Archive | नवम्बर, 2012

अनैतिकता के सामने नैतिकता

29 नवम्बर

कईबार मेरे मन में विचार आता है कि जब युधिष्ठि जानते थे कि कौरोवों द्वारा जुआ खेलने का आमंत्रण, उन्हें बर्बाद करने के लिये रची गई एक साजिश मात्र है; तो फिर उन्हों ने इस खेल को खेलने का मन क्यों बनाया ? इस खेल को खेलने से इंकार क्यों न किया ? दुशासन द्वारा चीरहरण होती हुई द्रौपदी की लाज न बचाते हुए, चूपचाप उसकी लुटती अस्मिता को उसके पांचो पति द्वारा मूक बने देखते रहना या बेबस द्रौपदी द्वारा प्रखर ज्ञानी भीष्म पितामह द्वारा उसके सवालों के जवाब न देना, बल्कि सिर झुकाये पितामह द्वारा तमासा देखते रहना कितना उचित था ? सभा में उपस्थित महानुभावों में से क्यों कोई भी उसकी लुटती अस्मिता को बचाने आगे न आया ? क्या ये अनैतिकता की अति का ही स्पष्ट पर घिनौना संदेश नहीं है ? एक स्त्री के साथ किया गया अन्याय नहीं है ?

राम द्वारा एक धोबी को खुश करने के लिये, मा सीता का त्याग करना क्या सही था ? राम का ये कहना कि उन्हों ने  अपना राजधर्म निभाया है, क्या सही है ? क्या राम ने मा सीता को अन्याय नहीं किया ? क्या एक पति के लिये पत्नीधर्म का पालन अनिवार्य नहीं होना चाहिये ?

सिर्फ भातृप्रेम का वास्ता  देकर पत्नी उर्मिला को 14 सालों तक अपने माता-पिता की सेवा हेतु छोडा जाना, क्या लक्ष्मन द्वारा उर्मिला के साथ किया गया अन्याय नहीं है ?

अगर रामराज्य में स्त्री इतनी बेबस थी , प्रखर ज्ञानियों की सभा भी अगर स्त्री की लाज बचाने में असमर्था बताती हुई जान पडती है …..फिर आज स्त्री पर आए दिन होते अत्याचारों को देखने में पुलिस , राजनेता या बन-बैठे समाजसेवकों द्वारा देखे जाना कौन सी बडी बात है !!

जब लोग अपने चारों और फैले कुशासन, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, कपटता, बलत्कार, शरीर – व्यापार इत्यादि से रोज-बरोज रुह-ब-रुह होते हैं तब उनके जहन में अपनी बहन-बेटियों की हिफाजत के लिये सवाल तो बहुत उठते हैं; पर ये सोचकर कि हमें सुनेगा कौन ? वे सवाल वहीं दम तौड देते हैं | वे जानते हैं कि ये दुष्कर्म करनेवालों के हाथ बहुत लंबे हैं | इन का हौंसला तभी बुलंद है….जबकि  इन पर राजनेता , सरकारी अधिकारी या पुलिस का पुर-पुरा सहयोग होगा…!! या पैसेवालों की ये बिगडी हुई औलाद होगीं….जिनके पिता या वालिद अपनी संपत्ति से  नामुमकिन को मुमकिन कर सकते हैं !!

मेरा मानना है कि अब वक्त आ गया है अनैतिकता के सामने नैतिकता के लिये युध्ध छेडने का |  अधर्म के सामाने धर्म-युध्ध का | कुशासन के ठेकेदारों पर नकेल कस ने का | देश की पुरानी अस्मिता को वापस लाने का |  ये सब तभी संभव है जब जन-जागृति आये | केजरीवाल और अन्नाजी की टीँम ने जागृति के श्रीगणेश कर दिये हैं ….बस हमें मिलकर इस मुहिम को आगे बढाना है | कुछ कर दिखाना है …..घर में सेंद लगाये बैठे राष्ट्र्द्रोंहींयों को सबक सिखाना है | लोकतंत्रके सिंहासन से उन्हें खदेडना है और एक सुशासन को वापस लाना है | आईये हम सब एक्जूट हो अनैतिकता के सामने नैतिकता के युध्ध के लिये कमर कसें ….

जयभारत…जयहिंद……

कमलेश अग्रवाल   

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क्या भारत में आम आदमी का राज होगा ?

27 नवम्बर

भारत दुनिया का सबसे बडा लोकतंत्र है । यह भी एक स्थापित सत्य है कि किसी भी लोकतंत्र में आम आदमी की भूमिका ही सबसे महत्वपूर्ण होती है । असल में शासन की बागडोर लोकतांत्रिक देश में आम आदमी के हाथ में ही होनी चाहिये । अन्नाजी और केजरीवालजी के प्रयास से आज भारत का आम नागरिक इस बात को समझने लगा है । शायद इसी कारण हाल में हुए विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में करीब 60 और पंजाब में 78 प्रतिशत मतदान हुआ । जाहिर है, आम आदमी ने  देश और समाज में अपनी भूमिका को ठीक से पहचाना और अब उसे निभाने के लिए कमर कसने को तैयार है । उसकी यह कटिबद्धता केवल किसी एक क्षेत्र में नहीं, बल्कि हर क्षेत्र में आज दिखाई दे रही है। इसी के चलते आज आम आदमी बढ-चढ कर भ्रष्टाचार और अत्याचार विरोधी आंदोलनों में हिस्सा लेने लगा है ।

सूचना तकनीक के कारण आम व्यक्ति आपस में अपने विचारों का आदान-प्रदान कर सकें तथा अपनी समस्याओं और अपेक्षाओं को सामने ला सकें, यह सुविधा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कारण आई और मीडिया के इस उदारीकरण ने इसे नई धारा दी । सबसे क्रांतिकारी कदम साबित हुआ इंटरनेट का आगमन । इंटरनेट के जरिये पहले ब्लॉगिंग और फिर माईक्रोब्लोगिंग की शुरुआत ने दूरदराज के लोगों को केवल अपने विचारों को व्यक्त करने और जानने का ही अवसर नहीं दिया, बल्कि सबको आपस में जुडने के लिए मंच भी उपलब्ध कराया । अब वे एक-दूसरे के विचारों को केवल जान ही नहीं सकते, वरन उस पर तुरंत अपनी प्रतिक्रिया भी दे सकते हैं । फेसबुक, ट्विटर और लिंक्ड  जैसी सोशल नेटवर्किग साइटों ने  हजारों की संख्या में परिचित-अपरिचित लोगों को दोस्ती का हाथ दिखाया और लाखों की संख्या में आपस में जूडने की सुविधा उपलब्ध करा दी। 

हमारी इस जागरूकता का ही ये परिणाम है कि आज अत्यंत व्यस्तता के इस दौर में भी लाखों की संख्या में लोग जनांदोलनों में शामिल होते देखे जा रहे हैं और देशहित को निजी हितों से ऊपर मानकर उसके लिए आवाज उठा रहे हैं । समाज में इस तरह का बदलाव या परिवर्तन यूं ही अचानक नहीं आता । हम जानते हैं कि देश का आम आदमी काफी समय तक संक्रमणता  से गुजरा है। पहले के मुकाबले गलत चीजों पर वह अब त्वरित और सही प्रतिक्रिया देता दिखाई दे रहा है । यह एक सकारात्मक और अच्छी बात है । आज वह सही दिशा की खोज में लगा दिखाई दे रहा है। अन्नाजी और केजरीवालजी के जरीये किये गये आंदोलनों  से यह धारणा पुख्ता होती दिखाई दी है ।

आने वाला समय आम आदमी का होगा यह अभी से कहना मुश्किल है । भविष्य में आम आदमी  का मंच सबसे बडा हो ऐसी मेरी ख्वाहिश है । काम शुरू हो गया है। जल्दी ही नतीजे भी नजर आयेगें । मैं मानती हूं कि केजरीवालों की टोली ज्ल्दी ही आम आदमी को अहमियत दिलवाने में कामयाब होगी । आज आम आदमी को केंद्र में रखकर ही उन्हों ने राजनैतिक पार्टी बनाई है । रोजमर्रा की जिंदगी में आम आदमी के द्वारा झेली जाने वाली दिक्कतों को उन्हों ने बहुत करीब से महशूस किया है । इससे सामाजिक सेवकों का एक बडा तबका इस पार्टीसे जूडा नजर आ रहा है । इस पार्टीको समर्थन देनेवाले किरदार आम आदमी को मुश्किलों से पार पाते देखना चाहते हैं । वे आम आदमी को विजेता बना कर भारत की बागडोर ईमानदार, देशप्रेमी, कर्तव्यनिष्ठ, जनता-हितेषु के हाथ में थमाना चाहते हैं ताकि सही मायनों में लोकतात्रिक देश का तंत्र आम आदमी के हाथ में हो, ना की भ्र्ष्टाचारियों के हाथ में…!! अगर भविष्य में ऐसा हुआ तो वे दिन दूर नहीं जब हम भारत को फिर से सोने की चिडिया बनते देख पायेंगे ….!!

ये तभी संभव हो पायेगा जब हर भारतवासी अपना किमती मत(वोट) उस इंसान को ही दे जो राष्ट्रप्रेमी हो, जनहित में विश्वास करता हो, नेक व ईमानदार हो, देश को खुद की अमानत न समझ; जन-जन की अमानत समझता हो, देश के विकाश के लिये तत्पर हो……अगर ऐसा होगा तो निश्चित ही भारत में आम आदमी का राज होगा……!! आज से ही दृढ हो जाईये….आज से ही  आम आदमी के राज का नगाडा बजाना शुरु कर दिजीये…

जय भारत …….

कमलेश अग्रवाल

जैसा अन्न वैसा मन!!

23 नवम्बर

एक साधु ग्रामानुग्राम विचरण करते हुए जा रहे थे और एक गांव में प्रवेश करते ही शाम हो गई। ग्रामसीमा पर स्थित पहले ही घर में आश्रय मांगा,वहां एक पुरुष था जिसने रात्री विश्राम की अनुमति दे दी। और भोजन के लिये भी कहा। साधु भोजन कर बरामदे में पडी खाट पर सो गया। चौगान में गृहस्वामी का सुन्दर हृष्ट पुष्ट घोडा बंधा था। साधु सोते हुए उसे निहारने लगा। साधु के मन में दुर्विचार नें डेरा जम ाया, ‘यदि यह घोडा मेरा हो जाय तो मेरा ग्रामानुग्राम विचरण सरल हो जाय’। वह सोचने लगा, जब गृहस्वामी सो जायेगा आधी रात को मैं घोडा लेकर चुपके से चल पडुंगा। कुछ ही समय बाद गृहस्वामी को सोया जानकर, साधु घोडा ले उडा। कोई एक कोस जाने पर साधु ,पेड से घोडा बांधकर सो गया। प्रातः उठकर उसने नित्यकर्म निपटाया और वापस घोडे के पास आते हुए उसके विचारों ने फ़िर गति पकडी- ‘अरे! मैने यह क्या किया? एक साधु होकर मैने चोरी की? यह कुबुद्धि मुझे क्योंकर सुझी?’ उसने घोडा गृहस्वामी को वापस लौटाने का निश्चय किया और उल्टी दिशा में चल पडा। उसी घर में पहूँच कर गृहस्वामी से क्षमा मांगी और घोडा लौटा दिया। साधु नें सोचा कल मैने इसके घर का अन्न खाया था, कहीं मेरी कुबुद्धि का कारण इस घर का अन्न तो नहीं?, जिज्ञासा से उस गृहस्वामी को पूछा- ‘आप काम क्या करते है,आपकी आजिविका क्या है?’ अचकाते हुए गृहस्वामी नें, साधु जानकर सच्चाई बता दी- ‘महात्मा मैं चोर हूँ,और चोरी करके अपना जीवनयापन करता हूँ’। साधु का समाधान हो गया, चोरी से उपार्जित अन्न का आहार पेट में जाते ही उस के मन में कुबुद्धि पैदा हो गई थी। जो प्रातः नित्यकर्म में उस अन्न के निहार हो जाने पर ही सद्बुद्धि वापस लौटी।

अनीति से उपार्जित आहार का प्रभाव प्रत्यक्ष था। दर्शन श्रवण की तरह आहार भी चरित्र निर्माण को प्रभावित करता है।

( ये मेरी रचना नहीं है …मैंने इसे facebook से ली है…इसमें छिपा बोध अच्छा लगाt….)

ये कैसी विडंबना ?

22 नवम्बर

कुछ दिनों पहले  दो ऐसी  खबरें अखबार में पढीं, जिसने मुझे ये सोचने पर मजबूर कर दिया कि सही में कहीं न कहीं हमारे न्यायिक और सरकारी सिस्टम में  बुनियादी खोट तो  है ही…!! उत्तर प्रदेश के सहारनपुर रेंज के डी.आई.जी ने सार्वजनिक रूप से कहा कि अगर उनकी बहन घर से भागी होती तो वे उसकी जान ले लेते या खुद आत्महत्या कर लेते…!!    

उधर बॉम्बे हाईकोर्ट की एक खंड पीठ ने तलाक के मामले में टिप्पणी की कि पत्नी को सीता की तरह होना चाहिए और हर हाल में उसे पति के साथ ही रहना चाहिए। डी.आई.जी साहब के इस  बयान के जांच का आदेश तो दे दिया गया है हालांकि इस पर कुछ होने हवाने का नहीं है ।  

आए दिन पुलिस या प्रशासनिक अधिकारी स्त्रियों को लेकर इस तरह के बयान देते रहते हैं। महिलाओं के साथ हो रहे अपराध के लिए महिलाओं को ही जिम्मेदार ठहराने की बात  कई सीनियर पुलिस अफसरों के द्वारा  कही जा रही है और कही जा चुकी  हैं। इसी तरह कोर्ट से भी कई बार ऐसी टिप्पणियां आती दिखाई दी हैं  । इससे एक बात तो साफ है कि हमारी सामाजिक व्यवस्था के विभिन्न अंग आज भी पुरुषवादी मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाए हैं।  पुलिस थानों का चरित्र  आज भी वैसा ही है जैसा आजादी के पहले था। निचले स्तर पर हालत और भी बदतर है।
 
छेड़छाड़ और बलात्कार जैसे मामलों में पुलिस, पीडि़त महिला के प्रति सहानुभूति दिखाने के बजाय, उसको अपमानित कर उसका  हौसलातोड़ने की कोशिश में लगी दिखाई देती है। उससे इस तरह पेश आती है जैसे महिला ही दोषी हो। ऐसे अधिकतर मामले तो दर्ज ही नहीं होते और होते भी हैं तो उनमें कार्रवाई ढीले-ढाले ढंग से चलाई जाती है। थाने के बाद कोर्ट में भी पीडि़ता कोअसुविधा का सामना करना पड़ता है। असुविधाजनक सवाल पूछ उसे शर्मिंदा किया जाता है ताकि वह टूट जाये और अपना केश वापस लेले । यह  कैसी विडंबना है कि उनके अधिकारों के हिफाजत के लिए कानून बनाए जा रहे हैं, पर जिस तंत्र के ऊपर इन नीतियों और कानूनों को अमल में लाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है, उन्हें बक्सा जा रहा है…!!

शायद महिलाओं के खिलाफ अपराध रुक नहीं रहे उसकी  वजह यही है कि सिस्टम में नीचे से ऊपर तक औरतों को लेकर पूर्वाग्रह बना हुआ है। क्योंकि पुलिस-प्रशासन या न्यायिक प्रणाली में आनेवाले भी हमारे समाज से ही तो आते हैं …!! भला उनकी राय  हमारे समाज की भीतरी  गांठों से भिन्न कैसे हो सकती है? समाज में परिवर्तन की प्रक्रिया तभी गति पकड़ेगी जब हमारी सोच आधुनिक और प्रगतिशील होगी । हमेंअपनी व्यवस्था का ढांचा बदलना होगा । उसे ऐसा बनाना होगा कि उसमें किसी भी तरह के दबाव की गुंजाईस न हो ।

कहा जाता है कि युवा पीढ़ी , खासकर शहरी युवाओं ने पुरानी  रूढि़यों को  पीछे छोड़ दिया है। अब नौजवान अपनी पत्नी या गर्ल फ्रेंड को न सिर्फ अपने बराबर समझते हैं बल्कि उनकी तरक्की देखकर खुश भी  होते दिखाई दे रहे हैं । अपनी पत्नी को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित भी कर रहे हैं। लेकिन अगर गौर से देखे तो कुछ मामलों में आज भी स्थिति जस की तस है। इसका प्रमाण मुझे कुछ दिनों पहले हुई एक घटना से मिला।

मेरी एक छब्बीस वर्षीय सहेली के बॉयफ्रें ड को सहेली के एक दोस्त ने अपने भाई की शादी पर बुलाया। बहुत बुलाने पर वह मेरी सहेली के साथ चला तो गया लेकिन शादी में पूरे समय अनमना रहा। क्योंकि उसे ऐसा महसुश हो  रहा था कि जैसे वह अपनी गर्लफ्रेंड का बॉडीगार्ड बनकर शादी में आया है। वहां वह अपनी गर्लफ्रेंड के अलावा किसी को नहीं जानता था। जबकि मेरी सहेली का मानना था कि वह उसे जानता है  क्या  यही उसके लिये बहुत नहीं है ? क्या वह जब उसके बॉयफ्रेंड के किसी दोस्त की शादी होती है  तो बिना सवाल जवाब किए वहां चली जाती है ? वह तो वहां खुद को इस तरह अनमना सा महसूस नहीं करती…!!

मेरी सहेली ने उससे पूछा कि क्या तुम शादी के बाद भी ऐसा ही सोचोगे? उसका जवाब था- शादी के बाद तो तुम मेरी जिम्मेदारी हो जाओगी । तब की बात अलग होगी । मैंने कई बार ऐसा भी देखा है कि अगर किसी एकल परिवार में कोई दोस्त या रिश्तेदार अपने यहां किसी समारोह में निमंत्रण देने के लिए फोन करे और वह पत्नी रिसीव कर ले तो कई पुरुषों को ऐसा लगता है कि हमें तो आमंत्रित किया ही नहीं गया। खासकर तब जब निमंत्रण पत्नी के मायके की तरफ के रिश्तेदार या दोस्त की तरफ से हो। जबकि पत्नी पर ये बात कतई लागू नहीं होती। क्योंकि वह ये सोचती है कि पति को निमंत्रित करने पर वह  स्वत: ही निमंत्रित हो गई  है औरकभी इस बात का इशू नहीं बनाती। 

दरअसल हम कितनी भी तरक्की कर लें, लेकिन पुरुष का दंभ कहीं न कहीं अपना सिर उठा ही लेता है। शायद इसके पीछे पुरुष के खुद को सर्वेसर्वा समझने की वही पुरातन सोच है जो पीढ़ी दर पीढ़ी एक से दूसरे पुरुष में अनजाने में ही आ जाती है ।

हम जानते हैं कि आदिकाल से ही नर और माद हर प्रजाति में आपसी संसर्ग के लिए पैदा हुए हैं। आपसी संसर्ग के लिए प्रकृति ने दोनों को सम्पूर्ण रूप से आजाद पैदा किया था। लेकिन मानव समाज के निर्माण के साथ-साथ, तुलनात्मक रूप से शारीरिक रूप से कमजोर स्त्री पर, पुरुष ने कब्जा जमा लिया, जिसे स्त्री ने अपने प्रति पुरुष का प्यार समझकर सहर्ष स्वीकार कर लिया। कालान्तर में प्यार करने वाला पुरुष, स्त्री का स्वामी बन बैठा और यह बतलाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि जब कोई आपका स्वामी बन जाता है तो आप उससे  बराबरी के रिश्ते और सम्मान की उम्मीद नहीं कर सकते। अर्थात्‌ यदि पति स्वामी है तो पत्नी स्वामी की दासी के अलावा और कुछ हो ही नहीं सकती। किसी भी दासी को यह हक नहीं होता कि वह अपने स्वामी अर्थात्‌ पति जिसे आगे चलकर पतिदेव भी कहा जाने लगा, के सामने अपना मुख खोल सके। ऐसे हालात में दासी और मालिक या पति देव के बीच प्यार कैसे उत्पन्न हो सकता है ? प्यार के लिये तो दिल में खाली जगह चाहिए न…!!

हजारों वर्षों तक स्त्री इसी विचित्र और प्रताड़ना पूर्ण स्थिति में जीने को विवश रही है। इसलिए, उसने इन दुखद और असहनीय हालातों को अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लिया। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि पुरुष और ताकतवर हो गया, उसकी नजर में पत्नी का महत्व कम होता गया । औरत का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रह गया  ।

क्या विवाह के साथ ही उसे अपना अस्तित्व विसर्जित हुआ मान लेना चाहिए ? क्या औरत का भी एक स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है ? विवाह से पहले कुछ हद तक उसका अपना व्यक्तित्व होता है और विवाह हो जाने भर से उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व का लोप  हो जाये क्या ये सही है ? विवाह होते ही क्या पति उसका मालिक हो गया ? पति के गुजर जाने पर अगर पत्नी का अकेले रहना संभव है, तब पति के रहते उसका स्वतंत्र अस्तित्व क्यों कर संभव नहीं है ? 

अगर जीवन की  समस्याओं का समाधान करना चाहते हो, अगर नारी का सम्मान करना चाहते हो तब  ‘धूप में छांव ढूंढ़ने का हुनर  सीखना होग….नारी द्वारा उठाये गये इस प्रश्न ये कैसी विडंबना ? का हल तभी मिल पायेगा…….

कमलेश अग्रवाल

आम लोगों का दर्द

22 नवम्बर

केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री हरीश रावत कहते हैं कि देश में हर कोई सब्सिडी का फायदा ले रहा है | उनका कहना है कि देश में बहुत सारे लोगों को सब्सिडी की जरूरत नहीं है | जरुरत है तेल कंपनियों को बचाने की | अब देश के मंत्री ऐसे हैं, तो फिर कहना ही क्या ? इन्हें तेल-कंपनियों की चिंता है….!!  आम लोगों की नहीं….!! जब देश में नीतियां तेल कंपनियों को ध्यान में रखकर ही नेताओं को बनानी हैं फिर तो आम लोग अपनी भलाई के लिये खुद ही सोचें,  वही बेहतर होगा…..| सही है इस तरह सोचना |

आज  क्यों आम आदमी महंगाई की आग में झुलसने को मजबूर है ? अब तो आप को इस के पीछे छिपे कारण का पता चल गया या नहीं ?  आज तो हाल ये है कि हमारी सरकार इन्हीं कोशिशों में लगी हुई है कि कैसे महंगाई के नए झटके आम आदमी को दिए जाएं ? वे ये क्यों सोचें कि महंगाई रुक क्यों नहीं रही है ? वे तो इस फिराक में डूबे हैं कि जनता को तैयार करें नई महंगाई के लिए, जेब कटाई के लिए, जरूरतें घटाने के लिए, खुशियां की बली चढाने के लिए…!!

वैसे तो हमे ये जिंदगी रास आ  गई है लेकिन, फिर भी दिल में कई बार टीस तो उठती ही है | जब जिंदगी की कुछ जरूरतों में कटौती करनी पडती है तब ऐसी सरकार के दांत खट्टे करने को भी जी चाहता है ,पर कुछ हो नही पाता…!! ऊपर से सरकार के द्वारा दी जा रही एक के बाद एक नई दलीलें , आपके कंधे पर लदने वाली महंगाई की नई किश्त, आप का मुंह चिढाती हुई आप की आंखों के सामने से गुजरती हुई  नजर आती है | अपनी दलीलों को सही ठहराने के लिये सरकार हर पेंतरा अजमाये दिखती है |

देश के मंत्री कहते हैं कि तेल कंपनियां घाटे में डूबी जा रही हैं….!! कंपनियां रो रही हैं नुकसान का रोना, वो कहती हैं कि पेट्रोल की बिक्री पर उन्हें 5 रुपए प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है | डीजल पर नुकसान का आंकड़ा 19 रुपए से ज्यादा का है | केरोसिन के प्रति लीटर की बिक्री पर नुकसान 34 रुपए से ज्यादा का बताया जा रहा है और रसोई गैस में हर सिलेंडर पर नुकसान 350 रुपए का हो रहा है | जाहिर है तेल कंपनियों और सरकार के पास आंसू बहाने का पूरा बहाना है |

अरे भई जब मंत्री जी आंसू पोंछने के लिए खुद खड़े हैं तो फिर उन्हें तो अपने बहते आंसूओं की धारा को तेज तो करनी ही होगी न……!! हां एक बात तो कहनी होगी, अगर मंत्री जी को आंसू नहीं दिखते हैं तो सिर्फ आम आदमी के….!! हर तरफ से महंगाई की मार आम आदमी को ही झेलनी है क्योंकि आम आदमी तो खुद ही नोटों की प्राप्ती के लिये उधर-इधर मारा-मारा फिर रहा है …भला वो क्या वोट दिला पायेगा ? वोट के लिये नोट तो चाहिये न….!! ये काम तो तेल कंपनियों को ही तो करना है…!!

आम लोगों का दर्द सरकार और तेल कंपनियों के लिए कचरे के ढेर से ज्यादा और कुछ नहीं | देश के विकास के नाम पर आम जनता की जेब काटने का सिलसिला कई सालों से जारी है | कसक बस ये है कि आम आदमी की सब्जी की थैलियां, आटे के और दाल के डिब्बे खाली नजर आ रहे हैं …!! उनकी जेबें दिन-प्रतिदिन हलकी होती जा रही हैं …!! आम आदमी के जले पर नमक डाला हुआ तब ज्यादा दिखाई देता है जब दूरदर्शन पर मंत्रियोंके घोटालों पर घोटालें दिखाई देते हैं और तो और , उन को बचाने हेतु पूरी नेता-टोली  बोलती नजर आती है…!! मंत्री ये कहकर अपना पल्ला छुड़ाना चाहते हैं कि विपक्ष उन्हें बदनाम करने पर आमदा है | अब तो आम जनता भी जान गई है कि चोर-चोर मौसेरे भाई…!!

शायद मंत्री जी ये नहीं जानते कि अमीरों और गरीबों के ठिकाने अलग हो सकते हैं ; उनकी लाइफस्टाइल भी अलग हो सकती है ; लेकिन जो रोटियां, दाल-चावल और सब्जियां दोनों के घरों में पकती हैं वे शायद दोनों के लिये एक ही मकसद लिये होतीं हैं ..…भूख लगने पर पेट की ज्वाला को शांत करने का…!! अब आप अगर खुद को गरीबों की सरकार कहते हैं, तो जरा ये भी बता दीजिएगा कि महंगाई के लिये आप क्या कदम उठायेगें जिससे एक आम आदमी के तन पर कपडा हो, सिर छूपाने को एक घर हो और पेट की आग को शांत करने को खाना हो…?

या फिर ……..हजारों अन्नाजी और केजरीवाल जैसों की सैना का इंतजार करेगें ? मंत्रीजी विचार करने का ये वक्त नहीं है…..कहीं ऐसा न हो कि पानी सिर से ऊपर आ जाये और आप सोते ही रहें….!!

कमलेश अग्रवाल

क्या तारीफ करुं मां तेरी ?

8 नवम्बर

कहते हैं दुनिया में मां से बढ़कर कुछ नहीं होता । मां ही है, जो हमें इस दुनिया में लाती है और जीने के तौर-तरीके सिखाती है । यही कारण है कि आज मां के न होने पर मुझे सबसे ज्‍यादा महसूश हो रहा है । मां से जुड़ी यादें मैं मरते दम तक नहीं भुला पाऊंगी……उसकी याद में ये कविता आप के सन्मुख रख रही हूं , पसंद आये तो आशीर्वाद दिजीयेगा….

छोङ गई अपने पीछे तुम, अपनी अनगिनत यादें,

समझ नहीं पाई सही तौर से मैं, इस रिश्ते की गहरी बातें,

मेरे मन की छोटी सी दुनिया को , तुम ने खुशियों से महकाई…..

आज मां याद मुझे तेरी बहुत आई…..

आज मां याद मुझे तेरी बहुत आई…। 

जब परीक्षा के दिनों में मैं घबराती थी,

घण्टों किताब खोल के पढाई किया करती थी,

तब खाना परोस के मेरे पीछे खडी तुम

मेरे सिर को सहलाती थीं…..। 

फिर मंदिर में जा मेरे लिये अच्छे नंबरों की,

मन्नत मांगा करतीं थीं…..। 

चंद रुपीये कामवाली के हाथों में थमा,

मेरे लिये उसे आशीर्वाद देने को कहा कहती थीं….। 

परीक्षा देने जाते वक्त मुझे मां तुम,

दहीं चीनी खिलाया करतीं थीं….। 

ये कह कर कि पेपर बहुत अच्छा होग,

इस कथन से मेरा  हौंसला बढाया करती थीं…। 

आज ये सब यादें, पुरानी बीती बातें,

मां मुझे तेरी याद दिलाती हैं….

अनायास ही ये सब सोच मां,

मेरी आंखे छलक जाती हैं,

मां याद मुझे तेरी बहुत आती है……

मां याद मुझे तेरी बहुत आती है……। । 

मां, कितना मीठा, कितना अपना, कितना गहरा और कितना खूबसूरत शब्द है ये आज समझ में आ रहा है । आज महसूश हो रहा है कि समूची पृथ्वी पर बस यही एक पावन रिश्ता है । इसमें न तो कोई कपट है, न ही कोई प्रदूषण…!! बस ये तो एक छलछलाता ममता का सागर है ।   एक शीतल और सुगंधित  कोमल  फूल  का अहसास है…..!!

आज दिल  कर रहा है कि काश ! वह गुदगुदाती गोद एकबार फिर मिल जाये । उसकी अनुभूति का अहसास  ठंडी व कोमल  हवा बन मेरी जीवन – बगिया को एकबार  फिर महेकाये……। 

कमलेश अग्रवाल

( ये रचना मैं मेरी प्यारी मां को समर्पित करती हूं  )

 

दिवाली का महत्व

5 नवम्बर

अँधेरे पर उजालों की जीत तथा असत्य पर सत्य की विजय के आधार को ध्यान में रख कार्तिक मास की अमावस्या के दिन दीपावली का त्यौहारपूरे भारतवर्ष में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है | इस महापर्व के सुअवसर पर हिंदू , सिख, बौध ,जैन सभी विघ्नहर्ताभगवान गणेश और माता महालक्ष्मीका पूजन करते हैं | हिन्दू धर्म ग्रन्थ में वर्णित कथाओं के अनुसार दीपावली का यह पावन त्यौहार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के 14 वर्ष के बाद बनवास के बाद अपने राज्य में वापस लौटने की स्मृति में मनाया जाता है | व्यापारीगण दिपावली के दिन दीपों की माला सजाकर नई बही खातों का मुहूर्त करते हैं |

जैन धर्म में इस पर्व की मान्यता है कि जब भगवान महावीर पावानगरी के मनोहर उद्यान में जाकर विराजमान हो गए और जब चतुर्थकाल पूरा होने में 3 वर्ष 8 माह बाकी थे, तब कार्तिक अमावस्या के दिन सुबह स्वाति नक्षत्र के दौरान स्वामी महावीर अपने सांसारिक जीवन से मुक्त होकर मोक्षधाम को प्राप्त कर गए | उस समय इन्द्र सहित सभी देवों ने आकर भगवान महावीर के शरीर की पूजा की और पूरी पावानगरी को दीपकों से सजाकर प्रकाशयुक्त कर दिया | इसीलिये जैन धर्मी इस दिन को भगवान महावीर का निर्वाणोत्सवके रुप में मानते हैं | ऐसा भी माना जाता है कि इसी दिन शाम श्री गौतम स्वामी को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई थी | जैन श्रद्धालुओं की ये मान्यता है कि 12 गणों के स्वामी गौतम गणधर ही गौरी पुत्र गणेश हैं | इसीलिये जैनी भी इस दिन विघ्नहर्ता भगवान गणेश और माता महालक्ष्मी का पूजन करते हैं |

इस दिन दीपकों की पूजा का विशेष महत्व होता है | इस दिन रात के अंधेरे को दूर करते हुए माना जाता है कि दीपमाला को लगा कर प्रकाश के द्वाराअसत्य पर सत्य की जीत व आध्यात्मिक अज्ञानता को दूर किया जा रहा है | इन सभी धर्मप्रेमियोंका ये विश्वास है कि मां लक्ष्मी की पूजा करने से उनके घर में कभी भी दरिद्रता का वास नहीं होगा और वे सदा ही अन्न, धन, धान्य व वैभव से संपन्न रहेंगे | दिपावली का ये पर्वसही अर्थोंमें समाज में उल्लास, भाई-चारे व प्रेम का सन्देश फैलता है |

कमलेश अग्रवाल