Archive | सितम्बर, 2012

ऐसा भी होता है…….!!!

28 सितम्बर

21978 को 4 से गुणा करने पर जो संख्या प्राप्त होती है वह है – 87912. अब जरा इस संख्या को उल्टा करके ( आखिरी अंक से शुरू करके) पढ़िए  …..

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कौनसी संख्या प्राप्त हुई ?

 

जापान का ओकिनावा द्वीप एक ऐसी जगह है जहां 450 से ज्यादा ऐसे व्यक्ति रहते हैं जिनकी उम्र 100 वर्ष से भी अधिक है. यह स्थान दुनिया में सबसे ज्यादा आरोग्य कर स्थान के रूप में भी जाना जाता है.

 

मनुष्य के शरीर के अन्य भागों की अपेक्षा दाढ़ी के बाल सबसे तेज गति से बढ़ते हैं. यदि कोई मनुष्य जिंदगी भर हजामत नहीं करवाए तो उसकी दाढ़ी के बाल 30 फीट तक लंबे हो सकते हैं.

 

सुन्दर व सेक्सी महिलाओं से बातें करना पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक है. कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में किये गए एक अध्ययन के अनुसार  सुन्दर दिखनेवाली किसी लड़की के साथ  रोजाना 5 मिनट व्यतीत करना ही पुरुष के मानसिक स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने के लिए पर्याप्त हैं.

ऐसा भी होता है……!!!

(http://gustakhimaaf.com  से लिये गये हैं ) 

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हिंदी कल, आज और कल

18 सितम्बर

( हिंदी पखवाडे के कारण हमारे संस्थान में निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था जिस में उपर्युक्त विषय रखा गया था…सो मैं ने यहां इस विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किये हैं…पसंद आने पर आशीर्वाद दिजीयेगा…)

 विषय का मतलब है  ‘बीता हुआ कल, आज और आने वाला कल’ । 

पिछले  ५०० से ज्यादा वर्षों तक हमारे देश की भाषाएँ हिदीं, प्राकृत ,संस्कृत, फारसी, उर्दू और अंग्रेजी रही | कारण ये रहा कि  पूरा भारत अलग-अलग क्षेत्रोंमें बटा हुआ था और कई राजाओं या बादशाहओं के नियंत्रण में था और हर राज्य एक अलग ‘देश’ था इस कारण कभी उर्दू, कभी फारसी तो कभी संस्कृत भाषाओं का चलन रहा । उसके बाद अंग्रेजों की गुलामी का दो सौ साल लंबा दौर चला और अंग्रेजी को हम पर लाद दिया गया ।

अंग्रेजी का गुणगान करने वालों को शायद मालूम नहीं कि आज से केवल 800 वर्ष पूर्व, तेहरवीं शताब्दी तक विश्व में अंग्रेज़ी नाम की कोई भाषा नहीं थी । अंग्रेजी के जन्म से चार सौ वर्ष पूर्व हिन्दी भाषा ने अपने साहित्यिक इतिहास का सवर्णमय ‘वीर-गाथा काल’ समाप्त कर के ‘भक्ति-काल’ में प्रवेश कर लिया था । पृथ्वीराज-रसो, वीसलदेव-रासो, और पद्मावत आदि महाकाव्य लिखे जा चुके थे। 

भारत कथा साहित्य का जनक देश है । भारत रचित कथायें  आज विश्व के दूर दराज़ देशों की सभी भाषाओं और शैलियों में प्रचिलित हैं, लेकिन सुनने और पढने वालों को उन के मूल के बारे में कोई जानकारी नहीं है ।  पाश्चात्य साहित्यकारों को संस्कृत भाषा की औपचारिक जानकारी अठाहरवीं शताब्दी में मिली थी जिस के पश्चात उन को भारत की साहित्यक प्रतिभाओं का ज्ञान हुआ था । लेकिन साहित्य का हस्तान्तरण श्रुति के आधार पर इस से पूर्व ही हो चुका था । मतलब साफ है कि हिंदी बेहद प्राचीन और समृध्ध भाषा थी इस बात से नकारा नहीं जा सकता । रामायण, महाभारत तथा पौराणिक कथाओं के अतिरिक्त, भारत के लोक गायक नल-दमयन्ती, राजा भर्तरि, आल्हा-उदल आदि के प्रेम, विरह, और शौर्य की गाथायें जमाने से प्रचलित हैं जो इस बात की पूरक है कि हिंदी का अतीत बेहद गौरवशाली रहा है । 

भारतीय लेखक समाज सुधारक तो थे ही साथ ही साथ वे भाषाविद भी थे और आज भी हमारे लेखक उसी परम्परा पर चल रहै हैं । उन की लेखन शैली में नैतिकता की प्रधानता आदि-काल से रही है । भाषा और संस्कृति सिक्के के दो पहलू के समान है | यह सनातन सत्य हैं कि दुनिया के 43 .7  करोड़ से ज्यादा लोग हिन्दी भाषा में बात करते हैं |  हमारे देश की विविध भाषाएँ और विदेशी भाषा से भी हिन्दी में विपुल मात्रा में अनुवाद हुए हैं |  मगर हमारी भाषाओँ में से इसके मुकाबले बहुत कम अनुवाद विदेशी भाषाओँ में हुए हैं | इसी कारण हमारे पास संस्कृति-साहित्य का अटूट खज़ाना होने पर भी हम अपनी भाषाओँ को विश्व के सामने  उच्च स्तर और विपुल मात्र में नहीं रख पाये हैं । 

शायद इस के पीछे राजनितीज्ञों की  नीति-अनीतियां तथा स्वार्थपूर्ण रवैया ही रहा होगा जिसके चलते  जनमानस में दुविधा बढ़ती गई और राष्ट्रीय एकता समान हिंदी भाषा की माला के मोती बिखरते ही रहे….बिखरते ही रहे और हिदीं अंग्रेजोंकी गुलामी तले दम तोडती रही |

गुलामी से तंग जनता ने स्वतंत्रता आंदोलन चलाया, बलिदान दिये और कई असफल प्रयासों के बाद अंतत: स्वतंत्रता प्राप्त की और 14 सितंबर 1949 में संविधान में हिंदी राष्ट्र्भाषाके रुप में चुनी गई । पर सिर्फ दर्जा मिल  जाने से तो काम नहीं बनता…!! अंग्रेजीसे लिप्त लोगों को अपनी ही भाषा में काम करने में परेशानी आने लगी । सो अंग्रेजी को भी स्वीकृती दे दी गई, यहीं हमारे राजनेताओं से चुक हो गई…अगर तभी हिंदी को सरकारी कामकाज की भाषा के रुप में रख दिया जाता तो आज हमें हिंदी दिवस पर ये कहना नहीं पडता कि “ ज्यादा से ज्यादा काम हिदीं में करो….। ” किसी भी देश की अपनी एक अलग राष्ट्रभाषा होती ,सरकारी कामकाज के लिये राजभाषा भी होती है |  जिसके गौरव के बारे में हर एक आदमी सोचता हो, यही उस भाषा के अस्तित्व के बारे में प्रमाण सिद्ध करने का जरीया होता है | हम ऐसा करने में चूक गये..!!

ब्रिटिश कालीन शासन के यंत्रणा भरे दौर से स्वातंत्र्योपरांत हमें हिन्दी पत्रकारिताके फलने-फूलने का पर्याप्त अवसर मिला । पत्रकारिता का नया दौर शुरु हुआ । हिदीं का प्रचार होना शुरु हुआ और  फिल्म उद्योग ने उसे बढावा दिया जिस के द्वारा  हिन्दी आज सभी प्रान्तों में घर की भाषा हो गई  | हिन्दी के बलबूते पर ही फिल्म सिर्फ मनोरंजन का साधन मात्र न रहकर हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन गई है ! 

आज भारत विश्वस्तर पर विकास की ऊंचाईयां सर कर रहा है । इसी कारण, अमरिका में कईं  सालों से हिन्दी के प्रति आदर-सम्मान देखा जाता रहा है |  वहां की 27 से ज्यादा विश्वविद्यालयों में हिन्दी अभ्यास के लिए सुविधा रखी गई है | अपने देश को समृद्ध करने के लिए भी उन्हों ने हिन्दी और संस्कृत भाषा का बड़ी मात्रा  में उपयोग करना शुरू किया हैं | ‘वेबस्टर’ की ‘न्यू वर्ल्ड कोलेज डिक्शनरी’ में भारतीय भाषा के शब्दों को शामिल करके ‘हेल्लो’, ‘हाय’  के  बदले  ‘नमस्कार’  शब्द चमकता हुआ दिखाई पड रहा  है |  ‘हरिजन’ शब्द के अर्थ में बताया गया हैं कि – “भारत में वह अछूत थे और बाद में अनुसूचित जातिओं में शामिल किये गए |” ये सब बातें क्या साबित कर रही हैं ? यही कि हिदीं का भविष्य उज्जवल है | क्योंकि हम जानते हैं कि देश की उन्नति उसके विकास पर निर्भर है और जो भाषा ग्राहकों को आसानी से  समझ में आयें वो ही सफलता दिला सकती है |चीन और जापान इस के जीते-जागते उदाहरण हैं  |   जिन देशों में अंग्रेजी का प्रभुत्व हैं ऐसे देशों से तो हम आयात कर ही रहे हैं और जिन देशों में हिन्दी का उपयोग हो रहा हैं उस में भी हमारे देश से उत्पाद की निकास हो रही है |  मतलब साफ़ हैं कि हिन्दी के कारण ही हमारी विदेशी मुद्रा में बढ़ोतरी होती दिख रही है |   

वर्तमानयुग सायबर युग है जिसमें कंप्यूटर का बोलबाला है | इस को समझकर ही आज हिंदी सोफ्ट्वेर की बाढ आ गई है | हिदीं ब्लोग व हिदीं वेब-साइट का चलन बढता जा रहा है | तकनीकी ने हिदीं को आगे  बढाने में अपना पूर्ण योगदान देना आरंभ कर दिया है |

मुझे पूर्ण विश्वास है कि आनेवाले कल में हिदीं का बोलबाल होगा | विश्वमें वही दिखाई देगी और भारत फिर अपनी अस्मिता को प्राप्त करेगा ;सोने की चिडिया का बिरुद वापस ले कर रहेग.. अगर हम इन नीचे दिये उपायों पर गौर करें तब…

मेरी समझ में हिन्दी को स्थापित करने तथा उसके उत्थान के उपायों के लिये इतना तो हम कर ही सकते हैं :

1.प्रत्येक परिवार में माता-पिता या अभिभावक अपनी मातृभाषा या हिन्दी में ही वार्तालाप करें और बच्चों के साथ घर में सदा-सर्वदा हिन्दी में ही बोले अर्थात हिन्दी का वातावरण बनाये रखें।

2. प्रवासी भारतीय विदेशों में जहाँ भी रहें, जिस स्थिति में भी रहें, भारतीय संस्कृति के आदर्शों  तथा मूल्यों से पूर्ण साहित्य का पठन-पाठन करें व करायें।

3. विदेशों में बच्चों के लिए हिन्दी पाठशालाओं में हिन्दी पढ़ाने का प्रबंध करावें। चाहे द्वितीय या तृतीय भाषा के रूप में ही क्यों न दो पाठयक्रम में स्थान दिलावें।

4. भारतीय बहुल नगरों शहरों व कस्बों में हिन्दी ग्रंथालय तथा वाचनालय स्थापित करें, प्रमुख पत्रिकाएँ मंगवाकर सब को सुलभ करावें। हिन्दी में रचित उत्तम साहित्य तथा विज्ञान संबंधी पुस्तकें मंगवायें अथवा दूतावास के माध्यम से उपलब्ध करावें।

5. भारतीय पर्व व त्यौहार अवश्य निष्ठापूर्वक मनाकर उनके महत्व पर व्याख्यानों का आयोजन करें।

6. हिन्दी की विविध विधाओं पर प्रतियोगिताएँ चलाएँ तथा विजेताओं  को पदक पुरस्कार प्रदान कर प्रोत्साहित करें।

7. समय-समय पर गोष्ठियों, परिसंवादों, समारोहों, सम्मेंलनों तथा सभाओं का आयोजन करके अपने ज्ञान की वृद्धि करें और हिन्दी भाषा के प्रतिममत्व आकर्षण तथा श्रद्धा-भाव पैदा करें।

8. विभिन्न भारतीय भाषाओं तथा साहित्यों के आदान प्रदान-अनुवाद इत्यादि का प्रबंध हो। ताकि विभिन्न भाषा भाषी भारतीयों के बीच सद्भाव, सौमनस्य एवं सौजन्य के अंकुर फूटे।

9.  पिकनिक, सांस्कृतिक कार्य भी संगीत, नृत्य नाटक एवं चित्रकलाओं के प्रदर्शन भी हिन्दी के उत्थान में सहायक हो सकते हैं।

10.  इन सब से बढ़ कर महत्वपूर्ण कार्य यह होना चाहिए कि दादी-नानी के माध्यम से ही नहीं, माता-पिता तथा भारतीय समाज के लोग भारतीय साहित्य, कला, वैभव, इतिहास आदि का बच्चों के बोध करावे तथा अपनी मातृभूमि प्रति श्रद्धा-भक्ति उनके हृद्यों में  उदित हो सके।  

तेलुगु के महा कवि आचार्य रायप्रोलु सुब्बाराव ने अपने एक राष्ट्रीय गीत में यह उद्बोधन किया है-

देश मेगिनाएवं कालिडिना, पोगडरा भी तल्ली भूमि भारतीनी। अर्थात्….

तुम किसी भी देश में जाओ, जहाँ भी कदम रखें, अपनी मातृसदृश भारत भूमि की प्रस्तुति करना न भूलो।

अगर हम ये कर पायें तो हिदीं के भविष्य की उन्नति को क्या कोई रोक सकेगा ? या रोकने में सफल हो पायेगा ? आनेवाला कल हिदीं के उन्नत होने का ही है , इस में कोई किंतु-परंतु की गुंजाईश ही नहीं…!! आप की क्या सोच है इस पर…? जरुर बताईयेगा…

जय भारत….

कमलेश अग्रवाल

इंटरनेट से जीवनशैली में बदलाव

15 सितम्बर

एक समय था जब हम किसी  भी  प्रकार  की  जानकारी  के  लिये  पुस्तकालयों में  जा कर  पुस्तकों को  खोजते या पत्र- पत्रिकाओं का सहारा लेते  थे, पर समय  बदला , संचार साधनों का(मोबाईल,कंप्युटर,लेपटोप,टेबलेटइत्यादि)  आविष्कार हुआ और इस  के  चलते घर  बैठे  ही  जानकारी उपलब्ध करने  की  सुविधा  इंटरनेट ने  हमें दे  दी  ।  इंटरनेट  के  माध्यम से  हम  घर  बैठे – बैठे  ही दुनिया  के  हर  कोने  की  जानकारी  प्राप्त कर  सकते  हैं । आज  बच्चे  से  ले  कर  बूढ़े  तक इंटरनेट के  बारे में जानते  हैं । गांव हो, शहर हो , जिल्ला हो या कस्बा हो, हर  जगह  सायबर  काफे  खुल  चुके  हैं ।

भारत में 15 अगस्त 1995 में इंटरनेट ने दस्तक दी थी, तभी से हमारी जानकारी का दायरा  बढ़ता चला गया और हमें मिलने वाली सेवाओं  का विस्तार होता दिखाई दिया;  इस कारण जीवन सरल बना नजर आ रहा  है । आज की  आपाधापी, भागदौड़ और व्यस्त जीवन में इंटरनेट एक अल्हाद्दीन के चिराग का जिन साबित हुआ  है । आज चाहे सामाजिक कार्य  हो, आर्थिक कार्य हो या स्वास्थ्य की जानकारी की बात हो , इंटरनेट आप  की सहायता के लिये हाजिर है । यह आप का घरेलू नौकर है, आप  के  अकेले पन का साथी  है, आप का वफादार खबरी भी है इतना ही नहीं आप का निजी डाकिया भी है..!!

यही वजह है कि आज किसान हो या मजदूर , मरीज हो या यात्री, छात्र हो या नौकरीपेशा , कारोबारी हो या कर्मचारी, गृहिणी हो या काम-काजी महिला सभी के जीवन में इस ने सुविधा,सूचना,ज्ञान व मनोरंजन रूपी क्रांति ला दी है । फ़सलों के लिये खरीद-बिक्री हो, उत्पादन के लिये कच्चे माल की जानकारी  मुहैया करनी हो , बच्चे के लिये स्कूल,विश्व-विद्यालय या महा – विद्यालयों में दाखिला  लेना  हो, इंटरनेट आप की सेवा में उपस्थित है । युवा को नौकरी के लिये तलाश करनी है, आवेदनपत्र भेजना है, या उस नौकरी के लिये कोई जानकारी चाहीये तो ये सेवक आप के लिये हाजिर है । इतनी सारी सुविधा उपलब्ध हो तो जीवनशैली में बदलाव तो आना ही है…!!

इंटरनेट के कारण हर क्षेत्र में हम ने बदलाव महसूस किया है । आज अगर कहा जाये कि ये सर्व व्यापक, सर्व शक्ति संपन्न है तो गलत न होगा । ये बात शहरी जीवनशैली पर तो सही बैठती है । रसोईघर से दफ्तर तक, रास्ते से खेल के मैदान तक , बाजार से लेकर अस्पताल तक इसका दबदबा दिखाई दे रहा है । सामाजिक चेतना का कार्य जो आंदोलन करने में असमर्थ रहे वह कार्य इंटरनेट ने कर दिखाया । अन्ना जी की जंग के सफल होने का श्रेय इसी को जाता है । तमाम अखबार, पत्रिका , पुस्तकें, बाल-साहित्य इत्यादि इस के कारण एक क्लिक से हमें उपलब्ध है । सामाजिक या शिक्षा के क्षेत्र में ये बदलाव क्या कम है ? आज देश-विदेश की सभ्यता, संस्कृति, रहन-सहन, भाषा, खेल इत्यादि का हम कोसों दूर बैठ कर भी आनंद उठा सकते हैं या उससे रूह-ब-रूह हो सकते हैं। इस बदलाव के बारे में क्या हम ने कभी सोचा था ?

इन सब के अलावा हम अपने आप के विचार अपने ब्लोग के माध्यम से देश-विदेश लोगों के दुनिया के किसी भी कोने  लिये रख सकते हैं और दूसरों के विचारों को बेब-साईट के ज़रिये जान भी सकते हैं । विशिष्ट विषयों की शुचि भी बना सकते हैं । आप के बिजली का बिल, जीवन-बीमा की किश्त, बैंक में राशि जमा करवाना, बच्चे के स्कूल या विद्यालय में फीस जमा करना, मेहमानों के अचानक आ जाने पर होटल से घर जैसा खाना मंगवाना, घर बैठे ही सहेली या रिश्तेदारों या अपने बच्चे या पति-पत्नी को कार्ड या उपहार-कैक भिजवाना,रेल टिकिट, हवाई-जहाज की टिकिट,होटल में कमरा बुक करवना आदि भी कार्य घर बैठे ही कर सकते हो । क्या आप ने कभी सपनों में भी इस बदलाव के बारे में सोचा था ?अब इन कामों के लिये न तो कतारों में खडा रहना पडता है और ना ही समय गवाना पडता है..!! 

महिला वर्ग के लिये भी ये काफी असरदार साबित हुआ है ।  वे दुनिया के किसी भी जगह बैठ कोई भी पुरानी या नई फिल्म देख सकती हैं । किसी भी देश का व्यंजन बनाना उस के लिये नामुमकिन नहीं है, बस इंटरनेट खोला और व्यंजन के बारे में जानकारी ली… फिर उसे बनाना  ही तो है..!! संगीत सुनना है, पुरानी सहेली से गपशप करनी है, कोई पुरानी सहेली का पता जानना है, व्रत-त्योहार के बारे में जानना है, उन की विधि या कहानी के बारे में जानना है … इंटरनेट को खोल अपना मकसद पूरा करो…!!  इतना ही नहीं बच्चों की शादी-विवाह के लिये योग्य पात्र ढूंढना हो तो इंटरनेट पर इस की भी सुविधा है, जीवनसाथी.कोम, मेट्रीमोनीयल.कोम,बनीया मेट्रीमोनीयल.कोम इत्यादि मौजूद हैं । इसमें अपने बच्चे का सारा व्यौरा फिड कर दें…बहुत चोईस मिल जायेगी । इतना ही नहीं आप अपने द्वारा पसंद किये पात्र की जन्मकूंडली और पत्रिका मिलान भी कर सकती हैं ,वह भी घर बैठे ही । पंडितजी की कोई दरकार नहीं..! !  वाह इंटरनेट ! आप का तो जवाब नहीं..!!

आप के बच्चे कोसों दूर विदेश में हैं, दादा जी या कोई और रिश्तेदार आखिरी  घड़ी गिन रहे हैं ..कभी भी वे इस दुनिया को छोड़ सकते हैं, साक्षात्कार करवाना लाजिमी है, इंटरनेट इसे भी मुमकिन कर सकता है । बहन के विवाह का आँखों देखा हाल ,अपने होस्टल के कमरे में बैठे-बैठे ही देख सकता है । कई प्रश्न-पत्रों को वहीं बैठे देख कर उसे हल कर ,अपने आप को इम्तिहान के लिये तैयार कर सकता है इतना ही नहीं बिना पुस्तक खरीदे, मन चाही पुस्तक भी पढ़ सकता  है । अपने दोस्तों के साथ विचार विमर्श भी कर सकता है । आज आइ.आइ.टी, आई.आई.एम., आदि प्रोफेशनल संस्थानों में आप के क्लास की जानकारी और कौन शिक्षक क्लास लेंगे,कब क्लास लेगें..ये भी इस इंटरनेट के ज़रिये बताया जाता है । आप को क्या ये सारी  सुविधाएं मिली थीं ? नहीं न । ये बदलाव इस इंटरनेट के ही कारण तो है ।

आज बुज़ुर्गों को हम घर बैठे ही प्रसिद्ध मंदिरों के दर्शन करवा सकते हैं । इतना ही नहीं वे पूजा का आस्वाद भी कर सकते हैं । घर बैठे-बैठे ही उन्हें हम कुछ विदेश में स्थित देवालयों, गिरजा घर, गुरुदारा आदि के दर्शन करवा सकते हैं । अब वे शारीरिक तौर से अशक्त होने पर भी अपने मन की मुराद पूरी कर सकते हैं । विदेश में बसें बच्चों के घर व उन की दिनचर्या भी देख सकते हैं, अपने पोते-पोतियों या दोते-दोतियों को भी देख सकते हैं , इस कारण उन्हें एक सुकून मिलता है । ये बदलाव अतृप्त हमारे घर के आदरणीयों के लिये कम थोड़े ही है ?

आज संयुक्त परिवार टूटते जा रहे हैं और विभक्त परिवार बने जा रहे हैं । आज बच्चों के पास दाद-दादी या नाना-नानी की गोद नहीं है, जिस में बैठ वे परि-कथा या ढेरों बौद्धिक कहानियां  सुना करते थे । ऐसे में इंटरनेट बच्चों के अकेले पन का दोस्त साबित हो रहा है । इस के कारण बच्चे तरह-तरह के खेलों को  खेल सकते हैं । अपने दोस्तों से गपशप कर सकते हैं । अपने होम-वर्क में आई कठिनाई यों को इस के ज़रिये हल कर सकते हैं । इस बदलाव ने इनके अभिभावकों एक सुकून दिया है ।

आज हम घर बैठे ही देश-विदेश के चिकित्सकों  की राय ले सकते हैं । इतना ही नहीं हमें क्या हो रहा है ? ये लक्षण किस बीमारी के हो सकते हैं ? उपाय क्या हो सकते हैं ? अगर हमें चिकित्सक ने दवाई दी है तो उस का कोई बुरा प्रभाव तो न होगा ? इस में कौन से घटक मौजूद हैं ? जो प्रयोगशाला या एक्सरे रिपोर्ट आई है क्या वह सही है ? ये सारी जानकारी हम घर बैठे ही ले सकते हैं व अपने स्वास्थ्य के लिये जीम ,क्लब आदि का भी ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं । है न जबरदस्त बदलाव ?

मेरी स्पष्ट राय है कि इस युग में चाहे बच्चे हो या युवा,पुरुष हो या महिला, उन्हें आधुनिक तकनीकी की जानकारी अवश्य होनी चाहिए, वरना वे जिंदगी की दौड़ में पीछे रह जाएंगे । ये कहना गलत न होगा कि इंटरनेट से दुनिया छोटी हो गई है । इस के कारण हमें दुनिया का कोने-कोने से ज्ञान का अविरत भंडार भी मिल पाया है ।

 हम जानते हैं कि हर चीज के सकारात्मक पहलू के साथ-साथ नकारात्मक पहलू भी जूड़े होते हैं । जहां इंटरनेट ने हमें इतनी सुविधाएं दी हैं वहीं कुछ मुसीबतें भी दी हैं । जितना हम इस का सदुपयोग कर सकते हैं उतना ही उस का दुरुपयोग भी करना नामुमकिन नहीं है । आज कई अनुसंधानों ने एक बात की पुष्टि की है कि इंटरनेट के ज्यादा इस्तेमाल से बच्चे कम आयु में ही स्थूलता का शिकार हो जाते हैं क्योंकि घर से बाहर खेले जानेवाले खेल गिल्ली-डंड, छूपा-छूपी जैसे खेल वे भूल चुके हैं । इंटरनेट पर आक्रामक खेलों को खेलते-खेलते वे अपनी वास्तविक जिंदगी में भी आक्रमक बनते जा रहे हैं । अश्लील फिल्में, अश्लील साहित्य ने उन का बचपन ही छिन लिया है । आज नेट पर बम बनाने से लेकर आतंकवादी प्रवृतियों को कैसे अंजाम दिया जाये ऐसी जानकारी भी उपलब्ध है जिस कारण बच्चे  व  युवा भटक रहे हैं । कम उम्र में ही वे पौढ बनते देखे जा रहे हैं ।

महिलायें परंपरा से विमुख हो रही हैं । रिश्तों का ह्रास  होता जा रहा है । संवेदनाएं घट रही है । निजता बढ़ती जा रही है । घर को अहमियत जितनी मिलनी चाहिये वह मिल नहीं पा रही है । वे टेक्नोंसैवी बनती जा रहीं हैं । इंटरनेट की आदी बन गई हैं ।

पुरुष भी घर आये नहीं कि इंटरनेट खोल कर बैठ गये..!!  वे न पत्नी को या बच्चों को वक्त देते हैं, ना ही घर की जवाबदारी ही उठाते हैं । उन का इंटरनेट पर व्यवसाय करना अगर मुमकिन है , तब तो और भी मुसीबत है । आज नेट के  कारण वे भी कईबार गलत रास्तों पर भटकते देखे जा रहे हैं । कम उम्र की लडकियों को फंसा कर उन की भावना से खिलवाड करना उन के लिये आसान हो गया है। 

आज इंटरनेट के कारण हज़ारों सायबर ठगों के गिरोह सक्रिय हो गये हैं जिन से निपटना मुश्किल है । देश की सुरक्षा में भी सेंध लगती दिखाई दे रही है । कई बैंक अकाउंट  हैक होते सुने जा रहा हैं । इंटरनेट का सहारा ले अश्लील संदेश, अश्लील तस्वीर का सिलसिला बढ़ता जा रहा है । कई बार बच्चे गलत लोगों के चक्कर में फँसते देखे जा रहे हैं । सायबर हैकिंग, स्पैमिंग, वायरस, पोनोर्ग्राफी ,पायरेसी जैसी बदियों का बोलबाला बढ़ता जा रहा है ।

जब भी समाज में ऐसी घटनायें घटती हैं तब विज्ञान को ही दोष दिया जाता है । पर यह तो सरासर गलत ही है । ये तो वह बात हुई कि उस्तुरा हम ने खरीदा,  उस का उपयोग करते वक्त हमारा हाथ बंदर का हाथ साबित हो जाये तो क्या दोष उस्तुरे का माना जाना चाहिए ?

निःसंदेह इंटरनेट ने विकास की नई राह गढ़ी है , लेकिन इस राह पर चलने के लिये, अपनी जीवनशैली को उत्तम करने के लिये हमें सही कदम उठाने होंगे । इंटरनेट से जीवनशैली में आये बदलाव को मद्दे नजर रख ही तो, आज हमारी सरकार मोबाइल, लेपटोप मुफ्त बांटने की बात कर रही है न ..!! अब तो आप भी मान ही गये होंगे कि इंटरनेट से जीवनशैली में बदलाव तो आया ही है….आप का क्या मानना है ? बदलाव के लिये इंटरनेट का आविष्कार हमारी जीवनशैली के लिये बरदान है कि नहीं…जरुर बताईयेग….मुझे आप के जवाब का इंतजार रहेगा…

कमलेश अग्रवाल

हे बप्पा मोर्या, आप के आने का मुझे है इंतजार

14 सितम्बर

दिन गुजरे, गुजर गया पूरा एक साल,

आप के स्वागत का हे प्रभू! मुझे है इंतजार….

पर सोच रही हूं कैसे करुंगी स्वागत आपका ?

न तो है मर्सिडीझ, न ही है कोई और कार !!

कृपा जो हो जाये आप की तो …..

पा जाऊं शायद मैं छोटी सी नेनो कार !!

ले आऊं उस में बैठा कर आप को,

हो जाऊं मैं भी आप की उस ‘कार’ में सवार….!!

घर मेरा छोटा है आज, पर कृपा जो बरसे आप की,

मिल जाये मुझे भी शायद, बडी सी कोठी लाखों की…!!

कर दूं घोषणा, आप के मेरे यहां पधारने की,

अगर मिल जाये स्वीकृती कंप्युटर की, आप के आशीर्वाद से…!!

कर दूं मैं ENTER आप का PROFILE पूरा का पूरा,

हो जाये वाह-वाह आपकी , देवों के देव महदेव भी हो जायें फिदा….!!

आया हो जो आप को पसंद ये मेरा IDEA,

E-MAIL करना मुझे  बप्पाजी , ये है मेरा ID का पता…!!

” astitva53.wordpress.com”

कमलेश अग्रवाल

हर साल ,14 सितम्बर के दिन हम, हिन्दी दिवस मनाते हैं

10 सितम्बर

हिन्दी दिवस पर सरकारी दफ्तर बैनर, पोस्टर, एजेंडा हिंदी में छपवाते हैं,

हर साल ,14 सितम्बर के दिन हम, हिन्दी दिवस मनाते हैं |

हिन्दी दिवस के फंड को,  हम सब प्रतियोगिताओं के माध्यमों से, मिल बांट के खाते हैं,

हर साल ,14 सितम्बर के दिन हम, हिन्दी दिवस मनाते हैं |

हिन्दी पखवाडे  के आगमन का स्वागत, से शान-बान से करते हैं,

हर साल ,14 सितम्बर के दिन हम, हिन्दी दिवस मनाते हैं |

हिन्दी के राजभाषा बनने से लेकर, उसके योगदान की चर्चा भी हम करते हैं,

हर साल ,14 सितम्बर के दिन हम, हिन्दी दिवस मनाते हैं |

मंच पर आसीन मुख्य अतिथि का हिंगलीश  भाषण का लुफ्त उठाते हैं,

हर साल ,14 सितम्बर के दिन हम, हिन्दी दिवस मनाते हैं |

 ‘हिन्दी इज वैरी गुड’ वी हैव आल्वेज स्पीकिंग इन हिंदी’ कहते हुए उन्हें सुनते हैं,

हर साल ,14 सितम्बर के दिन हम, हिन्दी दिवस मनाते हैं |

विदेशी भाषा का सम्मान करते फिरते, अपनी निज राजभाषा को ठुकराते हैं,

हर साल ,14 सितम्बर के दिन हम, हिन्दी दिवस मनाते हैं |

अपनी भाषा की उपेक्षा कर, हर रोज व्यवहार में अंग्रेजी को अपनाते हैं,

हर साल ,14 सितम्बर के दिन हम, हिन्दी दिवस मनाते हैं |

जरा सोच के देखिये, हम में से कितने देशवासी हिंदी को दिल से हैं अपनाते ?

हर साल ,14 सितम्बर के दिन बस यूं ही हम, हिन्दी दिवस मनाते !!

 

कमलेश अग्रवाल(तकनीकी अधिकारी)

 

(इस कविता को आप के समक्ष रखने का मेरा एक ही उद्येश्य है कि मन से हिंदी को अपनाईये सिर्फ एक दिवसीय सम्मान दे, इस राजभाषा की अस्मिता को यों न ठुकराईये…विदेशीभाषा के साथ साथ स्वदेशी भाषा को भी दिल से अपनाईये )

 

*हिंगलीश (अंग्रेजी-हिंदी मिश्रित)

 

 

 

हे नारी……

10 सितम्बर

जीवन के हर क्षेत्रमें अ‍पने  को जोडा,

 अपना अंश नर के रुप में वसुधा पर छोडा,

 सदियों से अपेक्षित जीवन को ओढा,

 अपने कर्तव्यों से कभी न मुख मोडा,

 दहलीज पार कर, (सामाजिक) कुरितियों को तोडा |  

  सच कहूं तो……

 खोई सभ्यता, संस्कृति की, आधार हो तुम,

 युग-धारा के बदलाव की, सुत्रधार हो तुम,

 जगत – जागृति की, सक्षम चेतना हो तुम,  

नारायणी के रुप में , बेहद पूजनीय हो तुम,

 टूटे खंडहर से (भारतीय)मूल्यों का, सागर हो तुम |  

  उठो, जागो, आगे बढो……

 अपने अंदर की अंतनिर्हित शक्ति को परखो,

 युवा-शक्ति की प्रेरणा हो, आर्दश बन बरसो,

 अपनी नारी-शक्ति की गरिमा को पहचानो,

 युग की सरिता हो तुम, इस बात को मानो,

 धूमिल पडी अपनी अस्मिता को जानो |    

हे नारी……

वसुधा पर हरियाली बन छाओ,

परंपरा की गंगा बन, पावनता लाओ,

शील-स्तंभ बन, जीवन को उज्जवल बनाओ,

स्नेह-बगिया बन , रंगबिरंगी फूल खिलाओ,

जगत-जननी बन संसार में अपना अलख जगाओ…..

जगत-जननी बन संसार में अपना अलख जगाओ…..||

 

कमलेश अग्रवाल(तकनीकी अधिकारी)