Archive | अगस्त, 2012

राजभाषा का वैज्ञानिक तकनीकी और प्रशासनिक क्षेत्रो में योगदान

28 अगस्त

आज के युग में विज्ञान के ज्ञान को जन साधारण तक पहुंचाना बेहद महत्वपूर्ण है |  इसे कहने की या दोहराने की आवश्यकता नहीं है | विज्ञान के सरल ज्ञानको जन–जन  तक पहूंचाना विदेशी भाषा द्वारा संभव नहीं है | इसीलिये हिंदी में तकनीकी – वैज्ञानिक शिक्षण के लिये नये सिरे से सोचना बेहद जरुरी है | अब इसे शिक्षण- प्रशिक्षण की सार्थक भाषा बनाने हेतु हमे नई परियोजनाओं के बारे में भी सोचना होगा | हमे चाहिये कि अनुसंधान एवम सर्जन के लिये सरल शब्दों की संरचना द्वारा भाषा को सरल बना, बोलचाल की भाषा से थोडे ऊपर बैठा , हर एक आम आदमी समझ सके, ऐसी भाषा को इन क्षेत्रों में लानी होगी |  इतना ही नहीं अंग्रेजी के बेहद प्रचलित शब्दों को भी जो विज्ञान, प्रशासन इत्यादि से जूडे हैं , उन शब्दों के इस्तेमाल की भी अनुमति देनी होगी तभी हम हमारी राजभाषा के वैज्ञानिक , तकनीकी व प्रशासनिक क्षेत्रों में लाभ उठाते हुए देश को उन्न्त कर पायेंगे |

आज तकनीकी के कारण कंप्यूटर  लिपि-अक्षर (Fonts) अब ’युनिकोड’ में बहुत सरल हो गये हैं | हिंदी मनीषियों के लिये अपनी बात हिंदी के अंतर्जाल (internet) के माध्यम से सरलता से लोगों के सामने रखी जाना आज आम बात है | इसी कारण आज हिंदी में विज्ञानका भविष्य उज्जवल दिखाई दे रहा है | वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग, केंद्रीय निदेशालय , हिंदी ग्रंथ अकादमी , कुछ स्वंयसेवी संस्थाओं के द्वारा इस विषय में महत्वपूर्ण काम हो रहा है |

जीवन के प्रत्येक क्षेत्रको अभिव्यक्त करने के लिये सदैव चुनौतियों का सामना करना ही होता है | जीवन को संचालित करने हेतु अनुभव और ज्ञानका संतुलन बनाये रखना बेहद आवश्यक है और ये दोनों ही से विकास की अतुलनीय समृध्धि होती है | आईये हम इस राजभाषा के योगदान को भिन्न-भिन्न पहलूओं के अंतर्गत  खंगालें……

राजभाषा का वैज्ञानिक क्षेत्र में योगदान

पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री पी.वी. नरसिंहराव ने लिखा है ‘ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विदेशी भाषा से कोई राष्ट्र न तो मौलिक ढ़ंग से विकास कर सकता है और न तो अपनी विशिष्ट वैज्ञानिक एंव प्रौद्योगिकीय पहचान बना सकता है । विदेशी भाषा से अनुवाद की बैसाखी का सहारा भी अधिक समय तक नहीं लिया जा सकता है । ‘ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी इस शताब्दी के प्रमुख एंव प्रखर स्वर हैं । आज साहित्य एवं दर्शन परिवर्तन का इतना बड़ा माध्यम नहीं जितना विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी हैं । आज के युग को विज्ञान का युग कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी परन्तु इसके साथ-साथ आज का युग जन साधारण का भी युग है । इस युग को अधिकतम उपादेय एवं प्रभावी बनाने के लिए जन साधारण को विज्ञान के साथ जोड़ देना ही आज विज्ञान लेखन का परम लक्ष्य होना चाहिए । इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु जन साधारण के बीच वैज्ञानिक दृष्टि तथा वैज्ञानिक मनोवृत्ति विकसित करने की अर्थात वैज्ञानिक जागरूकता जगाने की विशेष आवश्यकता है । वैज्ञानिक जागरूकता को विकसित करने का सबसे सशक्त तथा समर्थ माध्यम है विज्ञान लेखन । जन मानस की वैज्ञानिक मनोवृत्ति जगाने और जीवन तथा विज्ञान के बीच सार्थक समन्वय स्थापित करने के लिए यदि लेखन को एक सशक्त माध्यम मान लिया जाय तो ऐसे लेखन के माध्यम या वाहक के रूप में भाषा की महत्ता अपने आप स्थापित हो जाती है ।  यदि विज्ञान को जनमानस की संवेदना का हिस्सा बनाना है तो हमें भारतीय भाषाओं की और विशेष रूप से राजभाषा हिन्दी की महत्ता को समझना ही पड़ेगा ।

वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली के सृजन में आज उल्लेखनीय प्रगति हुई है । आज वैज्ञानिक कोष पारिभाषिक कोष विज्ञान की लगभग हर विधा के लिए उपलब्ध हैं । इसके लिए वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग , नई दिल्ली ने प्रशंसनीय कार्य किया है । हमारे देश के वरिष्ठ तथा प्रतिष्ठित हिन्दी में विज्ञान लेखक डॉ. शिव गोपाल मिश्र के अनुसार आज 3500 से अधिक हिन्दी में विज्ञान लेखक हैं जिनमें 150 महिलाएं हैं तथा  8000 हजार से भी अधिक विज्ञान संबंधी पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं । उन का कहना है कि  हम जिन्हें लोकप्रिय विज्ञान लेखक कहते हैं आजकल वे ही छाए हुए हैं । जिन्होंने हिन्दी में विज्ञान की पाठयपुस्तकें लिखी हैं और प्रतियोगिता वाली पत्रिकाओं के लिए लगातार लिखते रहते हैं , वे हाई स्कूल से लेकर महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों के परिसरों तक व्याप्त हैं ।  हर्ष की बात है कि हिन्दी भाषा में विज्ञान की पत्रिकाओं का अवश्य विस्तार हुआ है जो विज्ञान को लोकप्रिय बनाने की दिशा में सक्रिय हैं ।   कुछ मुख्य पत्रिकाएं निम्लिखित हैं:

विज्ञान (इलाहाबाद) , संदर्भ (होशंगाबाद) , स्रोत (भोपाल) , विज्ञान चेतना (जयपुर) , विज्ञान आपके लिए (गाजियाबाद) , सामयिक नेहा (गोरखपुर) विज्ञान भारती प्रदीपिका (जबलपुर)। इसके अतिरिक्त विज्ञान प्रगति , विज्ञान लोक , विज्ञान जगत , अविष्कार तथा विज्ञान गरिमा सिंधु आदि पत्रिकाएं भी उल्लेखनीय हैं।

वैज्ञानिक एवं तकनीकी पारिभाषिक शब्दावली का हिन्दी में अब अभाव नहीं है परन्तु विज्ञान लेखक इसका समुचित उपयोग नहीं कर रहे हैं और तमाम लेखक स्वयं नित नए शब्द गढ़ रहे हैं । इस अराजक स्थिति के जो कारण हैं वह ये हैं….

1. एक तो भाषागत कठिनाई

2. वैज्ञानिक जगत की घोर उपेक्षा

3. हिन्दी में लिखे आलेखों शोधपत्रों को प्रस्तुत करने के लिए मंचों का अभाव

4. प्रकाशन की असुविधा

आज भी शैक्सपेयर की और कालिदास की कृतियां पढी जाती हैं ;किन्तु न्यूटन के वैज्ञानिक ग्रंन्थ प्रिसिंपिया मैथेमैटिका और आइन्सटाइन के मूल विज्ञान शोध पत्रों को  अधिकांश लोग पढने की आवश्यकता नही समझते क्योंकि वास्तव में विज्ञान के लिये अपनी राजभाषा में प्रस्तुती अति महत्वपूर्ण है ।

राजभाषा  का तकनीकी  क्षेत्र में योगदान

सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पिछले कुछ दशकों से शीघ्र गति से विकास हुआ है ।   यह मनुष्य को सोचने विचारने और संप्रेषण करने के लिए तकनीकी सहायता उपलब्ध कराती है । सूचना प्रौद्योगिकी के अंतर्गत कंप्यूटर के साथ-साथ माइक्रोइलेक्ट्रोनिक्स और संचार प्रौद्योगिकि के  शामिल होने के कारण इसके विकास का नवीनतम रूप हमें इंटरनेट, मोबाइल, रेडियो, टेलीविजन, टेलीफोन, उपग्रह प्रसारण, कंप्यूटर के रूप में हमे दिखाई दे रहा है ।

आज सूचना प्रौद्योगिकी की विस्तृत भूमिका को देखते हुए विश्व स्तर पर हिंदी भौगोलिक सीमाओं को पार कर सूचना टेक्नोलॉजी के परिवर्तित परिदृश्य में विभिन्न जनसंचार माध्यमों तक पहुँच रही है । हिंदी के नए सॉफ्टवेयर हों या इंटरनेट, कंप्यूटर टेक्नोलॉजी अनेक चुनौतियों को स्वीकार कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जन-माध्यमों में अपनी मानक भूमिका के लिए संघर्षरत है ।

राजभाषा विभाग सी-डैक, पुणे के माध्यम से कंप्यूटर पर हिंदी प्रयोग को सरल व कुशल बनाने के लिए विभिन्न सॉफ्टवेयरों द्वारा हिंदी भाषा को तकनीकी से जोड़ने का सफल प्रयास ‘प्रगत संगणन विकास केन्द्र (सी-डैक), पुणे ने किया है । ‘एप्लाइड आर्टिफिशियल इंटैलीजेंस ग्रुप, प्रगत संगणन विकास केंद्र, पुणे द्वारा निर्मित सॉफ्टवेयर में विभिन्न भारतीय भाषाओं के माध्यम से इंटरनेट पर हिंदी सीखने के लिए लीला सॉफ्टवेयर विकसित किया है । लीला सॉफ्टवेयर के माध्यम से हिंदी प्रबोध, प्रवीण और प्राज्ञ पाठयक्रम असमी, बांग्ला, अंग्रेज़ी, कन्नड़ मलयालम, मणिपुरी, मराठी, उड़िया तमिल, तेलुगू, पंजाबी, गुजराती, नेपाली और कश्मीरी के द्वारा इंटरनेट पर सीखे जा सकते हैं । हिंदी प्रबोध, प्रवीण एवं प्राज्ञ पाठक्रम के प्रशिक्षण के मूल्यांकन हेतु ऑन लाइन परीक्षा प्रणाली का विकास भी किया जा रहा है । अब इंटरनेट के माध्यम से ही परीक्षा दी जा सकेगी । द्विभाषी- द्विआयामी अंग्रेज़ी-हिंदी उच्चारण सहित ई-महाशब्दकोश का विकास भी किया गया है। ई-महाशब्दकोश में हर शब्द का उच्चारण दिया गया है जो कि किसी और शब्दकोश में नहीं मिलता । हिंदी शब्द देकर भी उसका अंग्रेज़ी में अर्थ खोजना संभव हो पाया है । इस में प्रत्येक अंग्रेज़ी और हिंदी शब्द के प्रयोग भी दिए गए हैं ।

आज के दौर में इंटरनेट पर सभी तरह की महत्वपूर्ण जानकारियाँ व सूचनाएँ उपलब्ध हैं जैसे परीक्षाओं के परिणाम, समाचार, ई-मेल, विभिन्न प्रकार की पत्र-पत्रिकाएँ, साहित्य, अति महत्त्वपूर्ण जानकारी युक्त डिजिटल पुस्तकालय आदि । परन्तु ये प्राय: सभी अंग्रेज़ी भाषा में हैं । अत: आज ये जरुरी है कि ये जानकारियां  भी हिंदी में उपलब्ध कराई जाये । कम्प्यूटर पर भाषाओं के बीच एक पुल बनाने के लिए ‘मंत्र’ प्रोजेक्ट के तहत एक हिंदी सॉफ़्टवेयर के विकास के सहयोग से ये कुछ हद तक मुमकिन होता दिख रहा है ।

आने वाली शताब्दी अंतर्राष्ट्रीय संस्कृति की शताब्दी होगी और सम्प्रेषण के नए-नए माध्यमों व आविष्कारों से वैश्वीकरण के नित्य नए क्षितिज उद्घाटित होंगे । इस सारी प्रक्रिया में अनुवाद की महती भूमिका होगी । इससे ”वसुधैव कुटुम्बकम्” की उपनिषदीय अवधारणा साकार होगी । इस दृष्टि से सम्प्रेषण-व्यापार के उन्नायक के रूप में अनुवादक एवं अनुवाद की भूमिका निर्विवाद रूप से अति महत्त्वपूर्ण सिद्ध होती है ।

राजभाषा का प्रशासनिक  क्षेत्र में योगदान

हम हिन्दी को बोलचाल की भाषा के रूप में काम में लेते है तो उसे पूर्णतया कार्यरूप में लेने का भी प्रयास किया जाना चाहिए । अतः हम हिन्दी भाषी बनें, हिन्दी में सोचें, बोलें तथा लिखें भी इस सोच के कारण ही आज प्रशासनिक कार्य राजभाषा में होना अनिवार्य बन चूका है ।

किसी भी संस्था की गृह पत्रिका उसकी सतत् क्रियाशीलता, जागरुकता एवं उपलब्धियों की प्रतिबिम्ब होती है। केन्द्र में हो रहे विभिन्न कार्यकलापों तथा आयुर्विज्ञान के क्षेत्र में हो रहे अनुसंधान कार्यों को जन-साधारण तक पहुँचाने में ये पत्रिकाएं एक अहम् भूमिका निभा रही हैं । हमारे संस्थान में ‘दर्शना’ पत्रिका निकाली जा रही है । आई.सी .एम.आर भी हिंदी विज्ञान पत्रिकाओं का हिमायती रहा है और सभी संस्थानों का वेब-पेज हिंदी में बनाये गये हैं ।

केन्द्र में राजभाषा के प्रयोग को उत्तरोत्तर बढ़ाने के लिए नियमित रूप से हिन्दी कार्यशालाओं का आयोजन भी संस्थानों में किया जा  रहा है । इन कार्यशालाओं में प्रशासन व लेखा अनुभाग में कार्यरत कर्मचारी भाग लेते हैं जिनमें केन्द्र के या केन्द्र के बाहर के विषय-विशेषज्ञ, कर्मचारियों को हिन्दी में सरलता से काम करने के महत्वपूर्ण सुझाव देते हुए हिन्दी में कार्य करने की प्रेरणा व प्रोत्साहन देते हैं ।

हिन्दी में कार्य करने के उत्साह को अधिकाधिक बढाने हेतु सरकारी संस्थानों में दिनांक 14 से हिन्दी सप्ताह का आयोजन किया जाना निश्चित किया गया है । सप्ताह के दौरान विभिन्न प्रतियोगिताओं, यथा – श्रुतिलेख प्रतियोगिता, हिन्दी टिप्पण व पत्र लेखन प्रतियोगिता, कार्यालय शब्दावली ज्ञान, निबन्ध लेखन प्रतियोगिता, सुलेख प्रतियोगिता, जैसे कार्यक्रमोंका आयोजन किया जाता है । हिन्दी सप्ताह के दौरान हिन्दी कार्यशाला का भी आयोजन किया है और हिन्दी सप्ताह के दौरान आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेताओं को नकद पुरस्कारों से सम्मानित किया जाता है । प्रत्येकसंस्थान में  हिन्दी कम्प्यूटर प्रशिक्षणदेना भी जरुरी किया जा रहा है ।

हिन्दी में उत्कृष्ट कार्य के लिए केन्द्र के द्वारा नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति (नराकास) पुरस्कार भी रखे जा रहे हैं ।

युनिकोड़ एक ऐसी तकनीक है जो कम्प्युटर द्वारा फाइलों के आदान प्रदान में काम आती है। युनिकोड़ की सहायता से कम्प्यूटर पर हिन्दी में टाइप जानने वाला तो काम कर ही सकता है । साथ ही, जो लोग कम्प्यूटर पर हिन्दी में काम करना चाहते हैं और कर नहीं पाते हैं, वे भी बिना विशेष प्रयत्न किए कम्पूटर पर हिन्दी में काम कर सकते हैं । उपर्युक्त प्रोहत्सानों के कारण अब कर्मचारी एवं अधिकारी गण प्रशासनिक कार्य हिंदी में करने को उत्सुक देखे जा रहे हैं ।

वैज्ञानिक युग में हिन्दी की उपादेयता समाप्त नहीं हुई है ।  हिन्दी भाषा एक जीवंत भाषा है और अपनी संप्रेषणीयता के कारण ही हिन्दी स्वतंत्रता संग्राम की भाषा बन पाई है । हिन्दी को क्लिष्ट भाषा न बनाते हुए इसके सरलीकरण पर अगर जोर दिया जाये तो अवश्य ही ये अपना योगदान का दायरा वैज्ञाकिन, तकनीकी और प्रशासनिक क्षेत्रों में बढा सकती है ।  वैश्‍वीकरण के दौर में आज परिस्थितियाँ बदल गई है और समस्त टी.वी.चैनलों, सिनेमा एवं एफ.एम. रेडियो इत्यादि में आज यह भाषा एक आवश्‍यकता के रूप में ऊभर कर सामने आ रही है जो हम भारतीयों के लिये गर्व की बात है ।

जय-भातर……

कमलेश अग्रवाल

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रुद्राक्षों का अपना एक अलग महत्व

21 अगस्त

 माना जाता है कि एक बार पृथ्वी पर त्रिपुर नामक एक भयंकर दैत्य उत्पन्न हुआ था । वह बहुत बलशाली और पराक्रमी था । देवताओंके लिये  उसे पराजित करना असंभव था ; तब ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र आदि देवता भगवान शिव की शरण में गए और उनसे रक्षा की प्रार्थना लगने लगे ।

भगवान शिव के पास ‘अघोर’ नाम का एक दिव्य अस्त्र था । वह अस्त्र बहुत विशाल और तेजयुक्त था । उसे सम्पूर्ण देवताओं की आकृति माना जाता है । त्रिपुर का वध करने के उद्देश्य से शिव ने नेत्र बंद करके अघोर अस्त्र का चिंतन किया । अधिक समय तक नेत्र बंद रहने के कारण उनके नेत्रों से जल की कुछ बूंदें निकलकर भूमि पर गिर गईं । उन्हीं बूंदों से महान रुद्राक्ष के वृक्ष उत्पन्न हुए । फिर भगवान शिव की आज्ञा से उन वृक्षों पर जो फल लगे उनकी गुठलियों को रुद्राक्ष कहा गया । वैसे भी देखा जाये तो ‘रुद्र’ का अर्थ शिव और ‘अक्ष’ का आँख अथवा आत्मा है ।

ये रुद्राक्ष अड़तीस प्रकार के कहे गये हैं । माना जाता है कि जो फल शिव प्रभु ने सुर्य के नेत्रों से उत्त्पन करवाये वे  कत्थई रंग के थे और उन के बारह भिन्न-भिन्न प्रकार माने गये हैं ।  इसी प्रकार चन्द्रमा के नेत्रों से  श्वेतवर्ण के सोलह प्रकार के रुद्राक्षों की उत्त्पति हुई तथा कृष्ण वर्ण वाले दस प्रकार के रुद्राक्षों की उत्पत्ति अग्नि के नेत्रों से मानी जाती है । ये ही इनके अड़तीस भेद हैं ।

वैज्ञानिक तौर पर कहें तो रुद्राक्ष एक फल की गुठली (बीज) है । संसार में यही एक ऐसा फल है, जिसको खाया नहीं जाता बल्कि गुद्देको निकालकर उसके बीज को धारण किया जाता है। यह एक ऐसा बीज (काष्ठ रुप क) है, जो पानी में डूब जाता है । पानी में डूबना यह दर्शाता है कि इसका आपेक्षिक घनत्व अधिक है, क्योंकि इसमें लोहा, जस्ता, निकल, मैंगनीज,एल्यूमिनियम,फास्फोरस, कैल्शियम, कोबाल्ट,पोटैशियम, सोडियम, सिलिका, गंधक आदि तत्व होते हैं । इसी वजह से रुद्राक्ष का मानव शरीर से स्पर्श को महान गुणकारी बतलाया गया है । हमारे देश भारत में इसका उपयोग आध्यात्मिक क्षेत्रमें ज्यादा तौर पर किया जाता है ।

हमारे देश में व्यावसायिक तौर से रुद्राक्ष प्राय: तीन रंगो में पाया जाता है। लाल, मिश्रित लाल व काला । इसमें धारियांबनी रहती हैं । इन धारियोंको मुख कहा गया है । एक मुखी से लेकर इक्कीस मुखी तक रुद्राक्ष होते हैं । परंतु वर्तमान में चौदहमुखी तक रुद्राक्ष उपलब्ध हैं । रुद्राक्ष के एक ही वृक्ष से कई प्रकार के रुद्राक्ष मिलते हैं । एक मुखी रुद्राक्ष को साक्षात् शिव का स्वरूप कहा गया है । सभी मुख वाले रुद्राक्षों का अपना एक अलग महत्व होता है । हमारे ऋषि-मुनियों के मुताबिक इन रुद्राक्षोंके मुख के अनुसार देवों की महिमा बतलाई गई है ।  ज्योतिष शास्त्रों के मुताबिक निम्नानुसार मंत्र-जाप करने से कष्ट निवारण का महत्व दिखलाया गया  है …………

रुद्राक्ष                    देवता                                              मंत्र

१ मुखी                   शिव                                            ॐ नमः शिवाय । 2 –ॐ ह्रीं नमः

२ मुखी                 अर्धनारीश्वर                                 ॐ नमः

३ मुखी                अग्निदेव                                       ॐ क्लीं नमः

४ मुखी               ब्रह्मा,सरस्वती                             ॐ ह्रीं नमः

५ मुखी              कालाग्नि रुद्र                                  ॐ ह्रीं नमः

६ मुखी             कार्तिकेय,                                       ॐ ह्रीं हुं नमः

७ मुखी             नागराज                                         ॐ ह्रीं हुं नमः

८ मुखी            भैरव,अष्ट विनायक                       ॐ हुं नमः

९ मुखी          माँ दुर्गा                                            १-ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः २-ॐ ह्रीं हुं नमः

१० मुखी        विष्णु                                              १-ॐ नमो भवाते वासुदेवाय २-ॐ ह्रीं नमः

११ मुखी      एकादश रुद्र                                       १-ॐ तत्पुरुषाय विदमहे महादेवय धीमही तन्नो रुद्रः प्रचोदयात २-ॐ ह्रीं हुं नमः

१२ मुखी        सूर्य                                                १-ॐ ह्रीम् घृणिः सूर्यआदित्यः श्रीं २-ॐ क्रौं क्ष्रौं रौं नमः

१३ मुखी     कार्तिकेय, इंद्र ,इंद्राणी                       १-ऐं हुं क्षुं क्लीं कुमाराय नमः २-ॐ ह्रीं नमः

१४ मुखी     शिव,हनुमान,आज्ञा चक्र                  ॐ नमः

१५ मुखी       पशुपति                                         ॐ पशुपत्यै नमः

१६ मुखी    महामृत्युंजय ,महाकाल                 ॐ ह्रौं जूं सः त्र्यंबकम् यजमहे सुगंधिम् पुष्टिवर्धनम उर्वारुकमिव बंधनान् मृत्योर्मुक्षीय सः जूं ह्रौं ॐ

१७ मुखी     विश्वकर्मा ,माँ कात्यायनी            ॐ विश्वकर्मणे नमः

१८ मुखी     माँ पार्वती                                      ॐ नमो भगवाते नारायणाय

१९ मुखी     नारायण                                        ॐ नमो भवाते वासुदेवाय

२० मुखी     ब्रह्मा                                           ॐ सच्चिदेकं ब्रह्म

२१ मुखी     कुबेर                                            ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्य समृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा

आयुर्वेद चिकित्सा क्षेत्र में  रुद्राक्षका एक विशिष्ट वर्णन मिलता है । बहुत से रोगों का उपचार रुद्राक्ष से आयुर्वेद में वर्णित है ।

माना जाता है कि ….

दाहिनी भुजा पर रुद्राक्ष बांधने से बल व वीर्य शक्ति बढती है । वात रोगों का प्रकोप भी कम होता है।

कंठ में धारण करने से गले के समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं, टांसिल नहीं बढते । स्वर का भारीपन भी मिटता है ।

कमर में बांधने से कमर का दर्द समाप्त हो जाता है ।

शुद्ध जल में तीन घंटे रुद्राक्ष को रखकर उसका पानी किसी अन्य पात्र में निकालकर पीने से बेचैनी, घबराहट, मिचली व आंखों की जलन रोकने के लिए किया जा सकता है ।

दो बूंद रुद्राक्ष का जल दोनों कानों में डालने से सिरदर्द में आराम मिलता है ।

रुद्राक्ष का जल हृदय रोग के लिए भी लाभकारी है ।

चरणामृत की तरह प्रतिदिन दो घूंट इस जल को पीने से शरीर स्वस्थ रहता है ।

इस प्रकार से कई रोगों का उपचार रुद्राक्ष से संभव होता है ऐसा हमारे विद्वानों द्वारा कहा गया है ।

इसी वजह से वर्तमान समय में लोग रुद्राक्ष धारण करना चाहते हैं । क्योंकि इस के धारण करने से कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं होता है । इसी कारण वे चाहते हैं कि सही रुद्राक्ष को खरीदें । रुद्राक्ष की पहचान को लेकर अनेक भ्रातियां मौजूद हैं । जिनके कारण आम व्यक्ति असल रुद्राक्ष की पहचान उचित प्रकार से नहीं कर पाता है एवं स्वयं को असाध्य पाता है । असली रुद्राक्ष का ज्ञान न हो पाना , उसके प्रभाव को निष्फल करता है । अत: ज़रूरी है कि रुद्राक्ष असली हो ।

रुद्राक्ष के समान ही एक अन्य फल होता है जिसे भद्राक्ष कहा जाता है, और यह रुद्राक्ष के जैसा हो दिखाई देता है इसलिए कुछ लोग रुद्राक्ष के स्थान पर इसे भी नकली रुद्राक्ष के रुप में बेचते हैं । भद्राक्ष दिखता तो रुद्राक्ष की भांति ही है किंतु इसमें रुद्राक्ष जैसे गुण नहीं होते । 

असली रुद्राक्ष की पहचान के कुछ तरीके बताए जाते हैं जो इस प्रकार हैं…..

1.रुद्राक्ष की पहचान के लिए रुद्राक्ष को कुछ घंटे के लिए पानी में उबालें यदि रुद्राक्ष का रंग न निकले या उस पर किसी प्रकार का कोई असर न हो, तो वह असली होगा

2.रुद्राक्ष को काटने पर यदि उसके भीतर उतने ही घेर दिखाई दें जितने की बाहर हैं तो यह असली रुद्राक्ष होगा , यह परीक्षण सही माना जाता है, किंतु इसका नकारात्मक पहलू यह है कि इस परीक्षण से रुद्राक्ष नष्ट हो जाता है 

3.रुद्राक्ष की पहचान के लिए उसे किसी नुकिली वस्तु द्वारा कुरेदें यदि उसमे से रेशा निकले तो समझें की रुद्राक्ष असली है

4. दो असली रुद्राक्षों की उपरी सतह यानि के पठार समान नहीं होती किंतु नकली रुद्राक्ष के पठार समान होते हैं

5.एक अन्य उपाय है कि रुद्राक्ष को पानी में डालें अगर यह डूब जाए, तो असली होगा,  यदि नहीं डूबता तो नकली लेकिन यह जांच उपयोगी नहीं मानी जाती है क्योंकि रुद्राक्ष के डूबने या तैरने की क्षमता उसके घनत्व एवं कच्चे या पक्के  होने पर निर्भर करती है और रुद्राक्ष धातु या किसी अन्य भारी चीज से भी बनाया जा सकता है जिस के कारण वह भी पानी में डूब सकता है, सो ये प्रयोग बहुत कारगर नहीं कहा जा सकता है

6.एक अन्य उपयोग द्वारा भी परीक्षण किया जा सकता है … रुद्राक्ष के मनके को तांबे के दो सिक्कों के बीच में रखा जाए, तो थोड़ा सा हिल जाता है क्योंकि रुद्राक्ष में चुंबकत्व होता है जिस की वजह से ऐसा होता है ; कहा जाता है कि दोनो अंगुठों के नाखूनों के बीच में रुद्राक्ष को रखें यदि वह घुमता है तो असली होगा अन्यथा नकली परंतु यह तरीका भी सही नही है क्योंकि बाहरी तौर से धातु की मिलावट करना असंभव नहीं है

मेरा मानना है कि रुद्राक्ष को खरीदने से पहले कुछ मूलभूत बातों का आप  अवश्य ध्यान रखें  जैसे की  रुद्राक्ष में किडा़ न लगा हो, टूटा-फूटा न हो, पूर्ण गोल न हो । सही बात है कि रुद्राक्षों का अपना एक अलग ही महत्व है….

कमलेश अग्रवाल

अधिकमास क्यों ?

14 अगस्त

प्राचीन काल में दिन, माह और वर्ष की अवधियों की अधूरी जानकारी होने के कारण कैलेंडरों का वास्तविक घटनाओं से मेल नहीं बैठता था । इसलिए समय-समय पर उनमें ज्योतिषियों या शासकों या धर्माचार्यों द्वारा सुधार किए जाते रहे हैं ।

प्रकृति की जिन निश्चित घटनाओं से मनुष्य का आरंभ से ही गहरा सरोकार रहा है वे हैं –

१. रात-दिन का चक्र

२. चंद्र की घटती-बढ़ती कलाओं का चक्र और

३. ऋतुओं का चक्र

इन तीन घटनाओं से काल की तीन प्राकृतिक कालावधियाँ  क्रमशः दिन, माह और वर्ष सुनिश्चित होती हैं । कैलेंडर की प्रमुख समस्या है, उपर्युक्त तीनों संबंधों के बीच समन्वय स्थापित करना । इसलिए एक व्यावहारिक कैलेंडर के निर्माण का होना अति आवश्यक है जिस में नीचे दी हुई बातों पर गौर करना जरुरी है….

१) वर्ष और महीने में दिनों की संख्या का पूर्णाकों में होना

(२) वर्षारंभ और मासारंभ के दिन का सुनिश्चित होना

(३) एक सुनिर्धारित संवत का होना

(४) अगर चाँदमास को रखना हो, तो सौर वर्ष के साथ उसका संबंध बिठाना

इन बातों का ध्यान रखते हुए ही हमारे भारत में साल और मास की गिनती दो तरह से की जाती रही है | जब ये गिनती सूर्य की गति को घ्यान में ले कर की जाती है  तो उसे सौर्यवर्ष कहते हैं और जब गिनती चंद्रकी गति के अनुसार की जाती है तब उसे चंद्रवर्ष कहते  हैं | हमारे देश में मांगलिक कार्य, त्यौहार आदि चंद्रवर्ष पर आधारित केलैंडर के अनुसार मनाये जाते हैं | चंद्र की सोलह कला को ध्यान में रख कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष बनाये गये हैं | जब चंद्र की कला 15 दिनों तक बढती है तब शुक्ल पक्ष माना जाता है और जब उन का धीरे-धीरे 15 दिनों तक क्षय होता है उसे कृष्ण पक्ष माना जाता है | इस तरह कुल मिलाकर चंद्रमास साढे उन्न्तीस(29.5) दिन का होता है | मतलब कि पूरा चंद्रवर्ष 354 दिन का हुआ | पर सौर्यवर्ष के अनुसार एक साल 365 दिनों का होता है क्योंकि सूर्य को पृथ्वी की परिभ्रमणा करने में 365 दिन लगते हैं | इन 11 दिनों के अंतर को पूरा करने में करीब तीन साल लगते हैं | इस अधिकमास के कारण चंद्रवर्ष,सौर्यवर्षके समान हो जाता है | इसी वजह से अधिकमास तीन साल के बाद ही आता है |

इस वर्ष अधिकमास 18 अगस्त से शुरु हो रहा है जो कि 17 सितम्बर 2012 को खत्म होगा | अधिक मास में सूर्य की संक्रांति (सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश) न होने के कारण इसे ‘मलमास’ भी (मलिन मास ) कहते हैं | कहते हैं कि भगवान कृष्णने  इसका स्वामित्व स्वीकारकर अपना पुरुषोत्तमनाम इसे प्रदान किया था इसीलिये इसे पुरुषोत्तम-मास के नाम से भी जाना जाता है | हमारे आचार्यों के मुताबिक ऐसा माना गया है कि भगवान श्री पुरुषोत्तम( कृष्ण) ने स्वयं कहा है कि  अधिकमास के महत्व को जानो | भगवान श्री कृष्ण इस मास की व्रत विधि एवं महिमा को बताते हुए कहते हैं , “इस मास में मेरे उद्देश्य से जो स्नान दान जप होम स्वध्याय, पितृतर्पण तथा देवार्चन किया जाता  है , वह सब अक्षय हो जाता है | जिन्हों ने प्रमाद से मल मास को खाली बिता दिया , उनका जीवन मनुष्य लोक में दारिद्र्य , पुत्रशोक तथा पाप के कीचड़ से निन्दित हो जाता है इसमें संदेह नहीं |” 

यही कारण है कि इन कथन में विश्वास करनेवाले भक्तगण इस मास में भगवान के मंदिर , जलाशय या नदी में अथवा तुलसी , पीपल आदि जैसे परम पूज्यनीय वृक्षों के सम्मुख दीप-दान करते हैं ; इस उद्देश्यसे की उनकी सब मनोकामनाएं इश्वर-कृपा से पूर्ण होगी , दुःख शोकों का नास होगा, वंश दीप में वृध्धि होगी , प्रभुका सान्निध्य मिलेगा तथा रोगों से मुक्ति मिलेगी | हमारे ग्रंथो के मुताबिक माना जाता है कि प्रति तीसरे वर्ष में पुरुषोत्तम मास के आगमन पर जो व्यक्ति श्रद्धा- भक्ति के साथ व्रत , उपवास , पूजा आदि शुभकर्म करता है , निःसंदेह वह अपने समस्त परिवार के साथ त्रिलोक में पहुँच कर प्रभुका सानिध्य प्राप्त करता है |

धर्मग्रंथके अनुसार अधिक मास (मलमास) में फल-प्राप्ति की कामना से किए जाने वाले समस्त नैमित्तिक कर्म वर्जित कहे गए हैं | इसमें विवाह, मुण्डन, यज्ञोपवीत, गृह-प्रवेश, गृहारम्भ, नये व्यापार का शुभारंभ, नववधु का प्रवेश, दीक्षा-ग्रहण, देव-प्रतिष्ठा, सकाम यज्ञादि का अनुष्ठान, अष्टका श्राद्ध तथा बहुमूल्य वस्तु, भूमि, आभूषण, वस्त्र, गाड़ी आदि का खरीदना अर्थात् समस्त काम्य (सांसारिक) कर्मों का निषेध किया गया है । अधिक मास में केवल भगवान कृष्ण की प्रसन्नता के लिए निष्काम भाव से व्रत, उपवास, स्नान, दान या पूजनादि किए जाते हैं । अधिक मास में भगवान् विष्णु अथवा श्रीकृष्ण की उपासना, जप, व्रत, दानादि कृत्य करना श्रेस्कर माने गये हैं । 

मतलब कि सौर वर्ष और चांद्र वर्ष में सामंजस्य स्थापित करने के लिए हर तीसरे वर्ष पंचांगों में एक चान्द्रमास की वृद्धि कर दी जाती है । इसी को अधिक मास या अधिमास या मलमास कहते हैं । अब आप को पता चल ही गया होगा कि अधिक्मास क्यों आता है ? उसका धार्मिक महत्व क्या है ? 

अगर आप को मेरा ये लेख पसंद आया हो तो आशीर्वाद दिजीयेग…

कमलेश अग्रवाल

एक छोटा सा उपहार सखी आप के लिये…..

7 अगस्त

( आज मेरी एक अजीज सखी राजेश्वरी उर्फ राजु का जन्म-दिवस है ,उसी को अर्पण है मेरी ये कवित…..अगर आप को पसंद आये तो आशीर्वाद चाहूंगी…)

 जो कीमती न भी हो, फिर भी सबसे अलग हो…

इस विशेष दिन की कुछ अलग ही गरिमा हो…

सोच रही हूं बैठे-बैठे

क्या उपहार दूँ आज मैं तुम्हें…

अपनी सदाबहार हंसी से,

तुम्हारी पुरानी यादों को कैसे दूर हटाऊं ?

तुम्हारे मन के सबसे सुन्दर कोनें में,

कैसे मैं प्यार के फूल खिलाऊं ?

सोच रही हूं बैठे-बैठे

क्या उपहार दूँ आज मैं तुम्हें…

हज़ारों  रंगों के सुरों की लडियों से,

रोशन कर दूं मन तुम्हारा,

या अन-गिनत पुष्पों की बगियां महेका कर…

सुगंदित कर दूं  अंतर तुम्हारा..!!

सोच रही हूं बैठे-बैठे

क्या उपहार दूँ आज मैं तुम्हें…

अब कौन सा राग छेड़ दूँ ,

तुम्हारे मन-तारों पर बजने हेतु ?

बजता रहे एक अद्‍भुत संबंध का,

अद्‍भुत संगीत जीवन भर…..

सोच रही हूं बैठे-बैठे

क्या उपहार दूँ आज मैं तुम्हें…

कौन सी कलाकृति उकेर दूँ ,

तुम्हारी हथेलियों पर….?

बदल जायँ सारी रेखाएँ तुम्हारी,

और उनमें चूपके से दिख जाये प्रेम मेरा…

सोच रही हूं बैठे-बैठे

क्या उपहार दूँ आज मैं तुम्हें…

मेरे घर जाने के बाद भी,

तुम सोचती रहो मेरे ही बारे में……

कौन दे गया प्यार मुझे…..?

इस कविता रुपी उपहार के बहाने से…..

सोच रही हूं बैठे-बैठे

क्या उपहार दूँ आज मैं तुम्हें…        

                     

कमलेश अग्रवाल

दोषी कौन ?

7 अगस्त

मंहगाई, गरीबी, कालाबाजारी, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार आदि समस्यायों के लिये कौन दोषी है ? मंहगाई क्यों दिन-प्रतिदिन सुरसा की तरह बढी जा रही है ? आज हर जगह भ्रष्टाचाट पंख फैलाये खडा नजर आ रहा है, क्यों ? गरीबी देश की गरिमा पर सवाल उठाये खडी है ,क्यों ? ये सारे प्रश्न बार-बार हमारे देश  में क्यों उठ रहे हैं ? इन सवालों के उत्तर ढूंढने की  कौशिश क्यों नहीं की जा रही है ? अगर कोई इन सवालों के जवाब तलासने की कौशिश करता भी है तो उसे क्यों कुचलने पर कुछ देशवासी आमदा हो जाते हैं ? आखिर इस के लिये दोषी कौन है ?

अचानक भीतर से आवाज सुनाई दी  स्वंय तुम ही हो दोषी | क्या मैं हूं दोषी !! कैसे ? सुनना चाहते हो तो सुनो | क्योंकि तुम्हारी भौतिक सुख-सुविधा की भूख बढती गई, बढती गई, निरंतर बढती गई  | तुममें से दिन-प्रतिदिन त्याग की भावना धटती गई | तुलनात्मक जिंदगी जीना तुम्हें रास न आया | ईमानदारी को तुमने ताक पर रख दिया और येन केन प्रकारेन धन ईकठ्ठा करने में अपनी शक्ति और समय को लगा दिया | इस कारण तुम्हारी आवश्यकताएं बढती गईं और उनकी पूर्तिके लिये तुम गलत रास्तों पर चल दिये | अब तो तुम भी समझ ही गये हो..मैंने तुम्हें दोषी क्यों कहा ?”

ये सब सुन मैं सोच में पड गई | मन ने कहा बात में सच्चाई तो है | अगर हर देशवासी अपनेआप पर नियंत्रण रखे , त्याग की भावना रखे , अपने दिल में देश-प्रेमको जगह दे , अपनेआप से वादा करे कि कुछ भी हो, रिश्वतका सहारा कभी न लूंगा…तब भ्रष्टाचार तो खुद-ब-खुद दम तोड देगा | अगर हमारी आवश्यकतायें ही घट जायेंगी तो खर्च अपनेआप ही सिर नीचा कर लेगा | अगर हम अपनेआप में त्याग की भावना को अपनालें तो इमानदारी का जन्म सरलता से होता दिखाई देगा , त्याग से दूसरो की पीड़ा का एहसास भी होगा और नतीजतन गरीबी भी दम तोड देगी | सामाजिक परिवर्तन सहज ही आता दिखाई देगा | एक नये राष्ट्रका निर्माण सहजता से संभव हो पायेगा |

मेरा मानना है कि अगर ऊपर की बातों पर हर देशवासी ध्यान दे तो न तो कोई आंदोलन की जरुरत रहेगी और ना ही अस्त्र-शस्त्रकी | त्याग और ईमांदारी से बढ़कर दूसरा कोई सामाजिक परिवर्तन सा शस्त्र नहीं हो सकता |  इन बातों के साथ अगर हम देश-प्रेमकी भावना को भी अपने अन्दर पैदा कर लें तो किसी सरकार या संसद की गुलामी हमें बरदास नहीं करनी पडेगी | आप का क्या मानाना है ? आप के उत्तर की प्रतिक्षा रहेगी |

जयहिंद…..

 

कमलेश अग्रवाल

आसान नहीं होता अपनी बात पर अडिग रहना….

6 अगस्त

जब आप लीक से हटकर कुछ अलग करना चाहते हैं तो आपको उसकी कीमत चुकानी पडती है । इस  कारण हम काफी तनाव भी अनूभव करते हैं ,इससे निकलने का एक ही तरीका है- जिद । जिस के चलते नामुमकिन को भी मुमकिन बनाया जा सकाता है । जिद्दी और जोशीले लोगों को चुनौतियां स्वीकारना बहुत अच्छा लगता है । जिद्दी व्यक्ति और उसके मजबूत इरादों के सामने दुनिया भी घुटने टेकने को मजबूर हो जाती है । जिद के साथ कहीं न कहीं अपनों का प्यार और उनकी भावनाएं अगर जुडी हो तो सोने में सुहागे का काम होता दिखाई पडता है । कई बार ऐसा भी देखा गया है कि कई लोग हमें दुख पहुंचाने का या हमारे साथ बुरा बर्ताव करने का कार्य बेवजह ही कर जाते हैं , जो बाद में हमारी भलाई बन सामने आते नजर पडते हैं । क्योंकि ऐसी बातें सुनकर हमारा सोया हुआ जमीर जाग उठता है और फिर हम कई ऐसे मुश्किल काम भी कर गुजरते हैं, जिनके बारे में आमतौर पर सोचना भी हमारे लिये असंभव सा था ।  निर्धन परिवार में जन्मे एडिसन  ट्रेन में अखबार  बेच कर गुजारा करते थे । बिजली के बल्ब का आविष्कार करने के दौरान उनके सौ से भी ज्यादा  प्रयास विफल हुए थे । उस वक्त लोगों ने उनका बहुत मजाक उडाया था और उन्हें भविष्य में ऐसा न करने की सलाह भी दी थी, पर उन्होंने हार नहीं मानी । अंतत:  जब बल्ब की रौशनी से दुनिया जगमगा उठी तो लोग हैरत में पड गए । एडिसन का अपनी बात पर अडिग रहना और अपनी कोशिशों को जारी रखने पर यकीन करना ही उन्हें इस मुकाम तक ले आया । इसीलिए कहा गया है कि जिसके इरादों में सच्चाई हो, उसे दुनिया की कोई भी ताकत झुका नहीं सकती ।

हमारी इच्छाशक्ति ही हमारी सबसे बडी पूंजी है । कईबार देखा गया है कि अगर कोई व्यक्ति लीक से हट कर कुछ भी करना चाहता है, तो उसके आसपास के लोग उसे सहजता से स्वीकार नहीं पाते और वे ऐसे व्यक्ति को सनकी कह उनका मजाक उडाते हैं । अडियल या सनकी होने में कोई बुराई नहीं है अगर हमारा दृष्टिकोण सकारात्मक हो । कईबार हमारा जिद्दी व्यवहार का होना ही हमसे असंभव को संभव करवा देता है ,तो कईबार हमारा अपमान कर के, कई नादान लोग हमें ऊंचाईंयों पर ला बैठाते हैं । जरा सोचिए कि अगर तुलसीदासजी ने अपनी पत्नी रत्नावली की बात दिल पर न लगाई होती, तो आज क्या हिंदी साहित्य में श्रीरामचरितमानस जैसे महाकाव्य की रचना हो पाती  ? अगर दक्षिण अफ्रीका के पीट्मेरीज्बर्ग स्टेशन पर उस टीटी ने बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी का सामान ट्रेन की फ‌र्स्ट क्लास की बोगी से बाहर न फेंका होता, तो क्या आज भारत स्वतंत्र होता ? शायद इतिहास कुछ और ही होता ।

अपनी ही धुन में लगे रहने वाले ऐसे धूनी और कर्मठ लोगों को अपने शुरुआती दौर में अकसर आलोचना का सामना करना पडता है, लेकिन उन पर ऐसी नकारात्मक बातों का कोई असर नहीं होता । बाद में दुनिया को उनकी काबिलीयत की पहचान होती है और वे सुपर हीरो बन जाते हैं । कारण साफ है कि वे अच्छे पहलूओं पर ही अपना लक्ष्य रखते हैं , दुनिया उनके बारे में क्या सोच रही है उस पर वे गौर ही नहीं करते । कई बार  ऐसा भी होता है कि अपनी मंजिल को पाने की जिद में इंसान को दुनियादारी से कटना पडता है और कईबार अचानक आये दु:ख से बाहर आने के कारण भी उसे नई राह ढूंढनी पडती है । शायद इसीलिये हैरी पॉटर जैसे बेस्ट सेलर सिरीज की लेखिका जे.के. रॉलिंग ने तलाक के बाद अपनी बेटी को पालने के लिए लिखना शुरू किया । अपने घर के उदास माहौल से बाहर निकलकर वे कॉफी हाउस जातीं और वहां बैठकर घंटों लिखती रहतीं । आज हैरी पॉटर की लोकप्रियता, उनकी उस कडी मेहनत का नतीजा ही तो है !! उनकी लगन, कुछ कर बताने की जिद्द ही ने तो उन्हें इस मुकाम तक पहूंचाया !!

जब भी दृढ इच्छाशक्ति की बात निकलती है तो दुष्यंत कुमार का यह शेर मुझे बरबस ही याद आ जाता है-

क्यों आकाश में सूराख हो नहीं सकता ?

एक पत्थर तबीयत से उछाल कर तो देखो यारों..।

बिहार के गया जिल्ले के छोटे से गांव गहलौर के दलित मजदूर दशरथ मांझी की जिद के आगे पर्वत को भी झुकना पडा । उन्होंने राह रोकने वाले पहाड का सीना चीर कर 365  फीट लंबा और 30  फीट चौडा रास्ता बना दिया । दरअसल पहाडी का रास्ता बहुत संकरा और उबड-खाबड था । उनकी पत्नी उसी रास्ते से पानी भरने जाती थीं । एक रोज उन्हें ठोकर लग गई और वे गिर पडीं । पत्नी के शरीर पर चोट के निशान देख दशरथ को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने उसी दम ठान लिया कि अब वह पहाडी को काटकर ऐसा रास्ता बनाएंगे, जिससे किसी को भी ठोकर न लगे । बस फिर क्या हुआ ? दशरथजी हाथों में छेनी-हथौडा लेकर पहाड काटने में जुट गए । तब लोग उन्हें पागल और सनकी समझते थे कि कोई अकेला आदमी पहाड काट सकता है भला !! पर उन्होंने अपनी जिद के आगे किसी की नहीं सुनी । उनकी इस कोशिश के कारण ही तो, आज हम बेहद लंबे घुमावदार पहाडी के इस छोटे और सुगम पथ का मझा ले रहे हैं । अब दशरथ तो इस दुनिया में नहीं हैं, पर वह रास्ता आज भी हमें उनके जिद्दी और जुझारू व्यक्तित्व की याद दिलाता है । उनकी इस दृढ इच्छाशक्ति को सम्मान देते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपने कर्मचारियोंके लिए दशरथ मांझी पुरस्कार की शुरुआत भी की है ।

सच, लाचारी भरी शांति से तो ऐसा गुस्सा हजार गुना बेहतर है, जिसके कारण जिद्द हम पर हावी हो और हम देश और समाज का भला अनजाने में, अपनी जिद्द के चलते ही कर दें । कभी आप भी कोई ऐसी ही जिद्द करके देखें…हो सकता है कि आप ” आसान नहीं होता अपनी बात पर अडिग रहना….” को सहज बना दें ।

कमलेश अग्रवाल