आलोचना

11 फरवरी

निंदक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय,

बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाय।

हर व्यक्ति अपना अलग दृष्टिकोण एवं स्वभाव रखे हुए होता है। दूसरों के विषय में वह अपनी किसी भी तरह की कोई भी धारणा बना सकता है। हर मनुष्य का खुद की जीभ पर पूर्ण अधिकार है यही वजह है कि उसे निंदा करने से रोकना संभव नहीं है। पर एक बात कभी नहीं भूलनी चाहिये कि किसी की आलोचना से आप खुद के अहंकार को तो कुछ समय के लिए संतुष्ट कर सकते हैं किन्तु किसी की काबिलियत, नेकी, अच्छाई और सच्चाई की संपदा को कभी भी नष्ट नहीं कर सकते।..!!

कुछ व्यक्तियों का स्वभाव ही होता है कि वे हर किसी इंसान में चाहे वह अच्छा हो या बुरा कोई न कोई कमी निकाल ही लेते हैं और बेवजह ही उस की  निंदा कर ने में लग जाते  हैं। इतना ही नहीं अपने द्वारा की गई निंदा का कोई न कोई तथ्यपूर्ण कारण, परिस्थिति, मजबूरी या विवशता बताने से भी नहीं चूकते..!! उसे उचित ठहराने की हर कोशिश में लगे रहते हैं।

मतलब कि ऐसे व्यक्ति संसार के सारे दु:खों को खुद ही पैदा करते है और फिर खुद ही अशांत बन इधर-उधर घूमते रहते हैं; बस इसी फिराक में कि कोई ऐसा मिले जिस की निंदा की जाये..!! ऐसा इंसान जब खुद की निंदा सुनता है तो विहवल हो जाता है । देखा जाये तो संसार में एक मात्र मनुष्य ही ऐसा जीव है जो निंदा कर सकता है । विद्वानों का कहना है कि अपने आप की आलोचना करके व्यक्ति अपने जीवन की गंदगी को दूर करने का प्रयत्न कर सकता है । निंदा से हम अपनी कमियां जान सकते हैं । उन कमियों को दूर करें सकते हैं तथा अपना मानसिक एवम वैचारिक विकास कर सकते हैं । पर ये काले सिरवाला  मनुष्य अपनी बुराइयों को नहीं देखता बल्कि दूसरों की बुराईयों को देखता है । इंसान को दूसरे के अवगुणों की बजाय उनमें अच्छाई ढूढनी चाहिए और अपने खुद के अवगुणों को दूर करने चाहिए ।

जिनका स्वभाव है निंदा करना, वे किसी भी परिस्थिति में निंदा की प्रवृति में लगे ही रहते हैं । वे अपनी इस बेतुकी आदत का त्याग भी नहीं कर सकते हैं। इसलिए समझदार इंसान को चाहिये कि  ऐसे उथले लोगों द्वारा की गई विपरीत टिप्पणियों पर ध्यान न दे और अपने काम में मग्न रहे। वैसे भी किस-किस के मुंह पर अंकुश लगायेंगे ? कहां तक इन बेसिर-पैर की बातों पर गौर करेंगे ? निराधार निंदा को नजर अंदाज करना ही बेहतर है । मेरा मानना है कि आलोचना से घबराना नहीं चाहिए, बल्कि संभलना चाहिए।

ऐसा करने पर आप प्रतिवाद में व्यर्थ समय गंवाने से बच जायेंगे तथा अपने मनोबल को और भी अधिक बढ़ाकर जीवन में प्रगति के पथ पर आगे बढ पायेंगे । ऐसा करते-करते एक दिन आपकी स्थिति काफी मजबूत हो जाएगी और आपके निंदकों को सिवाय निराशा के कुछ भी हाथ नहीं लगेगा ।

कमलेश अग्रवाल

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2 Responses to “आलोचना”

  1. mahatammishra फ़रवरी 26, 2013 at 7:11 पूर्वाह्न #

    इस पर सहमती मेरी भी है लेकिन निंदक नियरे राखिये ताकि वह आप कों सुधार कर खुद सुधर जाय…..

  2. kamlesh फ़रवरी 27, 2013 at 7:11 पूर्वाह्न #

    मिश्राजी,
    आप ने इस आलेख में दिलचस्पी ली इसलिये आप की मैं बहुत-बहुत आभारी हूं…इसी तरह हौंसला बढाते रहें…

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