Archive | फ़रवरी, 2013

१४ फ़रवरी – वेलेंटाइन दिवस

28 फरवरी

आज फरवरी का आखरि दिन है । तो सोचा क्यों न कुछ लिखा जाये…!! सहसा याद आ गई 14 फरवरी की…जिसे वेलेंटाइन दिवस के रुप में दुनिया मनाती है ।

देखा जाये तो रोटी, कपडा, मकान के बाद जीवन की सबसे अनिवार्य आवश्यकता है प्रेम । प्रेम एक दृष्टिकोण है, एक चारित्रिक रुझान है जिस के चलते  हम बहुत से लोगों से हमारे प्यार की अभिव्यक्त करते हैं । सही तो ये है प्रेम शब्द एक पवित्रता का प्रतीत है ।

पहले के जमाने में प्रेम का इजहार के लिये  कबूतर या मुसाफिर के माध्यम से प्रेम-संदेश प्रेषित किए जाते थें। उस जमाने के प्रेमियों में इतना धैर्य होता था कि वे कई दिनों तक संदेश के उत्तर का इंतजार भी कर लेते थें परंतु आजकल के प्रेमियों में सब्र नाम की चीज ही नहीं होती है। उनको तो इज़हार और प्यार दोनों में ही देरी बर्दाश्त नहीं होती है…!!

 प्यार में संदेशों का बहुत अधिक महत्व होता है। संदेश जहाँ विचारों के आदान-प्रदान का एक माध्यम होते हैं, वहीं दूसरी ओर संदेश प्यार को प्रगाढ़ता व रिश्ते को नई ऊर्जा भी प्रदान करते हैं। प्रेमियों के लिए वेलेंटाइन डे एक खास दिन होता है। उनके लिए यह दिन अपने प्यार के इजहार का एक अच्छा मौका होता है, जब वे अपने वेलेंटाइन को अपने दिल की बात कह देते हैं। 

ऐसा माना जाता है कि 1743 साल पहले  संत वैलेंटाइन  ने अपने प्रेम का इजहार  करते हुए  जेलर की बेटी को एक ख़त में “yours valentine” लिखा था और उस प्रेमकी उन्हें ऐसी किंमत चूकानी पडी….कि प्रेम के जुर्म में सारी उम्र,मरते दम तक उन्हें रोम के सम्राट क्लौडिअस के द्वारा जेल की सजा मिली…!!

जब लोगों ने प्रेम को जाना ,उसे करीब से पहचाना तो लगा कि संत वैलेंटाइन  ने प्रेम का इज़हार कर कोई अपराध नहीं किया था । बस उन्हों ने तो ख़त के द्वारा जेलर की बेटी को अपना प्रेम दर्शाया था…शायद इसी सोचने उन की याद में १४ फ़रवरी को वेलेंटाइन दिवस मनाना घोषित कर दिया…!!

विदेशों में ये एक पारंपरिक दिवस है जिसमें प्रेमी एक दूसरे के प्रति अपने प्रेम का इजहार कार्ड भेजकर, गुलाब या कोई फूल का गुल्दस्ता या मिठाई आदि देकर करते हैं । धीरे-धीरे हमारे भारत में भी इस का प्रचलन शुरु हुआ और हमारे नवयुवक-युवतियों ने भी इस को मनाना शुरु कर दिया । रुस  में इस दिन को  “प्यार करनेवालों का दिन” भी कहा जाता है ।  इस अवसर पर रुस के कई नगरों में  संगीत कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है । जिसके दौरान प्यार करनेवाले पुरुष और महिलाएं एक दूसरे को अपने दिल की बात कहते हैं । कईबार “प्रेमियों का नृत्य” कार्यक्रम भी आयोजित किये जाते हैं जहां प्रेमी साथ मिल प्रेम का इजहार करते हुए नृत्य करते हैं । इस दिन गुलाब के दाम आकश को छूते दिखाई देते हैं…!! इसबार 14 फरवरी पर इतनी शादियां थी कि माता-पिता को भारी किंमत चूकाकर अपने लडके-लडकियों की शादी करनी पडी थी…!!

अब प्रश्न ये उठता है कि क्या हमें प्रेम का इज़हार केवल एक दिन, १४ फ़रवरी को ही करना चाहिए या हमेशा बरक़रार  रखना चाहिए ? देखा जाये तो आज समाज में वैवाहिक जीवन या आपसी रिश्तों में इतनी कडवाहट देखने को मिलती है कि ऐसे एक नहीं अनगिनत दिन मनाने की आवश्यकता है…!! मैं यही कहूंगी कि वर्ष के 365 दिन ही वेलेंटाइन दिवस होने चाहिए प्रत्येक दिन  ही गुलाब के फूल के भांति खिले होने चाहिए । क्योंकि

प्यार किया नहीं जाता हो जाता है
दिल दिया नहीं जाता खो जाता है…

मैं आखिरी में एक ही चीज़ दोहराना चाहूंगी कि हमे हमेशा वेलेंटाइन दिवस मनाना चाहिए ना कि केवल 14 फ़रवरी को केवल | किन्तु मेरे अकेले के सोचने से क्या होगा????? मुग्लेआजम का प्रसिध्ध गीत अनायास ही जुबां पर आ रहा है….

प्यार किया तो डरना क्या,प्यार किया कोई चोरी नहीं की, चूप-चूप आहें भरना क्यों……आप का क्या सोचना है….? अपने विचार देना न भूलें….

कमलेश अग्रवाल

 

 

जिम्मेदार कौन……?

25 फरवरी

 -सप्ताह में भारतीय ९० घंटे काम करता है और अंग्रेज सिर्फ ३० घंटे काम करता है

-भारतीय काफी मेहनतकश होते हैं, कामचोर और आलसी नहीं होते हैं

-भारतीयों की प्रतिरोधक क्षमता बहुत अधिक होती है, इसीलिये भारतीय बीमार नहीं होते हैं

-भारतीय अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा बचत करते हैं

-भारतीयों का अपना एक सांस्कृतिक मूल्य होता है

-भारतीयों का दिमाग बहुत तेज होता है

-भारतीयों में शील, गुण, क्षमा,दया,परहित, सेवाभाव, दानशीलता, संभव आदि जैसे मानवमुल्य गुण होते हैं

-भारतीयों में पारिवारिक जीवन का बड़ा महत्व है

-भारतीय सामाजिक होते है और बड़े ही धार्मिक होते है और दुसरे धर्मो की इज्जत करते हैं

-भारतीय सर्वधर्मसमभाव को अपनाये हुए हैं -आजतक भारतीयों ने किसी धर्म को नहीं मिटाया और ना ही मिटाने की सोच रखी

-भारतीय हमेशा ही दया और क्षमाके समर्थक रहे हैं

-भारतीयों ने आयुर्वेद और योग का प्रयोग किया जो बीमार ही नहीं होने देती

-भारत में दया और दान के बराबर कोई तप नहीं है, ऐसी द्रूढमान्यता है

-भारत एक बहुत ही विशाल और विविधता वाला महान देश है, जहा पर कृषि और श्रम मुख्य धनार्जन के श्रोत है

फिर भी आखिर क्यों एक पौंड में ८०-९० रुपये ? एक डालर में ४७ रुपये ?

“ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर अग्रीमेंट” के समय (१५ अगस्त १९४७) एक रुपये एक डालर मिलता था…!! इसके बावजूद आज भी हमारे रुपये की इतनी कम कीमत क्यों है ?

इसके लिए जिम्मेदार कौन ? क्या हमारे नेता ? शायद वे और उनकी वोट बेंक नीति…….

स्वदेशी को हमेशा दबाना, जिससे विदेशी कंपनिया खूब बिजिनेस करे…!!

स्वदेशी चीजो प्रचार नहीं होने देना और आयुर्वेद और योग को नीचा दिखाना…!!

विदेशी उत्पादों जैसे पेप्सी कोला आदि को बढ़ावा देना और स्वदेशी चीजो की जांच करवाना …..!!

कहीं आनेवाला कल हमारे बच्चो पर भारी न पड़े……

ये देश हर वर्ष आजादी मनायेगा

अपनी झूठी शान दिखायेगा और

भारत का बचपन यूं ही भूखे पेट सो जायेगा……!!

भारत माता की जय ….

कमलेश अग्रवाल

बुढ्ढा सरदार

11 फरवरी

कुछ दोस्तों ने दिल्ली घूमने का प्रोग्राम बनाया और दिल्ली रेलवे स्टेशन से बाहर निकलकर एक टेक्सी किराए पर ली ।  उस टेक्सी का चालक एक बुढ्ढा सरदार था । टेक्सी में सफर करने के दौरान उन लडकों को मस्ती सूझी और उन्हों ने सरदार पर बने जोक्स कहने शुरू कर दिये ताकि टेक्सी ड्राइवर चिढकर अपनी कुछ प्रतिक्रिया दे । लेकिन वह बुढ्ढा सरदार न तो चिढा और न ही उस ने कोई प्रतिक्रिया ही दी । वह तो उनके साथ हर जोक पर हंसता रहा । जब वे लडके दिल्ली-दर्शन कर वापस रेलवे स्टेशन आये…और तय किया किराया उस सरदार को चुकाया, तब बुढ्ढा सरदार बोला,” बच्चो ठहरो । मैं आप सब को कुछ देना चाहता हूं और यह कह उस ने हर लडके को अपनी और से एक एक रूपया हाथ में थमा दिया । हैरत से एक लड़का बोला “बाबा जी हम सुबह से आपके धर्म पर जोक्स मार रहे है , आप गुस्सा तो दूर पर हर जोक में हमारे साथ हँस रहे थे , और जब ये यात्रा पूरी हो गई तब आप हमें  प्यार से एक रुपीया भी दे रहे हो..!! क्यों ?

बुढ्ढा सरदार ने उत्तर दिया” बच्चो आप अभी जवान हो आपका नया खून है आप मस्ती नहीं करोगे तो कौन करेगा ? लेकिन मैं ने आपको एक-एक रूपया इसलिए दिया कि जब वापस आप अपने अपने शहर जाओगे तब ये रूपया आप उस सरदार को दे देना जो रास्ते में भीख मांग रहा हो ।”

इस बात को दो साल बीत गए हैं । उन लडकों के पास वह एक रुपये का सिक्का आज भी ज्यों का त्यों जेब में पड़ा है ; उन्हें कोई सरदार भीख मांगता नहीं दिखा । क्योंकि हम जानते हैं कि सरदार  गैरेज खोलेगा । ट्रक चलाएगा । लेकिन भीख नहीं माँगेगा ।

उनकी आबादी देश की आबादी की मात्र 1.4% हैं पर टोटल टैक्स में उनका हिस्सा 35% का हैं,..!! सेना में भी 50000 से भी अधिक हैं । उनके गुरुद्वारों में लंगरों में खाना खाने वालो की जाति या  धर्म नहीं पूछे जाते । वे अल्पसंख्यक हैं पर अपने लिए आरक्षण नहीं माँगते..!! उन्हों ने स्वंत्रता के आन्दोलन में सबसे अधिक अपने बेटो को खोया हैं पर कभी बदले में कुछ माँगा नहीं । क्या उनसे हमें कुछ सीखना नहीं चाहिये ?

Our Sikhs Brother contribute:-
* 35% of total income tax
* 67% of total charities
* 45% of Indian Army
* 59,000++ Gurudwaras serve
LANGAR to 5,900,000+ people
everyday !

आज से कान पकड कर एक प्रण लें कि किसी भी सरदार पर भद्दे जोक्स नहीं कहेंगे और ना ही सुनेंगे । जोक्स कहने से पहले एक बार ये जरुर सोच लेना कि देश के लिए अपनी जवानी को दावं पर लगा देने वाले शाहिद भगत सिंह भी एक सरदार थे….

हमें तो हमारे इन भाईयों पर नाज होना चाहिये…..

कुछ भी बोलने से पहले एक बार जरुर सोच लें….

कमलेश अग्रवाल

 

आलोचना

11 फरवरी

निंदक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय,

बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाय।

हर व्यक्ति अपना अलग दृष्टिकोण एवं स्वभाव रखे हुए होता है। दूसरों के विषय में वह अपनी किसी भी तरह की कोई भी धारणा बना सकता है। हर मनुष्य का खुद की जीभ पर पूर्ण अधिकार है यही वजह है कि उसे निंदा करने से रोकना संभव नहीं है। पर एक बात कभी नहीं भूलनी चाहिये कि किसी की आलोचना से आप खुद के अहंकार को तो कुछ समय के लिए संतुष्ट कर सकते हैं किन्तु किसी की काबिलियत, नेकी, अच्छाई और सच्चाई की संपदा को कभी भी नष्ट नहीं कर सकते।..!!

कुछ व्यक्तियों का स्वभाव ही होता है कि वे हर किसी इंसान में चाहे वह अच्छा हो या बुरा कोई न कोई कमी निकाल ही लेते हैं और बेवजह ही उस की  निंदा कर ने में लग जाते  हैं। इतना ही नहीं अपने द्वारा की गई निंदा का कोई न कोई तथ्यपूर्ण कारण, परिस्थिति, मजबूरी या विवशता बताने से भी नहीं चूकते..!! उसे उचित ठहराने की हर कोशिश में लगे रहते हैं।

मतलब कि ऐसे व्यक्ति संसार के सारे दु:खों को खुद ही पैदा करते है और फिर खुद ही अशांत बन इधर-उधर घूमते रहते हैं; बस इसी फिराक में कि कोई ऐसा मिले जिस की निंदा की जाये..!! ऐसा इंसान जब खुद की निंदा सुनता है तो विहवल हो जाता है । देखा जाये तो संसार में एक मात्र मनुष्य ही ऐसा जीव है जो निंदा कर सकता है । विद्वानों का कहना है कि अपने आप की आलोचना करके व्यक्ति अपने जीवन की गंदगी को दूर करने का प्रयत्न कर सकता है । निंदा से हम अपनी कमियां जान सकते हैं । उन कमियों को दूर करें सकते हैं तथा अपना मानसिक एवम वैचारिक विकास कर सकते हैं । पर ये काले सिरवाला  मनुष्य अपनी बुराइयों को नहीं देखता बल्कि दूसरों की बुराईयों को देखता है । इंसान को दूसरे के अवगुणों की बजाय उनमें अच्छाई ढूढनी चाहिए और अपने खुद के अवगुणों को दूर करने चाहिए ।

जिनका स्वभाव है निंदा करना, वे किसी भी परिस्थिति में निंदा की प्रवृति में लगे ही रहते हैं । वे अपनी इस बेतुकी आदत का त्याग भी नहीं कर सकते हैं। इसलिए समझदार इंसान को चाहिये कि  ऐसे उथले लोगों द्वारा की गई विपरीत टिप्पणियों पर ध्यान न दे और अपने काम में मग्न रहे। वैसे भी किस-किस के मुंह पर अंकुश लगायेंगे ? कहां तक इन बेसिर-पैर की बातों पर गौर करेंगे ? निराधार निंदा को नजर अंदाज करना ही बेहतर है । मेरा मानना है कि आलोचना से घबराना नहीं चाहिए, बल्कि संभलना चाहिए।

ऐसा करने पर आप प्रतिवाद में व्यर्थ समय गंवाने से बच जायेंगे तथा अपने मनोबल को और भी अधिक बढ़ाकर जीवन में प्रगति के पथ पर आगे बढ पायेंगे । ऐसा करते-करते एक दिन आपकी स्थिति काफी मजबूत हो जाएगी और आपके निंदकों को सिवाय निराशा के कुछ भी हाथ नहीं लगेगा ।

कमलेश अग्रवाल

वक्त के साथ जीने के मायने बदले….

7 फरवरी

मेरे पिताजी कई बार मुझ से कहते ,” बेटे यह क्या होता जा रहा है ? क्यों आज की लडकियां – लडके बेहया होते जा रहे हैं ? बहुओं को लिहाज क्या चीज है , पता ही नहीं ..!! लगता है वे शायद लज्जा, शर्म अपने माँ बाप के घर ही रख आई हैं..!! न सर पर पल्लू ,न अपने पराये का लिहाज आदि । तब मैं हंसकर कवि श्री मैथिली शरण जी की पंक्तियां क्या थे क्या हो गए और अभी क्या होंगे हम…… ” गुनगुना दिया करती थी ।  पर फिर भी उन्हें संतोष न होता । वे अपने आप से बाते करते हुए कहते क्या करे माँ बाप ? बहुएं हमारे सामने ही पति से तू करके बात करती हैं , पति को नाम लेकर ऐसे बुलाती हैं, लगता है जैसे कि नौकर को बुला रहीं हों..!! अब वह दिन दूर नहीं जब हम बुजुर्गों को मौन और कौन वाला फ़ॉर्मूला अपनाकर जीना पडे..!! अति स्वच्छन्दता और विदेशों के अन्धानुकरण ने शायद हमारी परंपरा, संस्कृति को जडमूल से उखाड फेंकने की सोच ली है..!! पिताजी की इस सोच पर ही शायद किसी ने ये पंक्तियां लिखि होगीं…..

वक्त के साथ रिश्तों के मायने बदले,

नजर धुंधली हुई है, या आईने बदले…!!

खुद जलकर धूप से उन्हें बचाया था कभी,

वक्ते जरुरत रुख उन सायों ने बदले…!!

 जब स्कूल में थी तब हिंदी की एक कहानी “वापिसी” पढने का मौका मिला था । उस कहानी के हीरो “गजाधर बाबू” को जीरो बना दिया गया था । उन्हें अपने ही घर में स्थान नहीं दिया जाता था।  वे अकसर खुले में चारपाई पर बैठा करते या दिन भर पार्क में और रात को घर के कोने में सोने आया करते । क्या ये कहानी आज के वर्तमान को नही दर्शाती है ?

मेरे नानाजी कईबार ये कहावत दोहराते थे…. बाप रहा अँधेरे में बेटा पावर हाउस  और खुद ही हंस पडते थे ।  आज ये कहावत ज्यादातर हर घर के बुजुर्ग दोहराते होंगे..!! मेरा मानना है कि दो पिढियों की सोच में विचारों का ये फर्क तो होना ही है । वे जमाने के साथ अपने आप को  बदलना नहीं चाहते हैं और इसीलिये ही अपने ही घर में , अपने ही बच्चों के बीच अपनेआप को अकेला महसूस करते हैं । उन की नजर में साड़ी पहनने में ही एक महिला मर्यादित है। अन्य किसी भी परिधान में उन्हें वे अमर्यादित लगती हैं । वे आज भी 18वीं सदी में ही जिना चाहते हैं। वे ये भूल जाते हैं कि पहले महिलाएं न स्कूटर चलाती थीं, न गाडी , न प्लेन उडाती थीं । पहले नौकरी के लिए भागते हुए लोकल ट्रेनें और बस नहीं पकडती थीं । पहले महिलायें खेल-कूद में भी इतनी शिरकत नहीं होती थीं । आज अगर ज़रुरत के अनुसार यदि उनके परिधान बदलते गए हैं तो क्या बुराई है ? उसे अभद्र , अश्लील और पश्चिम का अन्धानुकरण कहना कतई सही नहीं है  । 

पर अगर हमारे देश का युवा वर्ग पश्चिमी देशों की चमक दमक से प्रभावित हो बिना सोचे-समझे वहां की प्रत्येक जीवन चर्या को अपनाने में ही अपना  विकास , उन्नति मानने लगे तो वह उचित्त न होगा। हर देश का खान पान, रहन सहन, फैशन आदि वहां की प्राकृतिक स्थिति ,सामाजिक संरचना इत्यादि को ध्यान में रखकर ही  बनाई जाती  है । बिना उचित अनुचित का विचार किये ही किसी देश की परंपरा को अपना लेना या अनुसरण करना सही न होगा ।  भारत जैसे गर्म देश में आधुनिकता के नाम पर शराब का सेवन किया जाना शारीरिक एवं आर्थिक दृष्टि से हानि कारक है । हम जानते हैं कि पश्चिमी देशों की जलवायु हाड़ कंपा देने वाली ठंडी होने के कारण, रम व्हिस्की अर्थात अल्कोहलिक पदार्थों का सेवन करना वहां के निवासियों की आवश्यकता है, पर हमारे देश की आबोहवा में शराब पीना मजबूरी नहीं है । अगर फिर भी युवावर्ग इसे अपनाता है तो वह निश्चय ही अपनेआप को आधुनिक दिखाने का ढकोसला  ही  कर रहा है ।

एक ऐसा समय था जब हमारी भारतीय संस्कृति  दुनिया को प्रभावित करती थी । बाहरी दुनिया के लोग हमारा अनुसरण करते थे | क्योंकि उनकी सभ्यता में इंसानियत एवं आत्मीयता का सर्वथा अभाव  था और आज भी है, उन की सभ्यता सिर्फ सम्पन्नता लिये हुए है, जबकि हमारी सभ्यता प्यार, मान सम्मान, मानवीयता की धरोहर लिये हुए है।  मैं चाहती हूं कि आज की प्रचुर भारतीय मेधा समान युवा पिढी को उस इतिहास का निर्माण करना चाहिये जो कभी हमें नालंदा तक्षशिला में देखने को मिला था । तभी तो कई विदेशियों  ने उसे अपनाया ..!!  हमारी युवाओं  को  चाहिये की वे अपने बडों की भावनाओं की कद्र करते हुए, अपनी परंपरा को कायम रखते हुए , पाश्च्यात देशों का अंधानुकरण न करते हुए, एक सम्मान जनक जीवनशैली को अपनाये | वक्त के साथ हमारे जीने के मायने चाहे बदल जायें , पर हमारे भीतर छिपी भावनायें कभी भी न बदले …बस इतनी सी तमा करते हुए मेरे ये विचार यहां रखे हैं । पसंद आयें हों तो अवश्य ही आशीर्वाद दिजियेगा…साथ ही साथ आप के सुझाव भी आवकार्य हैं….

कमलेश अग्रवाल

असमंजस में आज ईमानदारी…!!

6 फरवरी

अपनों के हाथों ही कूचली जा रही हूं,

मुसिबतों से मैं जकडी जा रही हूं,

अकेलेपन की अंधेरी गुफांओं में भटक रही हूं,

बस खुद से ही सवाल किये जा रही हूं…

क्यों सीधा रास्ता भी अब टेढा प्रतीत हो रहा है ?

अपनी ही परछाई से भी क्यों डर लगने लगा है…?

हर घडी, हर पल ये मैं क्या सोचती जा  रही हूं ?

 ये सब क्यों मेरे साथ ही घटित हो रहा है ?

अचानक आईना सामने आ गया,

तब सहसा उससे यों ही पूछ बैठी मैं…

” बता आईने, ये हम ही हैं , या कोई और ?” 

कमलेश अग्रवाल

प्रसन्नता की खोज में…

1 फरवरी

जब हम बच्चे होते हैं  तब हम सब अपने आप को सांत्वना देते है कि जीवन जीने लायक हो जायेगा जब हम बडे होंगे हमारी शादी होगी, बच्चे होंगे । उसके बाद जब शादी और बच्चे हो जाते हैं तो चिडचिडाते हैं कि बच्चे अभी छोटे हैं.. समझदार नहीं हैं.. जीवन सुधर जायेगा जब यह समझदार हो जायेंगे ।जब बच्चे थोडा और बडे हो जाते हैं और कहना नहीं मानते, बराबर बोलते हैं और उन्हें समझाना मुश्किल लगता है तो सोचते हैं चलो व्यस्क हो कर स्वंय समझ जायेंगे ।

सोचते हैं जब हमारे पास बडी सी कार होगी..बडा सा घर होगा… या खूब घूमने को मिलेगा वही दिन जीवन के सबसे अच्छे और खुशहाल दिन होंगे । परन्तु सच्चाई यह है कि संतुष्ट या खुश होने के लिये वर्तमान क्षण के अतिरिक्त कोई और समय नहीं है । अभी नहीं तो कभी नहीं …..
जीवन हमेशा किसी न किसी काम में व्यस्त रहेगा, कोई न कोई अवरोध आता रहेगा एंव इस सब के साथ हमें प्रसन्नता के साथ जीना सीखना चाहिये । इस सब से मैने सीखा कि प्रसन्नता की तरफ़ कोई रास्ता नहीं जाता हां प्रसन्नता ही जीवन का रास्ता है । हर पल जीयें.. प्रसन्नता प्राप्ति के लिये पढाई समाप्त होने की प्रतीक्षा, दस किलो भार बढने या घटने की प्रतीक्षा, नौकरी लगने की प्रतीक्षा, शादी होने की प्रतीक्षा, सोमवार से रविवार की प्रतीक्षा, मौसमों के बदलने की प्रतीक्षा सब व्यर्थ है…. प्रसन्ता एक यात्रा है पडाव नहीं
अब आप इन प्रश्नों के उत्तर सोचें१. संसार के पांच सबसे धनी व्यक्ति
२. पांच मिस यूनिवर्स का खिताव जीतने वाली महिलाओं के नाम
३. दस नोवल प्राईज जीतने वालों के नाम शायद सभी प्रश्नों के उत्तर आप न दें पायें… कठिन है.. बहुत से नहीं दे पायेंगे क्योंकि

तालियों की गडगडाहट हमेशा नहीं रहती
ट्राफ़ीयां धूल से अट जाती हैं
विजेताओं को लोग समय के साथ भूल जाते हैं

अब इन प्रश्नों का उत्तर सोचें

१. तीन अध्यापकों के नाम जिन्होंने आप को पढाया
२. तीन दोस्तों की नाम जो आपके बहुत करीब हैं और जिन्होंने आपकी समय पर मदद की
३. तीन लोगों के नाम जो आपके लिये विशेष हैं
४. पांच लोग जिनके साथ आप समय बिताना पसन्द करेंगे

उत्तर आसान हैं… सभी इस का उत्तर दे पायेंगे…. क्यों ?

क्योंकि…….
जो व्यक्ति आप के लिये सार्थक हैं उनको आप धन, ओहदे या उनकी उपलब्धियों के कारण नहीं जानते… परन्तु वह सब आपके जीवन को कहीं न कहीं छूते हैं । 

क्षण भर को सोचिये कि आप अपना नाम उपर वाली दोनों सूचियों में से किस सूची में देखना पसन्द करेंगे  ? यदि हम मन के भीतर झांक कर देखें तो पायेंगे कि स्वंय की जीत ही जीवन की सबसे बडी उपलब्धि नहीं होती.. दूसरों को जिता कर जो प्रसन्नता मिलती है उसका अन्दाजा लगाना कठिन है.
कमलेश अग्रवाल
(इस लेख में प्रेषित की गई जानकारी मूलत: मेरी नही हैं.. इस रचना के मूल लेखक हैं ….. मोहिंदरजी….यदि आप को इस लेख  के प्रकाशन पर आपत्ति है तो कृपया  बताइए मैं इस लेख को हटा दूंगी…. मेरे मूल उदेश्य जानकारी का प्रसार मात्र है..असली श्रेय रचनाकार को ही जाता है….)