ ही साथ अपने जीवन को सार्थक बनाने की ओर अपना कदम बढ़ा सकते हैं | यहां एक बात ध्यान में रखनी होगी कि हम मनुष्य ही पाप और पुण्य , सुख और दुःख , बुरे और अच्छे कर्मों का मुल्यांकन कर ने में सक्षम हैं | अगर हम ऐसा न कर पाते तब हम या तो देवता होते या तो फिर राक्षस होते | सीधी सी बात है कि हमारे उत्कृष्ट सदगुण हमें देवता की विभूति से नवाजते नजर आते और हमारे दुर्गुण हमें राक्षस कि उपमा दिलायेगे | चूंकि हम अच्छे -बुरे कर्मों का मिला-जुला रूप हैं इसी कारण हम मानव बन पाए हैं | मानव बने रहने हेतु हमें कुछ ऐसे काम करने होंगे जो हमें देव बनने योग्य पद तक पहुंचा सके | इस के लिए हमें अपने दुर्गुण छोड़ ने होंगे | अपनी मानसिक विकृतियों पर विजय पानी होगी | अपने आप का आत्म-निरक्षण करना होगा और साथ ही साथ दिनभर के कार्यों का ईमानदारी पूर्वक परिक्षण करते हुए आगे बढ़ना होगा | कब और किस कारण हम पर हमारी भावनायें हावी होती चली गई ? कब हमारे भीतर का आत्मबल डगमगाया ? क्या कभी हम से जाने – अनजाने में कोई चुक तो नहिं हो गई ? इन सब पर निगाह डालनी होगी | ईश्वर के सन्मुख बैठ अपने नुनाहो की माफ़ी मांगनी होगी |  प्रभु से क्षमा की याचना करनी होगी | यह तो हुई खुद को मानसिक रूप से तैयार करने की बात किन्तु मन की शुध्धि का एक और भी तरिका है ; वह है अपने आप को शारीरिक दंड देना | यानी स्वयं को शारीरिक दंड देकर अपनी अंतरात्मा को यकीन दिलाना| मुझे अपनी गलतियों का एहसास हो चुका है और आगे इन गलतियों को न करूं इस कारण में स्वयं को दंडित करने जा रहा हुं |

शारीरिक दंड के अलग-अलग तरीके :

१. रात में अपने आप को साक्षी मानकर कान पकड़ उठ-बैठ करना

२. अपने गाल पर खुद ही तमाचा मारना

३. एक दिन भूखा रह कर ईश्वर के नाम का ५ मिनिट जाप करना

४. कुछ वक्त के लिए मौनव्रत रखना

इन सभी दण्डो द्वारा हमारे भीतर सत्कर्म तो विक्सित होंगे ही साथ ही साथ हमारे भीतर से अभिमान, असंयम, अनियमितता जैसी विकृतियां भी दूर होंगी | वस्तुतः देखा जाए तो ऐसी प्रवृतियां हमारे संपूर्ण जीवन को बदल देती है | हम जानते हैं कि अश्रुपूर्ण पश्चाताप के पशचात हममे एक नई स्फूर्ति आ जाती है | मन शांत हो जाता है | गिलाशिकावे दूर हो जाते हैं | एक तरह से देका जाए तो हमारा नया जन्म ही होता है | सो आप भी इस तरीकों को अपनाएं और हर दिन नया जन्म , हर रात नई मौत के महामुले मंत्र को याद रखें |

 कमलेश अग्रवाल