Archive | जनवरी, 2012

नए चांद की बांहो में पुराना चांद

24 जनवरी


 

अपनी सांसे बचाकर रखना

अपनी आंखोका नुर बचाकर रखना

अपनी नजरोको उठकर रखना

इस नजारे को आंखों में बसाकर रखना

 इस बार 26 जनवरी की शाम चांद और शुक्र ‘एक साथ’ नजर आएंगे। नेहरु केंद्र स्थित नेहरु तारामंडल के निदेशक अरविंद परांजपे (मुंबई) ने बताया कि इन दिनों शाम ढ़लने के बाद अंधेरा होने पर शुक्र को पश्चिमी क्षितिज के उपर शानदार तरीके से चमकते हुए देखा जा सकता है।

अर्धचंद्राकारचांद के आकाश में नजर आने पर लोग चांद के उस भाग को भी देख पाएंगे, जो सूर्य की रौशनी से प्रकाशित नहीं होगा बल्कि धरती से प्रतिबिंबित होने वाली सूर्य की रौशनी से प्रकाशित होगा।

इस बार कविता की पंक्तियांये होंगी….

नए चांद की बांहो में पुराना चांद देखा,

धरती पर एक अनोखा नजारा देखा,

आंखों को पटपटाते हुए आज हमने,

हुश्नको हंसते खिलखिलाते देखा……!!

कमलेश अग्रवाल

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आधुनिक परिभाषाएं

13 जनवरी

जीवन रूपी नौटंकी में कुछ किरदारों को बखूबी निभाने के लिए  कुछ महिलाओं द्वारा ,आज के वर्तमान परिपेक्ष्य में  अमूल्य आधुनिक परिभाषाएं सामने आई हैं , जिन्हें मैं आप के सन्मुख पेश कर रही हूँ I

धर्मपत्नी 
 पत्नी होने की अपनी जवाबदारी को केवल पार्ट टाइम जॉब मानें | भूलकर भी पति या उनके परिवारजनों द्वारा बताये कार्य में  अपना तन या मन ना लगायें | ” पति परमेश्वर ” के मन्त्र को मन में जगह न दें | उनके परिवारजनों को भूलकर भी इतनी हवा न दें कि वे आप से एक बेटी या बहन जैसी उम्मीद लगा बैठें | पति की हैसियत से ज्यादा खर्च करने की ठान लें और पूछने पर कहें कि आप को उनके स्टान्डर्ड की बहुत परवाह है | आप उन्हें दुनिया में एक उच्च स्तर पर बिराजे देखना चाहती हैं ..!! वक्त आने पर उन्हें, अपनी दूसरी सखियों द्वारा हो रही खरीदी का व्योरा देना कतई न भूलें | अपना वक्त पति के साथ कम  और  सहेलियों के साथ ज्यादा बिताने लग जाएँ | ये सब करने पर ,आप भी अपने आप को आधुनिक धर्मपत्नी के रूप में खड़ा पाओगी…!!
सास 
सास बनते ही प्रथम कार्य होना चाहिए कि आप अपनी ममता का वास्ता दे, सुबह-सुबह ही अपने  बेटे को पास बिठाकर उस पर दुनिया भर का प्यार उड़ेल दें  | बहु की तारीफ करते हुए चाय अपने हाथों से बनाकर लाने का सुझाव रखें  (बनानी तो पड़ेगी नही, क्योंकि बहु ने अपनी तारीफ जो सुन ली ..!!) बहु के रसोई में जाते ही बेटे को उसे बड़ा करने में कितनी परेशानी का सामना करना पड़ा था , इस बात को इस तरह रखें कि सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे | एक बात को सही सही समझ लें  कि बहु का जितना अपमान आप कर सकें और उसे जितनी जली कटी सुनाने की प्रेक्टिस अपने में पनपा सकें , उतना ही सास की भूमिका का आरोपण आप में होता चला जायेगा , बस एक बात का ध्यान रखना होगा कि आप की इस चाल की भनक बेटे को न हो ..!! बेटे के सामने अच्छी सास का नाटक जारी रखते हुए अपनी ममता कि भभूत बेटे पर छिडकना न भूलें | बेटा बहु कि मोहिनी का शिकार न बन जाये ,उसका पूर्ण रूप से ध्यान रखें या रखवाएं | ये सब करने पर ही तो  आधुनिक सास  की भूमिका आप निभा पाओगी…!!
बहु 
आप को एक बात का ध्यान रखना होगा कि गृहलक्ष्मी का रोल ज्यादा दिन न निभाकर  ,जल्दी ही दुर्गा के रोल में अपने आप को सेट कर लें  | अपनी सास, ननंद , जेठानी आदि पर अपने होने का बार-बार अहसास दिलाते हुए उन की डोर खिंच कर रखें | इसके लिए ज्यादा शक्ति का इस्तमाल न करें …सिर्फ़ थोड़ी सी बदतमीजी एवं थोड़ी सी नवाबी की आदत डाल लें | बार-बार अपने ज्यादा पढ़ें लिखे होने का उन्हें अहसास कराएँ  | उनकी जरा सी गलती को जोर-शोर और आत्मविश्वास के साथ परिवारजनों के सामने रखना न भूलें| पतिदेव के पद चरणों की आहट को अच्छी तरह जान लें और उसका वक्त आने पर भरपूर उपयोग करें | पति की अनुपस्थिति में कोई न कोई बहाना बना कर कम से कम काम करने का उपाय सोच लें और पति के पद चरणों की आहट सुनते ही अपने आप को इतना व्यस्त बताने की ऐसी चाल चलें कि पति कमरे में आप से नजर मिलाये तो उन नजरों में आप के थकान की कसीस आप देख पायें | अगर सास या ननंद पति के करीब आने की कौशिश करें तो दयामयी मूर्ति बन आँख में तरलता ला दें ताकि वे पति से आप की चालाकी का जिक्र करने से डर जाएँ …!! ये नुश्के कुशल आधुनिक बहु के रूप में आप को जरुर शाबाशी  दिलवाने में कारगर सिध्ध होंगें …!!
बहन 
एक भाई की आप बहन हो बस इतना ही आप को याद रखना है | सालमें एकबार भाई कि कलाई पर राखी बांध आपने उसे अपने प्यार का कायल बनाना है | आप को भूल जाना है कि आप अपने ससुराल में अपनी ननंद व सास से कैसे व्यवहार करती हैं , आप को तो बस अपनी जीवन भरकी कुंठा के हथोड़े के प्रहार निर्भय होकर अपनी भाभी पर करने हैं | जब भी ससुराल से उब जाओ , मायके आ कर , भाभी और भाई की खुशहाल जीवन  में दिया सलाई लगानी है , पर यह बताना नहीं भूलना की तुम्हें तो दिया सलाई का पता ही नहीं ; क्योंकि तुम  तो लाइटर का ही प्रयोग करना जानती हो  ..!! भाभी को बार-बार ये कहती रहो कि भाई पर तुम अपनी जेब खर्ची को कितनी बार लुटाती थीं…!! मतलब कि आप का पूर्ण अधिकार है भाई की कमाई  में …!! खूब खरीदी करो और “भाई हो तो ऐसा “ इस मन्त्र का जप कर ना न भूलो | यकीनन आप आधुनिक बहन की भूमिका बखूबी निभा पाओगी ….!!  
अगर आप भी आधुनिकता का जमा ऐसे ही और किरदारों को पहनना चाहते हो तो अपने व्यक्तव्य जरुर लिखें …..COMMENT का स्थान रिक्त है जिसे आप को भरना है ….
( ** ऊपर दी गई  परिभाषाएं आधुनिकता पर  कटाक्ष है |आप  के  घर में तो इसका चलन नहीं है न …!!मान लो अगर है तो अभी से सावधान हो जाइए  |)
कमलेश अग्रवाल

क्या स्वन्त्रत भारत में इतने सालों बाद भी हम आजाद हैं ?

9 जनवरी

 हर १५ अगस्त के दिन हम सब मिलकर भारत की स्वतंत्र दिवस की सालगिरह मनाते हैं | हमारे देश के कर्णधार लोकलुभावन एवं लालचयुक्त भाषण दे ; झंडा रोपण कर एक रस्म अदायगी पूरी करते नजर आते हैं | ये उनके द्वारा कर्तव्य निभा देने की क्रिया मात्र की पूर्ति ही होती है | प्रश्न ये है कि क्या इतने सालों बाद भी सही अर्थों में हम आजाद हुए हैं ? आजादी दिलवाने वाले हमारे देश के  पूर्व नेताओं की अपेक्षाएं और पूर्वानुमान पुरे हो पायें हैं ? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम स्वराज तो ले आये पर सुराज से आज तक वंचित हैं …!! क्यों कि हम आज भी अपने ही घर में अपनों के हाथों ही परतंत्रता की बेड़ियों से जकड़े हुए हैं | राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी ने स्वराज के वक्त कहा था ,” अब हमें हर आँख के आंसू पोंछने होंगें | जब तक ये कार्य पूरा न होगा , तब तक हम सही अर्थोमें आजाद नहीं है |” इस का समर्थन पंडित नहेरुजी ने उस वक्त हुई संसद सभा में भी किया था | पर ये हो नही पाया | विडम्बना तो ये है कि आज तो हमारी राजनैतिक व्यवस्था ही चरमरा गई है | आज लोकनेता , राजनेता और कुर्सी पर बिराजे हमारे प्रतिनिधि लोगों को बेवकूफ कैसे बनाया जाये उसी फ़िराक में लगे नजर आते हैं | उन्हें सिर्फ अपने निजी स्वार्थ हेतु प्रजा अशिक्षित रहे , अंधकार में डूबी रहे , भुखमरी एवं गरीबी बढती रहे तथा प्रजा मुर्ख बनी रहे , उसी में अपना फायदा दिखाई देता है | यही कारण रहा होगा, जार्ज बर्नाड के इस कथन में ..अगर जनता मुर्ख होगी तो उसके द्वारा चुने गए प्रतिनिधि अवश्य ही धूर्त होंगें | शायद यही कारण है कि इतनी लम्बी अवधि के बावजूद भी हम गरीबी से मुक्त नहीं हो पाये..!! शिक्षा जो लोकतंत्र की जीवाडोरी है , वही काफी कमजोर है | पहले तो उसे मजबूत करना होगा | शिक्षा के आभाव के चलते ही हमारी जनता के एक बड़े वर्ग को आज के प्रतिनिधि मुर्ख व बेवकूफ बनाने में सफल होते दिखाई दे रहे हैं | इतना ही नहीं , हमारी जनता में शिक्षित वर्ग में भी बड़ा प्रतिशत वर्ग सिर्फ अक्षरज्ञानी ही है | उनमें लोकतान्त्रिक देश के नागरिक होने वाली सही समज , सही दिशा की बेहद कमी है | वे पढ़े लिखे और प्रमाण-पत्री जरुर हैं , पर लोकतान्त्रिक देश में मिलने वाले अपने अधिकारों से अनजान हैं | भारत की आजादी के साथ-साथ जो अमलदारशाही , नौकरशाही  हमारे देश में आ गई है , उसने अपने ही देश नेताओं से अपने देशवासियों पर तानाशाही का हथियार चला, उनके जीवन में पीड़ा, दुःख, दर्द और तडप भर दी है | आज देश में परतंत्र  देशोंसे भी ज्यादा भ्रष्टाचार , रिश्वतखोरी , घोटाले आदि देखने को मिल रहें हैं | यह कैसी विवशता है कि कृषि प्रधान देश के किशान आज आत्महत्या करने पर मजबूर हो चलें हैं..!! संसद में हमारे पश्नों को उठाया जाये ,उसके लिए भी हमें अपने देश नेताओं को रिश्वत देनी पडती है ..!! विदेश जाने के लिए हमारे ही राजनेता कबूतरबाजी करते नजर आ रहे हैं ..!! गरीबी हटाओ का ढोल पीटनेवाले, अपनी गरीबी मिटाने की फ़िराक में धूमते दिख रहे हैं ..!! शासन के नजर तले ही अपराधीकरण बढ़ता जा रहा है ..!! राजनीति और अपराधीकरण एकदूसरे के पूरक बनते जा रहें हैं ..!! इतना देख ने के बाद भी हम आजाद हैं ..?

मैं आप से ये पूछना चाहती हूँ कि पढाई की गुणवत्ता में हेराफेरी , उसमें आरक्षण की तरफदारी , अपराधीकरण , भ्रष्टाचार , रिश्वतखोरी , बेरोजगारी , हत्याएं , डकैतियां , लूटपाट , बालात्कार तथा भुखमरी के होने को ही अगर आजादी कह सकते हैं तो हम बेशक आजाद हैं | सही अर्थों की आजादी सिर्फ़ आर्थिक विकास के आंकड़ों को आसमान तक छुआते दिखाना या आंकड़ों के तहत नारी-शिक्षा का प्रचार करना या गरीबी -भुखमरी के कम हो जाने का ढोल पिटवाने से नहीं मिलती ; सही आजादी का मतलब है कि हर नागरिक को रोटी ,कपड़ा और मकान मिले | हर हाथ को काम मिले | हर बच्चे को शिक्षा मुहिया कराई जाये | हर एक को चिकित्सा की सुविधा मिल पाये | ये सब होने पर ही हम सही अर्थों में अपने आप को आजाद कह पायेगें | पूर्व प्रधानमंत्रीजी श्री अटलजी ने कहा था ,” स्वंत्रत भारत में हर व्यक्ति सुखद नींद सो सके , ऐसा कुछ हमें कर दिखाना है | बापू के आदर्शों को पूरा करना है |” इसी सोच को लेकर ही उन्हों ने सभी नदियों को साथ मिलाने की योजना का विचार किया था ताकि हमारे रेगिस्तान बने इलाकें भी आबाद हो सकें | वे भी हरियाली से समृध्ध हो सकें | आज राष्ट्रिय ग्रामीण स्वास्थ्य गठन , ग्रामीण पंचायत राज्य व देश को हर तरह से जोड़े रखे ऐसी परिवहन योजना की सोच शायद आने वाले सालों में हमें सुराज के दर्शन करा पाए | आज नारी स्वतन्त्रता , बाल कल्याण योजना जैसी योजनाओं का अमलीकरण जरुरी है , न की सिर्फ़ और सिर्फ़ वोट बैंकों को खड़ा करना ..!!

आज जरूरत है भ्रष्टाचार नाबूद करने की , देश को धर्मनिरपेक्ष बानाने की , भेदभाव व जाति-पाति को दूर करने की , अंग्रेजों की डिवाइड और रुल पध्धति को नेस्तनाबूद करने की | हमे चाहिए कि हम धर्म के नाम हो रही राजनिती को उखाड़ फेंकें | आज अगर जरूरत है तो हिन्दू, मुस्लिम,सिख, ईसाई न बन ; सिर्फ़ भारतवासी बने रहने की |चक दे इण्डिया फिल्म के हार्द को जानने की | एक साथ खड़े होने की …चुनावी प्रक्रिया को आत्मसात करके, उसे सही जामा पहना ने की | हर भारतवासी को शिक्षित करने की | अगर हम इन बातों में कामयाबी हांसिल कर पायें , तभी हम सही अर्थों में आजद हो पायेंगें , अन्यथा कवि श्री रामधारी सिंह के वे बोल दोहराते रहेंगें …

” चंदन लेपुं किसे , सुनाऊ किसे मंगलगान,

सामने खड़ा है , मेरा भूखा हिन्दुस्तान …”

कमलेश अग्रवाल

नये साल की बहुत-बहुत बधाई

3 जनवरी

२०११ समाप्त हुआ और २०१२ नई उम्मीदों को साथ ले हमारे सामने आ खड़ा हुआ| कई व्यक्तियों को २०११ कई हसीन यादें दे गया होगा और कईयों को कुछ उदासी भरी यादें | समय कभी रुकता नहीं है , ना ही वह ठहरना जनता है !! आप उसे  पकड़ लेते हो तो वह आप के संग-संग चल पड़ता है और अगर नहीं पकड़ पाते हो तो वह आप को पीछे छोड़, कहीं दूर निकल जाता है, उसे पकड़ पाना हमारे लिए सम्भव नहीं है | मतलब कि आप को उसके मुताबिक चलना होगा | कईबार दौड़ ना भी होगा | रफ्तार उस  की और जीवन की गाड़ी आपकी …!! जो ये नहीं समझ  पाते वे जिन्दगी में काफ़ी पिछड़ जाते हैं और जो इसे समझ  लेते हैं, वे कुछ कर जाते हैं | सो आप भी २०१२ में समय को साथ ले चलें और आपकी हर तमन्ना तथा हर मुराद पूरी हो इसी कामना के साथ आप को ये नया साल मुबारक 

मैं तो प्रभु से ये ही प्रार्थना करूंगी कि ये नये साल २०१२ में … 
१. देश में जो भ्रष्टाचार की मुहीम शुरू हुई है वह  पूरी हो और शासन में बैठे हुए हमारे प्रतिनिधी, देशवासियों में उठ रहे जनून और असंतोष से रूह-ब-रूह हों या खमियाजा भुगत ने को तैयार रहें |
२. मंहगाई कम हो ताकि गरीबी रेखा के नीचे जीने वालों को कम से कम दाल रोटी तो मिले |
३. युवा जो नौकरी कि तलाश में दर -दर भटक रहा है , उसके हाथों में काम हो |
४.  पुरुष – दिवस को मनाने कि क्या कभी जरूरत हुई है ? नहीं ना, क्योंकि उन्हें तो   जरूरत से ज्यादा ही सन्मान मिल रहा है …मैं चाहती हूँ कि इस नये साल में महिला-दिवस को मनाने कि नौबत ही न रहे | सही अर्थों में अगर उन्हें मान-सन्मान मिले | मेरे इस विचार पर जरा गौर कीजियेगा |
५. भारतीय संस्कृति का प्रचलन सारे जहाँ में हो |
६. हर माँ-बाप बुढ़ापेमें अमन चैन से जियें |
७. हर बच्चे को माँ का स्नेह, उसकी गोद  और भरपूर  समय मिले | 
८. हर पिता  अपने बच्चों कि कम से कम न्यूनतम जरूरतों को पूरा कर सके |
९. देश में हर जगह खुशहाली दिखाई दे कम से |
१०. विदेशोमें रखे नोट हमारे देश में वापस आये …!!
शायद आप भी यही सब चाह रहे होंगें | आप भी ईश्वर से मेरी ही तरह इन सब के लिए प्रार्थना करोगे ना ….
धन्यवाद ….नये साल की बहुत-बहुत बधाई …
कमलेश अग्रवाल 

अद्भुत एवं अद्वितीय एकांत

1 जनवरी

अवनी सोच रही थी कि उस का बड़ा सा घर है | नौकर -चाकर हैं | अच्छे पढ़े लिखे और काफ़ी अच्छा वेतन ले रहे बच्चे हैं | पति भी बहुत सलीकेदार और उधमी हैं | ये सब कुछ होने पर भी क्यों उसे कभी-कभी खालीपन प्रतीत होने लगता है? क्यों उस पर कईबार उदासी सी छा जाती है ?  वह इस का उत्तर ढूंढ़ ही रही थी कि नवेदीता उस के यहाँ आ पहुंची | कहने लगी भई किस सोच में पड़ गई हो ? बहुत गहन विचारों में हो क्या ? हम भी तो जाने..!! अवनी ने मुश्कराते हुए कहा..कुछ खास नहीं , यूँ ही  सोच रही थी कि क्यों मुझे कभी-कभी खालीपन प्रतीत होने लगता है ? किसी तरह चैन नहीं पड़ता ..!! न खड़े बन पाता है , न पड़े | अवनी की बात सुन नवेदीता हंसी , कहने लगी, ” धत तेरे की ..इतनी सी उलझन !! मैं बताती हूँ ऐसा क्यों होता है ? क्यों कि तुम ज्यादा सोचती हो ..!!” दोनों हंस पड़ी | ये खालीपन सिर्फ़ अवनी को ही नहीं खलता , हमे भी कईबार इस का अहसास जरुर हुआ होता है |

आज की भागदौड़ की जीवन शैली में किसी के पास वक्त नहीं है , ऐसे में अकेलापन खलने लगता है | अगर आप इस अकेलेपन को सकारात्मक नहीं लेते हो तो ये आप को डिप्रेसन में ले जायेगा | सो हमें अपनी सोच बदलनी होगी |  मेरा तो मानना है कि अकेला होना हमें अपने आप को समायोजित करने में तथा  नियमित बनाने में अहम भूमिका निभाता है |  एकांत में हम ज्यादा द्रढ , ज्यादा संतुष्ट और अनपे आप को पहचानने कि क्षमता ला सकते हैं , जो की भीडभाडमें मुमकिन नहीं है |
न शोर, न शब्द …कितना अच्छा लगता है ये एकांत |  हवा की झुरमुर – झुरमुर आवज सुनाई दे और उसके गुलाबी  झोंको से पेड़ों की डालियाँ झूम उठती दिखाई दे  | सुबह होते ही सूरज की किरणें हमे उठायें और  उसकी सिंदूरी आभा को साथ ले पूरब दिशा हंसती हुई  हमारे सामने आ खड़ी हो | पंछियों की मीठी -मीठी सरगम कानों में गूंजती हो और उसके साथ ही भंवरें फूलों पर मंडराते दिखाई दे , साथ ही साथ फुल भी  उन्हें देख अपनी महेक से हमारे मन को प्रफुल्लित कर रहें हो …क्या ये प्रकृति का नजारा भीड़ में देख पाओगे ? नही  न …तब एकांत से डर क्यों?
सच्च पूछो तो आज तो इंसानों की भीड़ में खुद को खोजना ही मुश्किल हो गया है | इन्सान दुन्विय बन सबके लिए अच्छे से वक्त निकाल लेता है, चाहे मनसे  या अनमने मन से ही पर खुद अपने लिए उसके पास वक्त नहीं …!! ये कैसी विडम्ना है ?
शायद आप को ज्ञात होगा कि आजकल डोक्टर मरीज को दवाओं के रूप में एक सलाह देते हें कि थोड़े दिन के लिए पेपर, दूरदर्शन , मोबाइल फोन से अपने आप को काट, कहीं दूर चले जाओ और अपने आप में मस्त रहने कि कोशिश करो , हो सकता है कि आप को दवाई की जरूरत ही न पड़े | क्यों ऐसा कहा गया ? क्योंकि हकीकत में , कोई बीमारी है ही नहीं |  अगर जरूरत है तो मानसिक शांति  की जो  आधुनिक परिप्रेक्षय में  हांसिल नहीं हो पाता ..!! मानसिक शांति के लिए जंगल में जाने की जरूरत नहीं है , बस जरूरत है तो अपने आप में खो जाने की | आशय ये है कि, सब को भुला कर खुद के साथ रहना | आँखे बंध कर बाहर के तमसों से अपने आप को दूर रख कर अपने भीतर में खोजना | ऐसा करने से आप को मानसिक आराम मिलेगा | आप के विचार समृध्ध, रचनात्मक, बहुयामी और मानसिक शुकून देनेवाले बन पायेगें | हरदम लोगों से धिरा रहना या हर समय दूसरों से सम्पर्क में बने रहने के चलते हमें सोचने-विचारने का समय ही नहीं मिलता है और ये ही वजह है कि हम कईबार तेज रफ्तार जिन्दगी से तंग आ जाते हैं | मेरा मानना है कि अगर हम प्रकृति के करीब रहें और जीवन के प्रति नेक आस्था रखें तो हमारे कई अनसुलझे प्रश्नों को सरलता से सुलझा सकते है | यह तभी मुमकिन हो सकता है जब हम एकांत की उपलब्धियों को जानें , उन्हें समजें , साथ ही साथ उन्हें पहचानें | एकांत से रुह-ब-रूह हो उसका मजा लें | अपनी वैचारिक प्रक्रिया को निरंतर बनाये रखें | विरक्ति के इस युग में अगर कोई अपना हो सकता है तो वह एकांत ही होगा …!!

कमलेश अग्रवाल