Archive | दिसम्बर, 2011

वो दिन भी क्या दिन थे..!!

29 दिसम्बर

[*बचपन की यादें कभी भी भुलाई नहीं जाती  | जब भी अपने आप को तलाशतें है, हमारा बचपन हमारे सामने आ खड़ा होता है  | इस बचपन  के दिनों की  ही एक कविता में आप के सामने रख रही हूँ  | ]

कागज की नावों को पानी में बहाया करते थे ,

छत पर पापा हमे चाँद दिखलाया करते थे ,

लोरी गा कर माँ हमें सुलाया करती थी ,

सर्दी लग ने पर अदरक-शहद चटाया करती थी ,

हर साल छुट्टियों में दादी के घर जाते थे ,

भाई-बहनों के संग मिल, खूब उधम मचाया करते थे ,

रोज रात परी, राक्षस की दादी कहानियाँ सुनाया करती थी,

गरमा-गरम जलेबियों का मजा भी लुटाया करती थी ,

फिर मामा लेवाने आते थे ,हम नानी के घर जाते थे ,

वहाँ खूब पकवान खा-खा कर मोटे – ताजे बनते थे ,

नहीं रही है ये मस्ती, आज के बच्चो की जीवन शैली में ,

मौज मनाना, शोर मचाना… सपना सा है,

इनकी व्यस्त जिंदगानी में…(२)

कमलेश अग्रवाल

नशा : एक सामाजिक बुराई

22 दिसम्बर

एक बार घूमते-घूमते कालिदास बाजार गये | वहाँ एक महिला बैठी मिली | उसके पास एक मटका था और कुछ प्यालियाँ पड़ी थी | कालिदास ने उस महिला से पूछा : ” क्या बेच रही हो  ? “
महिला ने जवाब दिया : ” महाराज ! मैं पाप बेचती हूँ | “
कालिदास ने आश्चर्यचकित होकर पूछा : ” पाप और मटके में ? “
महिला बोली : ” हाँ , महाराज ! मटके में पाप है | “
कालिदास : ” कौन-सा पाप है ? “
महिला : ” आठ पाप इस मटके में है | मैं चिल्लाकर कहती हूँ की मैं पाप बेचती हूँ पाप … और लोग पैसे देकर पाप ले जाते है |”
अब महाकवि कालिदास को और आश्चर्य हुआ :”पैसे देकर लोग पाप ले जाते है ? “
महिला : ” हाँ , महाराज ! पैसे से खरीदकर लोग पाप ले जाते है | “
कालिदास : ” इस मटके में आठ पाप कौन-कौन से है ? “
महिला : ” क्रोध ,बुध्धिनाश , यश का नाश , स्त्री एवं बच्चों के साथ अत्याचार और अन्याय , चोरी , असत्य आदि दुराचार , पुण्य का नाश , और स्वास्थ्य का नाश … ऐसे आठ प्रकार के पाप इस घड़े में है | “
कालिदास को कौतुहल हुआ की यह तो बड़ी विचित्र बात है | किसी भी शास्त्र में नहीं आया है की मटके में आठ प्रकार के पाप होते है |

वे बोले : ” आखिरकार इसमें क्या है ? ”
महिला : ” महाराज ! इसमें शराब है शराब ! “
कालिदास महिला की कुशलता पर प्रसन्न होकर बोले : ” तुझे धन्यवाद है ! शराब में आठ प्रकार के पाप है यह तू जानती है और ‘ मैं पाप बेचती हूँ ‘ ऐसा कहकर बेचती है फिर भी लोग ले जाते है |

धिक्कार है ऐसे लोगों को…… !

आज का युवा , जीवन की वास्तविकताओं से बेखबर हो , अनजान रास्तों की भुलभूलेयों में भटक कर रह गया है | मात्र क्षणिक आनन्द के लिए अपने सम्पूर्ण जीवन को विनाश की ओर धकेल रहा है | समाज को  दीमक की तरह खा रही इसी नशाखोरी के हानिकारक परिणामों को ही इस कहानी में दर्शाया गया है ; शायद इससे ही चिंतित हो कर  अन्नाजी ने इस को खत्म करने की मुहीम छेड़ी है | कईयों  ने  इस पर नकारात्मक टिप्पणियाँ भी की क्योंकि वे भी इस नशाखोरी के शिकार जो हैं ..!! मेरा निजी तौर पर मानना है कि  ये मार्मिक कहानी  मुमकिन है कि ऐसी सामाजिक बुराईयों को रोकने में कुछ योगदान दे पाये| इसी कारण मैं ये लेख आप के सन्मुख रखने का प्रयास कर रही हूँ | मुझे पूर्ण विश्वास है कि युवाओं के लिए मेरे ये विचार सार्थक रहेंगे |

मादक  द्रव्यों  एवं पदार्थों के सेवन से होनेवाले नुकशान से कौन  अनभिज्ञ  है ? आज युवा पीढ़ी जिसके कंधों पर देश का भार  है, इन दुर्व्यसनों की शिकार होती जा रही है | युवावस्था में शारीरिक विकास हो रहा हो तब मादक द्रव्यों का सेवन शरीर को निष्क्रिय एवं अशक्त बना देता है | शराब, भांग, चरस, सिगरेट, तम्बाकू, बीडी, अफीम आदि के सेवन का प्रचलन इतनी हद तक हो गया है कि इसका उपयोग न करनेवालों को दकियानूसी समझा जाता है | यह एक विडम्बना ही तो है कि हम जानकर भी कि ये द्रव्य न तो टोनिक है, न ही किन्ही अर्थों में लाभकारी , फिर भी इसका उपयोग करते रहते हैं |ये सच्च है कि इससे दुखों से क्षणिक छुटकारा मिलने का आभास जरुर होता है पर वास्तव में दुःख मिटते नहीं हैं | वे तो जस के तस ही रहते हैं और हमे आर्थिक एवं मानसिक रूप से क्षति भी पहुंचाते हैं | अपने हाथों अपने ही विनाश को आमंत्रित करना क्या सही है ?

समाज का तथाकथित उच्च वर्ग स्वयं को आधूनिक तथा धनी प्रदर्शित करने के लिए इसका उपयोग करता है | शराब के सेवन को समृध्धि और फैशन का प्रतीक समझता है | परिणाम स्वरूप उस परिवार का बेटा / बेटी / बहु भी इस और अग्रसर होते हैं और मध्यवर्ग के अपने मित्रों को भी इस दलदल में घसीटते हैं | मध्यवर्ग के युवा इस चकाचोंध में अनजाने ही सामिल होते चले जाते है, इस लत के शिकार हो जाते है | धीरे धीरे इस लत के कारण आर्थिक तंगी आने लगती है और ये तंगी उन्हें गलत राह पर ला छोडती है ; जहाँ से वापस मुड़ना नामुमकिन सा प्रतीत होने लगता है  इस आदत के कारण उन्हें झूठ का सहारा लेना पड़ता है …और एक के बाद एक गलत आदतों के वे शिकार होने लगतें हैं | यानि यह कुसंगति एक परिवार से समाज, समाज से देश और देश से हमारी भारतीय संस्कृति को बर्बाद करती चली जाती है |

वहीं दूसरी और हम देखते हैं कि विद्या के मन्दिर समान विद्यालय जहाँ तरुण / तरुणी आदर्श जीवन का पाठ पढने जाते है वहाँ कुछ असामाजिक गुट ऐसे नशा प्रेरित पदार्थों का सेवन करने के लिए  मासूमों को अपनी जालमें फाँस ने का भरपूर प्रयास में लगे होतें हैं | जब ऐसे तरुण / तरुणी उनके जाल में फंस जाते हैं तब वे  नशाखोर बनते जाते हैं और तभी से शुरू होती है उनके पतन कि शुरुआत…उनकी बर्बादी की दास्तान..!!

नशाखोरी मानव जीवन की यात्रा का एक ठहराव या भटकाव मात्र है | जैसे जैसे शहरीकरण और औधौगीकरण बढ़ा है वैसे वैसे ये दुर्गुण भी बड़े पैमाने पर बढ़ता चला जा रहा है |एकबार इसकी शुरुआत होने के बाद व्यक्ति धीरे-धीरे गरीबी तथा बीमारी के कंटीले जाल में फंसता चला जाता है | उसके भीतर के  मनोबल, बुध्धि चातुर्य, धैर्य, तथा साहस क्षीण होते  चले जाते हैं | परिवार बर्बाद  होने लगता है | ये नशाखोरी उसे कहीं का नहीं छोडती | वस्तुत: इस तरह की बुराइयों से हमारा  युवावर्ग निकम्मा होता दिखाई दे रहा है | हमारी सभ्यता , संस्कृति नष्ट होती जा रही है |

अब भिन्न-भिन्न नशों का विषलेषण  एवम  होने वाली हानियों की ओर देखें तो पायेंगे कि हर वर्ष 14 अरब तो सिर्फ तम्बाकू के उत्पादन में ही स्वाहा हो जाते हैं | धुम्रपान के कारण करीब 1 से डेढ लाख लोग रोगग्रस्त हो जाते हैं | उनके इलाज में 20 लाख की राशि का सफाया हो जाता है | इन आदतों के कारण अन्य रोग जैसे कि टी.बी., कैंसर, दृष्टिदोष, दिल की बिमारी, मानसिक तनाव आदि भी लग जाते हैं जिस कारण देश आर्थिक बोझ का शिकार बन जाता है | वैज्ञानिक अनुसंधान से पता चला है कि जो व्यक्ति दिन में एक सिगरेट पीता है वह अपनी आयु में 5 मिंनट की कटौती करता है | 5 ग्राम तम्बाकू खानेवाला व्यक्ति अपने जीवन के दस साल कम कर देता है | उसे फेफडों का रोग भी हो सकता है |  

वैसे ही अगर अफीम की आदत हो जाये तो वह भी व्यक्तिको कहीं का नहीं छोड्ती | अफीम के सेवन से स्नायुतंत्र पर बुरा प्रभाव पडता है | वह व्यक्ति सुस्त, कमजोर व डरपोक  बनता जाता  है | मलत्याग में कठिनाई आने लगती है | खुब पसीना आने लगता है | उसकी मांसपेशियां शिथिल होने लगती है | अफीम की आदत उसे ये भ्रममें रखती है कि वह दुखों से छुट गया पर वैसा होता नहीं है | अफीम के कारण उसका मस्तिष्क अप्रभावि बन जाता है जिस के कारण वह ये महसुस करता है |वहीं भांग के सेवन से इंन्सान विवेकहीन होने लगता है | उसकी स्मरण-शक्त काफी हद तक प्रभावीहोती है | व्यक्ति हंमेशा अर्धमूर्छित अवस्था में गुमसुम पडा रहता है | कईबार वह अति आक्रमक भी बन जाता है | इस कारण परिवार की गरिमा को हानि पहूंचती है |

इस संबंध में कहना होगा कि नशा करने से व्यक्ति अगर अपने आप को आधुनिक बने दिखाना चाहता है तो वह उसकी गलती ही होगी | इन व्यसनों से दूषित कर, बिमारियों का हाथ थाम, समाज एवम परिवार पर बोझ बन, सामाजिक ढाचे को तितर-बितर कर अगर कोई अपने आप को आधुनिक माने तो उससे तो अच्छा ये होगा कि वह देशी ही बना रहे…!!  आधुनिकता का मतलब सभ्यता तथा संस्कृति का हनन करना ही हो तो मैं तो अपने आप को रुढिवादी कहना ज्यादा सही समझूगीं…!!

कमलेश अग्रवाल

आजकल रिश्ते इतने नाजुक क्यों ?

19 दिसम्बर

रिश्ते सिर्फ़ ढाई अक्षर से बना शब्द है पर अपनेआपमें  पूरी दुनिया समेटे हुए है | सच्च पूछो तो रिश्तों की शरुआत माँ और शिशु से होती  है | माँ और बच्चे का रिश्ता इस संसार में सबसे भावनात्मक  रिश्ता है| माँ के पेट से जन्म लेकर जब बच्चा इस फानी दुनिया में अपनी आँख खोलता है, तब उसकी गोद में कई मूल्यवान और पवित्र रिश्ते खुद-ब-खुद आ गिरते हैं, जैसे पिता, भाई, बहन आदि … इसके साथ न जाने कितने और रिश्ते जुड़ जाते है जैसे दादा-दादी, नाना-नानी, ताऊ-ताई, मामा-मामी इत्यादि ..

जैसे-जैसे वह अपने जीवन पथ पर आगे बढ़ता है , कई और रिश्ते उसकी जीवन बगिया में खिलते नजर आते हैं | ये रिश्ते उसने बनाये नहीं हैं पर सामाजिक रीति-रिवाज के कारण बन गये हैं…पति/पत्नी, बेटा/बेटी , सास/ससुर वगैरा | कुछ रिश्ते उसके साथ ऐसे जुड़े जो एकबार तो उसके साथ चलते दिखाई दिए पर बेनाम बन कहीं खो गये…दोस्त , प्रेमी/प्रियतमा जैसे..

इन सारे मानवीय रिश्तों के संग वह बढ़ता गया | उसे लगने लगा कि ये सारे रिश्ते उसके साथ पर्वत की भांति अविचल खड़ें हैं और नदी के बहाव में उसे  लहरों का सा आनन्द  दे रहें हैं | तभी अचानक एक दिन उसका ये ख्वाब टूटता नजर आने लगा  | उसे ये सारे रिश्ते बदलते से लगने लगे | वह सोचने पर मजबूर हो चला….क्यों ये रिश्ते बिखर रहे हैं ? कब और क्या भूल हुई जिसके चलते रिश्तों में दूरियां दिखाई दे रही हैं ? मैं नहीं बदला , लोग नहीं बदले तो फिर ऐसा क्या हो गया कि रिश्ते दम तोड़ते जा रहें है ?

उसे कहाँ पता था कि रिश्ते एक फल की तरह होते है | जब कच्चे होते हैं तो खट्टे होते हैं , उन्हें पका कर मीठा बनाना पड़ता है | मीठे फल में कीड़े जल्दी लगते हैं ; सो कीड़े न लगे उसका बड़ा ध्यान भी रखना होता है…!! भूल इतनी ही हुई कि जब रिश्ते निर्मित हो रहे थे तब वह इन बातों से बेखबर था | उसे ये जान लेना चाहिए था कि एक मजबूत रिश्ते को बनाने हेतु , उन रिश्तओं को पूर्णरूप से समजना बेहद जरूरी है | एक-दुसरे के प्रति आदर की भावना ही रिश्तों की जड़ें मजबूत कर पाती हैं | इन जड़ों को प्यार के पानीसे सींचना पड़ता है ; उनमें विश्वाशरूपी  खाद डालनी पडती है ; तभी वे सबल, समर्थ और संवेदनशील बन पाते हैं| अक्सर जब इन रिश्तों में अपेक्षाए, अनादर, क्रोध एवं हताशा पनपने लगती है तब ये रिश्ते बोझ से प्रतीत होने लगते हैं | बिलकुल एक आभासी प्रतिबिम्ब की तरह …सच्चाई से कोसों दूर …सिर्फ़ अपने होने का अहसास मात्र | ऐसे आभासी रिश्ते रेत पर बनी लकीरों की तरह होते हैं जो थोड़ी सी आंधी चलने भर से मिटते नजर आते हैं | रिश्तों की लकीरें पथ्थर पर खींचना ही सही रहता है , क्योंकि ये  लकीरें  जोरदार आंधी में भी मिट न पायेगी …!!

रिश्तों को तोड़ने की शुरुआत गलतफहमी के चलते ही होती है | ये गलतफहमी बहुत सी  कडवाहट  को अपने आप में समेटती जातीं  हैं | जब एक लम्बा अरसा हो जाता है तब इन रिश्तों में नफरत और क्रोध भी  कडवाहट बन आ मिलतें हैं , जिसके कारण रिश्ते कांच की किरचों की तरह बिखरते नजर आते हैं | ये कांच की किरचें हमे विहवल बना देती हैं और हम फिर एकबार उन बिखरी किरचों को जमा कर जोड़ना चाहते हैं | इन टूटे हुए रिश्तों को फिरसे पाना चाहता है , पर हमारा अहंकार , हमारी पूरानी भावना,  पर्वत बन आगे आ खडे  हो जाते हैं और एकबार फिर रिश्तें इस पर्वत से टकरा कर बिखर जाते हैं |

वास्तव में देखा जाए तो क्या रिश्ते कभी खत्म हुए थे ? शायद नहीं | उस की जड़ तो उस वक्त भी भावनाओं की गीली मिटटी में दबी ही पड़ी थी , उस उम्मीद से कि कभी न कभी पानी खाद मिलने पर वह फिरसे अंकुरित हो पाएगी..!!  जो भी हो , इतना तो मानना ही होगा कि रिश्ते टूटने के लिए नहीं होते | जो रिश्ते हमें विरासत में मिलते हैं , वे जब टूटते हैं तो बहुत गहरी चोट दे जाते हैं | क्योंकि उन्हें हमने बनाया नहीं था , वे अपने आप ही हमसे जुड़ गये थे | इससे भी गहरी चोट तब लगती है जब हमारे द्वारा बनाये गये रिश्ते  टूटते हैं | कारण  साफ़ है …इन रिश्तों को बनाने की हमारी कोई मजबूरी नहीं थी , ना ही उन्हें निभाने की | जाँच परख कर और ठोक बजाकर बनाये थे , फिर भी टूट गये ..आखिर क्यों ? कहाँ हमसे चुक हो गई  ? 

सही बात तो ये  है कि  ये रिश्ते पतंग और डोर की भांति हैं | ढील देने पर काफ़ी ऊंचाई पर पहुँते नजर आते हैं और थोडा सा खीचते ही कटते..!! कटी पतंग न जाने किसके हाथ आई होगी पर आप के  हाथों से तो दूर हो ही गई | मतलब अब समज में आया कि उसे खीचना ही गलती थी , शायद  ढील दी होती तो यों कटती नहीं | मैंने सुना है कि रिश्ते बनाने  जितने  आसन  हैं , उन्हें निभाना  उतना ही कठिन !!  ये ही कारण है कि आज तलाक के किस्से दिन -प्रतिदिन बढ़ते देखे जा रहे हैं | सयुंक्तपरिवार टूटते जा रहे हैं | राखी के बंधन खोखले और औपचारिक होते जा रहे हैं | झुलाघर और वृध्धाश्रम की संख्याएं रोज-ब-रोज बढ रही हैं |

आज जरूरत है इस विषय पर गौर करने की और ये जानने की कि आखिर वर्तमान परिपेक्ष्य में रिश्तों का ये हाल क्यों  है ? हमसे कहाँ चुक हो गई कि रिश्तों के मायने ही बदल गये …!!

वैसे तो मुझे पुरा यकीन है कि …

” दिलमें  रहनेवाले  दिल से नहीं निकलते ,

बदले  हजार  मौसम , रिश्ते नहीं बदलते ,

बदले  हजार  मौसम , रिश्ते नहीं बदलते ..”

कमलेश अग्रवाल 

लालची चिकित्सक

15 दिसम्बर

चिकित्सकों की लगी हुई है भरमार ,

फ़ीस और जांच से भरते जेबें बेसुमार ,

इतने से भी न होती उनकी हवस तमाम,

कर देते हैं वे मरीजों की श स्त्रक्रिया का एलान,

सुनिए, आपके मरीज का तो है बुरा हाल ,

करवाना होगा इनका आपरेशन तत्काल ,

हाथजोड़ बिनती करें मरीज के रिश्तेदार ,

साहब , क्या दवा से न होगा इन्हें आराम ?

टेड़ी कर नजर, वे बोले इस कदर….

” ले जाओ इन्हें यहाँ से तत्काल ,

न करो मेरा वक्त बर्बाद ,

करने हैं मुझे और भी बहुत से काम,

इनके दम तोड़ देने पर,

खामखाँ हो जाऊँगा बदनाम ..!!”

ये सुनते ही रिश्तेदारों की हलक में फंस गई जान ,

दौड़ पड़े वे करने पैसों का इंतजाम…!!

कमलेश अग्रवाल

मेरे पिताजी

12 दिसम्बर

हरदम देते मान सभी को

खुद रहते थे अमानी

परिवार की एकता पर

बन जाते थे अभिमानी

दुःख में कभी न घबराते

सुख में कभी न इतराते

राग-द्वेष से दूर रहकर वे

स्थितप्रज्ञता अपनाते

सादगी सा जीवन उनका

सौम्यशील व्यवहार

मधु-सम  वाणी थी उनकी

रखते थे उच्च विचार

करके उनकी याद आज भी

आँखें भर आती है मेरी

जहन में छा जाती मेरे

उनकी सरल सौम्य जिंदगानी

कमलेश अग्रवाल

कितनी कारगर औषधि है ये हंसी…!!

12 दिसम्बर

आज तनाव, मंहगाई, भागदौड़, उदासी, देखादेखी ने इन्सान की हंसी को डस लिया है . सच तो ये है की आदमी ने अपनी हंसी को तनाव एवं उदासी के पास गिरवी रख छोड़ा है. ये लेख के द्वारा मैं आप से गुजारिश करना चाहती हूँ कि आपकी ये आधुनिक जीवनशैली में आप गम्भीरता  को गले न लगायें. खुल कर हंसने का अभ्यास करें  और काका साहेब कालेलकरजी कि पंक्तियों को याद रखें 

भोजन आधा पेट कर, दोगुना पानी पिवा ,

तिगुन श्रम , चौगुनी हंसी, वर्ष सवा सौ जीव … 

हंसी प्रकृति का दिया एक अमूल्य उपहार है. हंसी एक इसी अचूक औषधि है जिसके द्वारा हम अपने आप में  शक्ति  एवं स्फूर्ति का अहसाश कर सकते हैं . दिलों में व्याप्त कसमकस से दूर हो सकते हैं. अपने अंदर छुपी कडवाहट को बाहर निकाल फेंकनेमें कामयाब हो सकते हैं. इसमें संदेह नहीं कि हंसी एक ऐसी प्राकृतिक व्यवस्था है, जो हमारे मन और तन दोनों को प्रफुल्लित रख सकती है. वैसे भी हमे एस पर  टेक्स थोड़े ही देना है जो हम हंसने में कंजूसी करें ? चिकित्सा विज्ञान ने भी शोध के जरिये ये पाया है  कि  एक मिनट की  हंसी  ४५ मिनट  के आराम के बराबर है.  स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय के  डा. विलियम फ्राय ने पाया कि २० सेंकेंड की खुली हंसी तिन मिनट के नौकाविहार के बराबर है. कैलिफोर्निया के डा. ली बर्क ने भी इस बात का समर्थन किया है और ये बताया है कि उन्मुक्त हंसी के क्या फायदे हैं ? नीचे उनका उल्लेख कर रहीं हूँ…..

१. हंसी हमारी रोगप्रतिकारक शक्ति को सक्रिय करती है

२. हंसी से हमारे शरीर के प्राकृतिक मारन कोशो में वृध्धि होती है , जिसके चलते वायरस जनित रोगों से हम बच सकते हैं

३. हंसी तनाव जनित होर्मोन्स को घटाती है  एवं  इम्युनोग्लोब्युलिन ऐ तथा  बी को  बढ़ाती  है जिस के कारण हम तंदुरस्त रह पाते हैं

४.  हंसी चहेरे की मांशपेशियों को मजबूत बनाती है जो चहेरेको झुरियों से बचाती है

५.  हंसी के कारण मस्तिष्क का तनाव कम होता है और नींद अच्छी आने लगती है

मतलब साफ़ है कि हमारा शरीर एक बड़ी केमिकल फेक्टरी है,  जिस कारण हर घड़ी कोई न कोई रसायन पैदा होते रह्तें है . साथ ही साथ हमारी हर भावना चाहे ख़ुशी  की  हो  या  गम की , रसायन में परिवर्तित हो हमारे शरीर पर अपना प्रभाव डालती रहती  हैं जिसके रहते  हमारे शरीर में रोग पनपते हैं.

अब्राहम लिंकन ने एक बार कहा था,” मैं इसलिए हंसता हूँ क्योंकि मैं चीखना नहीं चाहता ” उनके कहने का तात्पर्य था कि हमारा तनाव ही हमे चिडचिडा बनाता है और ये  चिडचिडाहट चीख बन बाहर निकलती है. ये कहना गलत न होगा कि जब हम खुल कर हंसते हैं तब हमारा शरीर, हमारा मस्तिष्क और हमारी आत्मा – तीनोंमें सामंजस्य स्थापित होता है जो हमे शांति  प्रदान  करता है ; शुकन देता है.  शायद इसलिए ही लाफिंग  बुध्ध  अपनी  संक्रमन  हंसी के लिए प्रसिध्ध है.

अर्थात हंसी द्वारा बिना विशेष श्रम व अभ्यास के हम अपने शरीर के विभिन्न तंत्रों को नियंत्रित एवं शक्तिशाली बना सकते हैं.गुस्से के वक्त ध्यान अवस्था को अपना सकते हैं और खुद को बीमारियों से बचा सकते हैं.  अगर मेरी बात में वजूद लगे तो आप भी जरुर हंसी को अपनाएँ.  खूब मुस्कराएं.  अपने आप को स्वस्थ बनाएं 

हंसी में है इतनी शक्ति ,

कर दे ये रोगों की छुट्टी 

जयहिंद

कमलेश अग्रवाल

योग का जीवन में महत्व

2 दिसम्बर

मानसिक तनावों से जर्जर होता आज का मनुष्य संतोष और आनन्द  की तलास में इधर-उधर भटक रहा है |शांति  का अहसास महसूस करने के लिए उतावला हो रहा है | वह अपनी जीवन बगिया के आसपास से स्वार्थ , क्रोध , कटुता , इर्षा , घृणा आदि के काँटों को दूर कर देना चाहता है | उसे अपने इस जीवन रूपी उद्यान में सुगंध लानी है | उसे उस मार्ग की तलाश है जो उसे शरीर से दृढ़ और बलवान बनाये , बुध्धि से प्रखर और पुरुषार्थी बनाये , भौतिक लक्षों की पूर्ति करते हुए उसे आत्मवान बनाये | निश्चित रूप से ऐसा मार्ग है | इसे भारत के एक महर्षि पतंजली ने योगदर्शन का नाम दिया है योगदर्शन एक मानवतावादी सार्वभौम संपूर्ण जीवन दर्शन है भारतीय संस्कृति का मूलमंत्र है |

इस भौतिकवादी , क्लेशमय जीवन में योग की सबसे अधिक आवश्कता है | थोड़ा-सा नियमित आसन और प्राणायाम हमें निरोगी तथा स्वस्थ रख सकता है | यम-नियमों के पालन से हमारा जीवन अनुशासन से प्रेरित हो चरित्र में अकल्पनीय परिवर्तन ला सकता है | धारणा एवं ध्यान के अभ्यास से वह न केवल तनावरहित होगा वरन कार्य-कुशलता में पारंगत भी हो पायेगा | हम अपने उत्थान के साथ-साथ समाज तथा राष्ट्र के उत्थान में भी सहभागी हो सकेंगे | 
बाबा रामदेवजी का कहना कितना सही है , ” जो रोज करेगा योग , उसे नहीं होगा कोई रोग “| योग न केवल शारीरिक क्रियाओं  को  सही करता है वरन आपके आध्यात्मिक विकास में भी सहायक होता है | जिसके चलते हम किसी भी बात पर अपना ध्यान केन्द्रित करना सिख जाते हैं | इस कारण हमारी साँस लेने की प्रक्रिया भी सही हो जाती है ; हमारे जीवन में काफ़ी स्थिरता , ठहराव तथा समज-शक्ति का अनायश ही उद्भव होता दिखाई देता है | हमारा शरीर दिन-प्रतिदिन सुडौल और स्फूर्तिदायी बनता जाता है |आलस हम से कोसों दूर भागती दिखाई देती है |एक नई उमंग , नया जोम हमारे अंदर उभरने लगता है | ये ही वजह रही होगी इस महामुल्य वाक्यों की जो स्वामी विवेकानंदजी ने कहे थे ..मानव जाती को विनाश से बचाने के लिए और विश्वास की और अग्रसर करने के लिए यह अत्यावश्यक है कि प्राचीन संस्कृति भारत में फिर से स्थापित की जाये जो अनायास ही फिर सारी दुनिया में प्रचलित होगी |यह उपनिषद और वेदांत पर आधारित संस्कृति ही आंतर-राष्ट्रिय स्तर पर एक मजबूत नींव बनकर उभरेगी …आज हम देख रहे हैं कि दूरदर्शन एवं शिबिर-केन्द्रों के माध्यमोंसे सारी दुनिया योग की दिवानी बनी दिखाई दे रही है |योग ही तो है जिसने हमे भीतरी और बाहरी प्रकृति को वश में करना सिखाया | आज हम जान गये हैं कि खुद हृष्ट-पृष्ट रहना है तथा दूसरों को भी  हृष्ट-पृष्ट बने रहना सिखाना है |
यों  देखा जाये तो हमारी भगवत-गीता भी तो अपने आप में योग की एक परम पाठ्य पुस्तक ही तो है | मुल्त: कृष्णा द्वारा अर्जुन को सांख्ययोग  तथा कर्मयोग के बारे में ज्ञान देना क्या योग ही नहीं है ? भगवत-गीता का हर आध्याय कर्मयोग , भक्तियोग , ज्ञानयोग , त्यागयोग ,ध्यानयोग का ही तो परिचायक रहा है |इन्हीं सिध्धान्तिक योगों  के माध्यम से ही तो अर्जुन अपने  शारीरिक , प्राणिक , मानसिक , भावनात्मक एवं आध्यात्मिक पहलुओं को पहचान पाये थे | सफलता और विफलता का पथ देख पाये थे !! विषम मन:स्तिथि में अपना संतुलन बना पाये थे  !! मुस्लिम भाइयों के नमाज की जो पध्धति है वह आसनों पर ही तो आधारित है | बौध-धर्म की विपश्यना भी तो योग पर ही आधारित है |सुबह सूर्यनमस्कार करने का जो हमारे शास्त्रों में   कहा गया है वह सभी आसनों का पर्याय ही तो है |  हर धर्म पुस्तक में मन की शांति के लिए योग का कहीं न कहीं उपयोग देखा ही जाता है | 
आधुनिक युग में योग का महत्व और भी बढ़ गया है क्योंकि हमारी व्यस्तता और भागदौड़ भरी ज़िदगी ने हमे रोगों से घेर दिया है | आज हम देख रहें हैं कि मधुप्र्मेह ,रक्तचाप , सिर-दर्द , छोटी उम्र में बालों का सफेद होना आदि जैसे आम रोग देखे जा रहे हैं | अत्यधिक तनाव , प्रदुषण , कमाने की चिंता इत्यादि ने इन्सान को रोगग्रस्त बना छोड़ा है | आज युवाओं में कम महेनत में ज्यादा पाने की होड़ ने उन्हें अविवेकी बना छोड़ा है और इसी के चलते  नौकरी  प्रतिस्पर्धा का दूषण बन कर रह गई है जो बेवजह ही युवाओं में एक ल्घुता-ग्रन्थि को पनपा रही है ; उन्हें कम उम्र में ही तनावग्रस्त कर रही है | हर व्यक्ति आगे बढ़ना चाहता है | ऊँचाइयों को छुना चाहता है | वैभवी बनना चाहता है |ये सब पाने के लिए उसे आंतरिक उर्जा चाहिए और इसका एक ही सशक्त मार्ग है योग | योग व्यायम नहीं , योग विज्ञानं का चौथा आयाम है |
हमारे  पूर्वजों ने शरीर को एक मन्दिर मानकर उसकी नियमित पूजा कैसे की जाये उसका पूरा-पूरा विधान बताया है | योग का अर्थ ही जोड़ना होता है | हमारा शरीर पाँच इन्द्रियों के समन्वय से ही कार्य करता है |  कान , त्वचा , आँख , जीभ व नाक क्रमश: एकदूजे के पूरक हैं | अगर नाक द्वारा शुध्ध हवा को सही तरीके से ली जाये तो शरीर की और सारी इन्द्रियां जुड़ कर अपना-अपना कार्य व्यवस्थित करने लगती है | शरीर को पूर्ण मात्र में उर्जा प्रदान करती है | कितना सरल उपाय !! ये जो साँस की रिधम है , उसी को “प्राणायाम ” कहते हैं | प्राणायाम  योग की एक बहुत महत्वपूर्ण कड़ी है जिसको आपनाके हम बिना पैसे खर्चे अपने आप को निरोगी रख सकते हैं |  हिंग लगे न फटकरी , रंग चढ़े चौखा | बस अपने आप को इसके लिए तैयार करने भर की जरूरत है | ये नियम आप को रोगों से तो बचाएगा ही पर आप के आत्म-विश्वास को भी बढ़ाएगा |
आखिर में मैं यह कहना चाहूंगी कि योग एक ऐसी अमूल्य औषधि है जो बिना मूल्य आप को स्वस्थता प्रदान कर सकती है | आप को शक्तिवर्धक बना सकती है | आप का आत्म-विश्वास बढ़ा सकती है और स्वस्थ शरीर का आशीर्वाद भी दे सकती है | उठिए योग के महत्व को जानिए , पहचानिए  और जीवन में उसे अपनाइये |
योग है जीवन की धारा ,
जिसने जाना, उसने माना 
सब का इसने  जीवन तारा ,
रोगों से हों मुक्त सभी ,
ये  बिनती मेरी आपसे अभी |

कमलेश अग्रवाल