वक्त के साथ जीने के मायने बदले….

7 फरवरी

मेरे पिताजी कई बार मुझ से कहते ,” बेटे यह क्या होता जा रहा है ? क्यों आज की लडकियां – लडके बेहया होते जा रहे हैं ? बहुओं को लिहाज क्या चीज है , पता ही नहीं ..!! लगता है वे शायद लज्जा, शर्म अपने माँ बाप के घर ही रख आई हैं..!! न सर पर पल्लू ,न अपने पराये का लिहाज आदि । तब मैं हंसकर कवि श्री मैथिली शरण जी की पंक्तियां क्या थे क्या हो गए और अभी क्या होंगे हम…… ” गुनगुना दिया करती थी ।  पर फिर भी उन्हें संतोष न होता । वे अपने आप से बाते करते हुए कहते क्या करे माँ बाप ? बहुएं हमारे सामने ही पति से तू करके बात करती हैं , पति को नाम लेकर ऐसे बुलाती हैं, लगता है जैसे कि नौकर को बुला रहीं हों..!! अब वह दिन दूर नहीं जब हम बुजुर्गों को मौन और कौन वाला फ़ॉर्मूला अपनाकर जीना पडे..!! अति स्वच्छन्दता और विदेशों के अन्धानुकरण ने शायद हमारी परंपरा, संस्कृति को जडमूल से उखाड फेंकने की सोच ली है..!! पिताजी की इस सोच पर ही शायद किसी ने ये पंक्तियां लिखि होगीं…..

वक्त के साथ रिश्तों के मायने बदले,

नजर धुंधली हुई है, या आईने बदले…!!

खुद जलकर धूप से उन्हें बचाया था कभी,

वक्ते जरुरत रुख उन सायों ने बदले…!!

 जब स्कूल में थी तब हिंदी की एक कहानी “वापिसी” पढने का मौका मिला था । उस कहानी के हीरो “गजाधर बाबू” को जीरो बना दिया गया था । उन्हें अपने ही घर में स्थान नहीं दिया जाता था।  वे अकसर खुले में चारपाई पर बैठा करते या दिन भर पार्क में और रात को घर के कोने में सोने आया करते । क्या ये कहानी आज के वर्तमान को नही दर्शाती है ?

मेरे नानाजी कईबार ये कहावत दोहराते थे…. बाप रहा अँधेरे में बेटा पावर हाउस  और खुद ही हंस पडते थे ।  आज ये कहावत ज्यादातर हर घर के बुजुर्ग दोहराते होंगे..!! मेरा मानना है कि दो पिढियों की सोच में विचारों का ये फर्क तो होना ही है । वे जमाने के साथ अपने आप को  बदलना नहीं चाहते हैं और इसीलिये ही अपने ही घर में , अपने ही बच्चों के बीच अपनेआप को अकेला महसूस करते हैं । उन की नजर में साड़ी पहनने में ही एक महिला मर्यादित है। अन्य किसी भी परिधान में उन्हें वे अमर्यादित लगती हैं । वे आज भी 18वीं सदी में ही जिना चाहते हैं। वे ये भूल जाते हैं कि पहले महिलाएं न स्कूटर चलाती थीं, न गाडी , न प्लेन उडाती थीं । पहले नौकरी के लिए भागते हुए लोकल ट्रेनें और बस नहीं पकडती थीं । पहले महिलायें खेल-कूद में भी इतनी शिरकत नहीं होती थीं । आज अगर ज़रुरत के अनुसार यदि उनके परिधान बदलते गए हैं तो क्या बुराई है ? उसे अभद्र , अश्लील और पश्चिम का अन्धानुकरण कहना कतई सही नहीं है  । 

पर अगर हमारे देश का युवा वर्ग पश्चिमी देशों की चमक दमक से प्रभावित हो बिना सोचे-समझे वहां की प्रत्येक जीवन चर्या को अपनाने में ही अपना  विकास , उन्नति मानने लगे तो वह उचित्त न होगा। हर देश का खान पान, रहन सहन, फैशन आदि वहां की प्राकृतिक स्थिति ,सामाजिक संरचना इत्यादि को ध्यान में रखकर ही  बनाई जाती  है । बिना उचित अनुचित का विचार किये ही किसी देश की परंपरा को अपना लेना या अनुसरण करना सही न होगा ।  भारत जैसे गर्म देश में आधुनिकता के नाम पर शराब का सेवन किया जाना शारीरिक एवं आर्थिक दृष्टि से हानि कारक है । हम जानते हैं कि पश्चिमी देशों की जलवायु हाड़ कंपा देने वाली ठंडी होने के कारण, रम व्हिस्की अर्थात अल्कोहलिक पदार्थों का सेवन करना वहां के निवासियों की आवश्यकता है, पर हमारे देश की आबोहवा में शराब पीना मजबूरी नहीं है । अगर फिर भी युवावर्ग इसे अपनाता है तो वह निश्चय ही अपनेआप को आधुनिक दिखाने का ढकोसला  ही  कर रहा है ।

एक ऐसा समय था जब हमारी भारतीय संस्कृति  दुनिया को प्रभावित करती थी । बाहरी दुनिया के लोग हमारा अनुसरण करते थे | क्योंकि उनकी सभ्यता में इंसानियत एवं आत्मीयता का सर्वथा अभाव  था और आज भी है, उन की सभ्यता सिर्फ सम्पन्नता लिये हुए है, जबकि हमारी सभ्यता प्यार, मान सम्मान, मानवीयता की धरोहर लिये हुए है।  मैं चाहती हूं कि आज की प्रचुर भारतीय मेधा समान युवा पिढी को उस इतिहास का निर्माण करना चाहिये जो कभी हमें नालंदा तक्षशिला में देखने को मिला था । तभी तो कई विदेशियों  ने उसे अपनाया ..!!  हमारी युवाओं  को  चाहिये की वे अपने बडों की भावनाओं की कद्र करते हुए, अपनी परंपरा को कायम रखते हुए , पाश्च्यात देशों का अंधानुकरण न करते हुए, एक सम्मान जनक जीवनशैली को अपनाये | वक्त के साथ हमारे जीने के मायने चाहे बदल जायें , पर हमारे भीतर छिपी भावनायें कभी भी न बदले …बस इतनी सी तमा करते हुए मेरे ये विचार यहां रखे हैं । पसंद आयें हों तो अवश्य ही आशीर्वाद दिजियेगा…साथ ही साथ आप के सुझाव भी आवकार्य हैं….

कमलेश अग्रवाल

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2 Responses to “वक्त के साथ जीने के मायने बदले….”

  1. mahatammishra फ़रवरी 26, 2013 at 7:23 पूर्वाह्न #

    विश्व के मानक में दो सौ विश्व विद्यालयों कों उत्तम श्रेणी में रखा गया है जिसमे भारत के किसी भी विश्व विद्यालय का नाम नहीं है जो हमारे उत्तमता कों हुबहू बयान कर रहा है, परिवर्तन प्रकृति का नियम जिसका सम्मान करना हमारा फर्ज है पर हम कुछ ज्यादे ही बदलाव करने के आदी हों रहें हैं जो हमें जड़-मूल से बदल रहा है ……

  2. kamlesh फ़रवरी 27, 2013 at 7:13 पूर्वाह्न #

    मिश्राजी,
    आप की सोच बिल्कुल सही है….टिप्प्णी के लिये आभार…

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