Archive | मार्च, 2012

मनचाही ज़िंदगी जीने की कुंजी – सकारात्मक सोच

30 मार्च

वर्तमानयुग तेजी का युग है । यहां सभी दौड्ते-भागते नजर आते हैं । इसके पीछे वजह ये है कि हर इंसान दुसरों को पीछे छोड, खुद आगे बढना चाहता है । इस होड की सोच के चलते वह मानसिक अवसाद से ग्रस्त होने लगता है । वैज्ञानिकोंके द्वारा किये गये अध्ययन के मुताबिक निराशावादी सोच रखने वाले लोगों पर नकारात्मक गतिविधि का जल्दी असर होता है जिससे उनके दिमाग़ के एक ख़ास हिस्से में गतिविधियाँ तेज़ होती दिखाई देती है । इस हलचल के कारण रोगों का मुक़ाबला करने की उनकी क्षमता कमज़ोर हो जाती है । जो व्यक्ति सकारत्मक-सोच रखते हैं उनके शरीर की धमनियाँ खुशी के कारण सजग और सचेत रहती हैं ।

सोच का सबसे ज्यादा प्रभाव चेहरे पर पड़ता है । बडे-बुढे सच ही कह गये हैं कि जो जैसा सोचता है उसके विचार और ख़याल भी उसी दिशा में जाने लगते हैं । दूसरे लफ़्ज़ों में कहें तो आधे भरे गिलास को दोनों तरह से देखा जा सकता है यानी आधा गिलास खाली देखना या आधा गिलास भरा देखना वह व्यक्ति की सोच पर निर्भर है । शरीर पर रोगों के प्रभाव और सोच का गहरा संबंध है । अत्यधिक सोच के फलस्वरूप गैस अधिक मात्रा में बनती है और पाचन क्रिया बिगड़ जाती है। सिर के बाल झड़ने लगते हैं शरीर कई रोगों का शिकार हो जाता है । यदि व्यक्ति प्रतिदिन रात्रि में सोते समय सकारात्मक भाव से स्वयं को प्रभावित करे, तो वह अनेक साध्य व असाध्य रोगों का सफल व स्थायी निवारण कर सकता है । 

सोच का सबसे ज्यादा प्रभाव चेहरे पर पड़ता है । चिंता और थकान से चेहरे की रौनक गायब हो जाती है । आँखों के नीचे कालिख और समय से पूर्व झुर्रियाँ इसी बात का सबूत हैं । शरीर में साइकोसोमैटिक प्रभाव के कारण स्वास्थ्य बनता है और बिगड़ता है । एक अमरीकी पत्रिका प्रोसीडिंग्स ऑफ़ द नेशनल एकेडेमी ऑफ़ साइंस ने एक अध्ययन के बाद नतीजा निकाला है कि दिमाग़ में किसी भी नकारात्मक गतिविधि से आदमी की रोगों से लड़ने की ताक़त कमज़ोर हो जाती है । 

देखा जाये तो इंसान की सबसे मूल्यवान अनुभूति सोच ही है । चारों तरफ़ व्याप्त जीवन के विहंगम दृश्य को देखने की क्षमता की  देन भी उसकी सोच ही है । गीत और भाषा की ध्वनियाँ सुनने की शक्ति, भौतिक संसार का आनंद व अनुभव , समृद्घ प्रकृति की मधुरता और सौंदर्य का स्वाद व गंध लेने की इंसान की योग्यता उसकी सोच पर ही टिकी है । जो व्यक्ति हर नये दिन का स्वागत उत्साह, आत्मविश्वास और आशा के साथ करता है  उसे ख़ुद पर भरोसा होता है और उस जीवन पर भी, जिसे जीने का विकल्प उसने चुना है । ऐसी सोच रखनेवाले लोग दूसरों को प्रेरित करने में कुशल होते हैं और दूसरों की उपलब्धियों पर ख़ुश होते हैं । वे दूसरों का ध्यान रखते हैं, उनके साथ अच्छा व्यवहार करते हैं और बदले में उनके साथ भी अच्छा व्यवहार किया जाता है ।

मस्तिष्कदृष्टि द्वारा वे जानते हैं कि मेहनत, चुनौती और त्याग जीवन के हिस्से हैं । वे अपने दु:ख को, खुद के विकास में बदल लेते हैं । ऐसे लोग डर का सामना करके उसे जीत लेते हैं और दर्द को झेलकर उसे हरा देते हैं । उनमें अपने दैनिक जीवन में सुख पैदा करने की क्षमता होती है ; जिससे उनके आसपास रहने वाले लोग भी सुखी हो जाते हैं । उनकी निश्छल मुस्कान आंतरिक शक्ति और जीवन की सकारात्मक शैली का प्रमाण होती है ।

यह तय है कि सही दिशा में चलने पर हमारा जीवन  रोमांचक, संतुष्टिदायक और सफल हो सकता है, कतई दिशाहीन जीवन नहीं हो सकता । आप अपनी मनचाही ज़िंदगी जीने में सफल हो पायेंगे या नहीं, यह अब पूरी तरह आप पर निर्भर है । मनचाही  ज़िंदगी  जीने की कुंजी आपकी खुद की  सकारात्मक सोच ही है ।

कमलेश अग्रवाल

 

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क्यों धर्म की व्याख्या ही बदल गई ?

29 मार्च

जिंदगी को अनुशासित और सुचारु रुप से जीने के लिये  हमें कुछ नियमों को धारण करना होता है जिस कारण हमारा जीवन सही रहे, यही  धर्म कि सही परिभाषा  है । नैतिक मूल्यों का आचरण ही इंसान का धर्म है ।  धर्म वह पवित्र अनुष्ठान है जिससे हमारे अंदर रही विकृतिओं का शुद्धिकरण होता है । धर्म वह तत्व है जिसके आचरण से व्यक्ति अपने जीवन को सही रास्ते पर चला पाता है । कर्म-कौशलता, व्यवस्था-परिवर्तन, वैज्ञानिक व तकनीकी विकास, परिश्रम तथा निष्ठासह जीवन ही धर्म है । धर्म संप्रदाय नहीं है वरन अनुशासित जीवन हेतु बनाई गई एक व्यवस्था है ।

धर्म के ठेकेदारों ने संसार के प्रत्येक क्रियाकलाप को ईश्वर की इच्छा बता कर , मनुष्य को  ईश्वर के हाथों की कठपुतली बना कर रख दिया । इसका परिणाम ये हुआ कि इंसान की सारी मुसीबतों का कारण ‘भाग्य’ अथवा  ईश्वर की मर्जी ही  है ; इस भ्रमित कथन का चलन शुरु हो गया । बेवजह ही इंसान भाग्यविधाता के रुप में धर्म की जो व्याख्य धर्म के ठेकेदारों ने दिखाई उसी कथित मार्ग पर चल पडा । गलत कामों से पाप होता है और उस के कारण नरक मिलता है तथा अच्छे कर्मोंसे पुण्य मिलने पर स्वर्ग मिलता है की परिपाटी चल पडी ।

उन्होंने व्यक्तिके जीवन की आफतों  को उसके ही ‘कर्म’ से जोड दिया । अपने  स्वार्थ के लिये उन्होंने पुरुषार्थवादी मार्गके मुख्य-द्वार पर ही ताला लगा दिया । इसकी परिणति यह हुई कि धर्म के ठेकेदारों ने इंसान की मुशीबतों को  ; उसकी नियति करार दे दिया और मनुष्य स्वयं भाग्यवादी बनकर अपनी सुख-दुःखात्मक स्थितियों से सन्तोष करता रहा । धीरे-धीरे धर्म की व्याख्या ही बदल गई ।

धर्म हमें आदर्श जीवन का मार्ग बतानेवाली ज्योत है । संसार को सही ढंग से पार करानेवाली नौका है । अगर नीचे दी हुई कुछ बातों को समझ लें तो उन्हीं को जीवन में अपनाकर हम धर्मके पथ पर अग्रसर हो पायेंगें…

अपने अभिभावकों का आदर करना ही धर्म है क्योंकि उन्हीं के कारण हम आज संसार में हैं । 

अपने को जो अच्छा न लगे, वैसा आचरण दूसरे के प्रति न करना ही धर्म है ।

 अपने मन वचन कर्म से हिंसा से दूर रहकर हर जीव को जीने का अधिकार देना ही धर्म है ।

 अपने से पिछडों की मदद करना ही धर्महै।

 बिमारों की सेवा करना ही धर्म है ।

 रक्तदान, विद्यादान भी धर्म ही है ।

नारी का सम्मान करना भी धर्म है  ।

ऐसे कई कार्य हैं जो आप को संतोष दे सकते हैं और एक सच्चे धर्म की अनुभूति करवा सकते है । धर्म को धर्म ही रहने दो उसे हिंदू , ईसाई , इस्लाम, सीख बौध, जैन जैसे नाम मत दो । इंसान को इन के तहत न बांटो ।

मंदिर, मस्जिद, गिरझाघर में बांट दिया भगवानको

धरती बांटी , पर्वत बांटे,  बांट दिया इंसान को,

धर्म के ठेकेदारों  मिलकर , न भ्रमित करो संसार को ।

 

कमलेश अग्रवाल


मां के नवरात्रों की महिमा

28 मार्च

हमारा भारतवर्ष देवभूमि है । राम, कृष्ण, बुध्ध, महवीर जैसे देवों ने यहीं जन्म लिया । देव यहां त्रिमूर्तिके रुप में पूजे जाते रहे हैं और देवियां पार्वती , लक्ष्मीऔर सरस्वती के नौ विभिन्न स्वरुपों में, जिन्हे नवदुर्गा के नाम से जाना जाता है । इस के पीछे हमारे संतों, महर्षियों, पुर्वजों की बहुत ही सोची-समझी गहरी दृष्टि रही है । इसी सोच के रहते देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनाई गई,  अनुष्ठान बनाये गये,  लोकजीवन की कई परम्पराओं को स्थापित किया गया और इसके महत्व को समझाने हेतू पर्वों की रचना की गई । इन पर्वोंको सीधे प्रकृति से जोड दिया गया । मनुष्य की भौतिक समृद्धि से जोड दिया गया । इतना ही नहीं उसे आध्यात्मिक उत्थान से जोड एक सम्पूर्ण वैज्ञानिक सोच का निरुपण भी किया गया ।

एक बात और भी है कि हमारे देश में नारी को पूजा जाता है क्योंकि नारी मूलतः शक्ति है, ऊर्जा है । जिसके बिना न तो संसार की संरचना की आशा की जा सकती, न ही अपने होने की, न ही अपनी रक्षाकी और न ही परम आनंद की । सच यही है कि नारी में शक्ति तथा ऊर्जा की क्षमता होती है । वह स्वयं को अवसर के अनुकूल भिन्न-भिन्न रूपों में व्यक्त कर सकती है । माँ, जो जननी है, जो हम सबकी ही नहीं, बल्कि राम और कृष्ण तक की जननी रही है, उसमें स्वयं को अलग-अलग रूपों में अभिव्यक्त करने की क्षमता  है । क्या कभी भारतीय देव को यह अवसर मिल सका है ? नहीं ना । शायद इसी कारण मां शक्तिकी आराधना नौ दिन तक की जाती  है । नौ दिन ही क्यों  ? इस की भी वजह हमारे शास्त्रोंमें बताई गई है । नौ रातों को मुख्यतः तीन-तीन रातों में बाँट दिया गया है । प्रथम तीन रातों में माँ की आराधना दुर्गा (काली) के रूप में की जाती है । काली, यानी कि हमारे अंदर की अमानुषि एवं अपवित्र वृत्त्तियों को नष्ट करने की आराधना । अगले तीन दिन मांकी अर्चना होती है लक्ष्मीके रूप में, जिसे हम भौतिक एवं आध्यात्मिक सम्पत्ति की अर्चना करना कह सकते हैं । अंतिम तीन दिनों में मां का स्वरूप सरस्वती का माना गया है । सरस्वती यानी कि प्रज्ञा, ज्ञान, जो जीवन की सम्पूर्ण सफलता के लिए जरूरी है । दो नवरात्रे आसो और चैत्र के हमारे यहां मुख्य रुप में महत्व रखते हैं । चैत्र नवरात्री में आठ दिन तक देवी की आराधना करने के बाद नौवें दिन राम के जन्म के रूप में रामनवमी मनाई जाती है । आसो की महानवरात्री में नौ दिन तक देवी की आराधना करने के बाद यह उल्लेख किया गया है कि दसवें दिन राम, रावण का वध करते हैं, जिसे हम दशहरा के रूप में मनाते हैं । यानी कि इन दोनों नवरात्रियों के अंत राम से जुड़े हैं, एक का रचना से तो दूसरे का रक्षा से । रावण का वध करके सीता को मुक्त कराना मूलतः एक आततायी के नियंत्रण से प्रकृति को ही मुक्त कराना था, चूंकि सीता श्रीराम की पत्नी के साथ-साथ पृथ्वी की पुत्री भी थीं ।

अगर सही अर्थों में मां के नवरात्रों का फल लेना हो तो नारी को सम्मान देना होगा ।  उसकी शक्ति को पहचानना होगा ।

॥ या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

कमलेश अग्रवाल

किटी -पार्टी की ओर महिलाओं के बढते कदम

27 मार्च

सुबह आंख खुलने से लेकर नींद से पलके बोझिल होने तक सिर्फ और सिर्फ भागदौड , सुबह से शाम तक बस काम ही काम..। ये है हमारी भारतीय नारी की कहनी । चाहे वह घरेलू महिला हो या कामकाजी महिला , इस बात से कोई फर्क नहीं पडता ; क्योंकि कामकाजी महिला को भी घरेलू महिला का पद तो मिला ही हुआ है ..!!

बच्चों और पतिदेवों को कम से कम इतवार तो मिलता है ; हर त्यौहारों की छुटियां भी मिलती है पर महिलाओं को तो ये भी नसीब नहीं । इन छुटियों में तो उनकी और भी सामत आ जाती है ….रसोई मास्टर ही बने रहना पडता है । पतिदेव चाय की फरमाईश करते दिखेंगे तो बच्चे मेगी की या पता चला कि रात खाने पर पतिदेव के दोस्त पधार रहे हैं..!! नारी के सिवाय घर का हर सदस्य कोई न कोई तरीके से अपने आप को आराम, तनाव-मुक्त व मौज-मस्ती करने के लिये आजाद है ।

 यही कारण था कि ‘क्लब संस्कृति’  केवल पुरुषों में ही प्रचलित थी और महिलाओं की भूमिका घर का चौका-चूल्हा व बच्चों की जिम्मेदारियाँ संभालने तक ही होती थी; लेकिन आज सब कुछ बदल गया है । आज संपन्न परिवारों की महिलायें पति के साथ क्लब जाने लगीं हैं । आज ये भी जरुरी नहीं रह गया कि वे पतियों पर निर्भर रहें । आज उन्होंने अपनी सखियों के छोटे-छोटे समूह बना लिये हैं । ये सभी निर्धारित तारीख और समय पर क्लब में मिलतीं हैं और तंबोला, तास, खाना-पीना कर अपना खाली वक्त जाया करती हैं । ये क्लब संस्कृति हर महिला को रास नहीं आ सकती क्योंकि ये शौख काफी महंगा है । इसी के चलते वर्तमान समय में किटी-पार्टीका चलन दिखाई दे रहा है । आज के दौर में  खास से लेकर आम महिलाएं, सभी किटी का आयोजन करने लगी हैं । इसका अहम मकसद है पैसे बचाना और घर से  बाहर निकलकर कुछ समय अपने मनोरंजन के लिए निकालना ।

आज महिलाओं की चर्चा पनघट या घरों के ओटलों पर नहीं बल्कि किटी पार्टियों में होती है । दैनिक कामकाज के उपरांत कुछ खाली समय मिलता है, उस समय महिलायें अपने अंतरंग दोस्तों और कभी कभी रिश्तेदारोंके समूह को ले  किटी बनाकर उसमें आनंद उठा अपने आप को तनावमुक्त करते हुए कई और तरीकों से अपने आपको निखारने लगी हैं । एक मिनिट खेल प्रतियोगिता, तंबोला या पिकनिक के जरीये वे इस दिन के लिये उत्साहित रहती है और अपने यहां कौन सा खेल रखा जाये उसकी उधेड्बून में रह, अपने आप को तरास ने में लगी रहती है । साथ ही साथ किटी की मेम्बर बनते समय, किटी समूह आर्थिक और सामाजिक लिहाज से उसके लिये योग्य है या नहीं उसे भी परखते हुए आगे बढती है । क्योंकि हर  किटी-पार्टी के कुछ अपने अपने तौर-तरीके होते हैं । ये किटी में मासिक कुछ अंशदान जमा करना होता है और इसे चिट प्रणालीके तहत (हर किटी में हर महिला के नाम की चिट बनाई जाती  है) चिट को किसी के हाथों से उठवानी होती है । जिस महिला का नाम निकले उसे वह संपूर्ण राशि दे दी जाती है । राशि की रकम मिलने के बाद भी उस महिला का अंशदान पहले की तरह  ही चलता रहता है । ये राशि  50/= रुपियों से लेकर 1000/=, 5000 /=, 50,000/= रुपियों तक की भी देखी गई है । सो अपने पतिदेव के जेब को देख,  किटी का चयन करना होता है । ये चिट प्रणालीके कारण सदस्या कोई भी चीज घर के लिये या अपने लिये बसा सकती है ।

बातूनी समझी जाने वाली महिलाएं अब किटी पार्टी में गप्पबाजी नहीं करती, बल्कि गम्भीर विषयों पर चर्चा करती हैं । किटी पार्टी के आयोजन के पीछे कई महिलाओं का तो मुख्य उद्देश्य ही अपने किसी उत्पाद  का प्रचार-प्रसार करना होता है । जाहिर सी बात है कि आजकल की महिलाएं अब इसमें भी अपने करियर, व्यापार और फायदे का रास्ता ढूंढ़ने लगी हैं । पहले जहां महिलाओं की किटी पार्टी केवल बेकार की बातें, एक-दूसरे की बड़ाई या बुराई का स्थान हुआ करती थीं, अब इनमें ज्यादातर महिलाएं काम की बातें करती हैं । भले ही वह बच्चों के ट्यूशन की बात हो, या फिर बाजार में कहां-कहां सेल में अच्छा सामान मिलने की बात हो । दूसरी बात ये है कि वे सब लजीज खानों का स्वाद भी लेती हैं और अलग-अलग व्यंजनो के बनाने की जानकारी से भी अपने आप को कुशल बना पाती हैं ।

एक ओर जहां महिलाएं आर्थिक तौर पर आत्म-निर्भर होने लगीं हैं वहीं समाजसेवा का एक और पहलू  भी इन किटी पार्टी से जुड गया है । किटी में अब पढ़ी- लिखी नौकरीपेशा और व्यवसायी महिलाएं भी हिस्सा ले रही हैं । वे समाज के वंचित तबके के बारे में गंभीरता से सोच रही हैं । वे कम पढी-लिखी औरतों को ऐसे काम की ट्रेनिंग दिलवा रहीं हैं जिसके जरीये वे आर्थिक बेहाली से निपट सके ; उदाहरण की तौर पर सिलाई, कढाई-बुनाई, मोतीकाम, चित्रकाम ,रद्दीपेपरों से लिफाफे बनाना, बेबी सिटींग आदि । इसके अलावा देश के किसी हिस्से में बाढ़ या भूकंप जैसी आपदा आने पर यह किटी समूह की महिलायें आर्थिक मदद करती हैं, कपड़े और खाने पीने का सामान भेजती हैं । आज कल कई किटी समूह भक्ति की और मूडा  भी देखा जा रहा है । सुंदरकांड किटी भी बनी देखी गई है । अभी अभी मुज्फ्फरपुर में बुजुर्गोंके जरीये एक ऐसी किटी का गठन किया गया है जिसमें चूट्कूले सुनाने पडते हैं । हंसी मजाक होता है । कई महिला किटी सिर्फ ग्यारसको  मिलती है और भजन-किर्तन करती हैं । कई बड़ी बड़ी किटी पार्टी में नाटक और गजल  की महफिलें  होती है । दिल्ली परिवहन निगम ने बस-किटी शुरु की है । ये बस में किटी मेम्बर्स बनी महिलायें शहर के अवलोकन का मजा लूटते हुए कुछ खेल खेलतीं हैं ।  अंताक्षरी, एक ही शब्द के पर्यायीवाची  व सामिक शब्द को ढूंढना , तंबोला को उल्ट-पूल्टा कर खेलना और दिनभर मस्त  रहना….। इस बस के कारण घरेलू  महिलायें किसी की भी मदद लिये बीना पूरी दिल्ली घूमने का मजा ले सकती हैं । किटी की बढते चलन को देख कई व्यपारियों ने भी अपने व्यापार को किटी के जरिये एक नया मोड दे डाला है । वे अपने कायम के ग्राहकों के लिये ऐसी किटी का आयोजन करतें हैं और लुभावने पकेज के जरीये महिलाओं को अपना सामान कम महेनत से टिका देते हैं । हिंग लगे न फिटकरी, रंग चढे चौखा….। 

समय के साथ किटी पार्टी का रूप बदल रहा है । अब यह ज्यादा क्रिएटिव और सोशियल हो गई है । किटी पार्टी यानी टाइमपास के रूप में जाने जानेवाली किटी अब टाइमबाउंड हो गई है । इसके अपने लक्ष्य हैं, योजनाएं हैं । यह सिर्फ अपने लिए, अपने  मनोरंजन के लिए आयोजित नहीं की जाती बल्कि मनोरंजन के जरीये  वंचितों  के लिए आर्थिक मदद जुटाने का कार्य  करती हुई भी दिखाई  देती है । सामजिक उत्थान में मददरुप रहती हैं । गरीब और असहाय तबके के लोगों को प्रेरणा देते हुए उन्हें एक नई दिशा दिखाती हैं । सच पूछें तो क्लब से किटी -पार्टी की ओर महिलाओं  के ये बढते  कदम समाज के लिये एक कारगर पहल ही है । घरेलू और कामकाजी बहनों के लिये आनंद महल है ।  उनके हाथ लगा (अपने आप को तरासने का) एक पारसमणी है  ।  व्यस्त वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बुजुर्गों के लिये वक्त बिताने का एक जरीया  है । बस ख्याल इतना ही रखना है कि भौतिक चकचौंध हमें फिजूल खर्ची की ओर न ले जाये । हमारे अंदर रही लोलूपता हमारे पतियों के जेब को हलका न करे…  । 

कमलेश अग्रवाल

 

गिरगिट की विवशता

26 मार्च

भ्रष्टनेता को आते देख ,गिरगिट सह-परिवार भागा,

भागने का  कारण पूछते ही, वह इस तरह ललकारा,

इस भ्रष्टनेता के सामने टिकना है मुश्किल,

चूपके से खिसकना ही बेहतर है , है ये बडा शातिर,

आस-पास खडों ने पूछा ,”ऐसा क्यों बोल रहे हो ?”,

उस ने कहा, ” मुझ से क्यों आप पूछ रहे हो ?”,

झूठ, भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी जैसे रंग लाऊं कहां से ?

गलत वादों, झूठे आश्वासन जैसे फरेबी रंग बनाऊं कैसे?

मुझ में है सप्तरंग बनाने की ही क्षमता,

भागने के सिवा नहीं बचा कोई और रस्ता…

 

कमलेश अग्रवाल

 

मीठा जहर

26 मार्च


ग़ुटका हो या पान-मसाला,

पेप्सी-कोला जहर का प्याला,

इन पंक्तियों का मतलब जानों ,

बच्चों  मेरी बात को मानो,

मत खाओ इस विष को प्यारो,

कर लो इन से नफरत यारो,

ये तों हैं  दांतों के दुश्मन,

वंश – बेल के ये दुर्योधन,

इन से हो सकता है केंसर ,

क्यों दें हम जबडों को  टेंसन ?

कहो सभी से, बुरी इस आदत को छोडें,

कभी न इन से नाता जोडें ,

कभी न इन से नाता जोडें ….

 

कमलेश अग्रवाल

शांतिचाची

18 मार्च

प्रीति कई सालों  बाद मायके आई थी सो पुष्पादेवी  बड़ी ही खुश थीं | बेटे-बहु  के मनाली जाने के  कारण पुष्पादेवी और श्यामलालजी  अकेलापन  महसूस कर रहे थे  | वैसे भी कई साल से प्रीति मायके आई भी नहीं थी सो दोनोंने सोचा एकबार उसे आने का कहकर देख लिया जाए  | बच्चों की पढाई और नितीन का अपने व्यवसाय में व्यस्त रहनेके कारण प्रीति का हर साल पीहर संभव न हो पाता  था | जैसे ही श्यामलालजी ने प्रीति को आने को कहा , उसने तुरंत हाँ भर दी वजह थी कि बच्चों की छुटियाँ होने को थी सो  वे दादा-दादी के पास जाना चाहते थे  और नितीन १० दिनों के लिये अमरिका  | प्रीति ये मौका गवाना नहीं चाहती थी …!!

प्रीति माँ से ढेरों बातें करना चाह रही थी | यही वजह थी कि जैसे ही दोनों माँ-बेटी दोपहर के खाने से फारिक हुईं , वैसे ही  बातें शुरू हो गई  | प्रीति माँ से पूछ रही थी कि मोहल्ले में सब ठीक-ठाक हैं ना ? ब्रिजेशचाचा की सोनू का ब्याह हो गया क्या ? दमयन्ती के क्या हाल-चाल है ? उसने दोबारा शादी की या नहीं ? गोपाल का लड़का तो अब बड़ा हो गया होगा ? अरे हाँ सूरज चाचा और शांतिचाची के क्या हाल-चाल हैं ? अभी भी दोनों की तूँ तूँ मै मै  होती रहती है क्या ? 

इतना सुनते ही पुष्पादेवी बोलीं ,” अरे बेटा ! मैं तो तुम्हें बताना ही भूल गई | शांतिचाची तो २ महिना पहले ही गुजर गईं |”  प्रीति को जैसे इस बात पर यकीन ही नहीं हो रहा था | वह बोलीं ,” क्या हुआ था उन्हें ?” होना क्या था ,  बस रात को सोईं  , फिर उठी ही नहीं | डाक्टर कह रहा था कि दिल के  दौरे के कारण उनकी मौत हुई | दो दिनों पहले ही सुरजचाचा आये थे |  उनकी उदासी देखी  नहीं जा रही थी  | जितनी  देर बैठे बस चाची की  ही  बातें करते रहे |कह रहे थे,” भाभीजी  , कभी भी नहीं सोचा था कि शांति इस कदर मुझे बीच मझदार में छोड़ चली जायेगी | वही थी जो मुझे सहती थी | मैंने उसे कभी चैन से रहने  ही नहीं  दिया ?  हर वक्त उस पर झल्लाता रहता था |  खाना तो अच्छा ही बनाती थी , पर मैं ही पता नहीं  क्यों उसके बनाए खाने में नुक्स ही देखता रहता था ? हर बात पर उसे भला-बुरा कहता रहता था | अब तो बड़ा पछताता हूँ | एक भी दिन ऐसा नहीं जाता जब उसे याद कर आँखे न गिली होती  हो !! मेरी किट-किट  ही  उसे ले गई | दो दिनों से मुझे कह रही थी कि सांस क्यों फुल रही है क्या पता ? पहले  कभी काम करते इतनी  थकान नहीं लगती थी | अब तो काम करते करते २० सों बार बैठना पड़ता है | पता नहीं इस मरे शरीर को क्या हो गया ? उसने तो भाभीजी  मुझे चेताया था पर मैं पागल उसे समझ ही न सका | ऊपर से उसे डांट ते हुए कहा, दो लोग तो हम हैं , इतने से काम से  भी तुम थकने लगीं|क्या  बताऊं  भाभीजी मेरा तो सब कुछ ही लूट गया |किसीने सही कहा है जब चिड़िया चुग जाये खेत तो पछतावत क्या होवत है ? “
 
प्रीति सहसा उदास हो गई | उसके जहन में पुरानी यादें ताजा हो गई | जब वह स्कुल से घर आती तो शांतिचाची उसे बुलाती और कहती ले आज मैंने बेसन के लड्डू बनाए हैं , खाके देख कैसे बने हैं ?  तेरे चाचा को बहुत पसंद हैं  | कभी कहतीं,” प्रीति ,सुन  जब तेरे चाचा  बाहर जायेंगे न  तब  मैं और तुम गिट्टे खेलेगें |  जल्दी से स्कुल का काम पुरा कर लेना | समझ गई न | फिर हम नुक्कड़ पर गोलगप्पे खाने भी जायेंगे | तेरी अम्मा से भी कह दियो | ” 
 
बड़ी ही नेक औरत थी | कईबार जब चाचा को चाची से उखड कर बात करते देखती तो मन में आता , जाकर कह दूँ कि इतना ख्याल रखने पर भी आप क्यों इस तरह चाची को  खरी-खोटी सुनाते रहते हो  ? पर कभी हिंमत ही न जुटा पाई  | हाँ माँ से जरुर कहती थी कि चाचा का स्वभाव बिलकुल भी ठीक नहीं है | जब देखो तब चाची को डांट ते रहते हैं | पता नहीं चाची कुछ कहतीं क्यों नहीं ? एकबार मैं ने चाची से इस बारे में पूछ ही लिया था ; तो वे बोलीं,” तेरे चाचा मन के बड़े अच्छे हैं | मर्द हैं न सो कई तरह के टेंशन लिये होते हैं |मेरी तरह  घर में बैठ रोटियां थोडे ही तोडे हैं ? तूं ही बता वे मुझ  पर गुस्सा न होंगे तो क्या गली-मोहल्ले वालों पर होंगे ?जब मुझे गुस्सा आवे है मैं भी तो भडक जाऊं हूं | बेटे हम औरतों को  तो  मर्द का गुस्सा सहना ही  है | हमारी जिदगी में यही लिखा है सो ज्यादा क्या सोचना ; बस प्रभु इतना करम करे, तेरे चाचा के हाथों में जाऊं |  तूँ देखना बेटे मेरे जाने के बाद तेरे चाचा का गुस्सा रहगा ही नहीं |”
 
सुबह जब मैं चलने जा रही थी तो सूरज चाचा मिले |मुझे देख ठहरे | सिर पर हाथ फेरा और बस गुमसुम से खड़े रहे | जब मैंने उनसे पूछा,”चाचाजी कैसे हो ? चाची का सुन बेहद दू:ख हुआ | तो बोले,”अकेला हो गया हूँ | कुछ अच्छा नहीं लगता | अब तो प्रभु मुझे भी तेरी चाची के पास भेज दे , बस ये ही सोच कर जी रहा हूँ |”
 
मैं सोच रही थी अगर चाचा ने चाची  की किंमत पहले की होती  तो यों पछताना तो न  पड़ता ..!!  मैं मन ही मन चाची को श्रधांजलि देती हुई घर की ओर  चल दी |