Archive | जुलाई, 2012

मंदिर में घंटी बजाने की महिमा

28 जुलाई

जब मैं छोटी  थी तब माँ  के संग मन्दिर जा देखती कि माँ मन्दिर में प्रवेशते ही अन्दर लटक रहीं घंटियों को एक के बाद एक बजाना शुरू कर देतीं और मुझ से पूछतीं, “बेटे तुम्हारा हाथ घंटियों तक पहुँच रहा हैं न । ” मैं भी अपने हाथों को, पूरी कौशिश कर, उन्हें  घंटियाँ बजाने को बाध्य करती । मुझे  उन घंटियों की आवाज बेहद  अच्छी लगाती । ये करते समय हर बार सोचती कि ये  घंटियाँ मंदिर में क्यों लगाईं जाती हैं ? एकबार  माँ से पूछ ही लिया । माँ ने समझाया  कि हमारे मंदिरों और धार्मिक स्थलों के बाहर ये घंटियाँ देवी-देवताओं को जगाने हेतु लगाई जातीं हैं ताकि उन्हें पता चले कि हम उनकी पूजा-अर्चना करने आये हैं । लेकिन जैसे-जैसे बड़ी होती रही बचपन की ये  जिज्ञासा प्रखर होती रही ।  सोचने लगी कि इन घंटियों को मंदिर के बाहर लगाए जाने के पीछे क्या वही कारण है जो माँ ने बताया था या फिर धार्मिक दृष्टिकोण से इनका औचित्य कुछ और है?

इस पर अध्ययन करना प्रारंभ कर दिया । पता चला  कि  प्राचीन समय से ही हमारे देवालयों और मंदिरों के बाहर इन घंटियों को लगाया जाता रहा है । इसके पीछे यह मान्यता है कि जिन स्थानों पर घंटी की आवाज नियमित तौर पर आती रहती है वहां का वातावरण हमेशा सुखद और पवित्र बना रहता है और नकारात्मक या बुरी शक्तियां पूरी तरह निष्क्रिय रहती हैं । यही वजह है कि सुबह और शाम जब भी मंदिर में पूजा या आरती होती है तो एक लय और विशेष धुन के साथ घंटियां बजाई जाती हैं जिससे वहां मौजूद लोगों को शांति और दैवीय उपस्थिति की अनुभूति होती है । इस के अलावा ये भी माना जाता है कि  देवी-देवताओं की मूर्तियों में चेतना जागृत होती है जिसके कारण हमारे  द्वारा की गई पूजा और आराधना अधिक फलदायक और प्रभावशाली बन जाती है ।  

कई पुराणों में ये भी बताया गया है कि मंदिर में घंटी बजाने से मानव के कई जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं क्योंकि जब सृष्टि का सर्जन हुआ था तब ऐसा ही  नाद (आवाज) गुंजा था, जैसा कि घंटी बजाने पर गूंजता है । माना जाता है कि यही नाद ओंकार के उच्चारण से भी जागृत होता है । शायद इसीलिए हमारे ग्रंथों में ओंकार शब्द की महिमा दरशाई गई है  । कहीं-कहीं यह भी लिखित है कि जब प्रलय आएगा उस समय भी ऐसा ही नाद गूंजेगा । 

आज इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक समर्थन भी मिल गया है । वैज्ञानिकों का कहना है कि जब घंटियाँ बजाई जाती हैं ,तब वातावरण में ऐसे कंपन पैदा होते हैं , जो वायुमंडल के कारण काफी दूर तक फ़ैल जाते हैं और आस-पास के क्षेत्र में आने वाले सभी जीवाणु, विषाणु और सूक्ष्म जीव आदि को नष्ट कर देते हैं, जिसके कारण आसपास का वातावरण शुद्ध हो जाता है ।  सुबह और सांय काल में घी का दीपक प्रगटाने व  तालियाँ बजाते-बजाते आरती गाने  के पीछे  भी यही सोच रही होगी ।

हमारा हिन्दू धर्म बहुत ही प्राचीन धर्म है और उस समय से विज्ञान से जुडा हुआ है ।  ये  सिर्फ  तर्कों  पे  आधारित नहीं है बल्कि विविध वैज्ञानिक सिध्धांतों  से जुडा हुआ  धर्म  है । हर धार्मिक विधि के पीछे गहन वैज्ञानिक सोच दिखाई देती है ।  इसीलिए अगर आप मंदिर जाते समय घंटी बजाने को अहमियत नहीं देते हैं तो अगली बार प्रवेश करने से पहले घंटी बजाना ना भूलें । इतना ही नहीं आप की दादी, नानी , माँ , भाभी ,बहन या कोई भी स्त्री आप को विधि-विधान से पाठ-पूजा करतीं या व्रत-उपवास करतीं दिखें तो उनका उपहास न करे वरन उसके पीछे छुपे हुए मर्म को तलास ने की कौशिश करें । 

श्रध्धा में बहुत शक्ति है , बस अंध – श्रध्धा से दूर रहें व औरों को भी दूर  रखें ।  

कमलेश  अग्रवाल

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अनिवार्य है नई पीढ़ी में संस्कारों का सिंचन

27 जुलाई

हम, अभिभावक  अपनी संतान को अच्छा डाक्टर, अच्छा वकील, अच्छा इंजीनियर, अच्छा आई.ए.एस अधिकारी तो बनाना चाहते हैं, लेकिन अपनी संतानों को अच्छा इंसान बनाना नहीं चाहते । अच्छे व्यक्ति का होना उसके अच्छे संस्कारों पर निर्भर करता है । हमें अपने बच्चों को ये बताना होगा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका का साधन मात्र ही नहीं है, वरन जीवन में निखार लानेवाली साधना भी है । अगर आप अपनी संतानों को जीवन जीने की कला सिखाना  चाहते हैं तो उनमें आप को अच्छी शिक्षा के साथ – साथ अच्छे संस्कारों का भी सिंचन करना होगा ; क्योंकि शिक्षा और संस्कार में बहुत फर्क होता है । जहां शिक्षा हमे जीवन–निर्वाह की कला सिखाती है ; वहीं संस्कार हमें जीवन–निर्माण की कला सिखाते हैं ।

बच्चे कच्ची मिट्टी की मानिंदे हैं, हमें उनके साथ कुशल कुंभार की भूमिका निभानी चाहिए । बच्चे सिखाने से नहीं सीखते, बच्चे देख कर सीखते हैं । यदि हमे अपनी संतानों से सु-आचरण की उम्मीद करनी है तो उन्हें हमें सु-संस्कार देने होंगे । हमें आचरण वान और संस्कार वान होना होगा । संस्कार जीवन में वही अभिभावक दे सकते हैं, जिन्होंने अपने जीवन में सु-आचरण को अपनाया है । जैसे प्रज्वलित दीपक ही बुझे हुए दीपक को जलाने की क्षमता रखता है । बुझा हुआ दीपक क्या खाक दीप जलायेगा !!

जैन मुनि श्री तरूण सागर जी का कहना है कि जीवन का निर्वाह सरल है । पशु–पक्षी भी किसी प्रकार से जीवन का निर्वाह कर लेते हैं, पेट भर लेते हैं और जिंदगी जी लेते हैं, लेकिन पृथ्वी पर एक मात्र मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो जीवन–निर्वाह के साथ-साथ जीवन–निर्माण भी कर सकने की पात्रता रखता है । इसीलिये यदि वह जीवन निर्माण की दिशा में नहीं बढ़ता तो उसमें और पशु में कोई अंतर नहीं रह जाता । उन के द्वारा कहे गये ये सुविचार कितने सही हैं ।

हम जानते हैं कि पत्ता सुखने के बाद मुड़ता नहीं है । मोडने पर टूट जाता है । वैसे ही एक निश्चित उम्र गुजरने के बाद बच्चों को संस्कार दे पाना कठिन ही नहीं होता है , असंभव भी जान पडता है । इस बात को एक उदाहरण के तहत समझाना चाहूंगी । एक महिला अपने बच्चे को लेकर आइंस्टीन के पास अपने बच्चे को कब से पढाना शुरु करे, इस विषय पर मसवरा  लेने पहुंची । उसने  उनसे पूछा ,” मैं इसे पढ़ाना चाहती हूं, कब से इसे पढाना शुरू करूं ? “ आइंस्टीन ने उस महिला से प्रश्न किया , “ बच्चेकी उम्र क्या है ? ”  महिला ने बताया – पांच वर्ष । आइंस्टीन ने कहा , “ बहन ! तुम बहुत लेट हो गई । अभी तक तो इसकी पढ़ाई पूरी हो जानी चाहिए थी, क्योंकि संस्कार तो पांच साल की उम्र तक ही दिए जा सकते हैं ।”

यदि सच में हम चाहते हैं  कि हमारी संतान बुढ़ापे में हमारी लाठी बने, तो इसके लिए अभी से आप को अपने प्रति उनके क्या कर्तव्य होने चाहिये , ये बात अपने बूढ़े मां–बाप की सेवा– सुश्रूषा करके उन्हें अनूभव करानी होगी । आज जो सलूक, जो व्यवहार आप अपने मां–बाप के साथ करोगे, वैसा ही व्यवहार कल आपकी संतान आपके साथ करेगी । आज यदि आप अपने मात-पिता  या घर के बुजुर्गों की अंगुली पकड़कर उन्हें मंदिर ले जाओगे, तभी तो कल जब आप बूढ़े होंगे तो आपका बेटा-बेटी, पौत-पौती आप का हाथ पकड़कर आपको मंदिर ले जायेंगे । संसार तो प्रतिध्वनी मात्र है, यहां तो वही मिलता है, जो हम लुटाते हैं । आनंद लूटायेंगे , तो आनंद मिलेगा । दु:ख बांटगें  तो दु:ख मिलेगा । खुशी बाटेंगे तो खुशी मिलेगी  । बांटने से ही बांटने वाले की गोद , बर्कत से लदी दिखाई देती है । संस्कार बांटते चलो, ताकि नई पीढी में संस्कार पनपते चलें । किसी ने सच ही कहा है बोया पेड खजूर का , आम कहां से होय….!! 

 कमलेश अग्रवाल

राखी का दिन

24 जुलाई

सुबह से दिव्या का मन कच्चा – कच्चा सा हो रहा था । उसे बचपन के राखी के दिन याद आ रहा थे । चूल्हे पर धीरे धीरे पकती खीर में पडी क़ेसर की वह महेक !! हाथों में रची मेहन्दी का वह चटक रंग !! चमकीले ,रंगीन धागे से बनी रंगबेरंगी राखियां !! वह सुबह से नहा कर, जैसे ही नये कपडे पहन कर तैयार होती, तो दोनों भाई सामने आ खडे हो जाते । मा से पूछते ,” कब बांधेगी दीदी ये राखियां हमे ? अभी श्रोग जिमाने भी बाकी है ? जल्दी करो ना मा । ” फिर उस के द्वारा सजी राखी की थाली के पास बैठ जाते और अपनी-अपनी पसंद की राखियों छांट अलग करते । कौन सी मिठाई से मूंह मिठा करवाया जायेगा उसी उधेड्बून में घर भर में दौड लगाते रहते । दिव्या भी कहां कम थी !! वह मन ही मन सोचती , उन्हें मैं क्यों बताऊं कि मैं कौन सी मिठाई लाई हूं ? पूरे घर में एक रौनक सी छा जाती । उस के भाई भी कहां कम थे ? चूपके से पता लगा ही लेते कि मिठाई का डिब्बा कहां रखा हुआ है ।

धीरे से डिब्बे को खोल मिठाई खाने को जैसे ही लपकते, तभी मा टोकती ,” मत खाओ मिठाई, तुम्हारी दीदी ने सुबह से कुछ नहीं खाया । तुम्हें राखी बांधने के बाद ही वह खायेगी और तुम हो कि लगे मिठाई खाने । वह अकेली क्यों भूखी रहे ?”
छोटू कहता, “ मैं तो खाऊंगा । मैंने थोडे ही उसे भूखे रहने को कहा है ? राखी बांधनी है तो रहे भूखी ।”
दिव्या भी उसे चिढाते हुए कहती,” जा मैं भी तुझे राखी  नहीं बांधूंगी ।”
वह कहता,” मैं तुझे पैसे भी नहीं दूंगा !”  वह कहती,” मत दे, वैसे भी पैसे तो पापा देंगे । तू कौन सा कमाता है।”
बडा थोडा भोला था सो मा से कहता ” मा मुझे भी पैसे दो ना, जितने छोटु को दिये ।”
मा कहती ” हाँ, मेरा राजा बेटा, तुझे भी पैसे मिलेंगे । पहले बहन से राखी बंधवा ले ।” 

बराबर के पैसे मिलने की शर्त पर राखी की रस्म पूरी होती । फिर तो वे दोनों थाली की सारी की सारी राखियां बांधवा कर दोस्तों को अपनी भरी कलाई दिखाने चल पडते । आज वह सोच रही थी, कहाँ चला गया वह बचपन ? कहां खो गये वे रिश्ते ? एक ही कोख से जन्मे भाई – बहनों के बीच वक्तके साथ क्यों इतनी औपचारिक्ता आ गई है ? बहुत सारे आंसू उसकी आंखो में भर आये । बहुत सूना – सूना सा लग रहा था उसे आज का ये दिन । वह सोच रही थी दोनों बच्चे भी दूर हैं । पतिदेव को भी ओफिस का कोई खास काम याद आ गया सो अपनी राखी की रस्म पूरी कर  चले गये ; ये कह कर कि जब भाई आ जायें तो फोन कर देना , 10 मिनीट में पहूंच जाऊंगा । 

उसका ये अकेलापन न जाने कितनी पुरानी स्मृतियां खखोर रहा था । बचपन, कैशोर्य के वो दिन जब दोनों भाई उसका पूरा ख्याल रखा करते थे । किसी भी सहेली के घर जाना हो , बाजार जाना हो, सिनेमा देखने जाना हो , वे सब साथ जाते । जब बडे भाई की पहली नौकरी की पहली तनख्वाह घर में आई तो उसने बेहद सुंदर पर्स उसे दिलवाया था उसकी शादी पर बिदा के समय छोटू कैसे बिलख-बिलख कर रो रहा था !! बेहोश सा हो गया था । बाद में मा ने बताया था कि वह घन्टों कमरा बन्द करके रोया था । एक साल बाद बडे की शादी हुई थी ।  फिर छोटे भाई का एक विजातीय लडक़ी से प्रेम सम्बन्ध हुआ था । उससे विवाह के लिये घर में कितने विरोध, लडाई झगडे होते रहते थे । एक वही थी जिसने पापा को मनाया था उस विवाह के लिये । उसे ये सारी बातें आज क्यों अचानक याद आने लगी हैं !!

क्योंकि शाम के 5 बज रहे हैं और वह अकेली घर में भाईयों के आने की इंतजार करे बैठी है । वह सोच रही है, दोनों के ससुराल इसी शहर में हैं सो पहले तो उन्हें वहीं जाना होगा…वरना उनकी मेमें रूठ जायेंगीं !! बहन का क्या , वह तो हम जब जायेंगे, राखी बांध ही देगी ! आखिर भाई जो हैं !! वही पागल थी जो बेटी के समझाने पर भी वहां न रुकी और 8 हजार खर्चकर प्लेन से सुबह यहां , अपने  घर आई इसीलिये  कि भाईयों की कलाईयों को सजाना है ।  ये सोच कर कि हर  राखी के त्यौहार पर वह खुद अपने हाथोंसे भाईयों को राखी बांधा करती है तो इस समय क्यों नाका डालना..!! कितनी जल्दी-जल्दी उसने खीर बनाई , श्रोग लिखे व उन्हें जिमाया, यही सोच कर कि भाईयों को आने के बाद यूं ही इंतजार न करना पडे ।

जब उसका मन भावुकता के अतिरेक से भर गया तो उसने मोबाइल पर कॉल किया, फोन उठाते ही सुनाई दिया…बस 10 मिनिट में दीदी हम पहूंच रहे हैं । उसने ये सुनते ही पति को सुचित कर दिया कि जल्द ही घर आ जायें । फोन लिये वह संज्ञाशून्य सी थोडी देर बैठी रही । वह फूट फूट कर रोना चाहती थी कि उसे  बाहर पैरों की आहट सुनाई दी । वह उठी , आंखों में आये आंसूओं को छिपाती हूई उसने दोनों भाईयों और भाभियों का स्वागत किया, तभी पति देव भी आ पहूंचे। उसके मन का सारा गुबार उन्हें देख बाहर आ गया । वह झूंझलाते हुए गुस्से से बोली, ” आप को मिल गई फूर्सत अपने काम से ? आप को क्या, कोई रोये या सुस्त हो सारे दिन बगूले झांकता बैठा रहे…!! सभी अपनी-अपनी मस्ती में मस्त हैं । मेरी क्यों कोई परवा करे..!! मैं तो बस सब के इंतजार करने के लिये ही तो हूं …!!”

पतिदेव को इस झूंझलाहट के पीछे छिपे दर्दको समझमें देर न लगी !! वे समझ रहे थे कि उसका गुस्सा जायज है सो बाजी संभालते हुए हंसकर बोले, ” देवीजी आप को तो गर्व होना चाहिये अपने ऐसे वी.आई.पी भाईयों पर । शुक्र मनाओ कि राखी के दिन ही तुम्हें अपने भाईयों की कलाईयों पर राखी बांधने का मौका तो मिला । अरे भाग्यवान, हमे तो बरसों हो गये अपने हाथों से ही राखी बांधते…सात सात बहनों का भाई होने के बावजूद भी…!! पता नहीं कब वो दिन आयेगा कि जनाब की कलाई भी बहनों के हाथों से सजने का लुफ्त उठाने का सौभाग्य प्राप्त करेंगी..? “

पतिदेव की बात सुन गुस्सा थुक वह भाईयों की कलाई सजाने हेतु सुबह से सजाई राखी की थाली, मिठाई-मेवा, तिलक करने के लिये रोली-चावल लाने अंदर चली गई और राखी के पावन पर्व की रस्म अदायगी पूरी हुई…!!

बीती यादें , पुराने दिनों को सहला फिर कहीं दूर खो गईं….। दिव्या की स्मृतिपट पर आज का ये  दिन सदा अंकित रहेगा ।

कमलेश अग्रवाल

ज़िंदा रहने की तीखी चिंताएँ और धुंधला होता भविष्य

23 जुलाई

मनुष्य के आसपास की दुनिया असीम है और वह इस दुनिया के साथ जूडी पहेलियों को हल करने का प्रयत्न कदम दर क़दम चल करना चाहता है । वर्तमान नाभिकीय युग में मनुष्य-जाति के शांतिपूर्ण जीवन की संभावनाओं का सवाल तीव्रता से हमारे सामने आता दिखाई दे रहा है । कई सवाल उसकी भविष्य की हयाती को लेकर उठ खडे हैं । क्या इस संसार से उत्पीड़न और अन्याय कभी गायब हो पाएंगे ? भविष्य में मानव जीवन के लक्ष्य, उद्देश्व व जीवन-मूल्य क्या होंगे ? यह दुनिया आनेवाले समय में कैसी होगी ? मनुष्य की नियति में क्या बदा होगा ? क्या उसे आनेवाले दिनों में युध्ध जैसे महाविनास से निपटना होगा ?

जनसाधारण के बुनियादी हितों को परावर्तित करने बाली इन समस्याओं को समझना, उनसे अवगत होना और उन्हें सटीकतः निरूपित करना अत्यंत कठिन है और इससे भी अधिक कठिन है उनको हल करने के तरीक़ों और साधनों का पता लगाना !! ऐसा करने के लिए विभिन्न विज्ञानों की उपलब्धियों के अत्यंत गहन ज्ञान की हमे जरुरत है क्योंकि मनुष्यों के बुनियादी हितों को समझने और युगों के विभेदक लक्षणों एवम विशेषताओं को सही ढंग से निरूपित करने की योग्यता होना यहां बेहद जरूरी है ।

बुराई, आतंक, दुषित , भ्रष्ट व्यवस्था तथा रूप बदल कर बैठी साम्प्रत्दायित पर सकारात्मक रवैया अपनाना होगा । हर घटना तथा हर समय में मनुष्यता जो मर रही है या मारी जा रही है उस पर विचार करना होगा । हमे अपने समय की समस्याओं और अंतर्विरोधों से कैसे निपटना पडेगा उस पर गंभीरता से सोचना होगा । ये भी मुकरर करना होगा कि क्या विज्ञान व तकनीकि के इस्तेमाल से हम मनुष्य के भविष्य को संयत कर पायेंगे । मनुष्य के भीतर की पशुता का जो नग्न रूप दिखाई दे रहा है उसे क्या मिटा पायेंगे ? अ‍ॅटम बोम्ब, रसायनीक बोम्ब या अत्य आधुनिक शस्त्रों की जो होड चल पडी है , उसे रोक पायेंगे ?

ज़िंदा रहने की तीखी चिंताएँ और धुंधला होता भविष्य का दारोमदार इन प्रश्नों के जवाबों पर या इन के हल करने के तरीकों पर ही टीका हुआ है । अच्छे और सुजीवन के लिये हमे अपने अंदर की बुराईयों को छोडना होगा । धर्म के नाम पर जो भटकाव हमारे चहूं ओर दिख रहा है उससे अपनेआप को दूर करना होगा । इतना ही नहीं अपने नीजि स्वार्थ को पीछे धकेल, मानवजाति के कल्याण पर घ्यान केंद्रित करना होगा । अ‍ॅटम बोम्ब, रसायनीक बोम्ब या अत्य आधुनिक शस्त्रों की जो होड लगी है उस से  पर रहना होगा  । पृथ्वी पर बसनेवाले हर व्यक्ति को  चिंता रहीत हो जिंदा रहने देने की इच्छा को अपने अंदर लानी होगी । अगर हम इन सब बातों पर अमल कर पाते  हैं तो निश्चिततौर पर हम ज़िंदा रहने की तीखी चिंताएँ और धुंधलेपन से अपने आनेवाले भविष्य को बचा सकते हैं ।

कमलेश अग्रवाल

अंधेरी अमावस्या का अभिन्न पहलू

19 जुलाई

(आज अमावस्या है तो सोचा क्यों न इसी के बारे में कुछ लिखूं और बस लिख दिया…पसंद आये तो आशीर्वाद दिजीयेगा…)

हमारे विद्वान ऋषि-मुनियों के रचे गये हिंदू पंचांग के मुताबिक एक महिने को 15-15 दिनों के दो पक्षमें विभाजीत किया गया है । जब चंद्रकी कला पूर्ण रुप में खिलती है उसे शुक्ल पक्ष माना जाता है और जब चंद्रकी कलाओं का क्षय होने लगता है तो उसे कृष्ण पक्ष माना जाता है । हमारे शास्त्रोंमें चंद्रकी सोलवीं कला को अमा कहा गया है और इसीलिये कृष्ण पक्ष में जब इस कला का क्षय होता है तो उसे हम अमावस्या कहते हैं । अमावस्या पंचांग के अनुसार माह की ३०वीं और कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि है जिस दिन चंद्रमा आकाश में दिखाई नहीं देता ।

सरल शब्दों में अगर अर्थघटन किया जाये तो अमावस्या सूर्य और चन्द्र के मिलन का काल ही है । शास्त्रमें अमावस्या तिथि का स्वामी पितृदेव को माना जाता है । इसलिए इस दिन पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण, दान-पुण्य का महत्व है । 

अगर अमावस्या सोमवार की पडे तो उसे सोमवती अमावस्या कही जाती है । ये वर्ष में लगभग एक ही बार पड़ती है। इस अमावस्या का हिन्दू धर्म में विशेष महत्त्व होता है। विवाहित स्त्रियों द्वारा इस दिन अपने पतियों के दीर्घायु कामना के लिए व्रत का विधान है । इस दिन मौन व्रत रहने से सहस्र गोदान का फल मिलता है ऐसा माना जाता है । शास्त्रों में इसे  अश्वत्थ प्रदक्षिणा व्रत की भी संज्ञा दी गयी है । अश्वत्थ यानि पीपल वृक्ष । इस दिन विवाहित स्त्रियों द्वारा पीपल के वृक्ष की दूध, जल, पुष्प, अक्षत,चन्दन इत्यादि से पूजा और वृक्ष के चारों ओर १०८ बार धागा लपेट कर परिक्रमा करने का विधान होता है । कहा जाता है कि महाभारत में भीष्म ने युधिष्ठिर को इस दिन का महत्व समझाते हुए कहा था कि, इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करनेवाला मनुष्य समृद्ध , स्वस्थ और सभी दुखों से मुक्त हो जाता है । ऐसा भी माना जाता है इस रोज नदी में स्नान करने से पितरों कि आत्मा को शांति मिलती है ।

मंगलवार के दिन अमावस्या आयें, तो उसे भौमवती  अमावस्या  के नाम से जाना जाता है । इस अमावस्या पर जप, तप और पूजा करने से पितरों के ऋण पूरे हो जाते हैं और पितर देवता प्रसन्न होकर आशीष देते हैं । मंगल ग्रह से ग्रसित जातकों के लिए और बजरंग बली के भक्त को पुण्य फलों की प्राप्ति होती है ।

शनिवार के दिन आने वाली अमावस्या, शनैश्चरी अमावस्या कहलाती है । शनिदेव को रिझाने के लिये इस दिन जिस पीपल के वृक्ष के नीचे हनुमानजी का मंदिर हो उस मंदिर में जा कर इस शनैश्चरी अमावस्या के दिन शनिदेव की विशेष पूजा की जाती है ।

माघ मास की अमावस्या को मौनी अमावस्या कहा जाता है । माना गया है कि इस दिन ब्रह्माजी ने मनु महाराज तथा महारानी शतरुपा को प्रकट करके सृष्टि की शुरुआत की थी । इसलिए भी इस अमावस्या को मौनी अमावस्या कहा जाता है । मकर राशि, सूर्य तथा चन्द्रमा का योग इसी दिन होता है इसलिए भी इस अमावस्या का महत्व और बढ़ जाता है । इस दिन इलाहाबाद के संगम पर स्नान करने से पुण्य फलों की प्राप्ति होती है । कुछ विद्वानों के अनुसार इस दिन व्यक्ति विशेष को मौन व्रत रखना चाहिए । मौन व्रत का अर्थ है कि व्यक्ति को अपनी इन्द्रियों को अपने वश में रखना । धीरे-धीरे अपनी वाणी को संयत करके अपने वश में करना ही मौन व्रत है । हर व्यक्ति के अंदर तीन प्रकार का मैल होते हैं । कर्म का मैल, भाव का मैल तथा अज्ञान का मैल । इन तीनों मैलों को त्रिवेणी के संगम पर धोने का अपना एक महत्व है । कहते हैं कि गंगा, यमुना तथा सरस्वत मिल त्रिवेणी संगम बना है इसीलिये इस में स्नान करने से व्यक्ति के अंदर स्थित तीनों मैल का नाश हो जाता है और उसकी अन्तर-आत्मा स्वच्छ हो जाती है ।

इस दिन का भारतीय जनजीवन में अत्यधिक महत्व हैं । हर माह की अमावस्या को कोई न कोई पर्व अवश्य मनाया जाता हैं । पर्वों तथा त्यौहारों के दिवस नियुक्त किये हैं । इन सबमें लौकिक कार्यों के साथ ही आध्यात्मिक तत्त्वों का समावेश इस प्रकार से कर दिया गया है कि हम उन्हें अपने जीवन में सुगमतापूर्वक उतार सकें । सभी उत्सव समाज को नवजीवन, स्फूर्ति व उत्साह देने वाले हैं । इन उत्सवों का लक्ष्य यही है कि हम अपने महान पूर्वजों के अनुकरणीय तथा उज्जवल सत्कर्मों की परंपरा को कायम रखते हुए जीवन का चहुँमुखी विकास करें ।

दीवाली का त्यौहार कार्तिक मास की अमावस्या के दिन दिपमालओं को प्रगट कर मनाया जाता है । इस दिन राम के द्वारा रावण वध किया गया था जिस का ये संदेश दिया गया कि बुराई पर अच्छाई की जीत ।

साँझी भारत के कई राज्य जैसे राजस्थान, गुजरात ,मालवा तथा अन्य कई राज्यों में मनाया जाता है ।  सोलह दिन के पर्व के अंत में अमावस्या को संझा देवी को विदा किया जाता है इस उम्मीद  से कि वे कुंवारिकाओं को अच्छे पति मिलने का आशीर्वाद प्रदान  कर बिदा हुई  हैं ।

हरियाली अमावस्या का त्योहार श्रावण कृष्ण अमावस्या को मनाया जाता है । यह त्योहर सावन में प्रकृति पर आई बहार की खुशी में मनाया जाता है । इस त्योहार का मुख्य उद्देश्य लोगों को प्रकृति के करीब लाना है ।

ज्येष्ठ मास की अमावस्या पर मनाया जाने वाला ‘वट सावित्री व्रत’, जो हमें वृक्षों की रक्षा करने का संदेश देता है । इस पर्व पर वट वृक्ष की पूजा करने की परंपरा प्राचीन काल से ही चली आ रही है ।  इस दिन महिलाएं वट वृक्ष के नीचे सावित्री और यमराज की पूजा करती हैं । वट सावित्र व्रत रखकर पति की दीर्घायु और अक्षय सौभाग्यवती रहने की मनौती मांगती हैं ।

कहते हैं कि श्राद्ध की अमावस्या के दिन सभी पितर अपने वंशज के द्वार पर पिंड प्राप्ति की आशा रखते हैं । यदि उन्हें सम्मानपूर्वक पिंडदान तथा तर्पण मिलता है तो गृहस्थ वंशज को सुख समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं । यदि उन्हें कुछ नहीं मिलता और वे निराश होते हैं तो वे शाप देकर लौट जाते हैं । अतः अपने परिवार के कल्याण हेतु पितरों को श्रद्धापूर्वक तर्पण करना अभीष्ट माना गया है ।

सुना हुआ है कि एक बार भगवान ने सूरज को बुलाया और कहा कि तुम अंधेरे के पीछे क्यों पड़े रहते हो ? क्या बिगाड़ा है अंधेरे ने तुम्हारा ? क्या है शत्रुता ? क्या है शिकायत ? सूरज कहने लगा, अंधेरा ! अनंत काल हो गया मुझे विश्व का परिभ्रमण करते हुए लेकिन अब तक अंधेरे से मेरी कोई मुलाकात नहीं हुई । अंधेरे को मैं जानता ही नहीं । कहाँ है अंधेरा ? आप उसे मेरे सामने बुला दें, तो मैं क्षमा भी मांग लूं और आगे के लिए पहचान भी लूं कि वह कौन है ताकि उसके प्रति मुझ से कोई भूल न हो  ।

शायद सूरज द्वारा की गई मांग को ध्यान में रख कर ही अमावस्या का ख्याल ऊपरवाले को आया होगा और उसने चांद को ये जिम्मा सौंपा होगा !! चांद को शीतलता का प्रतीक मानते हैं । इन की इस शीतलता के कायल हो बच्चों ने इन्हें मामा की उपाधी दे दी !!  इस चांदमामा ने प्रभू की बात को मान, माह में एक बार खुद को मिटाना मान ही लिया…!!  उसने अपने  बल का निर्णय अपने आकार के अनुसार किया  । पूर्णिमा के दिन चंदामामा अपने पूरे आकार में होते हैं और पूर्ण शक्तिशाली भी और अमावस्या के दिन उनका लोप हो जाता है । इस समय चंदामामा अपनी पूरी ताकत खो देते हैं !! शायद इसीलिये हम इस दिन चंद्रमा की खुशी के लिये तरह-तरह के उत्सव मनाते हैं और इस शीतल, सोम्य ,सुंदर चांद को प्रसन्न रखना चाहते हैं ।

कमलेश अग्रवाल

उपेक्षित जीवन से परे एक नई राह

18 जुलाई

संगीता एक पढी-लिखी महिला है पर उस पर उसके पति द्वारा किये गये जुल्मों की अगर  सूची तैयार की जाए तो न जाने कितने पन्ने भर जाएँगे । ऐसा नहीं है कि वह इन अत्याचारों को मूक हो सह रही है या उसे अपनी सुरक्षाके लिए कानून की जानकारी नहीं है । उसे जानकारी भी है और वह जागरूक  भी है । उसने अपने हक के लिए  कानून का  उपयोग भी किया । अपने इस साहस के चलते वह अदालत भी पहूंची , पर  अब वह कानून की पेंचीदा गलियों में भटकते-भटकते थक चूकी है ; क्योंकि घर से लेकर बाहर तक विरोध के ऐसे बवंडर उसके सामने आ खडे हुए हैं कि वह टुटती जा रही है । इन हालतों का सामना अकेले करना, उसके लिए अब कठिन होता जा रहा है । 

नकारात्मक वातावरण का सामना करते-करते अब उसे लगने लगा है कि अन्याय सहते रहना बेहतर विकल्प होता !! कानून होते हुए भी वह उसकी मदद नहीं ले पा रही है । उसका पति नोट खर्च कर हर कानून को अपनी जेब में रखे हुए आजाद घूम रहा है और ये बेगुनाह होने पर भी अपने न्याय के लिये कोर्ट-कचेरी के चक्कर काटे जा रही है । सच ही है आज भी आमतौर पर लोग औरतों को दोयम दर्जे का नागरिक ही मानते हैं । कारण चाहे सामाजिक रहे हों या आर्थिक,परिणाम हमारे सामने हैं ।

हमारे संविधान के अनुच्छेद 14 में कहा गया है कि कानून के सामने स्त्री और पुरुष दोनों बराबर हैं । अनुच्छेद 15 के अंतर्गत महिलाओं को भेदभाव के विरुद्ध न्याय का अधिकार प्राप्त है । संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों के अलावा भी समय-समय पर महिलाओं की अस्मिता और मान-सम्मान की रक्षाके लिए कानून बनाए गए हैं फिर भी आज संगीता अपने प्रति हो रहे अन्याय के खिलाफ न्यायालय के द्वार पर दस्तक दे- देकर हिंमत खोती जा रही है । शायद ये ही वजह रही है कि संस्कारों में जकड़ी महिलाएँ अन्याय और अत्याचार को अपनी नियति मान कानूनी मामलों में  रुचि लेना नहीं चाहती हैं । 

संगीता आज जिस मानसिक यातना से गुजर रही है उसके पीछे जो कारण दिख रहा है वह हमारा सामाजिक ढाँचा ही है । आधुनिक युग का ढोल पीटना  एक बात है और उसे प्रयोग में लाना दूसरी बात है । आज उसके मात-पिता और भाई-भाभी उस पर दबाव डाल रहें है कि वह अपना केस वापस ले ले और पति से फिर से रिश्ता जोड ले ताकि छोटे भाई-बहनों की शादियों में कोई बखेडा न खडा हो !! पति भी उसी फिराक में है कि वह कब अपना केस वापस ले और वह उससे फिर गिन-गिन कर बदला ले !!

कल जब वह अवनी से मिली और इन बातों से उसे मुखबीर किया तो अवनी ने उसे साफ-साफ कहा,” देख संगीता , एक बात जान लें कि जो अपनी मदद खुद नहीं करता, उसकी मदद ईश्वर भी नहीं करता अर्थात अपने साथ होने वाले अन्याय, अत्याचार से छुटकारा पाने के लिए खुद तुम्हें ही सोचना होगा । अपने प्रत्ये हो रहे इन अत्याचार, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठानी होगी । अपने दृष्टिकोण में जो बदलाव तुम लाई हो उससे जूडे रहना होगा । तुम भी एक इंसान हो और एक इंसान के साथ जैसा व्यवहार होना चाहिए वैसा ही तुम्हारे साथ भी किया जाना चाहिये तभी तुम न्यायपूर्ण और सम्मानजनक जीवन जी पाओगी । अब पीछे मूड कर मत देखो , बस जिस राह पर चल पडी हो उसी पर चल कर अपनी मंजिल सर करो । मैं तुम्हारे साथ हूं ।”

अवनी द्वारा दिये गये इस सुझाव में मेरा भी संगीता को समर्थन है । आज अगर संगीता को एक अवनी का  समर्थन मिला है तो हो सकता है , आनेवाले वक्त में मेरी तरह कई और महिलायें भी संगीता जैसी महिलाओं की समस्याओं की इस मुहिम में जूड जायें !! अगर महिलाएँ अपने अधिकारों का संगीता की तरह सही इस्तेमाल  कर पायेंगी तभी वे खुद को आत्मनिर्भर कर सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार हांसिल कर पायेंगी अन्यथा उपेक्षित जीवन ही जीती रहेंगी ।

मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि संगीता के परिवारवालों को सदबुध्धि दें ताकि वे उसे इस लडाई में अपना भरपूर साथ और सहकार दें जिस के चलते ऐसी कई और पीडीत महिलाओं को व उनके अभिभावकों भी प्रेरणा मिले । अगर आप को भी कोई संगीता मिले तो मेरा आप से अनुरोध है कि आप का पूर्ण सहकार उसे दिजीयेगा । हम सब को मिलकर ही बेहूदा सामाजिक ढांचे को बदलना है । आप का साथ और  सहकार से ही ये संभव हो पायेगा ।

कमलेश अग्रवाल

अपने मापदंडों को बदलिए

17 जुलाई

नारी जो विवाह पश्चात बिदा हो, एक बहू ,पत्नी, भाभी  बन  ससुराल में , अपने खुद के घर में प्रवेश करती है, उसी दिन से  उसके  नाज़ुक कंधों पर  अनगिनत बोझ डाल दिये जाते हैं । उसके साथ घर के मान-सम्मान, इज्जत, जवाबदारी, प्रतिष्ठा आदि भी जोड दिये जाते हैं । धीरे-धीरे वह उस घर के इंसानों को समझने की कौशिश करने लगती है और रफ्ते-रफ्ते वह अपनी समझदारी को बढाती जाती है । उसे खुद अपनी मर्यादाएं बिना कहे ही समझ में आने लगती हैं ।वैसे तो घर प्रवेश के वक्त उससे कहा जाता है कि वह स्वतंत्र है ,परन्तु हर पल , हर कदम पर उसे  बंदिशों का एहसास भी दिलाया जता है ।

मैं यह कतई नहीं कहती कि ये सब उसे तंग करने के लिए किया जाता है, हो सकता है कि इस मकसद के पीछे शायद कोई भलाई भी छुपी हो ; परन्तु इन बंदिशो के कारण उस के दिल में एक डर बैठ जाता है । उस के मन में प्रश्न उठने लगते हैं । क्या अब वह अपनी इच्छा के मुताबिक जी नहीं पायेगी ? क्या अब उसका अपना कोई वजूद ही नहीं रहेगा ? क्या उसे हर काम के करने के तरीके नये सिरे से बताये जायेगें ? हर वक्त इसी तरह टोका जाया करेगा ?

कहा जाता है कि गलती से ही इंसान सीखता है, पर बहूओं को तो गलती करने की इजाज़त ही नहीं । उन्हें तो हर चीज़ में पिता के घर से पी एच डी किया हुआ होना चाहिये ।  उन्हें क्यों अपनी गलतियों से सीख पाकर आगे बढ़ने का हक़ नहीं ? क्यों उन्हें बार-बार याद दिलाया जाता है कि वे पराई-जाई हैं ? उनके पिता के घर का चलन यहां नहीं चलेगा । अब उन्हें इस घर के कायदे- कानून , रीति-रिवाज को ही समझने होंगे । बहूओं को बेफिक्र हो साँस लेने की भी इजाज़त नहीं दी जा सकती है !! क्या वे इंसान नहीं ? जिन मा-बाप ने उन्हें अपना तन, मन, धन न्योछावर कर , आप के घर की शोभा बनाने हेतु अपने घर से सहर्ष बिदा किया हो, उनके बारे में अपशब्द या ताने सुनना क्या उन्हें राश आयेगा ? क्या ये सब गलत व्यवहार के बाद, आप उससे अच्छे व्यवहार की उम्मीद कर सकोगे ?

हमारे द्वारा पैदा किये गए काँटों में वे अपने नाज़ुक पैरों से कहाँ तक चल पायेगीं ? हर कदम पर तो हमने उनके लिए परीक्ष रख छोडी है , इस उदेश्य से कि कभी न कभी तो फेल होगीं ही और तब हम उन्हें ताने मार सकेगें । इतनी कठिन डगर में वे कहाँ चल पाएंगी ? अपने नाज़ुक कन्धों पर ससुराल के भारी से भारी वज़न को फूल की भांति उठा कर, अपनी पायल की आवाज़ पर मुस्कराहट बिखेरती हुई, घर को स्वर्ग बना देनेवाली ये  बहूयें कमज़ोर दिखती हैं; परन्तु उनके अंदर की ताकत को पहचान पाना दुनिया के किसी पुरुष के बस का नहीं है । जिस दिन हम नारित्व का अर्थ समझ लेंगे उस दिन इस अर्थहीन मापदंडो का अर्थ खुद-ब-खुद निकल आएगा ।

आज माँ-बाप के लिए अपनी सन्तति का लिंग कुछ भी हो,चाहे बेटा हो या बेटी, दोनों बराबर हैं । दोनों की अपनी-अपनी जगह है । न बेटा बड़ा न बेटी छोटी । लिंग के आधार पर बेटा-बेटी में फर्क करना अनुचित है ये आज के अभिभावक जान चूके हैं । जो नहीं जान रहे हैं उन्हें आनेवाले समय में अपने मापदंडों को बदलना ही होगा । आज जरुरी नहीं कि लडके को लडकी पसंद आ गई तो लडकी भी लडके को पसंद कर ही ले..!! जमाना बदल रहा है । ये बात को भूलाना ही होगा कि अथाह पीडा में भी बहू मुस्कराती रहे, आंसु बहाती रहे और उसके अभिभावक हाथजोड उसके ससुरालवालों के सामने एक मुजरिम की भांति खडे रह, अपनी बेटी के लिये रहम की भीख मांगते रहे !! हमे ये कतई नहीं भूलना चाहिये कि बहू ने चाहे इस घर में जन्म नहीं लिया, पर वह आप के घर एक अवतार बन कर आई है । उसकी प्यारी सी एक मुस्कान आप के घर के हजारों अंगारों की भड़की आग को पल्भर में बुझा देगी ।

आप अगर मेरे इन विचारों से सहमत हैं तो अपने पूराने मापदंडो को खुद भी तिलांजली दें और अपने आसपास के दोस्तों, अपने परिचितों या भाईभाडूं को भी आगाह किजीये …आप भी तो किसी लडकी के पिता, भाई, दोस्त या सह्कर्मी   हैं..!! आप के सुझाव आवकार्य हैं , आशीर्वाद चाहूंगी ।

कमलेश अग्रवाल