Archive | फ़रवरी, 2012

अर्श से फर्श तक कब पहूंची नारी ?

29 फरवरी

प्राचीनकालीन समाज मातृसतात्मक समाज होता था। औलाद को माँ के नाम से जाना जाता था। इसी कारण महाभारत में पांडव कुंतीपुत्र और कर्ण राधेय के नाम से पहचाने जाते थे । समाज में पुरुष की अपेक्षा नारी को अधिक माना जाता था । नारी को हर अधिकार दिये जाते थे ।

धीरे-धीरे समय बदला, युग बदले, सामाजिक नियम व परंपरायें बदलीं । मध्यकालीन युग में आते-आते नारी अर्श से फर्श तक आ पहूंची । पुरुष ने समाज पर अपना अधिपत्य जमा लिया । नारी पर पाश्विक जुर्म होने लगे । नारी ने इसका विरोध करना छोड़ , इसे अपनी नियति मान पुरुषकी अधीनता स्वीकार कर ली । बाल्यकाल में वह पिता के, युवावस्था में पति के व वृद्घावस्था में पुत्र के अधीन रह जीवन बिताने को विवश हो गई । अब उसे मात्र माँ के रूप में ही थोडा बहुत सम्मान मिलने लगा । नतीजा यह हुआ कि हर काम  उसे पुरुष की इच्छा के अनुसार ही अब करना था । धीरे-धीरे वह तनावग्रस्त होती चली गई । उसके इस तनाव ने उस में कुछ बदियों को पनपाया । वह घरमें ही रह्कर घर की दूसरी नारियों से बात-बात में उलजने लगी ; जली-कटी सुनाने लगी और धीरे-धीरे उसके अंदर राग-द्वेष पनपने लगा ।

आपसी द्वेषके चलते  वह दूसरी नारी (सास-बहू, भाभी-ननद) से द्वेषभाव रखने लगी, एक-दूसरे को छोटा दिखाने के लिए लड़ती रही । वह ये भूल गई कि एक रेखा को छोटा तभी किया जा सकता है, जब उसके समीप एक बड़ी रेखा खींच दी जाए, मतलब कि खुद में बडपन को पनपाकर ही वह बडी बन सकती है, नहीं कि दूसरों को नीचा दिखाकर । पुरुष-वर्ग ने इसका भरपूर फायदा उठाया । धीरे-धीरे सभी सामाजिक, धार्मिक एवम आर्थिक अधिकारों पर पुरुष काबिज होते चले गये ।

मतलब की पुरुषसत्ता का नारीसत्ता पर हावी होना व उसकी दूर्दशाका होना मात्र इत्फाक न था बल्कि उसकी ही नादानी का नतीजा था । उसकी भावुकता एवम आपसी रागद्वेषने ही उसकी आजादी की डोर पुरुष के हाथों में थमा दी । समय-समय पर अपनी योग्यता से समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती व प्राकृतिक रूप से सर्वगुण संपन्न नारी, पुरुष वर्ग के आक्रमक व्यवहार की मोहताज हो गई । यही वजह रही कि पुरुष वर्ग ने नारी पर सामाजिक, धार्मिक एवम आर्थिक परंपराओं की बेडि़या डालनी आरंभ कर दी । अब नारी की जिंदगी घर की चार दिवारी में कैद होती चली गई । आर्थिकतौर पर नारी पुरुष के आधीन होती गई । यही बदलाव ने उसे अर्श से फर्श तक पहूंचा दिया ।

आधुनिक नारी ने  सामाजिक, धार्मिक एवम आर्थिक परम्पराओं में संतुलन बनाए रखते हुए बेडि़यों को तोडऩा आरंभ कर दिया है । पुरुष के बराबर अपनी योग्यता की बड़ी रेखा खींच अपने आपको श्रेष्ठ साबित करना शुरु कर दिया है । वह आज घर में ही नहीं वरन चार-दिवारी से चांद तक ; चौके से आफिस तक का सफर तय  करना जान गई है  । वह समझ चूकी है कि अगर वह एक माँ, बहन, बेटी, पत्नी, प्रेमिका है तो पुरुष भी बाप, भाई, बेटा, पति, प्रेमी है । नारी-नर परस्पर पूरक हैं, एक-दूसरे के बगैर अधूरे हैं । अगर वह अपनी पहचान बनाना चाहती है तो उसे नर को उचित सम्मान देते हुए ही आगे कदम  रखने होंगे । सामाजिक, धार्मिक एवम आर्थिक मौकों पर उसकी भावना को समझ कर अपना दायित्व निभाना होगा ।

वह जान चूकी है नारी की भी जिम्मेदारी है कि वह भी स्वत्रंतता के नीचे स्व्छंदता को न अपनाये । अपने आप को निखारने हेतु, अशलिल्ता को गले न लगाये । पूरे पुरुषवर्ग को कट्घरे में खडा कर उस पर आरोंपो की झडि लगाने से पहले ये अवश्य सोचे कि कहीं उससे तो कहीं चूक नहीं हो गई ? पुरुष को जलील करने से पहले वह खुद का अवलोकन भी करे …..लज्जा और शील जैसे नारी आभूषनों को अपने आप में समाये हुए है या नहीं ? अपनेआप को उचित ढंग से रखे हुए है या नहीं ? अगर वह इन विषयों पर गौर करना जान जायेगी तो हो सकता है कि कई सामाजिक बुराईयां खुद-ब-खुद दूर होती नजर आये ।

वह जान चूकी है  कि उसे माँ, बहन, बेटी, पत्नी, प्रेमिका बन पुरुष का सहयोग करना है, तभी पुरुष से वह योग्य बेटा, भाई, पिता, पति, प्रेमी बने रहने की उम्मीद रख सकती है । पुरुष नारी जाति का दुश्मन नहीं वरन सहयोगी है , इस सोच को  अपने अंदर पनपा कर ही वह उच्च सामाजिक पद पा सकती  है । आज नारी, पुरुष के समान अपने हक की मांग को लेकर बहुत सतर्क है और देखा जाये तो  कानूनी तौर पर लगभग वह पुरुष के समान ही नहीं  ; अपितु बेहतर स्थिति में भी है  । वैसे देखा जाये तो समाजिक तौर पर आज की नारी को पुरुषों से नहीं  बल्कि स्वयं नारी वर्ग से  बराबरी की होड से निजात पानी है । ‘औरत, औरत की दुश्मन होती है’ इस कहावत को झुठला कर एक साकारात्मक सोच के साथ समाज के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन करना है । फिर से हर तबके की नारियों के उत्थान के लिये सोचना है । सिर्फ शहरी नारियों की तरक्कि से यह मानना सही न होगा कि अब हमने  फर्स से  अर्स तक का फासला तय कर लिया है , अगर ये फासला हम तय कर पायें तो शायद आनेवाले समय में महिला-दिवस मनाने की नौबत ही न रहे….!!

कमलेश अग्रवाल

काहे न धीर धरे …..

14 फरवरी
स्नेहा, देवबाबू और गौरी की सब से बड़ी संतान थी सो वह परिवार के सभी सदस्यों की चहेती  थी | वैसे तो उसका रंग सांवला था पर नैननक्ष ठीकठाक ही थे | बुध्धि और बातचीत  में इतनी तेज थी कि जहाँ जाती सबका मन जीत लेती | देवबाबू को अपनी स्नेहा पर बहुत ही नाज था पर गौरी को उसके सांवलेपन का खटका मन ही मन में रहा करता था | कईबार गौरी प्रभु से इसको लेकर शिकायत भी करती और  उनसे कहती ,” प्रभु , स्नेहा को थोड़ी बुध्धि कम दे दी होती तो चलता पर रंग काहे सांवला दे दिया ? अब दे ही दिया है तो उसके लिए अच्छा वर भी तुम ही ढूंढ़कर लाना | तुम तो प्रभु जानते ही हो कि स्नेहा के पिता के पास  इतना धन भी तो  नहीं है कि वे धन की लालच देकर ही लड़केवालोंको फाँस लें; ना ही उन्हें दुनियादारी का इतना ज्ञान !! हे भगवान ! कैसे सब पार पड़ेगा ? हर चीज में मेरी स्नेहा चतुर है पर चतुराई दिखती थोड़े ही है , दिखे तो बस रंगरूप ही है, जिसे देने में तुमने कंजूसी  कर ली है |”  फिर खुद ही अपनेआप से बतलातीं …अरे मैं भी तो पागल ही हूँ ,अभी कौनसी वह बड़ी हो गई , जो मैं बेवजह ही चिंता कर रही हूँ  | जब शादी का दिन आयेगा , तब की तब सोचेंगे |कोई  तो माई का लाल होगा जो मेरी स्नेहा की चतुराई को पहचानेगा ….!! सब प्रभु की लीला है , मैं यों ही चिंता किये जा रही हूँ |  
 दिन यों ही बीतते गये और स्नेहा अपनी पढ़ाई को आगे बढ़ाती चली गई | पढ़ाई में अच्छे नंबरों के कारण उसे पढ़ते-पढ़ते ही नौकरी भी मिल गई | एक दिन भी उसे  घर में बेवजह बेठना नहीं पड़ा | गौरी स्नेहा की इस तरक्की से बड़ी खुश थी ,पर देबबाबू बिलकुल भी स्नेहा से नौकरी करवाने के हक्क में न थे | वे तो जल्द से जल्द स्नेहा के हाथ पीले करना चाहते थे | बड़ी चतुराई से स्नेहा ने देबबाबू को यह कह राजी कर लिये कि जैसे ही विवाह की बात पक्की होगी  , वह तुरन्त नौकरी से इस्तीफा दे देगी | घर में बैठ कर तो  वह बोर ही होगी | काम के कारण मन भी लगा रहेगा और दो पैसे भी मिलेंगे , इतना ही नहीं नौकरी का अनुभव भी तो मिलेगा | स्नेहा के इन तर्कों के आगे आखिर देबबाबू को झुकना ही पडा |
देबबाबू ने अपने रिश्तेदारों से स्नेहा के लिये सही रिश्ता बताने का ज़िकर कर ही रखा था | रिश्तेदार लड़का  बताते थे पर देबबाबू को कोई लड़का जंचता ही नहीं था | वे चाहते थे कि लड़का ऐसा हो जो थोड़ा रंग का साफ़ हो ताकि आनेवाली संतानें सांवली न हों | जो जहेमत स्नेहा के रंग को लेकर उन्हें उठानी पड़ रही है, वह जहेमत स्नेहा के घरवालों को  उठानी न पड़े | साथ ही साथ लडका अपने दम पर खडे रहने की सोच लिये हुए हो | पिता के दम पर सैर-सपाटे में विश्वास करने वाला न हो ….ऐसी खूबियों वाला वर उन्हें अपनी स्नेहा के लिये चाहिए था | देबबाबू की इन बातों को लेकर रिश्तेदारों में बातें होने लगी | कई कहते ज़रा देखो तो इन्हें …खुद की औलाद चाहे सांवली रही,पर  चाहतें हैं लड़का साफ़ रंग का  हो..!! बाप की कमाई पर न हो , भला ये कोई बातें हुई !! कभी कभी गौरी को भी ताना मारते हुए कहते ,” आप की स्नेहा के लिये तो भाई कोई ख़ास ही बन्दा ईश्वर ने घड रखा होगा | ”  इन ताना कसी को लेकर कईबार गौरी देबबाबू पर झल्ला जतीं ,कभी  समझाती भी कि आप बेटी के पिता हो, थोड़ी आंखमिचौनी तो करनी ही होगी न | कब तक इन बातों को लेकर हम किंतु परंतु करते रहेगें | बेटी की शादी तो करनी ही है न | अब उसकी उम्र भी तो बढ़ रही है |
गौरी की बात सुन देबबाबू कहते ,” हमारी स्नेहा थोड़ी सांवली ही तो है , तुम ही बताओ और किस बात की कमी है उसमें , जो मैं उसे बेमेल के खूटे से बाँध दूँ ? वह हम पर बोझ थोड़े ही है | ढूंढ़ ने से अच्छा वर क्यों न मिलेगा ? हो सकता है कि थोड़ा वक्त लग जाए, पर देखभाल कर करने से आगे जाकर हमें कुछ देखना तो न होगा | लोग तो कहेंगे , उनकी बेटियां होती  तो क्या वे एसे लडकों से उन का विवाह करते ? मैं पैसों के बलबूते पर वर खरीदना नहीं चाहता | ”
 गौरी भी अन्दर से तो देबबाबू के इन तर्कों को सही मानती थी फिर भी बेटी की माँ होने के कारण चिंता में तो रहती ही थी | आखिर  एक दिन प्रभु ने उनकी इच्छा के अनुसार का लड़का दिखा ही दिया और स्नेहा को देबबाबू ने सहर्ष बिदा भी कर ही दिया | आज स्नेहा अपनी जिदगी से काफी खुश है |
स्नेहा को अपने माता-पिता कि सोच पर नाज  है , बड़ा ही गर्व है | आज स्नेहा भी अपनी दोनों बेटियों के लिये ऐसी ही सोच लिये हुए है |उसे        विश्वास है कि उसे भी उसकी बेटियों के लिये उनके मन मुताबिक वर अवश्य ही मिलेगें |
सच पूछो तो बेटियाँ हमारे घर की रौनक होतीं हैं | वे भी हमारी ही औलाद हैं | बेटे अगर हमारा वंश आगे बढाते हैं तो बेटियाँ भी हमारे अंश को रोशन कर,  ससुराल में हमारे संस्कारों  को महेकाती हैं | यह महक पेढ़ी दर पेढ़ी आगे फेलाती दिखाई देती है | हर माता-पिता  की सोच देबबाबू और गौरी जैसी ही होनी चाहिए, ऐसा मेरा मानना है | आप मेरी बात से सहमत हैं न …?
कमलेश अग्रवाल 

कव्या की कसक का अंत

6 फरवरी

काव्या एक लडकी है इस बात में दो राय नहीं है ,पर इस बात से भी तो नकारा नहीं जा सकता की वह अपने मात-पिता की संतान भी है..!! वह भी अपने भाई आकश की तरह पतंग उडाना, गिल्ली-डंडा खेलना, उछलकूद करना चाहती है । वह भी अपने स्कूल के साथियों के साथ बाहर पिकनिक पर जाना चाहती है, पर मां उसे रोकते हुए कहती है कि तुम लडकी हो और आकाश लडका है, उसकी बराबरी करना ठीक नहीं । मां के इस कथन के साथ ही उसके सपनों का अंत होता दिखाई देता है । इस के चलते काव्या के जहन में ये बात बार-बार उठती है कि आखिर क्यों मां उसे हमेशा इन बातों के लिये रोकती रहती है ? जबकि आकाश की छोटी बडी सभी ख्वाहिश पूरी कर दी जाती है ..!! ये भेदभाव क्यों ? वह इस रोकटोक से तंग आचूकि है । वह मां के लगाये गये अनुशासन, लक्ष्मण- रेखा को पार कर अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहती है । वह मन ही मन सोचती है कि वह न अपने भाई आकश से कमतर है और ना ही उससे ज्यादा… उसकी तरह ही वह भी ख़ूबियाँ-खराबियों सहित अपने माता-पिता की एक संतान ही तो है, फिर क्यों वह इस भेदभाव को सहन करे.. !! बस तभी से उसने ठान ली कि उसे अपनी एक विशेष पहचान बनानी है और वह चल पडी इस मंझिल की ओर ।

उसने मन ही मन सोच लिया था कि जीवन को अपने ढंग से जीना है , मन में उठी ललक को पूरा करना है । समाज के द्वारा तय की गई हर बंदिसों को धता दे आगे बढ्ना है और उसकी तरह दूसरी लडकियों को भी जीने की राह दिखानी है । सामाजिक रुढियों को मात दे, एक नई सोच को जन्म देना है और जल्द से जल्द,  नभ की ऊंचाई को छूना है ।

यही कारण था कि जब काव्या के विवाह की बात चली तो उसने साफ-साफ अपने  अभिभावक माता-पिता को कह दिया कि दहेज लोलुप युवा से या उसके परिवार से वह कोई नाता जोडना नहीं चाहेगी । साथ ही साथ उसने यह भी साफ कर दिया कि उसे ऐसा लडका, वर के रुप में नहीं चाहिये ; जिसे एक आज्ञाकारी बीवी और बिस्तर की शोभा बनने के लिये राजी  लडकी की ख्वाहिश हो । उसे ऐसे वर में दिलचस्पी है जो उसकी प्रगति, इच्छा या उसके कामकाज में रुकावट न बने । ढूंढने पर काव्या को ऐसा पति विकास मिल ही गया और दोनो ने मिलकर काव्या के सपनों को साकार करने की मूहिम छेड ही दी । विकास भी काव्या की तरह ही खुल्ले विचार  रखनेवाला व्यक्ति है । इन दोनों ने ठान ली है कि वे विषम परिस्थियोंसे झूझती नारियों के पास जा , उन्हें सबल बनाते हुए उन्हें एक नई दिशा की ओर ले जायेंगे । उनमें नई सोच को उभारते हुए उनमें एक नई उम्मीद जगायेगें । वे नहीं चाहते कि नारियां सिर्फ चूडी, बिंदी, पायल या महेंदी में अपनेआप को उलझाये रखे । वे चाहते हैं कि शक्तिसम पूजनीय नारी को उसकी खोई हुई अस्मिता पूर्ण सम्मानके साथ वापिस मिले । इसके चलते उन्होंने गली-गली , नुक्क्ड-नुक्क्ड एक जेहाद जगा दी है । इस मुहिम में कई और साथी भी जूड गये हैं । हम जानते हैं कि पतझड के बाद ही नई कोंपलें जन्म लेती हैं । हर रात के बाद ही उषा की किरणें दिखाई देती है । वह सुबह  कभी तो आयेगी……। वह सुबह  कभी तो आयेगी……।

काव्या की मूहिम ने हम मातओं को सोचने पर मजबुर कर दिया है कि बेटा-बेटी दोनो हमारी ही संतान होते हुए भी हमारी सोच में ये अंतर क्यों ? प्रतिदिन उन्नति का ढोल पिट्ते हुए भी हमारी पुरानी कुरितियों तथा कुप्रथा से हम आज तक क्यों जुडे हुए हैं ? क्यों आज भी बेटी को पैदा होने से पहले ही गर्भमें ही नष्ट कर दिया जाता है ? क्यों दहेज की लालच में उन्हें जिंदा जला दिया जाता है ? क्यों वंश का कारण सामने रख, बेटे की लालसा में बेटी को दुतकारा जाता है और जन्म लेनेवाली बेटियों को कोसा जाता है ?

मैं आपसे पूछना चाहती हूं क्या बिना मां के बेटा पैदा होना संभव है  ? सोचो, अगर बेटियां पैदा ही नहीं होंगी तो किसे बहु बनाकर लाओगे ? अपना वंश कैसे बढाओगे ? इस गहन विषय पर ध्यान जरुर दीजियेग…आखिर में इतना ही………..

 कुरितियों को तोडना होगा, छोडना होगा रुढियोंको,

बेटियों में ही देखना होगा हमें, अपने उज्वल कल को,

इन में ही होगी कोई  इंदिरा,  दुर्गा और  सरस्वती,

भावी पीढी की ये जननी, रसदायनी हमरी बगिया की…।।

 

कमलेश अग्रवाल