Archive | मई, 2012

वीणा के तार

31 मई

किसी  भी व्यक्ति के चारित्रिक व्यवहार में सबसे बड़ा हाथ उसकी परवरिश  का होता है , अगर व्यक्ति की परवरिश  अच्छी तरह होती  है तो उसका स्वभाव भी अच्छा होता है । बच्चे गीली मिट्टीकी तरह होते है आप और हम उन्हें जैसा चाहे वैसा बना सकते है ; खासकर तब जब वे 4 –5 साल की उम्र के आस-पास हो । ये उम्र बच्चों के विकास के लिये बहुत महत्व रखती है । इस उम्र में बच्चे अजीबोगरीब हरकतें करते हैं ; अगर उनके इस समय को ठीक से समझा जाए, धैर्य रखा जाये और उनको भी समझाया जाए तो वे अपने कदम सही दिशा की ओर रखते दिखाई देगें ।

आज के तेजी से बदलते  परिवेश में बच्चों को सही दिशा दिखाना , उनकी सही परवरिश  करना , उन्हें बड़ा करना , हर माता-पिता यानी कि हर पालक  के लिए सबसे बड़ी चुनौती  बनती दिखाई  दे रही है । आज के माता-पिताओं  को इस बात पर ध्यान देना बेहद जरुरी  हो गया है कि उनका , खुद के ही बच्चों से छोटी-छोटी  बातों  पर टकराव  न हो ।  इस पर  भी अगर  दंपति  कामकाजी  हों , तो बच्चों की परवरिश  की जिम्मेदारी  और भी बढ जाती  है क्योंकि ऐसे दंपति की जरा – सी लापरवाही  उनके संतान को उदंड बना सकती है या फिर उनके सहज विकास  को कुंठित  कर सकती  है । मतलब की आज के समय में अच्छे माता-पिता बनने की भूमिका  यानी ‘पैरेंटिंग’  भी आपके कौशल की परीक्षा ही  है ।

आज आम धारणा  ये बनती जा रही है कि मां के कामकाजी  होने से , वे बच्चों को ज्यादा समय नहीं दे पातीं और उनकी सही देखभाल  नहीं हो पाती  है । यही वजह है कि कामकाजी  महिलाओं  के लिये बच्चों की सही परवरिश  करना आज सबसे बड़ी जिम्मेदारी  बन गई है । इस विषय में जानकारों  का मानना  है कि  आज के दौर में मां का कामकाजी  होना  बच्चों की बेहतर  परवरिश  और अच्छी  शिक्षा में मददगार  ही साबित  हुआ है । कामकाजी मां आत्मविश्वास से समृध्ध  होती  है । बाहर के महौल से भलीभांति  परिचित  होती है । साथ ही साथ उसके अंदर एक छिपी चिंता भी होती है कि उसका , बच्चे को ज्यादा समय न दे पाना , बच्चे की मानसिकता  पर गलत प्रभाव तो नहीं डालेगा ? उसकी यही सोच , उसे बच्चे की हर हरकतों  पर ध्यान देने पर बाध्य करती है । इस कारण  वह अपने समय को और बच्चे की बढती उम्र के साथ ताल-मेल बैठाने की  कौशिश में लगी रहती है । इसी  के चलते कामकाजी  मां  अपने बच्चों को विश्वास में लेकर उनके बाहर आने-जाने की जानकारी  रखने  का प्रयत्न करती  है । उनके दोस्तों की आदतों  के बारे में उनसे खुलकर बातें करती  है । अनावश्यक  टोका-टाकी  से  अपनेआप  को दूर रख , उन्हें उचित  अनुशासन  में रखने का भरपूर  प्रयास करती है । छुट्टि के दिन उन्हें किसी  दर्शनीय स्थल पर ले जाकर अपने अंदर छिपी चिंता को समतोल  कर लेती है । कामकाजी  दंपति  आर्थिक तौर  पर मजबूत  होने के कारण  बच्चों की  शिक्षा के खर्चों का अच्छी  तरह  से वहन  कर ले सकते  हैं ।

शोधकर्ता जेसिका सैल्वाटोर का कहना है कि अगर माता- पिता अपने बच्चों को शुरुआत  से परिस्थितियों  पर विजय पाने की तालीम  देते हैं तो बड़े होकर वे किसी भी परिस्थितियों  में खुद से हल ढूंढ सकते हैं । यह काफी महत्त्वर खता है कि अपने बच्चे को नैतिक और सम्मानित नागरिक  बनाने के लिए हम किस तरह की भूमिका अपनाते  हैं ? यह भी उतना ही जरूरी  है कि हम अपने आचरण से उन्हें कितना प्रेरित कर पाते हैं ? महानगरों  और बड़े शहरों में संयुक्त परिवारों का ढहना और दूरदर्शन के जरीये  बच्चों का हर क्षेत्र में, हर विषय को जानना ,बच्चों की परवरिश में विशेष सतर्कता की मांग करता है।

मेरा मानना  है कि वीणा  के तार को इतना न ढीला  छोड़  दो कि उससे आवाज ही न निकले या फिर इन  तारों को इतना भी न कस दो कि वे टूट ही जाए  । आप का इस विषय को लेकर क्या मानना है ? आप के जवाब आवकार्य हैं….

कमलेश  अग्रवाल
 

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एरोबिक्स

30 मई

हर युवती चाहती है कि उसके पास ऐश्वर्यराय और सुष्मिता सेन जैसी एक परफेक्ट फिगर हो । वैसे भी जब से 0 फिगर का भूत उन पर सवार हुआ है , तब से उन्हें फिगर की बहुत चिन्ता रहने लगी है । इसके लिए वे डायटिंग और व्यायाम पर पूरा ध्यान देती हैं । यही वजह है कि वे 0 फिगर हांसिल करने हेतू हर सुझाव मानने को तैयार रहती हैं क्योंकि उनका लक्ष्य है अपनी बढती उम्रको दूर कर, हर समय अपनी उम्र से छोटा दिखना । मन में इस बात की पूरी लगन लिये होती हैं ।    

इसीलिये आजकल एरोबिक्स शरीर को चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए  एक अत्यंत लोकप्रिय व्यायाम हो गया है । एरोबिक व्यायाम एक वैज्ञानिक शैली है । एरोबिक शब्द एयर से बना है । इसका वैज्ञानिक अर्थ है शरीर में आक्सीजन की अधिक मात्रा यानी शुध्द हवा को श्वास के जरिए शरीर में पहुंचाना । एरोबिक्स से जब आक्सीजन की ज्यादा मात्रा शरीर में पहुंचती है तो इससे रक्तचाप सामान्य हो जाता है । हृदय की असामान्य धड़कनें लयबध्ध हो जाती हैं । फेफडों में मजबूती आ जाती है । मानसिक संताप दूर होता जाता है । सोचने की शक्ति तीव्र हो जाती है । आलस व सुस्ती कम होने लगते हैं ।

एरोबिक्स और कुछ नहीं, संगीत की धुन पर नाचते-नाचते किए जाने वाली एक शारीरिक व्यायाम ही है । अधिकतर एरोबिक्सके लिए तेज संगीत के ही गाने चुने जाते हैं, जिनमें बोल के साथ-साथ संगीत का अच्छा होना बेहद जरूरी है । क्योंकि तेज संगीत पर पांव की थिरकन एक लय में बंधी चली जाती है । इस के चलते शरीर में बढ़ रही चर्बी धीरे-धीरे कम की जा सकती है , मतलब कि ये व्यायम चर्बी कम करने के लिए एक कारगर उपाय है । जब मनोरंजन के साथ हम  कसरत करते हैं तब हमे थकान कम महसूस होती है । इसलिए शायद हर शहर में एरोबिक्स प्रेमियों की संख्या लगातार बढ़ रही है । दूसरे शब्दों में कहें तो एरोबिक कैलोरीज बर्न करने का एक अच्छा तरीका ही है ।

शोधकर्ताओं का मानना है कि एरोबिक्स से शरीर में श्वेत रक्तकणों की संख्या में बढोतरी होती हैं, जिससे शरीर का प्रतिरक्षा-तंत्र मजबूत बनता है । श्वेत रक्तकण रोगों से लड़ते हैं और हमे रोगों से बचाकर रखते हैं । इतना ही नहीं इससे कई मनोवैज्ञानिक फायदे भी होते देखे गये हैं । व्यायाम करते समय शरीर में ‘एंडोर्फिन’ नामक हार्मोन का स्त्राव होता है, जो हमे खुश होने का एहसास दिलाता है । हमे आनंदित करता है और हमे तनाव कम होने की अनूभुति करता है । देखा जाये तो एरोबिक्स एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया है जिस में हर चरण को पूर्ण करने पर हमें उपलब्धि और गर्व का एक एहसास होने लगता है । एरोबिक्स में की जाने वाली क्रियाओं से मांसपेशियां मजबूत होती हैं । हाथ, पैर, पेट, कमर, कंधे, हिप्स, शरीर के सभी अंग पुष्ट होने लगते हैं । जो लोग नियमित तौर पर एरोबिक्स का अभ्यास करते हैं उनकी नींद, मनोदशा और यहां तक की जीवनशक्ति सुधर जाती है ।

एक रिसर्च के नतीजे से पता चला है कि एरोबिक्स अनिंद्रा से ग्रस्त प्रौढ़ों और बुजुर्गों के लिए बहुत फायदेमंद है । अगर इस उम्र के लोगों को लंबे समय से अनिंद्रा सताए रहती हो तो एरोबिक्स से उन्हें इस खराब लक्षण से छुटकारा मिल सकता है । नींद नहीं आने की बीमारी से बिना किसी दवा , उन्हें निजात मिल सकती है । हाल ही में हुए एक नवीनतम शोध के अनुसार एरोबिक्स व्यायम मस्तिष्क की कार्यक्षमता को प्रभावित करती है क्योंकि इस व्यायम के फलस्वरूप मस्तिष्क को पहुंचने वाले रक्त संचार में सुधार होता है ; जिस के चलते कसरत के दौरान ऐसे रसायन उत्पन्न होते हैं जो मस्तिष्क कोशिका में वृद्धि व कार्य को प्रभावित करते हैं । । इलिनाय बैकमेन यूनिवर्सिटी के प्रमुख शोधकर्ताओं आर्थरक्रेमर और किर्क एरिक्सन के मुताबिक मस्तिष्क में मौजूद उम्र से संबंधित पदार्थ में क्षय होने से कई क्रियांएं जैसे योजना बनाना, याददास्त और बहुलक्ष्यीय कार्योको करने में कठिनाई आने लगती है । शोधकर्ताओं के मुताबिक  एरोबिक्स करने वालों में कसरत न करने वालों की अपेक्षा ज्यादा सक्रियता पाई गई है ।

हर व्यायाम की तरह एरोबिक्स के भी कुछ नियम हैं जिन्हें अपनाना निहायत जरूरी है वर्ना इससे फायदे के बजाय नुकसान हो सकता है ।

1. छोटे बच्चों और बहुत बूढ़े लोगों के लिए एरोबिक्स कसरत हानिकारक हो सकती है ।

2. किसी गंभीर रोग  जैसे अस्थमा होने पर, दिल की बीमारी या कोई अन्य गंभीर बिमारी के रोगी के लिये ये हानिकारक हो सकती है ।

एरोबिक-अनुभवियों के अनुसार एरोबिक्स शुरू करने की उम्र13-14 वर्ष ठीक है । अभ्यास के समय पैरों में जूते होने जरुरी है । भार पंजों के बजाय एड़ी पर दिया जाना बेहद जरुरी है ताकि पैरों में मोच न आ जाए और लिगामेंट्स को कोई नुकसान न पहुंचे ।

एरोबिक से आपका एक स्वस्थ, सुदृढ़ शरीर का सपना पूरा होता दिखाई देता है । आप एक ऐसे शरीर के मालिक बन जाते हो,जो बीमारियों को पास न फटकने देता है और जीवन जीने का भरपूर लुत्फ देता है । नियमित रूप से अभ्यास करने से आप को संगीत से प्यार होने लगता है और जीवन अधिक प्रफ्फूलित होते नजर आने लगता है  ।  एरोबिक्स की क्लास के कारण आप के अनेक दोस्त बनने लगते  हैं, उनके साथ हँसते मज़ा करते आप अपना छहरे बदन का लुफ्त उठाते हुए तनावमुक्त जिंदगी बसर करना सीख जाती हो…!!

 कमलेश अग्रवाल

कृत्रिम गर्भाधान – वंध्यत्व पर विजय

29 मई

हमारे शास्त्रोंमें गर्भाधान सोलह संसकारों में से एक संस्कार माना गया  है । गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के पश्चात हर दंपत्तिका एक ही सपना  होता है कि उत्तम संतति को वे दुनिया में लायें । स्त्री-पुरुष  के रज एवं वीर्य के संयोग से संतानोत्पति होती है ।  स्त्री-पुरुष  के संभोग के पश्चात पुरुष शुक्राणु नारी के रज से मिल कर नारी के डिम्ब में प्रविष्ट होता है और गर्भ के रुप में विकसित होता है । जब स्त्री और पुरुष  के प्राकृतिक तौर से बार-बार शारीरिक  मिलन के बाद भी अगर 2-3 सालों तक गर्भाधान संभव नहीं हो पाता , तब उन पति और पत्नी की चिंता बढने लगती है  ।  घरवाले भी परेशान  होते नजर आते हैं ।  इस समस्या के हल को सुलझाने हेतु  डाक्टर की राय ली जाती  है ।  डाक्टर दोनों का परिक्षण करता है और अगर उसे लगे कि इस दंपति के लिये नैसर्गिक गर्भाधान मुमकिन नहीं है , तब चिकित्सक उस दंपति को कृत्रिम गर्भाधान करवाने का  सुझाव  देता  है । । डाक्टर सभी परिक्षणों  के बाद कौन सा तरीका संतान इच्छुक दंपति के लिये सही रहेगा , उसका सुझाव देता है  क्योंकि ये कृत्रिम गर्भाधान के  कई तरीकें हैं ।

1. इन विट्रो उर्वरण ( In vitro  fertilization, IVF )

2. जायगोट इंटराफैलोपियन ट्रांसफर (जेड आई एफ टी)

3. गेमेट इंटराफैलोपियन ट्रांसफर (जी आई एफ टी)

4.इंटर साईटटोप्लास्मिक स्पर्म इंजैक्शन (आई सी एस आई)

इन विट्रो उर्वरण  का अर्थ है “शरीर के बाहर होने वाला” । इन विट्रो का एक और अर्थ भी है कांच के भीतर होना । ये सबसे अधिक प्रभावशाली तकनीक है ।  आम तौर पर इसका प्रयोग तब करते हैं जब दम्पति में अनुर्वरकता का कारण पता न चल रहा हो । कईबार महिला की अण्डवाही नलियाँ बन्द होतीं हैं या महिला के गर्भाशय  ग्रीवा परक म्यूक्स में कोई रोग हो तब भी गर्भ धारण करने में दिक्कत आती है । ऐसे में इन विट्रो उर्वरण की मदद ली जाती है । कईबार ऐसा भी होता है कि मर्द के वीर्य में बहुत कम शुक्राणु पैदा होते हैं , इतना ही नहीं कईबार वीर्य के अधिक तापमान या क्षारीयता व अम्लियता के कारण पैदा होते ही शुक्राणु मर जाते हैं या तो कईबार पुरुष साथी अनुर्वरक पाया जाता है ; ऐसी स्थिति में चिकित्सक द्वारा महिला को ऐसी दवाएं दी जाती हैं जिससे कि वह मलटीपल अण्डे पैदा कर पाये और पुरुष को भी ऐसी दवांए दी जाती हैं जो पुरुष के वीर्य की गुणवत्ता को बढाये, वीर्य में संख्या को बढाये और शुक्राणुओं की हलनचलन की रफ्तार तेज करे । जब दवाई के बावजूद ये संभव नहीं हो पाता है तब कईबार कृत्रिम वीर्य़ का उपयोग भी करना पडता है । इस प्रकिया के कारण जब महिला-अण्डे परिपक्व हो जाते हैं तब उन अण्डों को महिला के शरीर से निकाल लिया जाता है । लेब्रोटरी में एक कांच या प्लास्टीक के वर्तन में ( Petri dish ) उन्हें पुरूष के वीर्य के शुक्राणु से उर्वरित होने के लिए छोड़ दिया जाता है ।  तीन या पांच दिन के बाद इस प्रक्रिया से पैदा हुए स्वस्थ भ्रूण को महिला के गर्भ में रख दिया जाता है । इसके बाद महिला सामन्य महिला की तरह ही समय आने पर बच्चे को जन्म दे सकती है और मा बनने का गौरव प्राप्त कर अपने परिवार को संतति- सुख दे पाती है ।

ज़िगोटे इन्टराफैलोपियन  ट्रांसफर (जेड आई एफ टी ) इस प्रक्रियामें भी इन विट्रो उर्वरण की ही प्रक्रिया की जाती है ,बस फर्क इतना ही है कि अति सद्य भ्रूण को गर्भाशय की अपेक्षा फैलोपियन ट्यूब में ही डाल दिया जाता है ।

गेमेट इंटराफैलोपियन  ट्रांसफर (जी आई एफ टी) के अन्तर्गत महिला की अण्डवाही ट्यूब में अण्डा और वीर्य स्थानान्तरित किया जाता है । उर्वरण महिला के शरीर में ही होता है ।

इन्टर साइटोप्लास्मिक   स्पर्म इंजैक्शन  (आई सी एस आई  )  में उर्वरित अण्डे में मात्र एक शुक्राणु को इंजैक्ट किया जाता है । तब भ्रूण को गर्भाशय या अण्डवाही ट्यूब में स्थांतरिक किया जाता है । इसका प्रयोग उन दम्पतियों के लिए किया जाता है जिन्हें वीर्य सम्बन्धित कोई घोर रोग होता है । कभी कभी इसका उपयोग आयु में बड़े दम्पतियों के लिए भी किया जाता है या उन दंपतियों के लिये जिनका आई वी एफ का प्रयास सफल नहीं हो पाता  है ।

वंध्यत्व महिला के लिये बडा ही दु:खदाई है । हर महिला गृहस्थ जीवन के बाद मा बनना चाहती है । जब किसी कारण के चलते वह गर्भ धारण नहीं कर पाती है तब उस पर मानसिक और सामाजिक दबाव बढता  जाता है । कईबार दाम्पतिय जीवन में भी कठिनाईयां आ खडी होती है । शायद महिला के इस दु:ख ने ही प्रभूकृपा से ब्रिटेन के रॉबर्ट एडवर्ड को टेस्ट ट्यूब बेबी कि लिये प्रेरणा दी होगी..!! उन के द्वारा किये गये इस आविष्कार ने कई दंपतियों को खुशी बक्शी है । इसी कारण , उन्हें २०१० में प्रथम टेस्ट ट्यूब बेबी ,लुई ब्राउन जो (लड़की )1978 की जुलाई में पैदा हुई,के श्रेय में नोबेल पुरस्कार दिया गया । उन्हें ये सम्मान मेडिसिन के क्षेत्र में दिया गया । 1950, 1960 और 1970 के दशक में उन्होंने जो प्रयास किए, उसके परिणाम स्वरूप विश्व में टेस्ट ट्यूब बेबी का आना  संभव हो पाया । ये एक बहुत बडी सिध्धि थी ।

तब से अब तक दुनिया भर में आई वी एफ़ तकनीक से क़रीब 40 लाख बच्चे पैदा हो चुके हैं । नोबेल पुरस्कार देनेवाली समिति का कहना है कि संतानोत्त्पत्ति में असमर्थता एक ऐसी समस्या है जो विश्व के 10 प्रतिशत दंपतियों को प्रभावित करती है और ऐसी समस्या के निदान में जो अभूतपूर्व योगदान रॉबर्ट एडवर्ड ने दिया है, उसका मूल्य करना सुरज के सामने दीप दिखाना ही होगा । रॉबर्ट एडवर्ड ने निस्संतान लोगों की मदद के लिए इन विट्रो फ़र्टिलाइज़ेशन (आईवीएफ़) तकनीक का जो आविष्कार किया वह आज के युग में मानवजात के लिये एक आशीर्वाद ही है ।

इस के अलावा  भी कई और उपयोगितायें  भी इस तकनीकि की हैं : 

रजोनिवृत्ति पश्चात गर्भाधान: यद्यपि रजोनिवृत्ति भविष्य में गर्भ धारण करने के मार्ग में एक प्राकृतिक रुकावट है, लेकिन आईवीएफ़ (IVF) की मदद से पचास व साठ वर्ष की महिलाएं भी गर्भवती हो चुकी हैं और हो सकती हैं ; क्योंकि रजोनिवृत्ति के बाद भी गर्भाशय गर्भधारण करने के लिए पूरी तरह सक्षम होता है  ।

समलिंगी जोड़े, एकल और अविवाहित  अभिभावक :

नैतिक मुद्दों में प्रजनन अधिकार, शिशु का कल्याण, अविवाहित व्यक्तियों, समलैंगिकों के साथ भेदभाव न करना, और स्वायत्तता शामिल है इसी वजह से आज आई वी एफ़ (IVF) की मदद से इस वर्ग को भी संतान का सुख मिलना संभव हो पाया ।

बचे हुए डिम्ब का इस्तमाल भी दे सकता है कुछ और दंपतियों  को खुशी :

देखा गया है कि आई वी एफ़ (IVF) प्रक्रिया के बाद कई सक्रिय भ्रूण बच जाते हैं । उनका सही इस्तमाल कर अगर संबंधित दंपतियों को, जो संतान इच्छुक हैं, उन्हें कथित महिला या युगल की अनुमति से  प्रजनन हेतु , मदद करने के रुप में दान किए जायें तो कई घरों के चिराग रोशन किये जा सकते हैं । जो एक बहुत नेक कार्य हो सकता है । इस के तहत जन्मा शिशु उस महिला का माना जाता है जिसने उसे गर्भ में रखा और जन्म दिया, न कि दाता का, ठीक उसी तरह जैसे डिम्ब दान या शुक्राणु दान में किया जाता है ।

प्रीइंप्लांटेशन जेनेटिक  डायग्नोसिस

1990 के दशक की शुरूआत में आई वी एफ़ (IVF) उपचार के साथ प्रीइंप्लांटेशन जेनेटिक डायग्नोसिस के उपयोग की प्रथा भी आरंभ हुई और तब से लेकर आज तक इस उन्नत प्रजनन तकनीक का उपयोग करके सैकड़ों सामान्य, स्वस्थ शिशु जन्म ले चुके हैं । पी जी डी (PGD) तकनीक रोगियों के दो स्पष्ट रूप से भिन्न समूहों के लिए सफल गर्भावस्था और जन्म की संभावना को बेहतर करती है । वे युगल जो बार बार गर्भपात होने से संबंधित वंध्यता के शिकार हैं, और वे युगल जिन पर वंशानुगत मिले किसी आनुवांशिक रोग को अपने शिशु तक पहुंचाने का खतरा है ।

पी जी डी (PGD) से लाभ ले सकने वाले रोगियों में शामिल हैं :

  • जिन जोड़ों में वंशानुगत रोग का पारिवारिक इतिहास हो
  • वे जोड़े जो किसी लिंग-संबंधित रोग से बचने के लिए लिंग चयन का उपयोग करना चाहते हों
  • जिन महिलाओं को आई वी एफ़ (IVF) में बार बार विफलता मिली हो
  • जिन महिलाओं का अस्पष्ट गर्भपात का इतिहास रहा हो
  • जिन महिलाओं की आयु 39 वर्ष से अधिक हो

पी जी डी (PGD) में क्रोमोसोमल असामान्यताओं के लिए स्क्रीनिंग की जाती है । इसमें आई वी एफ़ (IVF) प्रक्रिया के दौरान प्री-एम्ब्रायो (pre-embryo) की एक-एक कोशिका को स्क्रीन किया जाता है । प्री-एम्ब्रायो (pre-embryo) का स्त्री के गर्भाशय में वापस स्थानांतरण करने से पहले प्री-एम्ब्रायो (pre-embryo) से एक या दो कोशिका निकाल ली जाती हैं । फिर इन कोशिकाओं का सामान्यता के लिए मूल्यांकन किया जाता है । सामान्यतः एक से दो दिनों के भीतर, मूल्यांकन समाप्त होने के बाद, केवल सामान्य प्री-एम्ब्रायो (pre-embryo) ही स्त्री के गर्भाशय में वापस रखे जाते हैं । इसके अलावा पी जी डी (PGD) एकाधिक गर्भाधान का जोखिम घटा देता है क्योंकि आरोपण के लिए बहुत कम एम्ब्रायो की आवश्यकता होती है ।

इस प्रक्रिया की कुछ जटिलताएं  :

आई वी एफ़ (IVF) की प्रमुख जटिलता है एक गर्भ में एक से अधिक शिशुओं का जन्म होना । यह घटना भ्रूण हस्तांतरण के दौरान एक से अधिक भ्रूणों को हस्तांतरित करने की प्रथा से सीधी जुड़ी हुई है । एकाधिक जन्म के साथ गर्भपात, प्रासूतिक जटिताएं, समय पूर्व जन्म और दीर्घकलिक क्षति की संभावना के साथ नवजात शिशु की अस्वस्थता के खतरे का बढ़ जाना । एकाधिक गर्भाधान (ट्रिप्लेट (Triplet) या अधिक के खतरे को घटाने के लिए कुछ देशों (जैसे इंग्लैंड) ने हस्तांतरित किए जाने वाले भ्रूणों की संख्या पर सीमाएं लागू की हैं, लेकिन इन सीमाओं का सभी स्थानों पर पालन नहीं किया गया है या उन्हें स्वीकार नहीं किया गया है । हस्तांतरण के बाद गर्भाशय में भ्रूणों का सहज विभाजन हो तो सकता है, लेकिन यह बहुत कम होता है और इससे एक समान जुड़वां शिशु जन्म लेते हैं । ये तकनीकी बेहद मंहगी है तथा ये जरुरी नहीं कि प्रथम प्रयास में सफलता मिलेगी  । फिर भी इस आविष्कार का होना बहुत शुकून प्रद तो है ही ।

सच्च कहूं तो 21वीं सदी में कृत्रिम गर्भधारण का चलन बढता दिखाई दे रहा है ।  वजह जो मुझे लग रही है वह शायद निम्न दिये सुझाव के मद्देनजर हो सकती हैं..

1.देर से शादी करना या होना

2. आज की तनावग्रस्त जीवन शैली का होना  और पैसे के पीछे दौडना 

3. सात्विक एवम समतोल आहर की जगह फास्ट्फूड को पंसद करना

4.व्यायम या आऊट्डोर खेलों से रुचि का घटना

जो भी हो आई वी एफ़  आज के दंपतियों के लिये लाभप्रद जरुर साबित हो सकती है । बस इस का अगर कोई गलत इस्तमाल न हो…!! दोस्तों ये तो भारत देश है…कुछ भी हो सकता है…सत्य मेव जयते में दिखाया था न हमारे यहां की चिकित्स-सेवा की दूर्दसा…

जय हिंद

 कमलेश अग्रवाल

नए संदर्भ में नई सोच

28 मई

हम सभी ने बचपन में कछुए और खरगोश की कहानी सुनी ही है । एक बार कछुआ और खरगोश के बीच दौड की शर्त लगी । कौन जीतेगा ? खरगोश बडा शातिर था । वह जानता ही था कि जीत उसकी ही होनी है । कछुआ महेनती था सो उसे अपनी लगन पर भरोसा था । दोनों ने शर्तके मुताबिक दौड शुरु की । प्रारंभ में कछुआ धीरे-धीरे चल रहा था, पर खरगोश बड़ी तेजी से दौड़ा । कुछ अंतर काटकर खरगोश ने देखा, कछुआ तो बहुत पीछे है, इसकी धीमी चाल से कितना चलेगा ? वहीं पेड़ के नीचे वह थोड़ा सुस्ताने के लिये बैठ गया । बैठते ही झपकी लगी और वह सो गया । कछुआ धीमी गति से बढ़ता रहा । पेड़ के नीचे सोये खरगोश से वह आगे निकल गया और शीघ्र ही निश्चित स्थान पर पहुंच गया । बस, क्या था , वह प्रतियोगिता जीत गया ।

अपनी हार पर खरगोश बडा दु:खी हुआ । आस-पास के भी सभी ताजुब कर रहे थे, यही सोचकर की तेज दौडने वाला हारा कैसे ? जब खरगोश शांत हुआ तब सोचने लगा कि मेरे हारने की वजह क्या रही ? उसने आत्मचिंतन किया और उसे ये महसूस हुआ कि उसका अपने पर अति विश्वासका होना, थोडी सी लापरवाही बरतना और शिथिलता का होना ही उसके हार के कारण रहे । खरगोश शातिर तो था ही सो वह फिर कछुए से मिला और कहने लगा,” मैं चाहता हूं कि एकबार फिर शर्त लगाई जाये । मुझे पक्का यकीन है कि तुम मना नहीं करोगे ।” कछुआ मान गया और एकबार फिर स्पर्धा का आयोजन किया गया । इस बार खरगोश बगैर रूके दौड़ता ही रहा…दौड़ता ही रहा और अंत में जीत गया ।

कछुए ने भी आत्मचिंतन किया एवं अहसास किया कि निर्धारित ढांचे की दौड़ में खरगोश को हरा पाना संभव नहीं । कछुआ धीरे-धीरे खरगोश के पास पुहंचा और कहा, “दोस्त क्यों न हम तीसरी बार दौड़ लगाएं ? अब जो भी जितेगा वह ही जीता कहलायेगा । पर अब की बार हम दौड का मार्ग बदल देंगे । क्योंकि तभी स्पर्धाको चुनौती दी जा सकती है । “ खरगोश ने सोचा , वह तो तेज ही दौडता है फिर क्यों फिक्र करना ,जो भी मार्ग हो क्या फर्क पडेगा ? और वह शर्त के लिये राजी हो गया । दोनों ने मार्ग बदलना स्वीकार कर ही लिया था । दोनों ने खुश होकर दौड़ शुरू की । पहले तो खरगोश तेजी से दौड़ा, लेकिन रास्ते में नदी देखकर कुछ ठिठका और आगे आकर रूक गया । निर्धारित स्थान नदी के सामने किनारे से डेड किलोमीटर दूर था । वह सोचने लगा कि अब क्या किया जाये ? उसे पहले कौन सा मार्ग होगा इस बारे में पूछना चाहिये था । गलती उसीकी ही है । अब हारना निश्चितहै क्योंकि मुझे कछुए की तरह तैरना जो नहीं आता । वह इस उधेड्बुन में लगा रहा और कछुआ नदी को पार कर अपने निर्धारित स्थान पर पहुंचकर दौड़ जीत गया ।

पर इस स्पर्धाके कारण वे अच्छे दोस्त बन गये । एक दिन फिर उन्हों ने बीती स्पर्धाको याद कर फिर एकबार शर्त लगाई । इस बार एक टीम की तरह दौड़ शुरू की गई । पहले खरगोश नदी के किनारे तक कछुए को उठाकर लाया और बाद में कछुए ने खरगोश को उठाकर नदी पार करवा दी। वापसी में भी दोंनो ने एक साथ मिल कर अपना फासला तय किया ।

असफलता के बाद खरगोश ने आत्मचिंतन किया और निर्णय किया कि अपने कार्य में सफल होने के लिए उसे अधिक मेहनत और प्रयत्नकरना होगा । कछुआ दूसरी बार हारा लेकिन उसने हार नहीं मानी । उसने सफल होने के लिए अपनी नीति बदली । असफलता मिलने पर सिर्फ अधिक मेहनत ही काम नहीं आती । हमारी कार्य-पध्दति और तरीकों को भी बदलना पडता है । हम जानते हैं कि बदलाव समय की मांग है । कई बार यह आवश्यक भी बन जाता है । खरगोश और कछुए ने जब तक एक दूसरे को मात देने की सोची, तब तक दोंनो को ही सफलता और असफलता का सामना करना पडा पर जब दोंनो ने मिलकर बीडा उठाया तो दोंनो ही खुश हुए एवम सफल भी रहे । हम आपस में नहीं बल्कि परिस्थति के सामने स्पर्धा करें तो परिस्थिति में सुधार अवश्य होगा और हमे सफलता भी मिलेगी । साथी हाथ बढाना , एक अकेला थक जायेगा, मिलकर बोझ उठान….। नए संदर्भ में नई सोच का होना बेहद जरुरी है ।

कमलेश अग्रवाल

प्लैटॉनिक रिलेशन का जमाना

25 मई

जिवीका अपनी बेटी दिव्या को ले कर बडी परेशान रहती है । उसकी बेटी दिव्या बडी अजीब सी लडकी है । जब भी जिवीका उसे उसके जन्म-दिवस पर  सहेलियों को बुलाने को कहती, वह फट से कहती ,” मां मेरी कोई सहेली नहीं है । तुम कहो तो अपने दोस्तों को बुला लूं । ये तो आप को गंवारा होगा नहीं …सही कह रही हूं न ? अब ये मत कहना कि दुनिया में लडकियों का क्या अकाल पड गया है कि तुम लडकों को दोस्त बनाये हुए हो..? मैं ऐसी ही हूं । एक बात बताओ मां, क्यों हम मेंजब भी दोस्तों को लेकर बातें होती हैं , तब आप दोस्ती को सिर्फ़ दो लड़कों या दो लड़कियों के बीच की ही दोस्ती को नजर में रख  बात करती हैं ? क्या दोस्ती एक लड़के और लड़की के बीच नहीं हो सकती ? आप इसे क्यों गलत मानती हो ? सच कहूं तो दोस्त मेरी झूठी तारिफ तो नहीं करते । मेरे पहनने ओढने को लेकर कोमेंट तो नहीं करते, जब की लडकियों को तो इन बातों के सिवाय कुछ और सुहाता ही नहीं ..!! उन्हें तो हर बात से तकलीफ होती है । दूसरों के फटे में पैर डालके फाडने में उन्हें बहुत मजा आता है । अब आप ही बताओ मैं क्यों उनसे मित्रता करुं ? दोस्ती में आदर, सच्चा प्यार और अंडर्स्टेंडिग चाहिये ,जो मुझे लडकियों में नजर नहीं आती ….मुझ से ये न होगा । ”

दिव्या की इस तरह की बातों को सुन जिवीका बौखला गई ।  उसके दिव्या पर पलट वार करते हुए कहा , तुम भी तो लडकी हो ।  क्या तुम भी ऐसा स्वभाव लिये हुए हो? नहीं न ।  अगर ढूंढोगी तो तुम्हे भी एक अच्छी सहेली मिल ही जायेगी ।  उसकी इस बात का दिव्या पर कोई असर न हुआ ।  वह सोचती रही कि जमाना क्या इतना बदल गया है ? क्यों दिव्या ऐसे ख्याल रखती है ?क्यों आखिर दिव्या सहेलियां बनाना नहीं चाहती ? ये बातें उसे विहवल किये जा रही थी तभी अचानक घर की घंटी बज उठी । उसने जैसे ही दरवाजा खोला तो खुशी से उछल पडी । सामने उसके बचपन की सखी प्रेम खडी थी ।

दोनों अंदर आईं । एक दूसरे से गले मिलीं । गील-शिकवे भी हुए । चाय-नाश्ता कर दोनों पलंग पर ही लेट  गईं । लेटे-लेटे ही बातें होने लगी । जिवीका ने कहा ये तो बताओ बच्चे क्या कर रहे हैं ? प्रेम ने कहा,” सोनू तो 5 साल से U.S.A. में ही थी, उसने वहीं अपने साथ काम करनेवाले दीपक से 2 हफ्ते पहले ही शादी कर ली । मोनू अभी – अभी  MBA कर कलकत्ता से लौटा है । बेंगलोर में कोई मल्टी-नेशनल कंपनी में मई में जोईन करेगा । सोच रही हूं कोई अच्छी लडकी देख 6 महिनों के भीतर उसकी भी शादी कर दूं । भई, मैं ही बोलती जाऊंगी या तुम भी कुछ कहोगी ?” जिवीका ठहका मार हंसते हुए बोली,” चांस भी तो मिले…!! अरे यार ! क्या बताऊं, दिव्या को ले एक अजीब सी उलझन हो रही है । तुम्हें पता है…उसकी कोई सहेली है ही नहीं, सिर्फ दोस्त ही हैं । बडी पागल लडकी है । कुछ कहो तो इस कदर सवाल-जवाब करती है कि  जवाब देते नहीं बनता । तुम्हारे आने से आधा घण्टे पहले ही मुझ से उलझकर गई है । मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आता , उसे  कैसे समझाऊं ? “

प्रेम हंसते हुए बोली, “ अगर उसे दोस्त अच्छे लगते हैं तो हर्ज क्या है ? सच कहो ,हमें भी अपनी कई सहेलियों से बातें करना कहां भाता था !! तुम बताओ अगर लड़का-लड़की बिना किसी कमिटमेंट या डिजायर के अच्छे दोस्त बनकर रहते हों तो उसमें बुराई क्या है ? मोनू कल ही बता रहा था कि मां आजकल प्लैटॉनिक – रिलेशन का जमाना है । जब मैंने उससे पूछा कि प्लैटॉनिक – रिलेशन किस बला का नाम है ?” उसने कहा,“ मां ,लडके और लडकी के बीच निखालसता से जब दोस्ती हो तब उसे प्लैटॉनिक – रिलेशन कहा जाता है । ये दोस्ती ऐसी ही होती है जैसी  दो लडकियों के बीच या दो लडकों के बीच देखी जाती है । इस दोस्ती में कोई गैर-जिम्मेदाराना हरकत की गूजाईश नहीं होती । कोई भी रोमांटिक एंगल नहीं होता । सिर्फ ये दोस्ती लडके और लडकी के बीच विश्वासके चलते ही की जाती है । दोनों को अपनी मर्यादा का पूर्ण रुप से ध्यान होता है । मानलो अगर हमें प्रेम-विवाह होने के बावजूद भी कोई बहूत पसंद आने लगता है तो ये जरुरी तो नहीं कि हम शादीशुदा हैं तो हम दोस्त या सहेली (भिन्न लिंग के होने के चलते) से मित्रता न करें ? ऐसी सिचुएसन में हम प्लैटॉनिक रिलेशंस  बना सकते हैं  और इसकी जानकारी  पति/पत्नी को भी करा सकते हैं । इसमें बुराई ही क्या है ? विवाह पूर्व भी अगर हमारे किसी के साथ ऐसे संबंध रहे हों , इसका जिकर अपने विवाहित साथी पति/पत्नी को बता दें तो  संशय तो पैदा न हो…!!

 21वीं सदी में जब लडकियां , लडकों के साथ कंधे से कंधा मिला कर काम कर रहीं हैं ; ऐसे में लड़का -लड़की कभी अच्छे दोस्त नहीं हो सकते ऐसी ग्रंथिको रखना क्या सही है ? आज मल्टी-नेशनल कंपनी में देर रात तक काम करना होता है ,तब एक ऐसे साथी की जरुरत होती ही है जो तुम्हे जरुरत के समय काम आये । जो दोस्त आप की तरक्की से दु:खी न हो पर आप की तरक्की को सकारात्मक अंदाज से देखे । जिस दोस्ती में स्वार्थ का भाव ना हो,  ऐसे में प्लैटॉनिक रिलेशन  बनाने में हर्ज ही क्या है..!!

प्रेम के द्वारा बताई गई बात ने जिवीका की चिंता ही दूर कर दी । अगर आप के बच्चे भी ऐसे संबंध को रखे हुए हैं तो चिंता मत करीये , इसे जमाने की रफ्तार मान सहर्ष अपना लीजिये ।

कमलेश अग्रवाल

 

दोस्ती

23 मई

दोस्ती बादल नहीं, जो गरजे, बरसे और थम जाये…..!!

दोस्ती ज्वाला नहीं, जो भडके, जले और बुझ जाये..!!

दोस्ती फूल नहीं, जो खिले, मुरझाये और मिट जाये…!!

सच कहूं तो यारो……

दोस्ती तो वह नदी है जो निरंतर बहना जानती है,

यारों की कसीस को किनारे कर, आगे बढना जानती है,

दोस्ती वह वसंत है, जो बहारों को गले लगाती है,

हरदम भंवरों की तरह दोस्तों पर मंडराती है,

आफताब की तरह चमकती है और खुद को मिटाती है,

दोस्ती तो वह सांस है, जो रुकने पर भी

अपनी मौजूदगी का अहसास कराती है ,

दूर रह कर भी अपने आप की याद दिलाती है…!!

कमलेश अग्रवाल

विश्वास का अंत

21 मई

अवनी ने जब अपने घरवालों को कहा कि वह जागृत से शादी  करना  चाहती  है तो मानो घर में भूचाल ही आ गया ।  उसकी बुआ को जब ये पता चला कि जागृत एक छोटे से गाँव का रहनेवाला है तो वे चिल्लाते हुए बोलीं कि अवनी तुम्हें पता नहीं ये गांव के पुरुष कितने जिद्दी होते हैं ? मैं मानती हूँ कि जागृत वैसा लड़का न भी हो ,पर उसके परिवार वालों का क्या भरोसा ? उनका कैसा स्वभाव हो किसे पता..!!  बेटे अवनी जो चीज चमकती हो ,जरूरी नहीं कि वह सोना ही हो ..!!  पित्तल भी हो सकता है

अवनी की सहेत पर बुआ की इन बातों का कोई प्रभाव न हुआ । उसने मन में ठान ली थी कि वह जागृत से ही विवाह करेगी और उसने ऐसा ही किया । विवाह से पहले ही जागृत ने उसे कह दिया था कि उसके माता-पिता को बहु का नौकरी करना पसंद नहीं है । सुना है कि प्यार में सब जायज होता है क्योंकि प्यार अँधा होता है..!! अवनी पर जागृत से विवाह करने का भूत इतना सिर चढ़ गया था कि जायज और नाजायज बातों के बारे में उसके दिमाग ने सोचना ही बंद कर दिया था । उसने अपने दिमाग रुपी दूकान के शटर ही गिरा दिये थे । 

अवनी व जागृत अपने इस फैसले से बड़े खुश थे । कुछ दिनों तक जागृत के परिवारवालों ने अवनी को अनमने मन से बहु के रूप में स्वीकार किया, धीरे-धीरे अवनी के प्रेम और धैर्य ने उसे उस घर में जगा दिला ही दी । कईबार अवनी को महसूस हुआ करता था कि उसकी सास अभी भी पूर्ण रूप से उसे बहू के रूप में अपना नहीं पाई हैं । समय के साथ सब सही हो जाएगा, इसी उम्मीद से अवनी बिना सोचे-समझे पति और उसके घरवालों की कुछ ऐसी बातों से भी सहमत होती चली गई , जिन बातों के कारण उसका आत्म-सन्मान, खुद की पहचान से वह दूर होती चली गई । जिस अवनी की वाक्पटुता से प्रभावित हो जागृत ने उसे अपनी संगिनी बनाया था, वह सब छुटता गया । अब अवनी घर में मात्र एक परिचारिका बन कर रह गई थी । हर समय सिर पर साडी का पल्लू रखे रहना , घर के लोगों का ध्यान रखना ,घर पर आये महमानों कि आगता-स्वागता करना ही अब उसकी दिनचर्या बन चूकी थी । एक बिंदास लड़की अब पूर्ण रूप से घरेलु औरत बन चूकी थी ।

वह इस बात से बिल्कुल बेखबर थी कि जागृत धीरे-धीरे उससे दूर होता जा रहा है..!!  इतना ही नहीं ,जागृत की ही आफिस में काम कर रही उससे उम्रमें ७-८ साल छोटी आरती को पसंद करने लगा है..!! पहले जागृत रात को ८-८:३० बजे तक घर आ जाया करता था । कुछ दिनों से वह १०-११ बजे तक आने लगा था । अवनी के द्वारा देर से आने के कारण के पूछने पर वह कभी कोई तो कभी कोई बहाने बना देता । एक दिन अवनी की चाचा की बेटी सुमन का फोन आया, जो उसी शहर में रहती थी । उसने अपने बेटे के जन्म-दिवस के उपलक्ष्यमें अवनी और जागृत को आमंत्रित किया था । वैसे भी अवनी ४-५ महीनों से घर के बाहर निकली ही नहीं थी ; सो सुमन का आमंत्रणउसे अच्छा लगा । वह ये सोच बहूत प्रसन्न थी कि कल उसे चचेरी बहन सुमन के यहाँ जाना है । जागृत के घर आने पर उसने जब कहा कि हमें कल दीदी ने खाने पर बुलाया है, रोहन का जन्म-दिवस है, तो जागृत ने दिलचस्पी न दिखाते हुए कहा, ” मैं कल जल्दी न आ पाऊंगा ।  तुम अकेले ही हो आना । कोई अच्छा सा गिफ्ट भी ले जाना ।” अवनी समझ ही नहीं पा रही थी कि जो पति विवाह पूर्व उसकी कोई बात टालता नहीं था , उसका अचानक १-२ सालों के बाद ही इतना शुष्क व्यवहार क्यों कर हो गया ? फिर ये सोच कर कि शायद आजकल बिजनेस में कुछ ज्यादा काम आगया होगा , वह दुसरे दिन अकेले ही सुमन के यहाँ पहुंची । रात काफी हो चली थी सो सुमन ने जागृत से फोन कर कहा कि अगर आप इजाजत दें तो हम अवनी को कल दोपहर तक घर पहूंचा देंगे । जागृत ने बिना हा-ना किये ही रुकने की इजाजत दे दी ।

जब सुमन ने अवनी से जागृत के न आने का कारण पूछा तो उसे अवनी ने जवाब दिया कि आजकल जागृत बडे व्यस्त रहने लगे हैं । रोज उन्हें 11-12 तो बज ही जाते हैं । कईबार तो ऑफिस में ही सो जाते हैं । मैं ने कईबार कहा है कि इतना बिजनेस क्यों बढाते जा रहें हैं आप ? तो कहने लगे इस उम्र में जो हो जाये वह ठीक है । बुढापे में थोडे ही इतना भाग पाऊंगा ? मेरी तबीयत की फिक्र न करो । यों व्यस्त रहना मुझे बहूत पसंद है । अवनी के द्वारा जो जवाब दिया गया उसे सुनते ही अचानक सुमन के दिमाग में कल गीरा की कही हुई बात याद आ गई । कल ही तो उसे गीरा, जो उसके पडोस में रहती है उसने सुमन से थोडा झिझकते हुए कहा था,” सुमन, मैं ने कल तुम्हारे जीजाजी को रात के शॉ में किसी खुबसूरत लडकी के साथ देखा था । पहले तो यकीन ही नहीं हुआ, सोचा अवनी दी भी साथ होगीं ,पर वे तो नहीं दिखी..!! सच कहूं तो तुम्हारे जीजाजी का, उस लडकी के साथ जिस तरह का व्यवहार मैं ने देखा, वह मुझे तो सही नहीं लगा । बुरा मत मानना, इन मर्दजात का विश्वास करना कईबार हमें मुशिबत में डाल देता है, अवनी दी वैसे भी घर की ही बन कर रह गई हैं..!! मैंने तो इसलिये कहा कि 2-4 दिनों पहले ही शर्माजी के दामाद की बात सुनी थी कि उसने दूसरी शादी कर ली और उनकी बेटी को पता ही न चला । बस इस कारण ही मैं ने सोचा कि चल कर तुम्हें बता दूं , अगर दाल में कुछ काला होगा तो अवनी दी कम से कम चौकोनी तो हो जायें । “

सुमन अवनी के करीब आते हूए बोली, “ अवनी, कल जीजाजी घर कब आये थे ?” अवनी बोली,“ कल..!! कल तो उन्हें काफी देर हो गई थी । समय तो नहीं देखा था फिर भी 12 या 12:30  तो बजे ही होंगे । इन का  खाने की टेबल पर इंतजार करते करते ही मैं कुर्सीपर ही सो गई थी ।  पर तुम क्यों ये पूछ रही हो ?” सुमन ने हंसते हुए कहा ,” आज जीजू आये नहीं न, सो मैं यही सोच रही थी कि रात देर तक काम किया होगा तभी वे नहीं आये ।” सुमन ने अवनी को तो ढांढस बंधा दी पर उसके मन को चैन नहीं था । काम की आड में जीजू का अवनी को मूर्ख बनाना उसे गंवारा न था । सुमन ने मन ही मन में ठान ली कि वह इस की तह तक जाकर ही दम लेगी । इस मुहिम में सुमन के पति राजीव भी सामिल हो गये  ।  

सुमन  और राजीव ने अब अपनी मुहिम छेड ही दी । थोडे ही समय में उन्हों ने जान लिया कि जीजू उनकी सेक्रेटरी लीना के प्यार में डूबते जा रहें हैं । लीना के प्यार का जादू जीजू पर पूर्णरुप से छा गया है । अब उनके सामने समस्या ये थी कि अवनी को कैसे बताया जाये ? सुमन ने अपने दो करीबी दोस्तों को जीजू की जासूसी के लिये लगा दिया । उनसे पता चला कि जीजू ने कल के रात के शॉ की कमल थीयेटर की दो टिकिटें बुक करवाई है । उसके प्लान के मुताबिक वह और उसके पति राजीव ने भी उसी पिक्चर की तीन टिकिटें बुक करवा ली । वही हुआ जिसका अंदेसा था । जागृत अपनी सेक्रेटरी के साथ ही थीयेटर के बाहर मौजूद था । सुमन ने अवनी को फोन लगाया और कहा मैं ने दोपहर में जीजू से बात की थी । पता चला कि आज जीजू को एक पार्टीसे मिलने राजकोट जाना है सो मैं ने उनसे कह दिया कि आज हम अवनी को साथ ले कहीं घूमने जायेंगे । तुम जल्दी से तैयार हो जाओ वैसे भी आज तो तुम घर पर अकेली ही तो हो । सास-ससुर भी तो गांव गये हुए हैं । बस हम अभी ही तुम्हें लेने आ रहे हैं । राजीव पिक्चर की टीकिटें ले आये हैं । बहुत दिनों बाद आज हम साथ-साथ पिक्चर देखेंगे ।अवनी थोडी देर तो आनाकानी करती रही पर आखिर में आने को मान गई । पिक्चर शुरु हो चली थी और सुमन को बता दिया गया था कि जागृत अंदर बैठ चूके हैं । प्लान के मुताबिक इन तीनों की सीटें ठीक जागृत और लीना की सीटों के पीछे की ली गई थी । इस प्लान को सही रुप दिया था राजीव के दोस्त सोहन ने क्योंकि वह इस थीयेटर का मालिक जो था ।

जब ये तीनों अंदर गये तो काफी अंधेरा था । थोडी देर में ही आंखे अंधेरे से रुह-ब-रुह हो चलीं थी । तभी मौका देख सुमन ने जोरों से कहा, “ अरे जीजू आप यहां ? आप तो राजकोट जानेवाले थे ? अवनी को तो पहले यकिन ही न हुआ, पर जब राजीव ने उसे कहा,” अवनी, जागृत की पार्टी से मिलो तो सही ।” अवनी को इन दोनों के साथ देख जागृत और लीना को तो जैसे सांप ही सूंघ गया । आज दोनों रंगे हाथों पकडे गये थे । अवनी जागृत द्वारा  इतना बडा विश्वासघात के चलते अपनेआप को संभाल नहीं पा रही थी । बडी मुश्किल से वह बस इतना ही कह पाई,” जागृत क्यों किया मेरे साथ इतना बडा धोखा ? आप ने तो मुझ से प्यार किया था न…? जन्म-जन्मांतर साथ रहने की कसमें खाई थीं न…!! फिर ये क्या है ?” लीना की ओर देख बोली,” जिस आदमी ने कुछ सालों पहले मुझ से प्यार किया था, उस प्यार और वादों को वह आज तुम्हारे कारण भूल बैठा…उस पर विश्वास कर तुम भूल तो नहीं कर रही हो न..? इस भंवर का क्या भरोसा कोई ओर सुंदर फूल देख पुराने फूल को, नहीं छोड देगा…!! मैं भी कभी ऐसे ही इस के मोह्जाल में फंसी थी । जब मन किया आसपास मंडराने का, रसपान करनेका कर लो…और जब मन भर जाये तो कोई नये फूल पर मंडराने चले जाओ । पर अभी तुम्हे मेरी बात समझ न आयेगी क्योंकि प्यार दिवाना होता है, अंधा होता है ।” और रोती हुई सुमन से लिपट पडी  थी ।

सुना है अब अवनी अपनी दो बेटियों के साथ इज्जत की जिंदगी जी रही है । वैसे भी अवनी पढी-लिखी तो थी ही । राजीव ने उसे दूसरे शहर में एक कोरपरेट कंपनी में नौकरी दिलवा दी थी । आज वह आत्म-सम्मान के साथ सिर ऊंचा कर शूकुन की जिंदगी जी रही है । दोनों बेटियों की शादी कर दी है । दामाद बेहद सुशील और संस्कारी मिले हैं ।

कुछ दिनों पहले उससे मिलना हुआ था । मैं और वह काफी एक-दूसरे के निकट थे । मैं ने कह, “ सब ठीक तो है न अवनी ?” वह हंसते हुए बोली,” मै ने उसे दिल से माफ कर दिया । एक पुराना सपना था जो टूट गया । उसे क्यों टटोलना…?”

अवनी की जिंदगी की ये कहानी को आप के सन्मुख इसलिये रखा है कि हमारी कोई बेटी,बहन या सखी ऐसे हादसे की शिकार न हो । प्रेम-विवाह का ये ही नतीजा होता है ये मैं नहीं कह रही हूं…बस मैं तो ये ही कहना चाहती हूं कि कभी ही कोई भी कदम उठाने में हम से जल्दबाजी न हो । हम जजबात में न बह जायें । बडों के द्वारा अगर हमें हिदायत दी जाये तो कुछ वक्त वहीं ठहर कर एकबार फिर से थोडा सोचें ।  

कमलेश अग्रवाल