Archive | दिसम्बर, 2012

2012 in review

31 दिसम्बर

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अपने लिए भी जीयें….!!

18 दिसम्बर

अपने लिए जीये तो क्या जीये.. इस फिल्मी गीत की पंक्ति को पत्थर की लकीर मानकर हम सब महिलाओं ने इसका इस हद तक अनुकरण किया कि खुद को  नजरअंदाज करने की  आदत ही डाल ली | एक बात जान लें कि यदि आप दूसरे से प्रेम करना चाहती हैं तो ये बेहद मायने रखता है कि आप खुद को भी चाहें ? क्या आप खुद को जानती हैं या समझती हैं ? आपको अपने स्वाभिमान से प्रेम है ? खुद से प्रेम करना और दूसरों से प्रेम करना- ये दोनों बातें एक-दूसरे पर निर्भर करती हैं ।  हमने सिर्फ दूसरों के लिए जीना  सीखा है , खुद से प्यार करना नहीं सीखा…!!

हमें हमेशा यही सिखाया गया  है कि खुद के लिए जीना, अपनी इच्छाओं की पूर्ति करना स्वार्थ है और दूसरों के लिए जीना परमार्थ । कामकाजी महिला या घरेलू  नारी यदि महीने भर की हाडतोड मेहनत के बाद पार्लर जाकर फेशियल या हेड मसाज कराना चाहे, स्पा लेना चाहे, कभी-कभार बाहर डिनर लेना चाहे (रोज खाना बनाने से अगर ऊब गई हैं), कभी पुराने मनपसंद  गीत सुने, नॉवल पढे, गमलों में पौधों लगाये और हरियाली के बीच अपनी सांसों का स्पंदन महसूस करे तो क्या वह स्वार्थी है ? यदि आप का जवाब हां है, तो बेसक रहे । कामकाजी महिला या घरेलू महिला के लिये यह स्वार्थ भी अच्छा है । क्योंकि ऐसा स्वार्थ केवल उसके भीतर सिर्फ सकारात्मक सोच को जन्म नहीं दे रहा, बल्कि उसके आसपास के माहौल को भी स्वस्थ बना रहा है । 

दिन के 24 घंटे में एक-एक मिनट का हिसाब एक घरेलू या कामकाजी महिला के पास होता है । घर-परिवार, नौकरी में अपना करियर, बच्चों व माता-पिता या सास-ससूर की देखभाल……इन सबके लिए उसे कितना करना होता है तो क्या एक-दो घंटा खुद के लिए अगर वह निकालना चाहे तो क्या उसे स्वार्थी कहना सही होगा ? सबकी जिम्मेदारियां उठाने में खुद की जिम्मेदारी से मुंह मोडना कहां की समझदारी है ?

मैंने देखा  है कि तीस-पैंतीस की उम्र तक पहुंचते  पहुंचते 60-65 फीसदी महिलाओं का वजन बढना शुरू हो जाता है, ब्लड प्रेशर, शुगर, अर्थराइटिस जैसी तमाम बीमारियां उन्हें घेरने लगती हैं । एक सर्वेक्षणके मुताबिक हमारे देश में लगभग 93 प्रतिशत स्त्रियां एनीमिया से ग्रस्त हैं । तमाम स्वास्थ्य सुविधाओं के बावजूद भी आज प्रसव के दौरान मरने वाली स्त्रियों की तादाद में कमी नहीं आई है । कारण साफ है अपने आप पर ध्यान न देने की मानसिकता..!!

बच्चा बीमार होता है- तो वह दौडकर डॉक्टर के पास जाती है, पति के मामूली से सिरदर्द से परेशान हो जाती है । यहां तक कि पालतू जानवर भी बीमार होता है तो उसे लेकर डॉक्टर के पास भागी चली जाती है लेकिन जब अपनी बारी आती है, तब टाल-मटोल करती दिखाई देती है…!! आखिर इस की वजह क्या है ? शायद इस की वजह है खुद के बारे में सकारात्मक ढंग से न सोचना , बेवजह अपराधबोध से घिरे रहना और  अपने स्वास्थ्य पर ध्यान न देना । क्या इस बात से नकारा जा सकता है कि स्वस्थ दिनचर्या और बेहतर सोच एक-दूसरे के पूरक हैं…!!  अपने मन और शरीर को स्वस्थ और सुखी रखना हमारी नीजि जिम्मेदारी बनती है । अगर महिलायें घर के हर व्यक्ति का अच्छी तरह ध्यान रख सकती है तो फिर अपने लिये ये लापरवाहि क्यों ? अगर घर की नार स्वस्थ होगी तो घर का हर सदस्य स्वस्थ रहेगा , अगर सदस्य स्वस्थ होगा तो कार्य भी सही ढंग से कर पायेगा और अगर कार्य सही होगा तो देश आगे  बढ पायेगा…..!!

मेरा मतलब बहनों , बस इतना ही है….आप अपने लिए भी जीयें….!! और मेरे भाईयों से भी गुजारिश है…..मा, बहन, बेटी या बहू के स्वास्थय पर भी कभी-कभार नजर डालें….अपने आप के फायदे के लिये ही सही…!!

कमलेश अग्रवाल

शहंशाह कौन है ?

13 दिसम्बर

चीन के महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस एकांत में बैठे चिंतन कर रहे थे , तभी उस रास्ते से चीन का सम्राट निकला । अपनी ही धुन में बैठे कन्फ्यूशियस नसम्राट की ओर कोई ध्यान नहीं दिया ।

यह बात सम्राट को बहुत बुरी लगी क्योंकि अक्सर सम्राट जब किसी राह से गुजरते तो प्रजा नतमस्तक होकर सम्मान करती थी । सम्राट संत के पास गये और
उनसे पूछा – तुम कौन हो ?कन्फ्यूशियस ने कहा – मैं शहंशाह हूं।

सम्राट को यह सुनकर गुस्सा आया और साथ ही आश्चर्य भी हुआ । उसने अपने क्रोध को दबाते हुए कहा – सम्राट तो मैं हूं । शहंशाहों का शहंशाह हूं । देखो , मेरे पास सेना है , सेवक है , धन – दौलत है , मान – सम्मान है । तुम्हारे पास तो कुछ भी नहीं है । न महल है , न कोई ठाट – बाट और न ही कोई सेवक , यहां तक कि रहने के लिए एक अच्छा सा मकान तक नहीं है । तो तुम बताओ भला कैसे शहंशाह ?

संत कन्फ्यूशियस ने बड़ी ही नम्रतापूर्वक कहा – देखिए सेना उसको चाहिए जिसका कोई शत्रु हो , पर मेरा कोई शत्रु नहीं है ।सेवक , नौकर – चाकर उसे चाहिए जो आलसी हो और अपना खुद का काम करने की ताकत न रखता हो। मैं न तो कमजोर हूं और न ही आलसी । अत : सेवक की कोई जरूरत नहीं।

रही धन – दौलत की बात , तो भाई यह उसको चाहिए जो गरीब हो , दरिद्र हो।

संत की यह बात सुन सम्राट ने आश्चर्य से पूछा , पर आपका धन तो दिखाई नहीं पड़ता ।

संत ने हंस कर कहा – भाई , मेरे पास संतोष है । ये सोना , चांदी , हीरे , जवाहारात मेरे लिए व्यर्थ हैं । अत : अब तुम ही बताओ कि सम्राट कौन है ? शहंशाह कौन है ?

संत की बात सुनकर सम्राट नतमस्तक हो गया , और उनके चरणों में गिर पड़ा ।

(नेट के सौजन्य से…)

ईमानदारी

12 दिसम्बर

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का शुरुआती जीवन अभावों में गुजरा था। जीवनयापन के लिए कम उम्र में उन्हें कई तरह के काम करने पड़े। कुछ दिनों तक उन्होंने चाय की दुकान पर भी नौकरी की। उन्हीं दिनों की बात है। एक महिला उनकी दुकान पर आई। उसने उनसे पाव भर चाय मांगी। लिंकन ने जल्दी-जल्दी उसे चाय तौलकर दी। रात में जब उन्होंने हिसाब-किताब किया तो उन्हें पता चला कि उन्होंने भूलवश उस महिला को आधा पाव ही चाय दी थी। वह परेशान हो गए। पहले तो उन्होंने सोचा कि कल जब वह फिर आएगी तो उसे आधा पाव चाय और दे देंगे। लेकिन फिर ख्याल आया कि अगर वह नहीं आई तो….। संभव है वह इधर कदम ही न रखे। वह समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें?

वह अपराधबोध से घिर गए थे कि उन्होंने उसे सही मात्रा में चाय क्यों नहीं दी। फिर उन्होंने तय किया कि इसी वक्त जाकर उस महिला को बाकी चाय दी जाए। आखिर उसकी चीज है, उसने उसके पूरे पैसे दिए हैं। संयोग से लिंकन उसका घर जानते थे। उन्होंने एक हाथ में चाय ली और दूसरे हाथ में लालटेन लेकर निकल पड़े। उसका घर लिंकन के घर से तीन मील दूर था। उन्होंने उस महिला के घर पहुंचकर दरवाजा खटखटाया। महिला ने दरवाजा खोला तो उन्होंने कहा- क्षमा कीजिए, मैंने गलती से आपको आधा पाव ही चाय दी थी। यह लीजिए बाकी चाय। महिला आश्चर्य से उन्हें देखने लगी। फिर उसने कहा- बेटा, तू आगे चलकर महान आदमी बनेगा। उसकी भविष्यवाणी सच निकली।

अहमियत ज्ञान की….

11 दिसम्बर

जब कभी भी  समाज की विसंगतियों पर बात होती हैं तो हमारे मन में ये बात जरुर आती है कि अब विवेक जागृत करना होगा ; और विवेक विद्या या ज्ञान से ही उपलब्ध हो सकता है । इस से मतलब यही  है कि आज की शिक्षा पध्धति में बदलाव लाना बहुत जरूरी है । देखा जाये तो आज की शिक्षा पद्धति सिर्फ याददास्त का ही मूल्यांकन मात्र है । इस पध्धति से विवेक जागृत होने की  संभावना  कम नजर आती दिखाई दे रही है । आज बच्चे  ज्ञान के लिए नहीं पढ रहे हैं, डिग्री के लिए पढ रहे हैं । अभिभावक भी आज यही चाहते हैं कि उनकी संतान के अच्छे मा‌र्क्स आने चाहिये फिर चाहे वे ये मार्क्स रट्टा मार कर ही क्यों न आयें…!! चाहे विषय को वे समझें या न समझें । क्या यह हम अभिभावकों का दुर्भाग्य नहीं है ? खास तौर से तब जबकि हम यह बात अच्छी तरह जानते हैं और हजारों उदाहरण भी हमारे पास ऐसे हैं, जिनसे यह साबित हो गया है कि दुनिया में कुछ खास वही कर सके हैं जिन्होंने लीक से हटकर सोचा है । जिनकी गिनती ज्ञानियों में की गई थी ।

अपनी अधूरी रह गई महत्वाकांक्षाएं पूरी करने के लिए जब हम अपने बच्चों को, छोटे भाई-बहनों या दोस्तों को उनके जुनून और उनकी रुचियों की परवाह किए बगैर अपनी इच्छानुसार कोई खास दिशा देने की कोशिश करते हैं, तब हम असल में उन्हें भटका रहे होते हैं ; क्योंकि हमारी चुनी हुई दिशा हमारे लिए तो बेहतर हो सकती है, पर किसी दूसरे के लिए इसका सही होना जरूरी नहीं है ।

भगत सिंह जब खेतों में बंदूकें बोने की बात किया करते होंगे और चंद्रशेखर जब अपना नाम आजाद बताते होंगे तो उनके माता-पिता को भी उनके भविष्य की चिंता जरुर हुई होगी । उन्होंने भी उन्हें उस रास्ते पर जाने से रोकना चाहा होगा । सुभाष चंद्र बोस ने जब आई सी एस को दरकिनार कर, आजाद हिंद फौज खडी करनी शुरू की होगी तो उनके परिजनों को भी कष्ट हुआ होगा…!! पर शायद वे अभिभावक ज्यादा स्वार्थी नहीं बन पाये होंगे….!!

हम अक्सर अपनी युवा संतानों को समझाते हैं कि पहले अपने हालात देखो और फिर सपने बुनो । अगर यही सही तरीका रहा होता तो क्या लाल बहादुर शास्त्री भारत के प्रधानमंत्री हो पाते ? या डॉ. ए.पी.जे अब्दुल कलाम राष्ट्रपति बनने के बारे में सोच सकते ?

हमारी या हमारे बच्चों की असफलता का ठिकरा अक्सर हम सामाजिक या प्रशासनिक व्यवस्था पर ही फोडते हैं , कभी भी ये नहीं सोचते कि इस असफलता के पीछे खुद हमारी अपनी हिप्पोक्रेस सोच ,हमारा खोखलापन ,  स्वार्थ या  बेबसी तो नहीं थे न…!! देखा जाये तो ये दोहरे मूल्यों की हमारी आदत कोई आज से नहीं, जमाने से चली आ रही है…!!

आज अभिभावक भी रिजल्ट ओरिएंटेड पढाई के हक्क में हो गये हैं । जैसे मैंने आगे कहा , आज बच्चे ज्ञान के लिए नहीं पढ रहे हैं, डिग्री के लिए पढ रहे हैं और उनका व उनके अभिभावकों का अंतिम उद्देश्य आजीविका से ही है । अगर बिना पढाई किए डिग्री मिल जाए तो 90 प्रतिशत अभिभावकों को अपनी संतान की पढाई की जरूरत ही महसूस नहीं होगी । ठीक यही हाल आगे भी होगा ।  अगर बिना डिग्री के नौकरी मिल जाए तो डिग्री भी नहीं चाहिए और अगर बिना नौकरी के वेतन मिल जाए तो नौकरी भी नहीं चाहिए…!! क्या आज  इस मानसिकता से उबरने की जरूरत  नहीं है ? क्या आपको आज ज्ञान की जरुरत महसूश नहीं हो रही ?

बच्चे के भीतर की मौलिकता का विकास तो ज्ञान ही कर पायेगा ,आप की ये संकीर्ण सोच उस के विवेक को सही रास्ता नहीं दिखा पायेगी वरन उसके ज्ञान में रुकावट ही बनी दिखाई देगी । आज की शिक्षा पद्धति सिर्फ याददास्त का ही मूल्यांकन है ,ज्ञान का नहीं । विवेक की जागृति के लिये ज्ञान का होना अति आवश्यक है । शायद इसी लिये हमारी प्राचीन गुरुकुल पद्धति को हमने अपनाया था क्योंकि उस शिक्षा पध्धति से विवेक को जागृत किया जाता था । राजा हो या रंक , गुरुकुल में सब एक ही छत के नीचे सोते, ,खाते, खेलते और गुरु व गुरु माता की आज्ञा का पालन भी करते …!! वहां नंबर नहीं देखे जाते थे ,वहां अमीर  और गरीब का भेद नहीं था । कृष्ण और सुदामा में कोई फर्क नहीं था …!! दोनों को ही जंगल से लकडियां लानी पडती थी…!! सिर्फ  कुशलता और ज्ञान को ही अहमियत दी जाती  थी ।

आज हमारी मानसिकता अजीब सी बन गई है…!! हम आज भगत सिंह पैदा हों ये तो चाहते है पर अपने घर नहीं, पडोसी के यहां…!! अपने घर में तो हम नोट कमाने वाला पुत्र ही चाहते हैं चाहे व बुध्धिजीवी हो या नहीं ….!! ये शायद इसीलिये , क्योंकि आज लक्ष्मीजी का आसन सरस्वतीजी के आसन से ऊंचा जो हो गया है…!! ज्ञान की नहीं , नोट  पाने की भूख जो हो चली है ..!!

 कमलेश अग्रवाल

एक आशा की किरण

7 दिसम्बर

हम देख रहें हैं कि मंहगाई बेलगाम हो चुकी है। भ्रष्टाचार दिन-प्रतिदिन अपनी सीमा लांघ रहा है । नेता लोग जेबें भरने में लगे हुए हैं ।  सरकार की ओर से मंहगाई को कम करने के लिए अनेकानेक घोषणाएँ की  जा रही है ; पर साथ ही साथ  यह भी तर्क देना वह नहीं भूलती कि ”कम बारिश” तथा ”अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में ऊंचे दाम”, ही महंगाई के लिए खास तौर से ज़िम्मेदार हैं …!! 

अर्थशास्त्रका सामान्य सा सिंद्धात है कि किसी भी उत्पाद का मूल्य कम करने के लिए उसका उत्पादन बढाना जरुरी है। लेकिन इसके साथ-साथ यह भी जरुरी है कि उत्पादित उत्पाद का 100 फीसदी उपभोक्ता तक पहुँचे। हमारे देश में विसंगति यह है कि कोई भी चीज 100 फीसदी गंतव्य स्थल तक कभी भी पहुँच नहीं पाती है। बिचौलिये, सरकारी बाबु , कुछ चमचें अपना हिस्सा बीच से ही मारना नहीं भूलते…!! कभी राजीव गाँधी ने भी इस तथ्य को माना था। अपने शासनकाल के दौरान उन्होंने कहा था कि 1 रुपये में मात्र 10 से 15 पैसे ही हितग्राही तक पहुँच पाते हैं। आज राजीव गाँधी  की धर्मपत्नी सोनिया गाँधीजी  अप्रत्यक्ष रुप से यूपीए सरकार की सर्वेसर्वा हैं। अगर वे राजीव गाँधी  द्वारा बताए गए विसंगति को दूर करने का प्रयास करती हैं तो मंहगाई,भ्रष्टाचार,बे‌ईमानी ,रिश्वतखोरी जैसी बदियों पर काबू पाना  नामुमकिन नहीं है।  जरुरत है तो सिर्फ अच्छी नियत की ।

सस्ते दामों से गरीबों को अन्न नहीं मिल रहा है क्योंकि कृषि उत्पाद कम हो रहा है..!! ये तर्क सरकार के द्वारा देना बिल्कुल भी सही नहीं है ।  जितना कृषि उत्पाद का उत्पादन हो रहा है, उसे जनसंख्या के अनुपात में कम जरुर कहा जा सकता है, लेकिन वह इतना भी कम नहीं है कि उसकी कीमत 70 से 80 रुपये तक पहुँच जाए…!! प्राकृतिक तथा दूसरे संकटों से जनता का रक्षण,देश के प्रशासकों की प्राथमिक ज़िम्मेदारी है । अगर शासक इन जिम्मेदारियों को निभा नहीं सकता है , तो उसे सत्ता पर रहने का हक भी नहीं मिलना चाहिये…!!

विधान सभा में सड़े हुए अनाज के सैम्पल दिखाने का नाटक करने की आवश्यकता नहीं है। राशन दुकानों में घटिया चीज़-वस्तुएं मिलती हैं, वह भी बहुत कम मात्रा में, और उसके लिए भी घंटों लाईन लगानी पड़ती है, यह सब आम जनता अच्छे से जानती है। ऐसे नाटक विधान सभा में चलते रहेंगे, पर इनसे महंगाई की समस्या हल नही होगी। इसे सुलझाने का एक ही उपाय है। जनता के हाथों में राशन दुकानों का नियंत्रण देना। इसीलिए हमें माँग करनी चाहिए कि जगह-जगह पर जनता द्वारा राशन समितियों का चयन किया जाये ! फिर उन समितियों के हाथों में स्थानीय राशन दुकानों का पूरा नियंत्रण दिया जाये तथा खराब गुणवत्ता तथा अपर्याप्त मात्रा की सप्लाई के लिए ज़िम्मेदार अधिकारियों, ठेकेदारों और मंत्रीओं को सजा देने का पूरा अधिकार भी इन समितियों को ही दिया जाये…!!

हमें माँग करनी चाहिए कि सभी (गरीब जनता) को उचित दरों पर, पर्याप्त मात्रा में अनाज, मिट्टीका तेल, खाने का तेल, शक्कर, आवश्यक दवाइयां, स्टेशनरी, कपड़ा, आदि, मिलना चाहिए ।

हमें माँग करनी चाहिए कि आयात निर्यात नीतियां तय करते वक्त, सब से पहला उद्देश्य, आम जनता की आवश्यकताओं की आपूर्तिका होना चाहिए ।

इन सब माँगों पर जब तक अमल नहीं किया जाता, तब तक महंगाई खत्म होना नामुमकिन है। ऊपर दी गयी सभी माँगें पूरी करना मुश्किल नहीं है। इसीलिए ”हमें जनता के प्रति प्यार है”, ऐसे कहनेवाले ग्रामपंचायत से लोक सभा तक के सभी नेताओं व जन प्रतिनिधियों पर दबाव डालना चाहिए कि वे भी यहीं माँगें उठाए । रहने की जगह से लेकर कारखानों, मोहल्लों, दफ्तरों, मतलब की काम करने की सभी जगहों पर हमें लोक राज समितियों का गठन करना चाहिये या सरकार से इस की मांग करनी चाहिये ।

ऊपर बताई माँगों के साथ-साथ, मेहनतकश जनता की खुशहाली के लिए आवश्यक अन्य माँगों की पूर्ती के लिए भी ऐसी समितियों का गठन आम जनता के लिये करना आज के परिप्रेक्ष्य में अति आवश्यक जान पडता दिखाई दे रहा है । राशन व्यवस्था जैसी और कई समितियों का कारोबार इस तरह की जन समितियों के हाथों में आना चाहिये । आम जनता की भागीदारी इस तरह के मुद्दोमें हो ऐसे कदम उठाना आज की वर्तमान परिस्थिति में आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है ।

केजरीवाल जी की यही सकारात्मक सोच के चलते ही उन्हों की पार्टी का नामकरण “आम आदमी की पार्टी “ रखा गया है  । हो सकता है ये AAP शायद धीरे-धीरे इसी तरह देश से  भ्रष्टाचार खत्म करने में कामायाब  हो जाये..…!!

 कमलेश अग्रवाल

 

आज नारी ने पुरूष -वर्चस्व को तोड़ दिया है…

5 दिसम्बर

वर्षों से रस्मो-रिवाज के दरवाजों के पीछे शर्मायी- सकुचायी सी खड़ी महिलाओं की छवि अब सजग और आत्मविश्वासी व्यक्तित्व में तब्दील हो चुकी है । पति के स्वर्ग सिधार ने के बाद गरुड पुराण जैसे ग्रंथो के उदाहरणों के आधार पर नारी को लेकर तरह-तरह के बंधनों का वर्णन करना, उसे सामाजिक परंपरओं का वास्ता देना सदियों से चला आ रहा है, पर आधुनिक महिलायें इस तर्क को नहीं मानती हैं । वे जानना चाहती हैं कि अगर आदमी के निधन के बाद औरत को बंधनों में बांधने के नियम की बात इस पुराण में कही गई है तो फिर औरत के निधन के बाद आदमी को कौन से नियम का पालन करना चाहीये, ये कौन से पुराण में लिखा है ? क्यों ये नियम लागू करने वाले पुराण औरतों के लिये ही बनाये गये , पुरुषों के लिये क्यों नहीं ?

अब ये महिलायें पूछने लगी हैं कि धर्म के कामों के समय हाथ पर बाँधा जाने वाला कलावा लड़कों के दायें और लड़कियों के बायें हाथ पर क्यों बाँधा जाता है, क्यों नहीं दोनों के एक ही हाथ पर बांधा जाना चाहिये ? यदि पूजा-पाठ या पुण्य के कार्य कराने के लिए जनेऊ धारण करना शास्त्रोंमें जरूरी माना गया है तो पुरोहित का कार्य करने वाली महिला जनेऊ क्यों नहीं धारण कर सकती ?

शायद इसी सोच के चलते आजकल लड़कियों ने अब अयोग्य वरों को शादी के मण्डप से बाहर निकालना आरम्भ कर दिया है । दुल्हन के वेश में सजी-धजी बैठी ये लड़कियाँ किसी ऐसे व्यक्ति को जीवन साथी के रूप में नहीं चाहती, जो उनको व उनके परिवार को सम्मान न दे या उनके अभिभावकों को दहेज की आड़ में अपनी धनलोलुपता का शिकार होने पर मजबुर करे । आज हम इसका प्रभाव भी देख रहें हैं । आज बेटे(वर) के माता-पिता अच्छी लडकियों के लिये घूमते नजर आ रहे हैं..!!

21वीं सदी के इस दौर में महिलायें सिर्फ आवाज ही नहीं उठा रही हैं वरन इन रूढ़िगत मान्यताओं को पीछे ढकेलकर नये मानदण्ड भी स्थापित कर रही हैं । आज राजस्थानमें ‘एकल नारी शक्ति संगठन’ के नेतृत्व में वैधव्य जीवन जी रही हजारों स्त्रियोंने उन साज-श्रुंगारों  का इस्तेमाल करना आरम्भ कर दिया है जो विधवा होते ही समाज उनसे छीन लिया करता था । हाथों में मंहेदी, कलाईयों में रंग-बिरंगी चूड़ियाँ, माथे पर बिंदिया और खूबसूरत परिधानों के साथ ये विधवायें आज मांगलिक कार्यों में  अपनी सहभागिता दर्ज करा रही हैं ।

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के घुमका गाँव में 8 जुलाई 2008 को एक लड़की अन्नपूर्णा ने स्वयंवर द्वारा अपना पति चुना ।

पश्चिम बंगाल के पूर्वी मिदनापुर जिले के गाँव नंदीग्राम की शबनम ने सन् 2003 में पिता जी की मौत के बाद अपने पैरों पर खड़े होने हेतु काजी बनने का रास्ता चुना और संयोग से काजी के रूप में उनका पंजीयन भी हो गया ।

आज वक्त आ गया है नारी को समकक्ष मानाने का..!! हमे ये मानना ही होगा कि शिक्षित व प्रशिक्षित नारियां ही हमारी संस्कृति की धरोहर हैं । उन्हें अगर हम सही सम्मान देगें तभी हम अपने बच्चों को , देश को , हमारी परंपराओं को सही मोड दे पायेगें ।

अब हमें ये फौसला करना ही होगा कि अज्ञानी एवं अल्पज्ञानी पुरूषों के भरोसे सनातन परम्परा और आचार-विचार सुरक्षित रहेंगे या शिक्षित- प्रशिक्षित नारियों के हाथ में हमारी संस्कृति की पताका महफूज रहेगी ?

इस विषय में आप का क्या ख्याल है ?

कमलेश अग्रवाल