Archive | अप्रैल, 2012

क्या नारी आत्मकेन्द्रित हो रही है ?

30 अप्रैल

 वर्तमान युग, चेतना का युग है। इक्कीसवीं शताब्दी का आरम्भ ही महिला सशक्तिकरण वर्ष (2001) के रूप में हुआ।  नारी जन्मदात्री है, सृष्टि सृजन करती है ; इस बात से क्या किसीको  एतराज  होगा ? निर्विवाद रूप से सोचे तो, जवाब होगा ‘नहीं’ ।  नारियों को प्रगति पथ पर प्रेरित करने हेतु राजाराम मोहन राय, महात्मा गांधी, महर्षि कर्वे इत्यादि महापुरुषोंने नारीके उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान दिये, इसी कारण आज ‘नारी-संचेतना’ झंकृत होती  नजर आ रही है । नारी बंधन, सीमा,गलत रुढियों और पुरुष जोर- हुकमी से मुक्त होती चली गई । नारी के जीवन मूल्यों में आमूल परिवर्तन हुआ । संयुक्त परिवार की प्रथा समाप्त होती गई । विभक्त परिवार सामने आते गये । इसके पीछे  कौन से कारण रहे ? नारी का शिक्षा, विज्ञान, विज्ञापन, कला, साहित्य आदि के क्षेत्रों में अपना स्थान बनाते हुए आगे बढना ही इसके पीछे की वजह रही । इसी के चलते राबड़ीदेवी जैसी घरेलू म‌हिला और मामूली द‌लित प‌रिवार से आई मायावती अपनी प्रभावी भूमिकाएं निभाने में सक्षम होती दिखाई दीं। आज के वर्तमान युग की  भारतीय नारी अपनी वर्जनाओं को तोड़ या यों कहें कि हर लक्ष्मण रेखाओं को छोड़, अबलापन की भावना को तिलांजलि देती हुई विकास के सोपान चढ़ती रही। तभी तो वह आत्मकेन्द्रित हो पाई !!

हम जानते हैं कि वात्सल्य, स्नेह, कोमलता, दया, ममता, त्याग, बलिदान जैसे आधार पर ही सृष्टि खड़ी है और ये सभी गुण एक साथ नारी में समाहित हैं । नारी-प्रेम त्याग का प्रतिबिंब है । नारी, संसार की जननी है । मातृत्व, उसकी सबसे बड़ी साधना है । आधुनिक नारी, अपने स्वाभिमान की रक्षा करना जान गई है, उसे अपनी सामाजिक सत्ता का पूर्ण भान है । आज, नारी दोहरी भूमिका बखूबी निभा रही है । गृहलक्ष्मी और राजलक्ष्मी के रूप में उसका गौरव दिन – प्रतिदिन महत्वपूर्ण होता दिखाई दे रहा है। शिक्षा एवं आर्थिक स्वतंत्रता ने नारी को नवीन चेतना दे दी है । पुरुष नियंत्रित समाज में नारी, आज आत्मविश्वास से लबरेज दिखाई दे रही है । ऐसे में नारी का रफ्ते-रफ्ते आत्मकेन्द्रित होते जाना  क्या जायज नहीं है ?

नारी के इस परिवर्तन के कारण मेरा मानना है कि वर्तमान युग में पुरूष प्रधान समाज को अपनी संकीर्ण मानसिकता, सड़ी-गली व्यवस्था, रूढि़गत कुप्रथा को नारी-उत्कर्ष हेतु तिलांजलि देनी ही होगी । पुरुषों को इस प्रकार का वातावरण तैयार करना होगा, जिससे नारी को भी इंसान, जन्मदात्री एवं सृजनहार समझा जाये, न कि मात्र भोग्य। । आज की नारी-मध्यकालीन आदर्शों से भिन्न संकीर्ण मानसिकता से विच्छिन्न हो, अपने जीवन के प्रति सजग होकर जीवनयापन करने को स्वच्छंद होती जा रही है। इस स्वच्छंदता के कुछ दुष् परिणाम भी सामने आये हैं जो सामाज के लिए सही नहीं हैं । नारी का ग्लैमर, फैशन, आजादी और आसमान को छूने की चाह  ने कई सामाजिक समस्याएं  बढा दी हैं । आज विवाहेत्तर संबंध खुलेआम प्रदर्शित हो रहे हैं । पति-पत्नी के जन्म-जन्मांतर के साथ का, मिथक टूट चुका है । संबंधों के बीच से प्रेम और स्नेह गायब हो रहा है। नारी मा के साथ-साथ अपने आप को तरासने की चाहत भी रखना चाहती है । वह अपनी इस सोच में अपने पति का सहयोग चाहती है । आत्मकेन्द्रित  होने से पहले वह अपनी जिम्मेदारी से रु-ब-रुह होना चाहती है ।  मेरा मानना है कि उसके आत्मकेन्द्रित होने की वजह सिर्फ उसकी  स्वच्छंदता या  अश्लीलता कतई नहीं होनी चाहीये । भारतीय संस्कृति का मान और आदर करते हुये ही उस का आत्मकेन्द्रित होना सही होगा ।

पश्चिमी सभ्यता के संक्रमण के कारण भी नारी-जीवन में विविध बदलाव आये हैं । यौन शुचिता भी संक्रमित हुई है । यथार्थ के नाम पर नग्नता को बढ़ावा भी मिलता जा रहा है। टी.वी. चैनलों पर प्रसारित धारावाहिकों का सत्य, धीरे-धीरे पूर्ण समाज का सत्य बनता जा रहा है । षड्यंत्रकारी भूमिका में नारी का चित्रांकन (दूरदर्शन के पर्दे से) वास्तविक जीवन में अपने पांव पसार चुका है । अबलापन की भावना को तिलांजलि देने के कारण नारी की जड़-मानसिकता में तीव्र परिवर्तन हुआ है । पत्नी कथा की पीड़ा और वेदना तो कई हद तक अब कम हुई है पर परिवार बिखरते जा रहे हैं । जो कि समाज के लिये या नई पीढी के लिये ठीक नहीं है । नारी के आत्मकेन्द्रित होने से किसी को भी एतराज नहीं होना चाहीये यदि नारी पश्चिमी सभ्यता के अच्छे पहलूंओ को अपनाते हुये आत्मकेन्द्रित बने ।

उस का आत्मकेन्द्रित होना शायद उसे दहेज की खातिर, ईंधन की भांति जलाई जाने से उबार सके । समाज व पुरुष द्वारा कदम कदम पर तिरस्कृत तथा बहिष्कृत होने से उसे बचा सके । क्या प्रख्यात साहित्यकार अमृता प्रीतम के शब्दों में   सच्चाई  नहीं छुपी है …..?
“मैं नहीं मानती कि यह सभ्यता का युग है..सभ्यता का युग तब आयेगा, जब औरत की मर्जी के बिना उसका नाम भी होठों पर नहीं आयेगा । “

नारी-जीजिविषा के चलते वर्तमान सामाजिक संदर्भ में उसका अबला रूप निश्चित ही बदल चुका है, नारी-सबल हो रही है, ऊर्जावान बनी है । नारी की दशा और दिशा में, क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है । नारियों को प्रगति पथ पर प्रेरित करने हेतु ही 8 मार्च ‘विश्व महिला दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। मेरा ये       प्रश्न कि क्या नारी आत्मकेन्द्रित हो रही है ?  के संदर्भ में  आप की क्या राय है ?  क्या आप भी मेरे ऊपर दिये तर्कों से सहमत हैं ?

कमलेश अग्रवाल

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रजोनिवृत्ति

25 अप्रैल

( मुझे पूर्ण उम्मीद है कि मेरे द्वारा लिखा गया ये लेख बहनों  और सखियों  को जो रजोनिवृत्ति में आ चुकी हैं या उसके करीब हैं , उन्हें लाभ पहुंचायेगा  तथा उनके परिवार के सदस्यों को  इस से कैसे निपटा जाये उस की प्रेरणा भी देगा )

जब कन्या के शरीर के अंडकोष इस्ट्रोजन एवं प्रोजेस्ट्रोन नामक हार्मोन उत्पन्न करने लगता है तब समझो कन्या अपनी किशोरावस्था में आ गई है। इस अवस्था में आने से उसकी डिम्बग्रंथि सक्रीय हो जाती है ,जिसके चलते डिम्ब उत्पन्न एवं उत्सर्जित होने लगता है । उत्सर्जित डिम्ब डिम्बवाही नली से होते हुए गर्भाशय तक पहुंचता है । गर्भाशय की परत डिम्ब को ग्रहण करने के लिए अघिक मोटी हो जाती है । शरीर २५-२८ दिनों के अंतराल में रक्त स्राव के रूप में मोटी हुई गर्भाशय की परत को तोडते हुए डिम्ब को बाहर निकाल फेंकता है । जिसे हम कन्या का मासिक धर्म शुरू हुआ कहते हैं । कई लोग इसे माहवारी भी कहते हैं । ये अवस्था कन्या के ९-१६ साल के बीच देखी गई है ।

डिम्बग्रंथि के सक्रीय- जीवन के समाप्त होने पर इस स्रावों का बनना बंद हो जाता है । मतलब अंडाशय द्वारा अंडों का उत्पादन बंद हो जाता है । हार्मोन का स्तर गिरने लगता है और माहवारी या मासिक धर्म का आना धीरे-धीरे कम होते-होते समाप्त हो जाता है, जिसे रजोनिवृत्ति कहते हैं । अंग्रेजी में इसे मेनोपॉज कहते हैं, जिसका अर्थ “ जीवन में परिवर्तन” है । वास्तव में यह स्त्री के जीवन का परिवर्तन-काल ही है ।

रजोनिवृत्ति होने पर स्त्रीके शरीर में शारीरिक तथा मानसिक परिवर्तन होने लगते हैं । ये परिवर्तन इतनी धीमी गति से होते हैं कि स्त्रीको कोई ज्यादा तकलीफ नहीं होती । कभी-कभी कुछ स्त्रियोंको इस अवस्था में आने पर तकलीफ भी होते देखा गया है । ये परिवर्तन के कारण जो भी शारीरिक तथा मानसिक फेरफार होते हैं वह स्त्रीके व्यक्तिगत प्रतिकारक क्षमाता पर निर्भर करते हैं । कभी-कभी  मासिक एक या दो साल में बंद होता है , उसे पेरी-मेनोपॉज कहा जाता है , इस अवस्था में स्त्री में होर्मोनल परिवर्तन के साथ-साथ कुछ जैविक बदलाव भी होते हैं । आमतौर पर रजोनिवृत्ति-काल ४५-५० साल की उम्रमें महिलाओं में पाया जाता है । यदि ४५ वर्ष से कम उम्र में रजोनिवृत्ति देखी जाए तो उसे समय से पहले आना माना जा सकता है ।  सर्वेक्षणों से पता चला है कि ४० वर्ष से पहले करीब १% और ३० वर्ष की उम्र के तहत ०.१% महिलाएं समय से पहले रजोनिवृत्ति से प्रभावित होतीं हैं ।

रजोनिवृत्ति के कारण शरीर के कई और अंग जैसे गर्भाशय की झिल्ली (एंडोमिट्रीयम), प्रजनन-अंग, पेशाब-नली, त्वचा, ह्रदयके साथ रक्त- संचार-तंत्र,मस्तिष्क एवं हड्डियां इत्यादि भी प्रभावित होते हैं ; क्योंकि रजोनिवृत्ति के कारण शरीर में लोहतत्व , केल्शियम ,मिनरल आदि कम हो जाते हैं । सुस्ती महसूस होना , नींद कम आना जैसे लक्षण भी पाए जाते हैं ।  धीरे-धीरे शरीर में शिथिलता आने लगती है ।  बदन टूटता है । कईबार मोटापा भी होते दिखाई देता है । इन लक्षणो  के चलते चिडचिडापन आने लगता है ।  इतना ही नहीं शरीर के उपरी हिस्से में गर्मी महसूस होती है और बदन पसीने से तर-बतर हो जाता है ; इसे हॉट-फ्लेसिस या रात्री-स्वेद भी कहते हैं । कभी-कभी पेरी-रजोनिवृत्ति के दौरान योनी में सूखापन तथा खुजली भी होने लगती है । इस के उपाय में चिकित्सक क्रीम के इस्त्माल का सुझाव देते हैं ।  बार-बार मूत्र-निष्कासन को मन करता है । ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम होती दिखती है । कईबार अल्पकालिक स्मृति नाश का आभास भी होता है । इस कारण बेवजह चिल्लाना, बात-बात पर तुनक जाना , रोना आना जैसे परिवर्तन आते दिखाई पड़ते हैं ।

हमें जान लेना चाहिए कि रजोनिवृत्ति एक प्राकृतिक प्रक्रिया है । इस कारण इसे समस्या न समझ, जीवन का एक अस्थाई चरण मात्र मानना चाहिए । नियमित रूप से कसरत करना , अपने आप को व्यस्त रखना , अच्छा संगीत सुनना , अच्छी किताबें पढाना ,सहेलियों से गपशप करना तथा अपने खान-पान का ध्यान रखना हमें इस समस्या से छुटकारा दिला सकता है । सकारात्मक सोच, परिवार के सदस्यों का सहयोग एवं क्रियाशीलता ही इसका अकसीर इलाज है ।  रजोनिवृत्ति वृध्धावस्था की ओर ले जाने का लक्षण है “ इस मिथक सोच को हमें अपने मन से निकाल फेंकना होगा तभी हम रजोनिवृत्ति को सहजता से ले पायेंगे । 

रजोनिवृत्ति सिर्फ महिलाओं में ही नहीं वरन पुरुषों में भी आती है, जिसे मेल – हाईपोगोनाडीज्म कहते हैं । टेस्टोस्टेरोन का उत्पादन जब पुरुष अंडकोष में पर्याप्त मात्र में नहीं होता, तब ये अवस्था आती है ; जिसके कारण थकान , मिजाज में बदलाव , यौन संबंध में कमी, बालों का झडना, एकाग्रता न रहना, वजन का बढ़ाना जैसे परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं । व्यायाम और खान-पान पर पूरा ध्यान देकर , इसे सहजता से लिया जा सकता है ।

अंत में इतना ही कि प्राकृतिक या अप्राकृतिक (शल्य चिकित्सा के द्वारा गर्भाशय या अंडाशय का निकाला जाना ) रजोनिवृत्ति को हमें सहजता से लेना चाहिए और हतोत्साहित न होकर , ये जीवन का एक अस्थाई पड़ाव मात्र है, इस सकारात्मक सोच को ध्यान में रख अपने स्वास्थय और खान-पान पर विशेष ध्यान देना चाहिए है ।

 “ रजोनिवृत्ति यौन-जीवन का अंत नहीं है , वरन यह मात्र पौढता का अहसास  है “ इस विचार को साथ रख इस का सही ढंग से प्रबंध करना चाहिए है ।

कमलेश अग्रवाल 

 

अंधश्रध्धा से बचें

20 अप्रैल

राजा वसुसेन हर काम अपने राज ज्योतिष से पूछ कर करते थे । एक  दिन वे अपने राज ज्योतिष को साथ ले देशाटन पर निकले । सामने उन्हें एक किसान मिला वह अपने साथ बेलों को लिये हुए था और हाथ में हल भी था । ये देख राज ज्योतिष बोला,”अरे मुर्ख ! इस दिशा में काम करने जा रहा है ? पता नहीं इस दिशा में दिशाशूल लग गई  है । तुझे इस कारण बडी हानि उठानी पड सकती है । अपनी हथेली दिखा, पता चले कि तेरी किस्मत में क्या लिखा है ।”

राज ज्योतिष की ये बात सुन किसान ने विनमता से अपनी हथेली उनके आगे कर दी । राज ज्योतिष गुस्से से बोले,” हथेली उल्टी नहीं सीधी देखी जाती है, सो हथेली सीधी कर ।”

राज ज्योतिष की बात सुन किसान बोला,” माफ करीये मालिक, सीधी हथेली कुछ मांगने के लिये फैलाई जाती है । मुझे अपने आप पर पूर्ण विश्वास है कि मैं अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण  इन हाथों से काम कर, अच्छी तरह से कर सकता हूं । हथेली वो फैलाते हैं जो इस तरह की फालतू बातों में अपना वक्त जाया करते  हैं । आप भी इस अंधश्रध्धा से बाहर आयें । आप हमारे राज्य के अति प्रखर एवम ज्ञानी व्यकति  हो ; इस कारण आप का ऐसी  बातों पर विश्वास करना क्या उचित  है ? ”

किसान की इस बात ने राजा और राज ज्योतिष की आंखें खोल दी ।

ये कहानी बताने से मेरा उद्येश्य है कि इस तरह की अंधश्रध्धा से हमारे अंदर धीरे-धीरे वहेम पनपने लगता है । भूतप्रेत की बातें हों या ऊपर बताई कहानी की तरह ज्योतिष की बातें हों; इन बातों से विहवल हो, समझे विना बेसिर-पैर की बातों के गुब्बारे उड़ाना ठीक नहीं है । हो सकता है कि इस के पीछे कोई निश्चित विज्ञान या गणित हो  । जब तक हम इन बातों से अंभिज्ञन हैं ,इस का खंडन करना उचित न होगा क्योंकि हमारी अनुभूति का दायरा अभी सिमीत है । संसार के कई रहस्यों का पता लगाना अभी बाकी है । पश्चिम के कई देशों में तथा हमारे भारतवर्षमें मृतात्मा को बुलाकर उनके साथ बातें करने के प्रयोग अक्सर होते देखे गये  हैं । सो इन बातों को निरर्थक समझ कर उड़ा देना भी ठीक न होगा ।

मेरा तो बस इतना ही कहना है कि किसी भी छोटी बात को बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तूत किया जाना या तो परापूर्व से सुनी बातें बिना सबूत के फैलाना ठीक नहीं है । हमे सच-झूठ की पऱख रखनी चाहिए और अपनी विवेकशक्ति का इस्तमाल करना चाहिए । मैं तो ये कहूँगी कि भूत-प्रेत की बातें चाहे कितनी भी सच्ची क्यों न हो, हमे ना-हिंमत या डरपोक बनने की कोई आवश्यकता नहीं । हर हाल में हमे ऐसी बातों की सच्चाई के भीतर उतर, नीडरता व बहादुरी से मुकाबला करना चाहिये । हमारी आनेवाली पीढी बेवजह अंधश्रध्धा की शिकार ना हो, इस बात का  ध्यान रखना हमारा भी कर्तव्य है । 

कमलेश अग्रवाल

एक चुप सौ सुख

17 अप्रैल

(हम जानते हैं कि एक चूप सौ को हराये और एक चूप हम को सौ सुख दे जाये ….भारत पुरुषप्रधान देश है….यहां नारी का चूप रहना ही उस के घर की महेक है….सो मैंने नारी की इस सोच को कविता के माध्यम से आप के सन्मुख रखा है….आशीर्वाद चाहूंगी…)

एक चुप, सौ सुख

 इस के हास्र को पहचाना ,

इसी को अपना कर जीना जाना,

होठों  की खामोशी,, शब्दों  से न हो गुस्ताखी,

 इस मंत्र  से , क्या  कमाल हो गया…!!

शौहर को आंखो ही आखों से, प्यार हो गया,

वीरान रातें, खुशनुमा होती चली गई,

मुस्कान मेरी  खिलती चली गई,

चूपी  का था ये सारा  चमत्कार,

“एक चुप, सौ सुख” को

मेरे शत-शत नमस्कार,

मेरे शत-शत नमस्कार…….

कमलेश अग्रवाल

16 अप्रैल

 मानसी तरुणावस्था में बहुत संकोची और एकान्त प्रिय लडकी थी; अवस्था बढ़ने पर भी वह समीप के बन्धु-बन्धवों एवम सहेलियों से विरक्त होती चली गई । संपूर्ण वास्तविकताओं  से उसका साथ धीरे-धीरे छूटता चला गया ; सारी दुनिया उसे अजनबी लगने लगी । वह अपने मन में भय-संशय की दीवार खड़ी करती चली गई ; अपने विफल प्रयत्नोंका दायित्व वह दुनिया के कल्पित षड्यन्त्रों पर डालती रही । उसकी ये मानसिक हालात को देख उसके अभिभावकों ने राजीव नामक एक सुशील और संस्कारी लडके के साथ उसका विवाह करा दिया । राजीव मानसी की मानसिक परिताप से अनजान था । मानसी का किसी पर भरोसा न करना तथा किसी से अपने मन का भेग नहीं कहना, राजीव को खलने लगा । राजीव ने अपनी ओर से काफी कौशिश की पर वह सफल न हो पाया ।

आखिर एक दिन इस बात का जिकर उसने अपने चिकित्सक दोस्त मानव से किया । डा. मानव ने राजीव से मानसी को लेकर कुछ प्रश्न किये और वह जान गया कि मानसी के व्यक्तित्वमें जो परिवर्तन आ गए हैं, वे उसकी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि उसके आन्तरिक  मन से जूडे हैं । मानसी के मानसिक अस्वास्थ्य की प्रारंभिक अवस्था यहां से ही शुरु हुई होगी । इनका यथा समय उपचार न हुआ तो किसी भी समय मानसी की मानसिक विकृतियाँ, रोग के रूप में सामने आ सकती है । इस कारण मानसी की परिस्थिती का विवरण डा. मानव ने राजीव से कर ही दिया ।

डा. मानव ने राजीव को समझाते हुए बताया कि मानसी मानसिक व्यथा से गुजर रही है ; सो इस का वक्त पर इलाज करना बेहद जरुरी है । यह संभव है कि व्यक्तिको खुद के मन में आ रही विकृति के कोई लक्षण नज़र न आते हो, किन्तु यह संभव नहीं है कि आपके आसपास रहनेवालों को या आपके प्रियजनोंको आप में हो रहे मानसिक विकृति के चिह्न न दिखें । यही वजह रही थी कि मानसी की मनोस्थिति का अंदाजा राजीव को जल्द ही हो गया । राजीव की इस सतर्कताने मानसी को मानसिक रोग के अन्तिम संकट से ही नहीं बचाया, बल्कि भविष्य में मानसी इस तरह के दौर से न गुजरे उसके लिये सावधान भी हो गया ।

जब तक हमें अपने मानसिक विकृतियों का ज्ञान नहीं होता तब तक हम यह भी नहीं जान पातें हैं कि कब हमारी मानसिक सोच औरों के लिये समस्या बन गई थी ? जाहिर है कि मानसिक स्वास्थ्य शारीरिक स्वास्थ्य की पहली शर्त है । मन अस्वस्थ होगा तो शरीर भी अस्वस्थ होगा । आजकल के संघर्षमय जीवन ने इंसान को मानसिक परिताप  दे, उसेके स्वास्थ्य को बहुत संकट में डाल दिया है । देखादेखी , प्रतिस्पर्धा एवम विज्ञान के बढते विस्तार ने मनुष्य की मानसिक वृत्तियों को और भी विकट बना डाला है । आज मानसिक संतुलन; वर्षों पूर्व जितना कठिन था, उससे दस गुना अधिक हो गया है ।  देखा गया है कि हम अपने शारीरिक स्वास्थय की रक्षा के लिए बहुत सतर्क रहते हैं, किन्तु  मन के आरोग्य के लिये अनभिज्ञ से रहते हैं जो कि सही नहीं है । ज्यादातर हम इन विकारों की उपेक्षाकर देते हैं और यही उपेक्षा का धीरे-धीरे हमारे मन की ग्रन्थियों पर बुरा प्रभाव होने लगता है । हमारा कर्तव्य है कि रोग की प्रथम अवस्था में ही हम सावधान हो जाएँ और अपनी सतर्कता से उसका उपचार करें या अपनों का इलाज करवायें ।

कमलेश अग्रवाल