Archive | अक्टूबर, 2012

ईश्वर की आराधना का सही रुप

19 अक्टूबर

विख्यात लेखक एच.जी.वेल्स अपने मकान की तीसरी मंजिल के एक मामूली से कमरे में रहा करते थे । एक बार उनके मित्र ने पूछा- ‘‘आप साधारण कमरे में क्यों रहते है ?  इस मकान की निचली मंजिल पर तो इससे कहीं अधिक आरामदायक व सुंदर कमरे हैं । आप उनमें से भी तो कोई चुन सकते हैं ?’’ वेल्स ने उत्तर दिया, ‘‘उन कमरों में मेरे नौकर रहते हैं ।’’ 

मित्र आश्चर्य सहीत बोले, ‘‘आपने नौकरों को इतने शानदार कमरे दे रखे हैं  ? क्यों ? लोग आमतौर पर नौकरों को घर का सबसे साधारण कमरा देते हैं ।’’ 

वेल्स ने गंभीरता से कहा-‘‘ मैंने जानबूझकर  ऐसा किया है, क्योंकि कभी मेरी मां भी किसी जमाने में लंदन के एक घर की नौकरानी  थी । वे दिन मुझे याद हैं…..’’

अगर हम इस कहानी को  समझलें तो यकिनन ईश्वरका निवास हमारे हृदय में हो गया है, या हम निश्चिततौर से ईश्वरके करीब आने के लिये प्रथम कदम को रख चूके हैं ये माना जा सकता है । हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि हम सही अर्थों में अब इंसान बन गए हैं । मनुष्य ही तो एक ऐसा प्राणी है, जो अपने ही दुःख से नहीं, बल्कि दूसरों के सुख से भी दुःखी होता है । मतलब की केवल अपने ही दुःखों को दूर करने में लगे रहना सही नहीं है , बल्कि दूसरों के दुःखों को समझने की हर संभव कोशिश करना ही सही मार्ग है ,ना की दूसरों के सुख से इर्षाभाव रखना । इसीलिये हमारे यहाँ सेवा करने को  ईश्वर की आराधना का दर्जा दिया गया है । दुखियों की सेवा ही ईश्वर की सेवा है ।

एच.जी.वेल्स हमारे सामने एक स्वस्थ विचारों के व्यक्तिके रुप में  हैं जिनके पास संतुलित विचार, जागरूकता तथा बुद्धिबल है । इन सभी सदगुणों के बलबूते पर ही वे अपने लक्ष्यको पाने में ,सही मायनों में ईश्वरके आशीर्वाद पाने में कामयाबी हांसिल करते देखे गये हैं । ऐसे व्यक्ति समाज को, मानवता को एक नया आयाम देते हैं । अन्य व्यक्तियोंके लिए इनका जीवन एक प्रेरणा स्रोत की तरह होता है  ।

मानव सामाजिक बंधनों से जकड़ा एक प्राणी है । हमे केवल अपने बारे में ही तो नहीं सोचना है न !! हमें यह भी विचारना चाहिए कि जिस व्यवहार से हमें चोट पहूंची थी , वैसा ही व्यवहार कर हम अपने अतीत को पथभ्रष्टतो नहीं कर रहें हैं न ..!!  सर्वप्रथम हमें इस बात पर विचार करना चाहिये की हम समाज के लिये कितने उपयोगी हैं ? उनके लिए कहीं हम अपने आदर्शो को, अपने नैतिक मूल्यों को तो दांव पर नहीं लगा रहे हैं न….!! कई बार विकृत विचार हमें पतन के मार्ग की ओर उन्मुख कर देते हैं । वे हमें धनसंपदा व अपने लक्ष्य से मालामाल तो करते हैं परंतु उसका तरीका अत्यन्त निम्न स्तर का होता है जो अनुकरणीय नहीं होना चाहिये । ऐश्वर्य की चाह रखना तथा उस चाह को पूरा करना अनुचित नहीं है पर उसे किस तरह अर्जित किया जाय यह सोचनीय है । आज हम धन दौलत को ही सर्वोपरि मानते हैं तथा उसका अधिक से अधिक अर्जन करने के लिए, कुछ भी करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं । उस समय हम अपने विवेक को, शील को किनारे पर रख देते हैं । अपनी दौलत से इतने भ्रमित हो जाते हैं कि हमारी सेवा में खडे पांव रहने वाले नौकरों की सुविधा की भी पहचान नहीं कर पाते….!!

ये कहानी अगर आप को आपके विवेक, शील व संस्कार से अवगत करा दे, तो मैं प्रभु की लाख-लाख शुक्रगुजार रहूंगी ….

कमलेश अग्रवाल

किर्ती का फैसला

9 अक्टूबर

 आखिर किर्तीने भारी मन से फैसला ले ही लिया कि अब वह अपनी लडाई खुद ही लडेगी | उसे वे दिन याद आये जब हर आनेजाने वाले से पिताजी उसकी तारीफ़ करते नहीं अघाते थे…सबको गर्व से उसके जीते  इनाम और मेडल दिखाते…पर जब उसे ससुराल में सताया जाने लगा तो समाज में अपनी इज्जत के ख्याल से उसके पिताजी ने आँखें फेर लीं…!! अपनी इस बेटी को जुल्म सहने के लिए अकेला छोड़ दिया..!!

आज बैठे-बैठे ही उसे लगा कि ये क्या हो रहा उसके साथ ? रोज दिन में नीरव की मिन्नतें और रात में माँ और पिताजी की नसीहतें | सुन सुन कर  दिमाग ही सुन होता जा रहा है | इस दिमाग को  कब तक पागल होने से रोक पाऊंगी ? शादी क्या हुई कि सभी अधिकार ही ध्वस्त हो चले ..!! अपने जीवन पर अपना कोई अधिकार ही नहीं..!! क्या उसके फैसले हमेंशा दूसरे ही लेंगे ? उसे मन से या बेमन से उन फैंसलों को मानना ही पड़ेगा ? वह ये सब को लेकर एक गहरी सोच में पड़ गयी..|

सहसा उसके भीतर छूपे सम्मान ने सिर उठाया और आखिर भारी मन से उसने फैसला ले ही लिया कि अब वह अपनी लडाई खुद ही लडेगी | वह उठी और चल पडी अपनी मंझिल की ओर….

उस ने फोन उठाया और एक नंबर डायल किया | सामने से आवाज आई,” सुची स्पिकीं….|” किर्ती ने कहा,” सुची मैं किर्ती बोल रही हूं | याद आया कुछ ? “ अरे ! क्या बात है आज अचानक कैसे याद किया मुझे ? किर्तीने कहा,” यार, बस गृह्स्थी में ऐसी फंसी कि चाहते हुए भी कभी तुमसे मिल न पाई…भई मैं तुम से मिलना चाहती हूं…बोलो कब फ्री हो ?” ऐसे करो तुम आज 4 बजे आ जाओ | आ पाओगी ? “ हां-हां बिल्कूल आ जाऊंगी | सुची आज एक होनहार वकील बन चूकी है और उस के न्यायिक फैंसलों के गुनगान अक्सर किर्ती समाचारों में पढती रहती है |

सुची के घर जाते वक्त वह सोच रही थी कि क्या जाने सुची अब उसे तुल देगी भी या नहीं…काफी नाम जो हो चूका है उसका…!! सोचते-सोचते ही वह अपने मुकाम पर पहूंच ही गई | घंटी बजाई | दरवाजा सुचीने ही खोला | दोनों की नजरें मिली और सहसा दोनों इस तरह आत्मविभोर हो गईं कि दरवाजे पर ही कुछ समय खडी रहीं | फिर दोनों सोफे पर बैठीं |

बीती बातें होने लगीं | थोडी देर के बाद किर्ती ने कहा, “सुची आज मैं एक परेसानी का हल ढूंढने तुम्हारे पास आई हुं | शायद कोई रास्ता निकल आये और उसने अपनी शादी के बाद के हालात बेहिचक सुची के आगे रख दिये | सुची ने कहा,” इतना बर्दास्त क्यों करती रहीं ? क्यों नहीं मुझे पहले मिलीं ? चल कोई बात नहीं…जब उठे तभी सवेरा…”

एक काम करते हैं | तुम थोडे दिन मायके चली जाओ | हम फिर न्यायिक कार्य शुरु करेंगे | किर्ती ये सुन कुछ विचार करने लगी | वह सोच रही थी कि क्या मायकेवाले उसे कोर्ट-कचेहरी करने देंगे ? या फिरसे नसीहत देते हुए मेरे इरादों को हवा में उडा देंगे ? शायद किर्ती की द्विधा की भनक सुची को आ गई थी | उसने कहा ,” अगर पीहर नहीं जाना चाहती हो तो कोई बात नहीं | अगर तुम अपने आप में मक्कम हो तो मैं तुम्हारा पेईंग-गेस्ट की तौर पर अपने ही पडोस में रहनेका इंतजाम कर सकती हूं | वैसे भी तुम खुद अपने पांव पर खडी हो…आर्थिक तौर पर सक्षम हो…फिर ये जिल्ल्त क्यों बर्दास्त करनी ?”

सुची की बात किर्ती को सही लगी और दोनों ने फैसला ले लिया …सुची और किर्ती पडोस में अनीताजी के यहां गईं और सब बातें तय कर इस नतीजे पर पहूंची कि पहली तारीख से यहां रहने आ जाना है और तब तक बस चूप रहकर दिन व्यतीत करने हैं | पहली तारीख को किर्तीने कालेज से छुट्टी ले ली थी और उसने अपनी अटेचियों में सामान रखना शुरु किया ही था कि नीरव आ गये और कहां जाने की तैयारियां हो रही है..पूछने लगे | किर्ती ने कहा,” दो दिन पहले ही तो आप से और मा से मैंने कहा था ना कि कोलेज के टूर में इस बार मुझे जाना होगा वरना आगेका प्रोमोशन न होगा |”

अच्छा तो इस की तैयारियां हैं | कितने दिन का टूर है ? एक हफ्ते का | ठीक है…जाओ…और किर्ती बिना आंख मिलाये ही सिर हिला कर अटेची ले चल पडी..गनिमत थी कि आज सासुमा घर पर न थी | वह सीधी अनीताजी के घर पहूंची और तुरंत ही इस बात की इतला सुची को भी दे दी | पर बार-बार एक बात उसके जहन में आ रही थी कि उसने ये फैंसला लेकर कुछ गलत तो नहीं किया न…!! फिर अपने आप को संभाला और एक गहरी सांस ले इन पंक्तियों को दोहराया…

इन पवन के बेकाबु झोंकों से, अगर उसे निकलना है,
तो डर को अपने आप से, अपने ही कदम तले कुचलना है….

प्रयास तो कई किए जीतने के वास्ते,
मगर अभी तलक नहीं, चूने थे , मैंने अपने लिये सही रास्ते………

इस ओर शाम का समय था , न जाने क्यों किर्तीका मन बहुत बोझिल सा हो रहा था , भारी मन से उठ कर रसोईघर में जा कर उसने अपने लिए एक कप चाय बनाई और रेडियो एफ एम् लगा कर वापिस आकर कुर्सी पर बैठ कर धीरे धीरे चाय पीने लगी | चाय की चुस्कियों के साथ साथ वह संगीत में खो जाना चाहती थी कि एक पुराने सुरीले गीत ने उसके कानो में मधुर रस घोल दिया ,” ”हर घड़ी बदल रही है रूप जिंदगी ,छाँव है कही ,कही है धूप जिंदगी ,हर पल यहाँ ,जी भर जियो ,जो है समां कल हो न हो ”…और उसका बोझिल, बैचेन मन शांत हो गया |

सुची ने रात किर्तीको अपने घर खाने पर आने को कह ही रखा था सो वह सुची के यहां जाने को निकल गई | दोनों झूले पर बैठ अपने बीते दिनों को याद कर-कर हंस रहीं थी | तभी रसोईघर से आवाज आई…मेडमजी खाना टेबल पर लगा दें ? हां-हां लगा दो | दोनों खाने की टेबल पर आ गईं और खाने बैठ गई | कुक अपना काम समाप्त कर चली गई |

थोडे समय बाद सुची ने कहा,” किर्ती तुम सच्च में नीरव से तलाक चाहती हो ? या कुछ समय और इस पर सोचना चाहती हो ? देखो ये तुम्हारे जीवन का एक बहुत ही महत्वपूर्ण मोड है जिसे हर पहलू से समझना तुम्हारे लिये बेहद जरुरी है | मैंने तो गृहस्थी बसाई नहीं है सो मैं इस पर तुम्हें क्या मसवरा दूं ? अगर सच में तुम्हें यकिन है कि नीरव नहीं सुधर सकता तो ठीक है…हम एक नोटिस भिजवा देंगे…पर पहले अच्छी तरह सोच लो |’

किर्तीने कहा,” 10 साल यही तो सोचती रही हूं कि कभी न कभी नीरव मुझे समझेगें….एक पत्नीका दर्जा मुझे देंगे | अब बच्चे नहीं हुए तो क्या करुं ? गोद लेने को कहती हूं तो उस पर भी भडक उठते हैं | सासुमां हर वक्त ताने मारती रहती हैं | नीरव से कहती हैं कि इस बंजर जमीन को कब तक संभाले बैठा रहेगा ? तेरे पिता तो पौत्र को तरते हुए चले गये अब क्या तु चाहता है कि मैं भी इस तरह तरसती चली जाऊं ? सच कहूं तो हमने कई डाक्टरों को दिखाया…मेरी जांच तो करवा लेते हैं पर खुद की जांच करवाने से झिझकते हैं | अब मैं और ताने नहीं सुनना चाहती | अब मैं अपनी जिंदगी खुद अपनी तरह जीना चाहती हूं | तुम भी तो अकेले जी रही हो न | मैंने तय कर लिया है … नीरव से जूदा होना का |”

सुची ने पूछा कि क्या वह अपने पीहरवालों से इस विषय पर बात करना चाहेगी ? तो दो टूक जवाब देते हुए किर्ती बोली,” वे भी तो समाज में अपनी साख का रोना ही तो रोते रहे हैं मेरे आगे…नहीं मैं अपना फेंसला खुद ही करना चाहूंगी | क्यों न मैं अपने इस जीवन के हरेक पल का आनंद लेते हुए न जीऊं ? जो बीत चुका सो बीत चुका, आने वाले पल का कोई भरोसा नही, तो क्यों न इन बाकी सालों को भरपूर जीऊं ?  जीवन में कुछ ऐसा करुं जिससे मुझे ख़ुशी मिले , आनंद मिले | सहसा उसने मोबाईल उठाया और नीरव से कहने लगी , देखो नीरव मैं कहीं नहीं गई हुं ,इसी शहर में पीईंग गेस्ट की तरह रह रही हूं | हम 10 साल साथ रहे  | अब और साथ रहना मेरे लिये मुमकिन न होगा | मैंने सोच लिया है कि अब हमारे लिये एक ही रास्ता बचा है …तालाक का …!! अब हमारी मुलाकात कोर्ट में ही होगी… और इतना कह उसने मोबाईल बंद कर दिया |

किर्ती की हिंमत और स्पष्टता ने सुची को दंग कर दिया |  अनान्यास ही सुचीके मुख से निकल पड़ा ” तुम्हरा सोचना बहुत ही सही है , इन भारी पलों में हमारी विचारधारा को हम अगर एक खूबसूरत दिशा की ओर मोड़ दें तो उस जलधारा को (नई दिशा मिलने के कारण) बाढ़ जैसी स्थितिसे उसे बचाया जा सकता है | विचारों के प्रवाह की दिशा बदलने से हम निराशा की बाढ़ में डूबने से बच सकतें है | मैं इस बात से बहुत ही खुश हूं कि तुमने अपने इस निर्णयको लेने से पहले अपने आप को काफी खंगाला है | मैं चाहूंगी कि तुम्हें प्रभुका साथ मिले , उनका आशीर्वाद सदा तुम पर बना रहे |”

दूसरे दिन ही सुची ने कोर्ट से तलाकनामे की नोटिस जारी करवा दी और किर्ती के अहम फैंसले का आखरि अध्याय यहीं खतम हो गया | धी धरणी को धीरज धरना ही होता है.. इस पुरानी कहावत को साथ रख कब तक स्त्रियां अपने आप को अपमानित करतीं रहेंगी ? गोद सुनी सिर्फ उनकी कमी मान लेना क्या जायज है ? नहीं न ….फिर तो अब आप को भी किर्तीके इस फैंसले से आपति न होगी…!!

कमलेश अग्रवाल

 

 

“महंगाई डायन खाए जात है”…!!

4 अक्टूबर

महंगाई से अगर आम आदमी दौड़ – स्पर्धा करे  तो वह जीत ही नहीं सकता ; क्योंकि उसकी रफ्तार  गजब की है…!!  ये इस कदर भागती है कि पूछो मत !! रूकना तो इसने मानो सीखा ही नहीं !! बस इसे अगर पस्त होने का डर  है तो….,सिर्फ और सिर्फ राजनेताओं की संपत्ति से !! क्योंकि राजनेताओं की संपत्ति इस कदर ताकतवर है कि इस दौड़ में उनसे आगे निकलने का माद्दा किसी में नहीं है…फिर ये महंगाई क्या चीज है ?

देश की जनता अपनी हर कौशिश के बाद भी इससे सदा ही पस्त रहती है । आज देश के सामने सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर ये महंगाई रुकती क्यों नहीं ? आखिर क्यों सरकार की हर कोशिश नाकाम साबित हो रही है ? आखिर क्यों आम आदमी इसको झेलने के लिये मजबूर है ? क्यों इस आम आदमी पर लटकती तलवार झूलती रहती है कि तैयार रहिए नई महंगाई के लिए, तैयार रहिए जेब कटाई के लिए, तैयार रहिए जरूरतें घटाने के लिए, तैयार रहिए खुशियों का गला घोटने के लिए…!!  ये क्या हो रहा है इस आम आदमी के साथ ?

जब किसी चीज के दाम बढ़ते हैं या फिर बढ़ने की ख़बर आती है तो आम आदमी का खून न खौलना कैसे मुमकिन हो सकता है और यकायक उसे याद आता है पीपली लाइव फिल्म का महंगाई पर बना मशहूर गाना “महंगाई डायन खाए जात है”…!! उसके दिल में  टीस तो उठेगी ही न ? क्योंकि उसे अपनी जिंदगी की कुछ जरूरतों में नई कटौती जो करनी होगी !!

कभी रेलवे में सर्विस टैक्स का लगना , पासपोर्ट बनवाने के लिए 500 रूपीयों की और  बढोतरी, पेट्रोल, डीजल, केरोसीन ,रसोई गैस के दामों का बढना…..इन सबने तो गृहणी के बजट को ही हिला दिया …. निरंतर बढ़ती महंगाई के इस दौर में अगर कोई बेफिक्र है तो वे हैं हमारे सांसद , उच्च सरकारी अधिकारी । उन्हें इस बढती महंगाई से कोई वासता नहीं । उनकी संपत्ति में बेहिसाब बढ़ोतरी जो हो रही है…!! तभी तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की संपत्ति एक-दो सालों पहले जहां करीब 5 करोड़ रूपए थी…वो अब बढ़कर करीब 11 करोड़ हो गयी है । कैबिनेट मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने तो सारे रिकार्ड ही ध्वस्त कर दिए…उनकी संपत्ति की कीमत करीब 52 करोड़ रूपए बतायी गयी है…जबकि एक और कैबिनेट मंत्री शरद पवार की संपत्ति करीब 22 करोड़ रूपए और पी चिंदबरम की संपत्ति करीब 12 करोड़ है …!!  ये सिर्फ कुछ ही नाम है …। वाह इन के तो व्यारे न्यारे हैं…!!

अब देश के मंत्री ऐसे हैं, तो फिर कहना ही क्या ? इन्हें कंपनियों (तेल, विदेशी निवेश) की चिंता है, लेकिन आम आदमी की नहीं…!! जब देश में नीतियां इन कंपनियों को ध्यान में रखकर ही बननी हैं फिर तो आम आदमी को अपनी भलाई खुद ही सोचनी होगी ।  सही है न…!! इन नेताओं की दलील भी सुन ही लीजिए…कि जहां खाद्य महंगाई महज एक महीने की अवधि में 6 फीसदी से ज्यादा बढ़ी, वहीं विनिर्मित उत्पादों की कीमतें फरवरी में गिरकर 5.75 फीसदी पर आ गई । जनवरी में यह 6.49 फीसदी थी। मूल्यवृद्धिपर काबू पा लिया जाएगा ….क्यों मूर्ख बनाये जा रहे हो ?

जो अंग्रेजों के शासनकाल में कानून चल रहे थे, आप आज भी लगभग वही कानून चला रहे हैं ..!!  क्या आप जानते नहीं कि देश का 80 करोड़ किसान शासकीय नीति से बाकायदा उपेक्षित है !! गत दो वर्षों के दौरान देश का किसान और अधिक गरीब हुआ है जबकि उसके द्वारा उत्पादित खाद्य पदार्थों के दामों में भारी इजाफा दर्ज होता हम देख रहे हैं । यह समूचा मुनाफा अमीरों की जेबों को भर रहा है । देश के अमीरों की अमीरी ने अद्भुत तेजी के साथ कुलांचें भरीं हैं । मंत्रियों और प्रशासकों के वेतन में जबरदस्त वृद्धि होती जा रही है । दूसरी ओर साधारण किसानों में गरीबी का आलम दिन -प्रतिदिन बढता जा रहा है । आम आदमी की रोटी-दाल किसानों ने नहीं, वरन बड़ी तिजोरियों के मालिकों ने दूभर कर दी है  !!

महंगाई वास्तव में ताकतवर अमीरों द्वारा गरीबों को लूटने का एक अस्त्र है । इस खतरनाक साजिश में सरकारें भी अमीरों के साथ बाकायदा शामिल हैं । वास्तव में सरकार ने बाजार की ताकतों को इतनी ताकत प्रदान कर दी है कि घरेलू बाजार व्यवस्था बेकाबू हो चुकी है । सटोरिए, दलाल और बिचौलिए इसमें  अहम किरदार हो गए हैं । भारत की अर्थव्यवस्था अब सटोरियों और बिचौलियों के हाथों में ही खेल रही है । अपना खून-पसीना एक करके उत्पादन करने वाले किसानों की कमर कर्ज से झुक चुकी है । काली राजनीति का काले धंधे के साथ अवैध समीकरण अपनी चरम सीमा पर है !!  बिचौलिए मालामाल हो रहे हैं और किसान बदहाल हैं !! निरंतर गति से बढ़ती महंगाई और शोषण के बीच चोली-दामन का संबंध दिखाई दे रहा है …!!

हमारे नेतावर्ग ये जान गये हैं कि आम आदमी के रोष से निकट भविष्य में उनकी सत्ता को कोई खतरा नहीं, किन्तु वे ऐतिहासिक सच्चाई को शायद भूल चुके हैं कि…

कबीर हाय गरीब की, कबहु न निष्फल जाए ,
मरी खाल की सांस से, लौह भस्म हो जाए ।। 

अब भी संभल जाईये नेताजी , जागो तभी सुबह को अपनाईये…इतना भी न बहेकीये कि पीछे मूड ने की गुंजाईश ही न रहे…आम आदमी की ताकत को उकसाईये नहीं …एकबार कबीरजी के दोहे पर भी नजर डाल ही लिजीये….

कमलेश अग्रवाल

 

 

अधजल गगरी छलकत जाय

1 अक्टूबर

पहाडों , चट्टानों से गुजरती हुई नदी खूब आवाज करती है क्योंकि छिछरी होती है, गहरी नहीं होती, कंकड-पत्थरों से टकराते हुए, रास्ता बनाते  आवाज करते हुए चलती है। वही नदी जैसे-जैसे समतल धरती पर आती है उसका पानी गहराता जाता है और नदी शांत होती जाती है, उसकी गति मंथर हो जाती है। उसकी आवाज सुनाई नहीं पडती। लहरें उछल-कूद नहीं करतीं। मतलब कि शोरगुल हमेशा उथलेपन का ही सबूत है।

इस कहावत में कितनी ठोस बात छिपी है कि घडा आधा भरा हुआ हो तो आवाज करता है, पानी छलक कर गिर जाता है और पूरा भरा हो तो बिल्कुल भी न आवाज करता है, न छलकता है। पूरे भरे घडे में गहनता आ जाती है। छिछरापन नहीं रहता। मतलब साफ है, छिछरापन अपने आप को छिपाने हेतु आवाज करता है, पर गहराई हमेंशा शांति रखे होती है।

यही वजह है कि ज्ञानी व्यक्ति बडबोले नहीं होते । ज्यादा व व्यर्थ नहीं बोलते । तोल-नाप कर बोलते हैं। जितनी आवश्यकता है उतना ही बोलते हैं। क्योंकि वे अंदर से गहरापन लिये हुये हैं। यह गहन अनुभूति का कारण है, उनकी विद्वता। वे कितने विद्वान हैं ? कितने गुणी हैं ? कितने भले हैं ? कितने परोपकारी और सदाचारी हैं ? ये सब गुण उनके व्यवहार में, उनके आचरण में, उनकी वाणी में स्पष्ट झलकते हैं। ऐसे ज्ञानियोंको किसी के प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं होती, किसी के प्रचार की जरूरत नहीं होती । ऐसी विभूतियों के आचरण की सौरभ सर्वत्र बिना किसी विशेष प्रयास के स्वत: ही फैल जाती है ।

जो बंदे अंदर से खोखले होते हैं वे अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते हैं । अपने धन से लेकर दान-पुण्य, समाजसेवा, आध्यात्मिक व धार्मिक रुचि एवं बौध्दिक क्षमता का बढ-चढक़र बखान करते हैं । आज ऐसे लोगों की संख्या में इतनी तेजी से बढोतरी हो रही है कि कभी-कभी हम भी उनकी ईष्या करने लगते हैं । परंतु फिर एक संतोष भी मन ही मन में होता है कि विकास की नींव इतनी खोखली होने से तो अच्छा है कि विकास धीमी गति से हो।

अधकचरा ज्ञान लिए, अपने आपको को ‘बडा’ बताने वाले ऐसे लोग या तो मस्का लगाकर, जी हजूरी करकर , डरा-धमकाकर व एवज में पैसा फेंककर अपनी  वाहवाही करवाते हैं। ऊपर से ‘ज्यादा होंसियारी’ की बातें करते हैं ;पर ज्ञानीजन की जमात में आधी भरी गगरियां की कहावत को छुपाने में अपने आप को असमर्थ पाते हैं ।

आज हम देख रहें हैं कि हमारे देश की बागडोर संभाले नेतागण  इस कहावत को पूरी तरह अपनाये हुए हैं !! भ्रष्टाचार,,रिश्वतखोरी,भुखमरी  को सरेआम देखते हुए भी देश के विकाश की बेबुनियाद बातें करते दिखते हैं । अपना डंका बजाने हेतु हमारी आंखों में धूल  झोंक रहे हैं..!!  भारतीय प्रणेता स्वामी दयानंद सरस्वती, ज्योतिबा फुले, महादेव गोविंद रानाडे, गोपाल कृष्ण गोखले, जानकीनाथ घोषाल आदि से लेकर महात्मा गांधी, डा. भीमराव अंबेडकर और डा. राममनोहर लोहिया जैसे नेताओं की कथनी और करनी एक थी लेकिन वर्तमान सरकार की नियत इसके विपरीत दिखाई दे रही है । ये नापते तो नौ गज हैं पर काटते हैं दो गज !! ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ कहावत आज के नेताओं को अच्छी तरह रास आ गई है । वे इस कहावत को अच्छी तरह आत्मसात कर बैठे हैं । बडे-बडे लड्डू दिखाते हैं और खिलाने के वक्त बहाने बनाते हैं । वैसे तो इनकी गगरियां आधी हैं ,पर दावा करते हैं कि गगरियां भरी हुई हैं…!!

आज की राजनीति में इस कहावत का  सूरज उदय होते तो दिख रहा है…पर अस्त कब होगा…कौन जाने ?

कमलेश अग्रवाल