Archive | जून, 2012

मेरे पिताजी

29 जून

आज पिताजी को गुजरे पूरे 16 साल हो गये, फिर भी उन की मौजूदगी का अहसास मेरे जहन में आज भी ज्यों का त्यों ही  है । पिताजी मेरे लिये मेरे जीवन की पृष्ठभूमि थे । जीवन की धूप में वे मेरे लिये ठंडी छांव  थे । वे मेरे जीवन के मार्ग-दर्शक थे । वे मेरे रोल-मॉडल थे , इतना ही नहीं, वे मेरे अजीज मित्र भी थे । मैं आज तक नहीं समझ पाई कि उन्हें मेरी जरुरतों का पता कैसे लग जाता था..!! उन्हों ने मुझे न केवल उच्च आदर्शों की शिक्षा दी वरन व्यवहारिक रुप से उन्हें जीवन में स्थापित करने की प्रेरणा भी दी । वे अनुशासन के बडे ही हिमायती थे । कभी-कभी मुझे लगता भी था कि वे हम भाई-बहनों पर कुछ ज्यादा ही सख्ती किये रहते हैं ,पर जैसे-जैसे मेरी समझ बढी, मुझ में समझ आने लगी कि गहरी और कडक आवाज के पीछे उनका मकसद हमें जिंदगी की धूप की तपिश से हमारा परिचय करवाना मात्र ही है । सही तो यह है कि वे सख्त नहीं हैं, सिर्फ सख्त होने का दिखावा मात्र कर रहे हैं ।

आज भी उन्हें याद कर मेरे जेहन में उनकी, एक दृढ व्यक्तित की छबी उभरने लगती है । वे मेरी रुह बन मेरे भीतर आज भी मौजूद हैं । आज भी हर कदम पर जो साहसिकता मैं महसूस करती हूं , वह उन के कारण ही संभव  है । वे एक ऐसे शख्स थे जो तब साथ खडे दिखते थे जब मैं धैर्यहीन हो अपने को असहाय समझ बैठ्ती थी । उनका साथ आज भी मैं महसूस करती हूं जब मैं कोई सफलता हांसिल करती हूं । जब कभी भी उनका हाथ मेरे सिर पर रखा होता था तब एक सुरक्षाके भाव की अनूभुति अवश्य ही होती थी । सच कहूं तो मेरे पिता मेरे जीवन के अहम किरदार ही नहीं मेरे जीवन के संरक्षक भी थे ।

सब कहते हैं कि उनके चेहरे से, उन के रंगरुप से , मैं उन के सबसे ज़्यादा नज़दीक हूँ । शायद यही वज़ह रही कि मैंने कई चीज़ें उन्हीं से आत्मसात की । बचपन में उन्हों ने हमे सिखाया था कि सफलता पाने के तमाम गुणों में सबसे अनिवार्य गुण आप का बेहतर व्यवहार ही होना चाहिये जिसे आप को संभाले रखना है । आप को मैं कैसे विश्वास दिलाऊं कि मेरे पिताजी मेरे जीवन के संबल थे , शक्ति थे , धौंस जमानेवाले प्रशासनिक थे , मेरी जैसी  चिडिया के लिये बडा आसमान थे….वे मेरे लिये मेरी जिंदगी के निर्माणकर्ता थे, निर्णायक थे, विश्वकर्मा थे साथ ही साथ मेरे सर्जनहार भी थे ।  वे नियम के पूरे पक्के थे । उनके गुणों से ही मुझमें ईमानदारी और मानवीय गुण आ पाये जिनकी आज के समय में बड़ी ज़रूरत है । यह उनका ही असर रहा कि मैं हर प्रकार के दुर्गुणों से दूर रहने का हरदम ख्याल रखती हूं ।

आज मेरे पिताजी तो मेरे साथ नहीं हैं परंतु आज भी ऐसा महसूस होता है कि वे मुझ से दूर रह कर भी, अपनी स्नेहिल छत्रछाया मुझ पर बनाये हुए हैं । शायद उन की सकारात्मक सोच और समझदारी के कारण ही आज में अपना घरसंसार सही तरह चला पा रही हूं । उन से मिली प्रेरक बातें और अनुभव के कारण ही मैं अपनी बेटियों को सही मार्गदर्शन दे पाई हूं । आज मैं उन के इन उपकारों को श्रध्धा-पुष्प चढा, नत-मस्तक हो, प्रणाम करना चाहती हूं । उन के आशीर्वाद सदा मुझ पर यों ही बरसते रहें…….

कमलेश अग्रवाल

 

जीवन की साँझ

26 जून

आज हमारे समाज में हम देख रहे हैं कि इंसानी रिश्ते तार तार हो रहे हैं । जिन बच्चों को मा-बाप ने मेहनत मजदूरी कर के डाक्टर, इन्जीनियर, आई.एस, पी.सी.एस, बना कर समाज में मान सम्मान दिलवाया ,वे ही बच्चे आज अपना घर परिवार अलग बसा कर, हाईसोसायटी से जुडकर अपने माता-पिता को बोझ समझने लगे हैं । जब बच्चे नौकरी के कारण अपने इन बूढे मा-बाप को वृध्धाश्रम के सहारे छोड कर उन से दूर जा बसते है तब अपना सारा जीवन बच्चों पर निछावर करने वाले माता-पिता, बुढापे में खुद को लाचार और ठगा सा महसूस करते हैं । उन्हें वे दिन याद आने लगते हैं जब उन्हों ने अपने मासूम और लाडले बच्चों को ऊँगली थामकर चलना सिखाया था ।अपने दिल की गहराइयों में कहीं एक सपना पाला था कि आज हम तुम्हारी ऊँगली पकड़कर चलना सीखा रहे हैं और कल जब हम बुढ्ढे हो जायेंगे तो तुम भी इसी तरह हमारा हाथ थामे हमे सहारा देना । लेकिन वे इतने भाग्यशाली कहां हैं कि उनका ये सपना सच होता दिखाई दे !!

कल अखबार में पढ़ा कि शहर के एक वृध्धाश्रम में अगले दस वर्षों तक किसी भी बुजुर्ग को नहीं लिया जाएगा ; चूंकी वहाँ की सारी सीटें बुक हो चुकी है , तो दिल दहल गया । मन में विचार आया, क्या ये खबर आज के बदलते समाज पर कलंक नहीं है ? हमारी आज की युवा पेढी पर एक करारा चाँटा नहीं है ? जिस तरह डूबते सूरज को कोई नमन नहीं करता, उसी तरह अनुभव की गठरी समान बुजुर्ग, जिन्हों ने हम पर अपना सब कुछ न्योछवर कर दिया, उनका कोई महत्व नहीं !! उनका महत्व केवल घर के एक कोने में रखा बासी अखबार का सा ही है !! सच्च ही तो है कि तट का पानी हमेशा बेकार होता है और जीवन की साँझ का मुसाफिर  हमेशा भुला दिया जाता है । 

इस सच्चाई से कोई मुकर नहीं सकता कि आज की भौतिक चकाचौंद ने नैतिकता को कुचल दिया है । आज हम ने मा, बहन, बेटी, बहू आदि को नौकरी की इजाजत तो दी है पर उसके पीछे की सामाजिक व्यवस्था के ढांचे की ओर पलट कर नहीं देखा ।  नतीजा ये हुआ कि जिन हाथों को थामकर मासूम झूलाघर में पहुँचाए जा रहे हैं, वही मासूम हाथ युवावस्था की देहरी पार करते ही उन काँपते हाथों को वृध्धाश्रम पहूंचा रहे हैं ।

हम भूल चूके हैं कि बुजुर्ग हमारी धरोहर हैं । जब वर या वधू पक्ष के गोत्र बताने की बात आती है, तो घर में सबसे पहले बुजुर्ग की ही खोज होती है । क्यों ? क्योंकि वे इन विषयों के अनुभवी हैं । ये बात कई हद तक सही है कि बुढ़ापे के साथ बचपन भी आ जाता है । यही वजह है कि बुजुर्गों पर हमेशा यह आरोप लगाया जाता है कि वे समय के साथ नहीं चलते, सदैव अपने मन की करना और कराना चाहते हैं । उन्होंने जो कुछ भी सीखा, उसे हम पर लादना चाहते हैं । उनके मन का कुछ न होने पर वे बड़बड़ाते रहते हैं । उनके इस स्वभाव को झेलना कठिन ही नहीं , मुश्किल भी है ,बर्दास्त के बाहर है । बच्चों को एक बार सँभाला भी जा सकता है, पर बुजुर्गों को सँभालना बहुत मुश्किल है । ये सारे आरोप अपनी जगह पर सही हो सकते हैं, पर इसे यदि स्वयं को सामने रखकर सोचा जाए तो, कई आरोप अपने आप ही धराशायी हो जाते दिखाई देंगे । हम सभी ने एक कहानी तो जरुर ही सुनी है …एक बच्चे ने 25 बार पिता से पूछा था कि ये पेड पर कौन बैठा है ? पिता ने हरबार बिना झिडके कहा था,” पेड पर काला कौवा बैठा है ।” आज उसी बेटे को पिता का दो बार पूछना नहीं सुहा रहा है ..!! 

आज के समाज की ये एक बहुत कडवी सच्चाई है कि झुर्रीदार चहेरों को हमने हाशिए पर रख छोडा है जो की आनेवाले कल के लिये खतरनाक भी साबित हो सकता है । एक बार इस पर गंभीरता से सोचा जाना चाहिये ।

गुजराती कविता की एक पंक्ति याद आ रही है…..

मुझ बीती तुझ बीत से धीरी बापुडिया…  

 

कमलेश अग्रवाल

क्या बेबसी है ?

25 जून

बरस बीते ,गुजरे कई लम्हें जींदगी के,

बसंत आये , फूल भी मुस्कराये, 

आँसू की गागर फिर भी क्यों छलकती रही?

आंखें क्यों हरदम बरसती रही?

क्या बेबसी है इस अबला की ?

कौन सा दर्द पाले बैठी है ये ?

क्यों मौन खडी आंखे नम किये है ?

क्यों आंचल से आंसू पोंछे जा रही है ?

घर में क्यों यों अंधेरा करे खडी है ?

घरवालों के आगे क्यों गुनहगार सी डटी है ?

क्या फिर दूसरी बेटी पैदा हुई है ?

क्या इसीलिये विवश बन खडी है ?

दूसरी बेटी का आना ही समस्या है इसकी,

हर पश्नके पीछे की ये विवशता है इसकी,

क्यों न समझ पाया 21वीं सदी का ये इंसान,

धरती तो सिर्फ करती है हिफाजत बीज की….!!

घर की रोनक होती हैं ये बेटियां,

आंगन की शोभा होती हैं ये बेटियां,

जिस घर में न होती हैं बेटियां,

अक्सर उस घर से दूर रहती हैं खुशियां…!!

कमलेश अग्रवाल

 

असीम और अनंत इच्छाएं

16 जून
आकाश की तरह मानव की इच्छाएं भी असीम और अनंत होती हैं। हमारी अपूर्ण और अनुचित इच्छाएं ही हमारे दु:ख का मुख्य कारण हैं। कामनाओं के वशीभूत मानव सारा जीवन दु:खी रहता है । थोड़े दिनों पहले एक पत्रिका में विज्ञापन देखा ” सुन्दरता चाहिए तो हम से संपर्क करें “। मतलब कि कृत्रिम तरीके से आप को छोटी सी शल्य-चिकित्सा द्वारा सुन्दरता मिल सकती है । आज हम दुसरों के लिये जी रहे  हैं और  अपनेआप से दूर होते जा रहे हैं ।
 सच्च तो ये है कि आपका आत्मसम्मान, आपकी महानता का घोतक है। जो अपना सम्मान स्वयं करता है, सभी लोग उसका भी सम्मान करते हैं। अपने व्यक्तित्व में  निखार देखना है तो सुन्दर बनाना जरुरी नहीं है ; जरुरी है तो अपने विचारों को सुंदर, सुचारू और परिपक्व बनाने की । जब आप बोलते हैं, चलते हैं, देखते हैं तो आपके चेहरे की बनावट ,शरीर के संकेतों या बॉडी लैंग्वेज से आपके सारे व्यक्तित्व का आभास हो जाता है। जैसे मैले दर्पण में सूर्य का प्रतिबिम्ब कभी नहीं पड़ सकता वैसे ही बनावटी साजसज्जा से आप का व्यक्तित्व भी नहीं निखर सकता । यदि शीशा साफ हो, तभी इसमें प्रतिबिंब दृष्टिगोचर हो सकता है ।  
 जैसी हमारी सोच होती है, वैसे ही हम बन जाते हैं । हम अगर सोचे समझे बिना दूसरों को दिखाने हेतु अपने आप को बदलते हैं तो परिणाम गलत ही होगा ..!!   हिरण मधुर संगीत की तरफ आकर्षित होता है और शिकारग्रस्त होकर जान गंवा देता है । हाथी हथिनी की तरफ आकर्षित होकर कभी-कभी जान गंवा बैठता है । पतंगा अग्नि में भस्म हो जाता है।  मछलियां जीभ के स्वाद के लिए लालच में फंसकर कांटे में अटक जाती है। जैसी हमारी इच्छाएं होती हैं वैसे ही हमारे मन के भाव बन जाते हैं । उसी प्रकार की आभा हमारे मुखमंडल पर छा जाती है । समय के साथ बचपन, जवानी और बुढापे का आना एक कुदरत का नियम है । इसे बदलना  क्या उचित्त होगा ? माना कि आज इंसान ने जवानी बरकरार रखने का रास्ता खोज निकाला है । उस परिस्थिति के बारे में सोचिए, जब दादा-दादी, मां-बाप, बेटा-बेटी, पोते-पोती सभी जवान ही बने रहेंगें तो क्या होगा ? जवानी का महत्त्व ही मिट जाएगा  ।  ऐसे में कैसे समाज और कैसी संवेदना का निर्माण होगा ?सामाजिक रचना क्या होगी ? मानवीय रिश्तों का अहसास, क्या नजर आयेगा ?अगर ऐसा हो जाए तो क्या होगा ? हम खुद अमरत्व से घबराएंगे, क्योंकि जवान बने रहने की दीवानगी उसी धीमे जहर की तरह होगी, जो हमें अन्दर ही अन्दर मारती रहेगी  ।  आप कितने दिनों तक मरते रहेंगे ? क्या मौत के बाद जश्न मनाओगे ? यहां हमारी और आपकी संवेदना की मौत होती दिखाई देगी ।
ये जानना जरूरी है कि हमेशा सबकुछ अच्छा नहीं रहता ।  अविवेकी और चंचल इच्छाएं  बेखबर सारथी के  घोड़ों की भांति बेकाबू होकर बिदक जाती है । मानव को चाहिए कि वह कछुए की भांति बन जाए जो अपने सब अंगों को समेट लेता है और एक पत्थर की भांति रह अपने आप को दुश्मनों से बचाते हुए मस्ती से अपनी जिंदगी जीता है । अविवेकी इच्छाओं की गुलामी, पराधीनता से कहीं ज्यादा दु:खदायी होती है । अत: अपनी अनुचित  इच्छाओं को अपने वश में करना बुद्धिमानी का काम है । हमारेविचारकों ने सही कहा है कि  मानव की समाप्ति हो जाता है, परंतु उसकी अभिलाषाओं का अंत नहीं होता । 
कमलेश अग्रवाल

ईमान की रोटी व इज्जत की जिन्दगी

12 जून
 चंद सिक्को के लिये,  ईमान को बिकते देखा,
 पेट की भूख के लिये, ईमान को जूझते देखा ।
 
गरीबी ईमान को थामे,  किसी तरह जी रही है ‘
अमीरी ईमान बेच,  ठाठ से जिंदगी जी रही है ।
 
गरीबी को इज्जत के लिये बिलखते देखा ,
अमीरों के  हाथों  सरेआम लुटते  देखा ।
 
ईमान और इज्जत की रोटी के लिये ,
गरीबी को  चुपचाप यों सिसकते देखा….।।
कमलेश अग्रवाल
11 जून

तन थक कर हो गया है  चूर ,

सुन्दर सपनों से मन भी है दूर ।

मुश्किल से  गुजरे ये बेरण  रातें ,

देख मुसीबत मन भीतर से काँपे ।

कब टलेगी गम की ये संध्या ?  

कब लौटेगी  फिर से रूह में खुशियाँ  ?

कब  चमकेगा किस्मत का  सूरज ?

कब निकलेगा शुकून का मुर्हत ?

कमलेश अग्रवाल

राजनीति में आया बदलाव

4 जून

इंदिरा गांघीजी की आसमयिक मृत्यु के बाद सन 1989 में राजीव गांघीजी देश के प्रधानमंत्री बने । वे बडे ही सरल, शांत एवम शरीफ थे प्रकृति के इंसान थे । उन के प्रधानमंत्री बनने से  देश को एक नई रोशनी दिखाई देने लगी थी …। उन्हों ने आते ही देश के विकास पर ध्यान देना शुरु कर दिया । मोबाईल क्रांति उन्हीं की देन है पर कुछ ही समय पश्चात बोफर्स मामाले में तोप सौदे  को लेकर, नीजि तौर पर उन पर आरोप लगने शुरु  हुए । बस तभी से भारतीय राजनीति में  भ्रष्टाचार के  खिलाफ खुलकर लडाई शुरु  होती चली गई । 

उसी दौरान उत्तरप्रदेश की राजनीति में भी बदलाव आया । वहां के कुछ राजनेताओं को लगा कि अगर चुनाव जीतना हो तो राजनीति में बाहुबलियों को लाना होगा । उन्हें राजनीति में प्रचार हेतु खडा रखना होगा । बस उन्हों की इस सोच को हवा मिली और राजनीति में बाहुबल ने अपराधीकरण को अपने खेमे में ला खडा किया । बाहुबल – अपराधिकरण के कारण जो जीता वही सिकंदर बनता चला गया ।  कुछ ही सालों में इन बाहुबलियों को लगने लगा कि अगर हम इन्हें जीत दिलवा सकते हैं तो हम खुद भी तो जीत सकते हैं और गुंडाराज असतित्व में आ गया । आम आदमी पहले तो ठिठका, भयभीत हुआ और फिर उसकी सोच में भी बदलाव आया । अपना काम निकलवाने हेतु उसने भी शाम ,दाम, दंड और भेद की नीति अपनानी शुरु  कर दी और जन्म हुआ भ्रष्टाचार का । आज हमारे भारत वर्ष में कोई भी वर्ग इस भ्रष्टाचार से अलिप्त नहीं है ।  हर काम या तो नोटों से करवाओ या पहचान से…!! जिस  की लाठी उसी की भेंश..!! आज कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं चाहती कि राजनीति में पढ़े-लिखे, समझदार लोग आएं और सचमुच जन सेवा करें ।  उन्हें एक डर है , भय है कि अगर बड़ी संख्या में बेहतर मिजाजी देशभक्त लोग आ जायेंगें तो पार्टी का चरित्र ही बदल जाएगा । भ्रष्टलोगों के हाथ से पतवार छूट जाएगी । यह किसको गवारा होगा ? इसीलिए शरीफ लोगों को  राजनीति से दस हाथ  दूर ही रखा जाना चाहिये । जब-जब कोई देशभक्त ने आना चाहा , उसे अठंग शासित दल ने हराने हेतु हर वह हथकंडे अपनाय जो अपनाये जाने थे । धीरे-धीरे शरिफों ने राजनीति से अपना रुख ही बदल लिया ।

यही कारण है कि राजनीति में परिवारवाद का बोलबाला होता चला गया । आज सभी राजनीतिक दल गिरोह बन चुके हैं । इसलिए ही, इन तालाबों का पानी सड़ता जा रहा है । जो ताजा खून आता है, वह पुराने खून से भी ज्यादा संक्रामक होता दिखाई देता है । इसीलिए राजनीतिक दलों में नीति और कार्य पर कोई बहस नहीं होती । विचारवान लोगों का तो प्रवेश ही निषिद्ध होता जा रहा है । जो समझने-बूझने वाले लोग हैं, वे अपनी इज्जत बचाने की खातिर चुप्पी साधे रहते हैं । शासन में बैठे राजनेताओंके बेटा-बेटियों के आगे विद्वान भी बौने नजर आते हैं । इस राजनीति में साधारण, पढे-लिखे व बुध्धिजीवी लोगों के लिए कोई जगह नहीं बची है । आज राजनीति लूट-खसोट की राजनीति का पर्याय हो चुकी है , वह जनता के हितों के बारे में सोचना ही भूल गई है..!! मेरा तो खयाल है, आज के समय में हमारे नेता लोग ही देश के विकास में सबसे ज्यादा बाधक हैं।

यही वजह है कि आजादी की लडाई के , एक सैनिक दल में कार्यरत रह  चूके अन्नाजी को आज  देश की जनता की भलाई की खातिर बार-बार अनसन करना पड रहा है । वे चाहते हैं कि चुनावी प्रक्रियाको बदला जाये । राजनीति को भ्रष्टाचारके दल-दल से निकाला जाये । पून: भारत को सोने की चिडिया बनाया जाये; पर सत्तालोलूप भ्रष्ट- राजनेता का ये गिरोह इसे करना नहीं चाहता । 60-65 सालों से उन्हें बोस बने रहने की , पैसा लूटने की, गरीबों को और भी गरीब बनाने की और शरिफों पर गलत आरोंपों की झडी लगा, उन्हें अपने मकसद से दूर करने की आदत हो चूकी है । एक नशा हो चूका है…जो इतना कातिल है कि किसी भी उपाय का उस पर असर होना  दुर्लभ है ।

 देश के ये हालात देख आज एक बात याद आ गई । अमरिका के प्रथम राष्ट्रपति असनहावर जब चुनाव जीते थे तब उन्हें काफी उपहार मिले थे । उन में किसी व्यक्ति के द्वारा  उन्हें झाडू उपहार के रुप में दी गई थी और साथ में एक कागज भी लिखा हुआ था जिसमें लिखा था,” झाडू का ये उपहार इसीलिये भेज रहा हूं कि आप इस को इस्तमाल कर राजनीति में प्रविष्ट गंदगी को साफ कर दें “। मजे की बात तो तब हुई जब असनहावर ने इस उपहार को सब के सामने रखा और उस के पीछे के उद्देश्य से सभी को अवगत करवाया और कहा ,” सभी उपहारों में से ये झाडू का उपहार मेरे लिये बेहद किंमती है । मुझे जिस उम्मीद से ये दिया गया है , उसे मैं जरुर पूरा करुंगा । “

आज हम भारतीयों को भी इन बन बैठे भ्रष्ट-राजनेताओं के हाथों में झाडू ही  थमानी होगी और मजबूर करना होगा उन्हें कि वे खुद अपने ही हथों से इस भ्रष्टाचार की सफाई करें और हमें एक स्वच्छ सुराज भारत वापिस दें । जयहिंद…जयभारत..

कमलेश अग्रवाल