Archive | जनवरी, 2013

सपनें

31 जनवरी

हमारा मस्तिष्क बहुत ही विचित्र यंत्र है । हम जैसा सोचते हैं वह वैसे ही काम करने लगता है । हमारे कई अव्यक्त विचार व भावनाएं, जीवन के अनुभव, भय आदि अचेत मन में रहते हैं , जो जाने अनजाने हमारे स्वप्न बन कर उभरते हैं । हर इंसान स्वप्न देखता है। कुछ उसे याद रहते हैं और कुछ वह भूल जाता है । मनोचिकित्सक फ्रायड का ऐसा मानना है कि हमारे स्वप्न अचेत मन के विचारों को व्यक्त करते हैं ।  अधिकतर जब आपके अंदर  क्रोध, ईर्ष्या, डर या आप की प्यार की भावना को ठुकराया गया हो, तब आप को अपने असुरक्षित होने  के सपने आते हैं । कईबार विध्यार्थिंयों को पेपर पूरा न होना, पेपर मिलने पर कुछ भी न आना, परीक्षा में लेट हो जाना, पेन या पेन्सिल की नीप टूट जाना इत्यादि के सपने दिखाई देते हैं । इस का कारण है कि उन को जितना ध्यान अपनी पढाई पर देना चाहिये था वह, वे नहीं दे पाये और इस बात का भय उन के भीतरी मन में है ,जो सपने बन उन के अचेतन मन से उजागर होते हुए उन्हें दिखते हैं । कई बार सपनो मे आप अपने आप को पलंग से नीचे गिरते हुये देखते हैं , कई बार जमीन से भी टकराते हुए अपने आप को देखते हैं, इस का कारण है, कहीं न कहीं आप के अंदर आक्रोश छीपा है या आप अपने आप को असुरक्षित महसुस कर रहे हैं । मतलब कि ये सपनें आप के अंदर के छीपे अवसाद, भावनायें ,क्रोध,प्यार, असुरक्षा जैसी अचेत मनोभावों के ही प्रतिबिंब हैं ।

सपने इसके अतिरिक्त और भी कई कारणों को लेकर आ सकते हैं । इतना ही नहीं हमें हमारे जीवन के कई प्रश्नों के उत्तर भी इन सपनों से मिल सकते हैं । ये सपने संकेतों की भाषा बोलते हैं जिसे समझने के लिए हमें उन संकेतों को समझना पड़ता है । कई ऐसे उपयोगी आविष्कार हुए हैं जो सपनों की वजह से ही सम्भव हुए । मैरी शेली ने अपनी लोकप्रिय पुस्तक फ्रेंकेस्टाइन को लिखा था तब उन्होनें कहा था कि उस पुस्तक के पात्रों को उन्होंने सपनों में देखा था । इलियास होवे ने अपने सपने में खुद को आदिवासियों की कैद में देखा था । उन्हों ने देखा कि वे आदिवासी अपने हथियारों को अजीब तरह से सिल रहे हैं । जिस  यंत्रका उपयोग वे आदिवासी सीने के लिये कर रहे थे उस यंत्रके कारण ही सिलाई मशीन की खोज का श्रेय वे ले पाये..!! इसी तरह फेड्रिक ओगस्ट के द्वारा बेनजीन (C6H6) जैसा जटिल रसायनिक फार्मुला तैयार करना भी सपने के आभारी ही माना जाता है । जैम्स वॉटसन जिन्होनें अपने मित्र फ्रांसिस क्रिक के साथ मिलकर डी.ए.नए की खोज की थी, का कहना था कि उन्होनें अपने सपने में ढेर सारी स्पायर सीढियाँ देखी थी जिस कारण ये बेहतरीन खोज वे कर पाये…!! ये भी माना जाता है कि अपनी मृत्यु के कुछ दिन पहले अब्राहम लिंकन ने अपनी पत्नी से कहा था कि उन्होनें सपने में कुछ लोगों को रोते हुए देखा । जब उन्होनें उन रोनेवालों से उन के रोने का कारण पूछा तो उन लोगों ने कहा कि हमारे राष्ट्रपति को किसी ने गोली मार दी है इसीलिये वे रो रहे हैं और कुछ दिनों बाद अब्राहम लिंकन की मौत इसी तरह हुई..!!

मतलब कि सपने जहां कईबार जाने अनजाने हमारे बौद्धिक विकास में महत्वपूर्ण भाग निभाते दिखाई पडते हैं वहीं कईबार हमें भविष्य में होनेवाली घटनाओं का अंदेशा भी दे जाते हैं..!!

मतलब है कि स्पनें इंसान की दबी हुई इच्छाओं का प्रकाशन करते हैं जिनको हमनें अपनी जाग्रत अवस्था में कभी सोचा था..!! अर्थात सपनें हमारी वे इच्छायें हैं जो किसी प्रकार के डर या भय के कारण हमारी जाग्रत अवस्था में पूर्ण नहीं हो पाती हैं पर सपनों के रूप में आ कर हमें मानसिक संतुष्टि एवम शांति प्रदान करती है ।

वैज्ञानिकों के मतानुसार रात को जब हमारा शरीर आराम कर रहा होता है तब भी हमारा मस्तिष्क काम में लगा होता है । वह दिनभर मिले चेतन अवस्था के स्फूरण, संकेत, भावनायें को लेकर सक्रिय हो जाता है और इन सब को वह सपनों के जरीये प्रदर्शित करता है ।जहां डरावने व बुरे सपनें इंसान को भयभीत करते हैं वहीं दिलचस्प, मनोहारी व अच्छे सपनें उसे आत्मविभोर भी करते हैं..!! इंसान इन अच्छे सपनों की जाल में घिरा हुआ एक अजीब सी खुशी का अनुभव करता है जो उसकी  ऊजा को बढाती है । अगर सोचा जाये तो बुरे सपनें भी उसे चेतावनी तो दे ही जाते हैं..!!

सपनें हमारे जीवन में शुभ-अशुभ घटने वाली सुक्ष्म और प्रमाणिक जानकारी को हम तक पहूंचाने वाले माध्याम हैं । इसीलिये मेरा तो यही मानना है कि सपनें असल में हमारे अंदर की भावनाओं के प्रेरक भाग्यसूचक हैं जिसे देख हम बहुत कुछ समझ जाते हैं ।

कमलेश अग्रवाल

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ऐतिहासिक महाकुंभ पर्व

24 जनवरी

हमारे विष्णुयोग मीमांसा, योगसार सहिंता आदि ग्रंथोंके मुताबिक  तीर्थराज प्रयाग में तीन विशेष तिथियों जैसी मकर संक्रान्ति,मौनी अमावस्या व वसन्त पंचमी पर स्नान करने से एक हजार अश्वमेध करने का फल प्राप्त होना, माना जाता रहा है । ये पुण्यदायक स्नान महाकुंभ पर्व पर किये जाते हैं । इन तीन स्नान को शाही स्नान कहा जाता है । इस के अलावा और तीन स्नान भी किये जाते हैं । मतलब कि कुल छह स्नान इस पर्व पर श्रध्धालुं करते हैं । इस बार शाही स्नान गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर 14 जनवरी , मकर संक्रांति के मौके पर सोमवार को इस शताब्दी के दूसरे महाकुंभ के रुप में आस्था और विश्वास के साथ किया गया । 10 फरवरी मौनी अमावस्या तथा 15 फरवरी वसंत पंचमी के दिन पर और दो शाही स्नान किये जाने हैं । इसके अलावा पौष पूर्णिमा 27 जनवरी, माघ पूर्णिमा 25 फरवरी तथा 10 मार्च महामहाकुंभ पर्वशिवरात्रि के दिन मुख्य स्नान की तिथियां निश्चित की गईं हैं । 

इतिहासकारों का मानना है कि कुंभ की शुरूआत राजा हर्षवर्धनके कार्यकाल में हुई जबकि कुछ का मानना है इसे आदि शंकराचार्य ने सन्यासी मण्डल के द्वारा     धर्म के प्रचार और प्रसार कार्य के हेतु  प्रति तीसरे वर्ष  निश्चित स्थानों पर एकत्रित होने के कारण शुरू करवाया था । 

हमारे शास्त्रों के मुताबिक एक ऐसा समय था जब दैत्यों पर समय काल की विशेष कृपा थी । वे देवताओं पर भारी थे । चूंकि भगवान विष्णु त्रिकालदर्शी माने जाते हैं इसीलिये वे देवताओं के मन में दैत्यों से भीती की बात जान गए थे । वे जानते थे कि दैत्यों पर विजय हांसिल करना सरल नहीं था सो वे देवगण से बोले—‘‘ देवगण ! दैत्यों पर इस समय काल की विशेष कृपा है इसलिए जब तक तुम्हारे उत्कर्ष और दैत्यों के पतन का समय नहीं आता, तब तक तुम उनसे संधि कर लो । क्षीरसागर के गर्भ में अनेक दिव्य पदार्थों के साथ-साथ अमृत भी छिपा है । उसे पीने वाले के सामने मृत्यु भी पराजित हो जाती है । इसके लिए तुम्हें समुद्र मंथन करना होगा । यह कार्य अत्यंत दुष्कर है, अतः इस कार्य में दैत्यों से सहायता लो ।”

कूटनीति भी यही कहती है कि आवश्यकता पड़ने पर शत्रुओं को भी मित्र बना लेना चाहिए । तत्पश्चात अमृत पीकर अमर होने की इच्छा से देवताओं ने इसे  अंजाम देने की ठन ली  ताकि दुष्ट दैत्य  उनका  अहित न कर सकें। भगवान विष्णु के परामर्श के अनुसार इन्द्रादि देवगण दैत्यराज बलि के पास संधि का प्रस्ताव लेकर गए और उन्हें अमृत के बारे में बताकर समुद्र मंथन के लिए तैयार कर लिया । समुद्र मंथन के लिए समुद्र में मंदराचल को स्थापित कर वासुकि नाग को रस्सी बनाया गया । तत्पश्चात दोनों पक्ष अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन करने में लग गये । अमृत पाने की इच्छा से सभी बड़े जोश और वेग से मंथन कर रहे थे। आखिरकार समुद्र मन्थन से अमृत कुंभ निकला । इस कुंभ के निकलने पर असुर उसे छीनने के लिए देवताओं पर टूट पड़े, किन्तु इन्द्र का पुत्र जयन्त उस अमृत के घड़े को लेकर निकल गया । यह भाग-दौड़ दिव्य 12 दिन ( मनुष्य के 12 वर्ष) पर्यन्त चलती रही । इन 12 दिव्य दिनों में चार स्थानों पर चार बार राक्षसों ने जयन्त को पकड़ा और उससे अमृत घड़ा छीनने का भरसक प्रत्यन किया, पर सूर्य, चन्द्र और बृहस्पति ने उन चारों स्थानों पर जयन्त का साथ देकर अमृत कुंभ की रक्षा की । ***माना जाता है कि बृहस्पति ने राक्षसों से अमृत कुंभ की रक्षा की, सूर्य ने घड़े को फूटने से बचाया और चन्द्रमा ने घटस्थ अमृत को गिरने से बचाया, इसी कारण इन तीनों का कुंभ महापर्व से गहरा सम्बन्ध है । इस खींचा-तानी में अमृत की कुछ बूंदें प्रयाग, हरिद्वार,नासिक और उज्जैन इन चारों स्थानों पर गिरी ही गई । चूंकि प्रयाग(इलाहाबाद) में कलश से ज्यादा बूंदें गिरी थीं इसलिये हर बारह साल (संग्राममनुष्य के 12 साल तक चला) बाद यहां महाकुंभ लगने लगा।  

यही वजह है कि हिंदू श्रध्धालु हर कौने से इस महकुंभ पर्व पर जमा होते हैं और ये शाही स्नान कर अपने को धन्य करते हैं । कई विदेशों में बसे हिंदू एवम भारतीय आध्यात्मिक ग्रंथों में श्रध्धा रखनेवाले विदेशी भी यहां इस महापर्व पर लाभ लेते देखे गये हैं ।

***यही वजह है कि जब सूर्य और चन्द्रमा मकर राशि में तथा गुरु वृष राशि में आते हैं, तो प्रयाग में भव्य महाकुंभ होता है । दूसरा- जब कुंभ राशि में गुरु हो एंव सूर्य मेष राशि में होता है, तब हरिद्वार में कुंभ का आयोजन होता है । तीसरा- सिंह राशि में गुरु और सूर्य एंव चन्द्र कर्क राशि में भ्रमण करते है, तब नासिक (पंचवटी) में कुंभ मेले का आयोजन होता है । चौथा कुंभ- जब तुला राशि में सूर्य आये तथा गुरु वृश्चिक राशि में भ्रमण करें, इस योग में अवनितकापुरी (उज्जैन) में कुंभ के पर्व को बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है ।

 कमलेश अग्रवाल

अकेलापन एक समस्या

23 जनवरी

आज हम देख रहें हैं कि कई लोगों का हरा-भरा परिवार होने के बावजूद भी उनका साथी अकेलापन व खौफनाक सन्नाटा ही होता  है । एक न्यूज चैनल पर प्रसारित ‘आप पर असर क्यों नहीं होता ?’ नामक स्पेशल रिपोर्ट ने मेरे दिल-दिमाग पर गहरा असर कर दिया । इस रिपोर्ट में दिल्ली व मुम्बई जैसे महानगरों में उन लोगों के जीवन पर प्रकाश ड़ाला गया जो अकेलेपन के साये में जीवन व्यतीत कर रहे हैं । इसमें सबसे पहले नोएडा में रह रही दो बहनों सोनाली व अनुराधा के बारे में दिखाया गया था  जिनके भाई ने माता-पिता की मृत्यु के बाद उन्हें अकेला छोड़ दिया और दोनों बहनों ने उसी अकेलेपन को अपना सहारा बनाकर खुद को घर में नजरबन्द कर लिया । वे केवल परिवार ही नहीं बल्कि समाज से भी कटकर दो जिन्दा लाशों में तब्दील हो गई । इसी तरह मुबंई में रहने वाली ‘पल्लवी पुरकायस्थ ’ की हत्या भी उसका अकेले रहना बताया गया और तो और दिल्ली के रजौरी गार्डन में रह रही मशहूर प्रोफेसर तारा, जो एक ड़ॉस टीचर्स थीं, जिनके घर कभी मशहूर अभिनेत्रियाँ नृत्य सीखने आया करती थीं आज अकेलेपन से त्रस्त हैं । इन सभी सच्ची घटनाओं ने हमें इतना तो बता ही दिया कि अकेलापन आज समाज में तेजी से फैलती एक गंभीर समस्‍या हो चली है ।

दुनिया तेज़ी से आधुनिकता की ओर बढती जा रही है । आधुनिकतम तकनीक के विकास के कारण जीवन सुविधापूर्ण होता जा रहा है । टी.वी.,रेडियो ,सिनेमा, नेट आदि मनोरंजन के समस्‍त साधन विद्यमान हैं । इसके बावजूद भी अकेलापन कम होने के बजाय दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है । क्यों आज गरीब, अमीर, शिक्षित, अशिक्षि‍त, बच्चे-बडे, नर-नारी सभी अकेलापन महसूस करने लगे हैं ? सच तो ये है कि ये अकेलापन हमें न केवल मानसिक तौर पर कमजोर बनाता जा रहा है, बल्कि हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी  नुकसान पहुंचा रहा है । आज स्वीडन की लगभग आधी आबादी अकेले जीवन गुजार रही है । मतलब वहां से दाम्पत्य जीवन का लोप हो चला है । ब्रिटेन में 34, जापान में 31, इटली में 29, दक्षिणी अफ्रीका में 24, केन्या में 15, कनाडा में 27, अमेरिका में 28 और ब्राज़ील में 10 फीसदी लोग एकला चलो की जीवन शैली अपना चुके हैं । हमारे ‘दूधौ नहाओ पूतो फलो’ की मान्यता वाले देश में भी अब अकेले रहने की यह प्रवृति अग्रसर होती दिख रही है ।

शिकागो यूनिवर्सिटी के मुख्य शोधकर्ता प्रोफेसर जान कैसिपो का कहना है कि स्वास्थ्य के हिसाब से देखें तो अकेले रह रहे व्यक्ति और लोकप्रिय व्यक्ति के बीच वैसा ही फर्क है जैसा एक धूम्रपान करने वाले तथा धूम्रपान नहीं करने वाले शख्स के बीच होता है ; क्योंकि एकांकीपन के तनाव के लिए उत्तरदायी प्रोटीन का श्रावण ऐसी स्थिति में अधिक होने लगता है । इस प्रोटीन के श्रावण से हृदय रोग, टाइप 2 डायबिटीज, गठिया और अल्जाइमर जैसी बिमारियों के होने का खतरा भी बढ़ जाता है । मतलब है कि एकाकीपन न सिर्फ हमारे व्यवहार पर बल्कि हमारे खून के प्रवाह पर भी असर डालता है । 

इस अकेलेपन के क्या कारण हो सकते हैं ? इस पर अगर गौर किया जाये तो शायद इस समस्या से हम निपट सकें….!! 

अनेक लोगों ने यह स्‍वीकार किया है कि उनके किसी प्रियजन की मृत्‍यु होने पर अथवा विवाह के तलाक  होने पर, उन्‍होंने गहरे अकेलेपन का अनुभव किया है । कईबार बेरोजगार या निवृत व्यक्ति निष्क्रिय होने पर भी अकेलेपन का अनुभव करने लगता है । शारीरिक अथवा मानसिक रूप से लाचार इंसान, जिसे  अपनी छोटी से छोटी ज़रूरतों के लिए दूसरों का मोहताज होना पड़ जाता है, वह भी अकेलेपन का गहरा शिकार होने लगता है ।

कईबार व्यक्ति अपने आसपास के माहौल से प्रभावित होकर यदि बुरे व्‍यसन का शिकार हो जाये अथवा अपनी या किसी दूसरे की ग़लती से  किसी अपराध में लिप्‍त हो जाए तब भी वह तन्हाई महशूस करता है और सदैव एक दोहरी ज़ि‍न्‍दगी जीने पर मजबुर हो जाता है । उसे हर वक्त अपने सम्‍मान खो जाने का भय सताता रहता है । भीड़ में रहकर भी उसे सहजता का अहसास नहीं होता है और धीरे-धीरे वह अकेलेपन के जाल में फंसने लगता है ।

किसी दंगे-फसाद अथवा किसी अन्‍य मजबुर परिस्थिति की कोई युवती अथवा महिला शिकार हो जाए और अपना शील गवां बैठे तब एक गहरे सदमे के कारण वह अपनेआप को दूसरों से दूर रखना चाहती है । तब उसका अकेलापन गहरा होता जाता है और अनायस ही वह तनावग्रस्त होती जाती है । जीवन जीने की इच्छा मर जाती है और आत्महत्या जैसे विचार उस पर मंडराने लगते हैं या वह बहूत हिंसक बनी नजर आती है । कईबार ऐसा भी देखा गया है कि कम उम्रके नवयुवक भूलवश यदि अपनी सीमाएं लांघ जाते हैं और अपनी पवित्रता खो बैठेते हैं तो एक हीन भावना उनमें पनपने लगती है जो उन्हें एक अपराध का बोध कराती रहती है ; ऐसी परिस्थिती में वे अपनेआप को दूसरों से दूर रखना चाहते हैं और इस का परिणाम अकेलेपन में परिणीत हो जाता है ।

हम एक सामाजिक प्राणी हैं । हमारे समाज में अनेक प्रकार की प्रबल मान्‍यताएं, पूर्वाग्रह एवं वर्जनाएं हैं । जाति, भाषा, रंग, हैसियत, व्‍यवसाय, योग्‍यता इत्‍यादि पर आधारित अनेक अलिखित नियम एवं परम्‍पराएं हैं जिन्हें हमें मानने ही पडते हैं । जब हम इस परिधि से बाहर जा नहीं पाते तब हम विवश हो एक कुंठा के  कूप-मंडूक में अपनेआप को फंसा हुआ महशूस करते हैं एवं अकेलेपन का शिकार बनते जाते हैं ।

मतलब कि अकेलेपन से छूटकारा मिलना बेहद जरूरी है । एक स्वस्थ समाज में परिवार, दोस्त, रिश्तेदार, बंधु-बांधव का होना बेहद जरुरी है । हम भारतीय संयुक्त परिवार के सदा हिमायती रहे हैं ; पर दिनोंदिन पाश्चायात संस्कृति के चलन ने अब विभक्त परिवारों की ओर रुख करना आरंभ कर दिया है । जिस कारण आज के बच्चे एकल-खोरे बनते जा रहे हैं । 

एरिक क्लीनेन बर्ग ने , ‘गोंइंग सोलो’ पुस्तक प्रकाशित की है जो ऐसे वर्ग  के लिये कुछ राहत देने वाली बातें सामने रखती है। इस किताब के अनुसार सर्वेक्षित 300 अमेरिकी लोगों में जो अकेले रह रहे  हैं, जरूरी नहीं है कि वे दुखी हों । ऐसे लोग सामाजिक रूप से बहुत सक्रिय पाए गए ब निस्बत परिवार वालों के; जिन्हें घर से फुरसत ही नहीं मिलती । ऐसे लोगों ने अपने महान उद्येश्यों से कभी समझौते नहीं किये, ना ही अनुचित दबाव से डरे । वे अपने कर्तव्य पथ पर अडिग रहे क्योंकि परिवार न होने से उनकी आवश्यकताएं काफी कम थीं । उन्होंने अपनी निजी स्वच्छन्दता, व्यक्तिगत नियमन और आत्मबोध की जिन्दगी के आड़े किसी को आने नहीं दिया और समाज की सेवा की । वे क्या चाहते हैं, कब चाहते हैं, कितना चाहते हैं, मतलब कि अकेलेपन को ऐसे इंसान अपनी नीजि जरुरतों के मुताबिक अपनाते हैं । ऐसी सोचवाला वर्ग घर बार और  गृहिणी/ गृहस्वामी की आये दिन की धौंस, उसकी हर उचित अनुचित फरमाइश से भी मुक्त रहना चाहता है। और सबसे मजेदार बात यह कि अकेले रहना ही उन्हें कईबार फिर से दुकेले होने को उकसाता भी है ।

बदलती दुनिया में हम हर विषय को अपनी सोच और सुविधा के अनुसार लेने लगे हैं…!! और इस के लिये जरुरत पडने पर ऐसे साधन और संसाधन भी जुटा लेते हैं…!! पुस्तक, ‘गोंइंग सोलो’ शायद अकेलेपन को अपनी तरह से सही ठहराती हो पर इस सत्य को भी नकारा नहीं जा सकता कि अकेलापन हमारे व्यवहार और हमारे दिलो-दिमाग पर अपना नकारात्मक असर तो करता ही  है…..

रश्मिप्रभाजी के द्वारा लिखी गई ये कविता बहुत कुछ कहती नजर आ  रही है…..

अकेलापन घंटों मुझ से बातें करता है,

भावनाओं को तरासता है,

जीने के लिये मुठ्ठियोंमें,

चंद शब्द थमा जाता है…..

कमलेश अग्रवाल

 

 

 

 

क्या पाकिस्तान की नीयत में खोट है ?

18 जनवरी

पाकिस्तान से जब-जब भारत ने अपने रिश्ते सुधारने की बात की है, तब-तब हमारे सामने उस का दोहरा चरित्र ही सामने आया है । दो भारतीय जवानों की हाल ही में पाक सैनिकों ने हत्या कर दी और उनमें से एक के सिर को काट कर अपने साथ ले गये । इस घटना के बाद दोनों देशों की सीमा पर भारी तनाव हो गया है साथ ही साथ देश का हर नागरिक  पाकिस्तान के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा में है । 1998 में जब पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान से दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए लाहौर यात्रा की तब ऐसा लगा था कि दोनों देशों ने पुरानी कडवाहट और दिल में पनपी कटुता को भुला दिया है । अब अमन-चैन का वातावरण कायम हो जायेगा ।

लेकिन पाकिस्तन के दिल में तो कुछ और ही चल रहा था । उसने सर्दियों के मौसम में अपनी सैना द्वारा भारत की सीमा पर अपनी घुसपैठ जारी रखी । फलस्वरूप 1999 में करगिल युद्ध हुआ । उसके बाद पाकिस्तान के साथ हमने कई वर्षों तक क्रिकेट खेलना और राजनैतिक  संबंध खत्म कर दिए गए । इस बीच पाक पोषित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैय्यबा ने एक बार फिर 26/11 के दिन मुंबई हमले को अंजाम दिया और फिर दोनों देशों के रिश्तों में खटास आ गई ।

फिर दुनिया के कई देशों ने इस घटना की निंदा करते हुए एशिया में शांति कायम करने के लिए भारत को पाक से फिर बातचीत के जरिए रिश्तों को बेहतर बनाने की अपील की ।इसी बात को नजर में रख भारत ने पाकिस्तान के साथ बातचीत शुरू की । इस के चलते ही नवंबर 2003 में संघर्ष विराम की घोषणा की गई । भारत के विदेश मंत्री पाकिस्तान गए । पाक के विदेश मंत्री भारत आए । एक बार फिर रिश्तों में मिठास दिखने लगी । पाक क्रिकेट टीम ट्वेंटी-20 और वनडे सीरीज खेलने के लिए भारत के दौरे पर आई । भारतीय दर्शकों ने उन का स्वागत किया महेमान नवाजी की । इस महेमान नवाजी को देख पाकिस्तान के पीसीबी अध्यक्ष जका अशरफ ने भारतीय दर्शकों की प्रशंसा के पुल बांधते हुए कहा, ‘भारत की मेजबानी से हम गदगद हो गए ।‘ पर ये रिश्तों की मिठास ज्यादा दिन न टिक पाई । पाक में रह रहे मुंबई आतंकवादी हमले का मास्टर-माइंड हाफिज सईद ने भारत के खिलाफ जहर उगलते हुए फिर एकबार कश्मीर में हमले की धमकी दे डाली…!! इससे दोनों देशों के बीच फिर से रिश्तों में खटास आ गई । 

वैसे भी पाकिस्तान शांति की आड़ में भारत पर  छुप-छुप कर हमले करने से  बाज कहां आया था…!!  एक सर्वेक्षण के मुताबिक पिछले तीन साल में पाक ने करीब 200 से ज्यादा बार संघर्ष विराम का उल्लंघन किया है । इस बार तो उस ने भारत के दो जवान लांसनायक हेमराज और सुधाकर सिंह की बर्बर हत्या कर इतना जघन्य कृत्य किया है जो माफी ले काबील ही नहीं है…!! शायद पाकिस्तान ये मान बैठा है कि शांति और अहिंसा का हिमायती भारत उस की नीयत में जो खोट है उसे देख ही नहीं पाया….!!

मेरा मानना है कि अगर पाक इसी तरह से संघर्ष विराम का लगातार उल्लंघन करता रहा और हमारे सैनिकों के साथ इस तरह का जधन्य अपराध करता रहा तो भारत को न चाहते हुए भी इसका कड़ा जवाब देना पड़ेगा और देना भी चाहिए । बस दिक्कत ये ही नजर आ रही है कि भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के पास परमाणु हथियार हैं । अगर इस बार भारत-पाक युद्ध हुआ तो परमाणु हथियार का इस्तेमाल हो सकता है ऐसा अंदेशा है । ऐसे में हिरोशिमा और नागासाकी जैसे बडे नरसंहार होने से झूठलाया नहीं जा सकता ।

सेब चाकू पर हो या चाकू सेब पर…..कटना तो सेब को ही होगा….!! मतलब की इस का खामियाजा तो पूरी दुनिया को ही भुगतना होगा…!! प्रभू पाकिस्तान को सदबुध्धि दे….

कमलेश अग्रवाल

अपराध की डगर पर युवा वर्ग… क्यों ?

17 जनवरी

कुछ दिनों पूर्व उत्‍तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक लूट का पर्दाफाश हुआ । पुलिस ने जिन लोगों को गिरफ्तार किया वे पेशेवर अपराधी नहीं बल्कि इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ने वाले नौजवान थे…!!  नोएडा पुलिस ने अभी कुछ दिन पहले दो युवकों को चेन स्‍नेचिंग के आरोप में गिरफ्तार किया था । पूछताछ पर पता चला कि वे मैनेजमेंट के छात्र हैं और उनके पिता सरकारी विभाग में ऊंचे पद पर कार्यरत हैं..!! दिल्ली में हुए गैंगरेप  से पूरा देश खफा है..!! अब यहां, सवाल यह उठता है कि आखिर युवा अपराध की डगर पर क्‍यों चलने लगे हैं ?

अगर देखा जाये तो नीचे दी गई पंक्तियां कितना सच बयां करती दिख रही हैं…..

संघर्षों के साए में असली आजादी पलती है,

इतिहास उधर मुड जाता है, जिस ओर जवानी चलती है….

हम जानते हैं कि युवा ही राष्‍ट्र की प्राणवायु और भविष्‍य होते हैं । शायद इसीलिये विवेकानंदजी के जन्मदिवस, 10 जनवरी को हम युवा राष्ट्रीय-दिन के रुप में मनाते आ रहें हैं ï 2011 में की गई जनगणना के अनुसार भारत में लगभग 54 फीसदी युवा आबादी है । यह आबादी चाहे तो मात्र 20 वर्षों में ही देश का भविष्‍य बदल सकती है लेकिन पिछले साठ वर्षों से हमारा भारतवर्ष एक विकासशील देश ही बन पाया । इसका कारण शायद यही है कि हमारी युवा जनसंख्‍या की शक्ति और उनकी काबिलियत का अब तक प्रशासन और देश के नेतृत्‍व  के द्वारा सही इस्‍तेमाल नहीं किया गया । अगर हम देश को आगे ले जाना चाहते हैं या समय-समय पर आमूल चूल परिवर्तन लाना चाहते हैं तो हमें इस युवाशक्ति का इस्तमाल करना होगा । उसे अपराधिक गतिविधियों से बचाना होगा । हमने देखा है कि अभी कुछ समय पहले ही समाजसेवी अन्‍ना हजारे द्वारा भ्रष्‍टाचार के खिलाफ किये गये आंदोलन में युवाओं ने अपनी सशक्‍त उपस्थिति दर्ज करायी थी । दिल्ली में हुए गैंगरेप की पीडिता को न्याय दिलाने हेतु कडकती ठंड में भी इस युवाशक्तिने अपने आक्रोश द्वारा सरकार में बैठे नेताओं की निंद हराम कर दी थी और आज भी किये हुए हैं । फिर क्यों आज इतिहास बदलने वाली और कई क्रांतिकारी बदलावों की साक्षी रही युवाशक्ति राह से भटकती दिखाई दे रही है ? अगर यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब समाज में अपराधी बन रही युवा शक्ति एक बड़ी समस्या बन कर उभरती दिखाई दे…!! रोज अखबारों में क्यों आये दिन युवाओं द्वारा किये जा रहे अपराधों के किस्से आ रहे हैं ? कभी हमने इसबारे में सोचा ?

हमें इन बातों पर ध्‍यान देना होगा । दलदल में गिरते जा रहे इन युवाओं के अवसाद व कूंठा के कारण ढूंढने होगें । मेरा मानना है कि इस  के पीछे व्‍यावसायिक, नीजि, सा‍माजिक जैसे कई कारण हो सकते हैं । इन कारणों पर नजर डालनी होगी….

अवसाद व कूंठा के कुछ अहम कारण मेरी नजर में जो हैं वे निम्न प्रकारहैं……

आज के इस आर्थिक युग में धन की प्राथमिकता को झुठलाया नहीं जा सकता । अपने माता-पिता के सपनों को पूरा करने हेतु हर युवा अपने जीवन में स्‍थायित्‍व चाहता है । उसे एक ऐसे करियर विकल्‍प की तलाश रहती है जो कि उसके सपनों को पूरा करे । जब वह ये हांसिल करते-करते थक जाता है तब सही मार्गदर्शन न मिलने पर गलत हाथों का शिकार बन जाता है । इतना ही नहीं सोशल स्‍टेटस यह एक ऐसा कारण होता है कि जो कि उसे हमेशा आकर्षित करता है । बाजारवाद के इस दौर में युवा एक आकर्षक जीवनशैली की इच्‍छा रखता है और चाहता  है कि उसका जीवन स्‍तर लोगों के आकर्षण का केंद्र बनें । जब उसे  वह सोशल स्टेटस नहीं मिलता तब वह और रस्ते से ,मतलब कि गलत रास्ते से हांसिल करने की फिराक में रहता है । कई बार उसकी कुंठा पुरानी पीढी से तालमेल न होने से भी हावी होती दिखती  है । एक प्राइवेट कंपनी में काम करने वाले एक युवा का कहना है कि वह इं‍जीनियरिंग करना चाहता था लेकिन उसके पिताजी चाहते थे कि वह स्नातक की पढाई पूरी कर किसी सरकारी नौकरी के लिये तैयारी करे । दोनों में से वह कुछ न हांसिल कर सका..!! नतीजा ये हुआ कि अब जो भी नौकरी मिले उसी के लिये अपने आप को तैयार करने की कौशिश में लगा हुआ है…!!

इस युवा वर्गकी कुंठा का एक कारण शायद देश में बढ़ती जनसंख्‍या भी है । इससे निबटना होगा । हमे भी चीन की निती एक परिवार, एक बच्‍चा का अनुकरण करना होगा । ऐसा करने पर शायद 10 से 20 वर्षों में हमारा देश विकसित देशों की यादी में खड़ा दिखे..!! अभी क्‍या हो रहा है- 100 पोस्‍ट निकलती हैं, जिनके लिये एक लाख आवेदन आते हैं । गाडियों में यात्रियों के लिये जगह नहीं । आरक्षणकी दिक्कत । इस कारण रेल और बसों में लोग जानवरों की तरह ठूस दिये जाते हैं। अस्‍पताल में बेड नहीं, तो इलाज के लिये भटकना पड़ता है। क्या हमारे देश की इस समस्‍या को सुलझा पाना इतना कठिन है ? नहीं …. अगर देश का प्रशासन युवाओं के अवसाद और कुंठा का कोई ठोस उपाय करे और युवावर्ग की परेशानियों पर ध्यान दे तो मेरा मानना है कि  हमारे देश में एक बड़ा परिवर्तन आ सकता है ।
जब पढा-लिखा नौजवान, राजनेता  या अधिकारियों की सिफारीश पर उससे कम योग्यता के युवा को नौकरी मिली देखता है, तब उस को जाहिर है कि उसे गुस्सा आयेगा । आज हमारे स्‍वतंत्र भारत में एक सर्वेषण के मुताबिक करीब 60-80 फीसदी भ्रष्टाचार नेताओं या अधिकारियो के द्वारा होते हुए देखे गये है । आज का युवा चाहता है कि सीबीआई, आयकर विभाग, आदि को स्‍वतंत्र कर दिया जाये ताकि कुछ प्रतिशत भष्टाचार पर तो रोक आये । हो सकता है कि अगर ये स्‍वतंत्र होकर काम करेंगी, तो 70–80 फीसदी भ्रष्‍टाचार अपने आप दूर हो जाये…!!

आज के पढे-लिखे शिक्षित युवावर्ग का ये भी मानना है बिना किसी आरक्षण के सभी को समान अधिकार देते हुए प्रतियोगी परीक्षाएं होनी चाहिये । तभी देश को नई दिशा मिलेगी । जाति के आधार पर आरक्षणदेना उनकी सोच से गलत है । अगर आरक्षण देना है तो आर्थिक स्थिति को ध्यान में रख देना चाहिये । 

इसमें कोई संदेह नहीं कि जब युवाओं को योग्यता होने के बावजूद औचित्य नहीं मिलता, प्रतिभा के बावजूद प्रतिसाद प्राप्त नहीं होता, परिश्रम के बावजूद पुरस्कार नसीब नहीं होता, यानी जब “पैसा” और “पॉवर” जीत जाते हैं तब युवा पीढ़ी अवसादग्रस्त हो जाती है । मेरा मानना है कि अगर युवावर्ग को सही मार्गदर्शन मिले तो युवा पीढ़ी  अपने “जोर” से “दौर” बदल सकती है । अपने आप को अपराध की डगर पर जाने से रोक सकती है ।

हमारा हाल  कुछ ऐसा है कि हम नौजवानों को देखते हैं मगर उनकी संवेदनाओं को समझ नहीं पाते । हम रोजमर्रा की नींद में हैं- सुबह से शाम तक सभी काम आदत से करते हैं। रास्ते पर निकलकर अच्छे रास्ते पर चलना, अच्छे दफ्तर में ऊंचे पद पर कार्य करना, आना जाना सभी काम नींद में करते हैं । शायद नीचे दी गई कहानी हमें कुछ उपाय बता दे…..

एक बार रूस के प्रसिद्ध दार्शनिक गुर्जिफ अपने कुछ शिष्यों के साथ टिकलिस नामक शहर में गये । उनके शिष्यों को वहां यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि पूरा शहर नींद में डुबा हुआ है । व्यापारी नींद में व्यापार कर रहे हैं, ग्राहक नींद में खरीददारी कर रहे हैं । एक शिष्य ने अपने गुरू से पूछा-‘कमाल है, ये सब नींद में है । मगर एक बात मुझे समझ में नहीं आती कि जब मैं तीन माह पूर्व यहां आया था तब ऐसा कुछ नहीं था ।’ गुर्जिफ ने कहा-‘उस वक्त तुम नींद में थे, आज तुम जागे हुए हो । जब तुम सो रहे थे तब ये सभी सो रहे थे जो तुम्हें जागते प्रतीत हुए । इसी प्रकार आज तुम जागे हुए हो तो तुम्हें ये सब सोते प्रतीत हो रहे हैं ।’

आज अगर हम युवावर्ग को अपराध के गलियारों में जाते हुए रोकना चाहते हैं तो हमें भी निंद से जागना होगा । क्या  हम 21 वीं सदी के भारत को स्वर्ग बनाना चाहते हैं.. या यह कहना कि हमारी युवा पीढ़ी नालायक है, कुछ नहीं कर सकती, दोनों में सच क्या है , इसे ढूंढकर अपना पल्ला झाडना….!!

इस प्रश्न का जवाब आप से जानना चाहती हूं….दे सकें तो अवश्य दें….

कमलेश अग्रवाल
 
 

अविवेकि इच्छायें कितनी जायज ?

11 जनवरी

इच्छा शब्द छोटा है लेकिन बहुत विस्तृत है । इच्छा, कामना, वासना, अपेक्षा, ये सभी एक दूसरे के पर्याय शब्द ही हैं या यूं कहें कि ये मन में उठनेवाली ऐसी तरंगें हैं जो कभी समाप्त नहीं होना चाहतीं । कोई वस्तु को पाने की इच्छा हुई, हमने उसे पाया, हमारी इच्छा को पूरी कर दी, वहीं बात खत्म हो जानी चाहिये, पर ऐसा नहीं होता । एक इच्छा पूरी हुई न हुई, इतने में दूसरी इच्छा अपना सिर ऊपर किये खडी दिखाई दे ही जाती है !! मतलब कि हम इस इच्छा रुपी भंवर में फंसते चले गये…!!  हमें पता  है कि हम अपनी इच्छा  तृप्त होने पर सुख महशूस करते हैं और  पूर्ण न होने पर दु:खी हो जाते हैं…!! देखा जाये तो किसी वस्तु को पाने की सोच ही तो इच्छा है । अगर गौर से देखा जाये तो इच्छा का संबंध हमारे मन एवम ह्रदय से ही तो है ..!!

आकाश की तरह हमारी इच्छाएं भी असीम और अनंत होती हैं। हमारी अपूर्ण और अनुचित इच्छाएं ही हमारे दु:ख का मुख्य कारण हैं। कामनाओं के वशीभूत हम अपना सारा जीवन दु:खी रहकर बीता देते  हैं । कईबार देखा गया है कि साधारण शक्ल होने के कारण कई महिलाएं  दु:खी हो जाती हैं और सुंदर बनने की उन में  उत्कट इच्छा होने लगती है । फिर वे बिना सोचे समझे  ” सुन्दरता चाहिए तो हम से संपर्क करें ” जैसे विज्ञापनों से ललचाकर बेवजह ही धन का व्यय करती नजर आतीं हैं । अपने व्यक्तित्व में अगर आप निखार देखना चाहतीं हैं तो आप को सुन्दर बनाना जरुरी नहीं है ; जरुरत है तो बस इतनी कि आप अपने विचारों को सुंदर, सुचारू और परिपक्व बनायें । जब आप बोलते हैं, चलते हैं, देखते हैं तो आपके चेहरे की बनावट शरीर के संकेतों या बॉडी लैंग्वेज से आपके सारे व्यक्तित्व का आभास हो जाता है  । जैसे मैले दर्पण में सूर्य का प्रतिबिम्ब कभी नहीं पड़ सकता वैसे ही बनावटी साजसज्जा से आप का व्यक्तित्व भी कभी नहीं निखर सकता । यदि शीशा साफ हो, तभी इसमें प्रतिबिंब दृष्टिगोचर हो सकता है । इस सच्चाई को हमें जानना ही होगा । हम अगर सोचे समझे बिना दूसरों को दिखाने हेतु अपने आप को बदलते हैं तो परिणाम गलत ही होगा ..!!  

 हिरण मधुर संगीत की तरफ आकर्षित होता है और शिकारग्रस्त होकर जान गंवा देता है । पतंगा अग्नि में भस्म हो जाता है।  मछलियां जीभ के स्वाद के लिए लालच में फंसकर कांटे में अटक जाती है।  जैसी हमारी इच्छाएं होती हैं वैसे ही हमारे मन के भाव बन जाते हैं। उसी प्रकार की झलक हमारे मुखमंडल पर छा जाती है। सो हमें ये नहीं भूलना चाहिये कि समय के साथ बचपन, जवानी और बुढापे का आना एक कुदरत का बनाया हुआ ही  नियम  है । कहने का मतलब है कि अविवेकी और चंचल इच्छाएं  बेखबर सारथी के  घोड़ों की भांति बेकाबू होकर बिदक न जाये इस बात का सदा हमें ध्यान रखना चाहिये । हमें चाहिए कि हम कछुए की भांति बन जाएं जो अपने सब अंगों को समेट लेता है और एक पत्थर की भांति रह अपने आप को दुश्मनों से बचाते हुए मस्ती से अपनी जिंदगी जीता है । 

अत: अपनी अनुचित इच्छाओं को अपने वश में करना बुद्धिमानी का काम है । ऐसा न हो कि हमारा जीवन  समाप्ति पर हो, परंतु हमारी अभिलाषाओं का अंत न हो..!! किसी ने सही कहा है…अविवेकी  इच्छाओं  की गुलामी  पराधीनता  से कहीं ज्यादा दु:खदायी  होती है ।

कमलेश अग्रवाल  

क्या हम आदतों के आदी हैं ?

10 जनवरी

हम में कुछ गुण जन्मजात होते हैं जैसे घृणा करना । जब हम किसी से घृणा करते हैं तो हम अनजाने ही उस व्यक्ति को घृणा करने के लिए प्रेरित करते हैं । अविश्वास कर दूसरे को अविश्वास करने का अवसर देते है । हम यदि जीवन में सुख चाहते हैं तो हमें दूसरों पर बिना कारण अविश्वास नहीं करना चाहिए । हमारे यहाँ अभी चारों तरफ अविश्वास हैं । अविश्वास संदेह को बढ़ाता है।

वर्ष 2013 में अपने आप का  पुनरावलोकन करें । गत वर्ष की उपलब्धियों व अनुपलब्धियों पर मनन करें । स्वयं को जाने-समझें । हम आदतों के आदी हैं । इसीलिये हमें अपनी आदतों पर गौर करना होगा । क्योंकि आदतें बदलकर ही हम स्वयं को बदल सकते हैं । मतलब कि अपनी आदतें, सपनों व प्रयत्नों का परीक्षण करें ।  एच.डी. थोरो ने लिखा है कि वस्तुए नही बदलती, हम ही बदलते हैं । अतः पहली जरूरत है स्वयं को बदलने की ।

एक अच्छी आदत को जन्म दीजिए, एक सकारात्मक आदत को बोइए, एक अच्छे और सच्चे चरित्र को जन्म दीजिए, एक चरित्र को बोइए, एक सफलता को जन्म दीजिए । ये बहुत आसान नहीं है क्योंकि परिवर्तन में असुरक्षा है, नयापन है । आदतें व्यक्ति अपनी स्थिति, सोच व लक्ष्य के आधार पर बनाता है । पर ये भी सत्य है कि आदतों में स्थायित्व होता है व व्यक्ति उन  में एकाकार हो जाता है । आदतें हमारे जिने की शैली को दर्शाती है । उस में हमें अपनत्व दिखाई देने लगता  है । हम धीरे-धीरे हमारी अच्छी-बुरी अदतों को न्यायोचित ठहराने लगतें हैं । आदतें हमारे जीवन मूल्य में समा जाती हैं । हम उन्हे  तुल  देने लगते हैं । हमारी आदतों के मुताबिक हमारा मन विचार करने लगता है और हम मन के अनुसार अर्थात विचारों के अनुसार चलने लगते हैं । अतः विचारों को बदलना स्वयं को बदलने के लिये बहुत जरूरी है । आदतों व विचारों को बदलना थोड़ा कठिन है; लेकिन कुछ गुण हम यहीं पर सीखते है, उन्हें बदलना आसान होता है । यदि कोई पूरी तरह जन्मजात नकारात्मक है तो उसे हम इस तरह सकारात्मक विचार कर नहीं बदल सकते हैं ; लेकिन जिस माहौल या वातावरण से नकारात्मकता सीखी गई है उसे हम अच्छे विचार कर बदल सकते हैं । एक कहानी के माध्याम से शायद आप  अच्छे विचारों एवम आदतों के महत्व को जान पायें……!!

एक राजा ने अपने जन्म दिन पर नगर के प्रमुख साहुकारों को भोज दिया । भोज के दौरान प्रत्येक सेठ से राजा स्वंय मिला । राजा सभी सेठों से मिलकर प्रसन्न हुआ । लेकिन एक सेठ से मिलने पर राजा के मन में भाव आया कि इस सेठ को फांसी दे दी जानी चाहिए । राजा  ने तब तो कुछ नहीं कहा लेकिन इस तरह का विचार मन में उठने का कारण खोजने लगा। दूसरे दिन राजा  ने अपने मन्त्रियों से उसके मन में उक्त विचार आने का कारण पूछा । एक बुद्धिमान मन्त्री ने कहा कि इसका पता लगाने के लिये उसे समय चाहिये ।  मन्त्री ने सेठ के बारे में जानकारी इकट्ठी करनी शुरु कर दी ।

कुछ दिनों बाद उस ने पाया कि वह सेठ चन्दन लकड़ी का व्यापारी है । लेकिन विगत तीन-चार माह से उसका व्यवसाय ठीक नहीं चल रहा था । सो उसे विचार आया कि काश! राजा  की मृत्यु हो जाये तो उसकी ढेर सारी चन्दन की लकड़ी एक ही दिन में बिक जाये । इस विचार के आते ही वह राजा की मौत की कामना करने लगा । राजा  के सेठ से मिलने पर राजा  के अचेतन मन ने सेठ के मन के भावों को पढ़ लिया और विचारों की प्रतिक्रिया के कारण सेठ को फांसी पर चढ़ाना चाहिए,जैसा नकारात्मक विचार राजा के मन में आया…!!

मन्त्री बड़ा चतुर था । उसने सोचा अगर वह राजा  को यह बता दे तो सेठ अनावश्यक खतरे में पड़ जाएगा । इसलिए उसने एक तरकीब सोची । उस मंत्रने सेठ से प्रतिदिन दो किलो चन्दन की लकड़ी महलों में उपयोग हेतु खरीदनी शुरू की । अब प्रतिदिन दो किलो चन्दन की लकड़ी बिकने लगी । सेठ सोचने लगा, भगवान करे राजा  चिरायु हो । राजा के कारण ही उसका व्यवसाय हो रहा है । अगर ये राजा न रहेगें तो उस से रोज लकड़ी खरीदी नहीं जायेगी इसलिए वह राजा की लम्बी उम्र की कामना करने लगा ।

राजा ने अगले वर्ष फिर अपने जन्म दिन पर बड़े सेठों को भोजन पर बुलाया । इस बार वे (राजा ) उस सेठ से व्यक्तिगत रूप से मिले तो उन्हें लगा सेठ बहुत अच्छा है । इसकी आयु लम्बी होनी चाहिए । अब इस तरह के विचार आने का कारण फिर से राजा  ने उस मन्त्री से पूछा । मन्त्री ने बताया ,” महाराज हम सब का मन बहुत सूक्ष्म है, हमारा अचेतन मन सामने वाले के मन में, गुप्त चलते विचारों को चुपचाप पकड़ लेता है । उस पर स्वतः प्रतिक्रिया करता है । इस बार सेठ आप की आयु बढ़ाने की प्रार्थना मन ही मन करता था । चूंकि इससे उसका व्यवसाय चल निकला था । प्रतिदिन दो किलो चन्दन की लकड़ी बिक रहीं थी । अतः उसके मन में चलते गुप्त विचारों को आपके मन ने भांप लिया है ।”

मतलब साफ है हमारी आदतों के मुताबिक हमारा मन विचार करने लगता है और हम मन के अनुसार अर्थात विचारों के अनुसार चलने लगते हैं । अगर हमारे विचारों में स्वार्थ छिपा हो तो वह भाव सामने वाला व्यक्ति में भी प्रतिक्रिया के रुप में वैसे ही भाव पैदा करता है । निष्कपट विचार हमारे अंदर, अच्छी आदतों का सिंचन करते हैं । हमे में सकारात्मकता और सुसंस्कारिता लाते हैं । सो ये सत्य है कि हम अपनी आदतों के कायल हैं । अगर हमारे विचार नेक होंगे तो हमारी आदतें भी अच्छी होंगी ।

इस संदर्भ में आप का क्या मानना है ? आप के विचार आवकार्य हैं….जरुर बताईयेगा….

कमलेश अग्रवाल