Archive | मार्च, 2013

जादुई गोली

28 मार्च

हार्वर्ड के वैज्ञानिक प्रोफेसर डेविड सिनक्लेयर ने दावा किया है कि  वे एक ऐसी नई तकनीक की शुरुआत देख रहे हैं, जिससे एक दिन 150 वर्ष तक जीवन  मुमकिन  हो  पाएगा । उनका कहना है कि बढ़ती उम्र के लक्षणों से मुकाबला करने में सक्षम यह दवा पांच साल के अंदर बाजार में मौजूद होगी।

वैज्ञानिकों ने सिडनी में एक सम्मेलन में कहा कि शरीर को गठीला बनाने वाली यह जादुई गोली विकसित होने के शुरुआती चरण में है और इसके सेवन के बाद 100 वर्ष से अधिक जीवन जीने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि इस दवा के सेवन से स्टेम कोशिका थरेपी जीवन की गुणवत्ता बढ़ा देगी। न्यूसाउथ वेल्स विश्वविद्यालय में डीन ऑफ मेडिसिन के प्रोफेसर पीटर स्मिथ ने कहा कि ढलती उम्र में खुश और स्वस्थ्य रहने की संभावनाओं पर यह दवा व्यक्ति की उम्र बढ़ाने की दिशा में अहम कड़ी साबित होगी।

अध्ययन के मुताबिक यह शोध विज्ञान पत्रिका जर्नल साइंस में प्रकाशित है। शोधकर्ताओं का कहना है कि ‘सिर्टी’ नाम के एन्जाइम पर 117 दवाओं के परीक्षण के बाद यह दावा किया गया है। उनके मुताबिक यह दवा कैंसर, अल्जाइमर और टाइप 2 डायबिटीज जैसी बीमारियों को रोकने में सक्षम होगी। शोध के बारे में उन्होंने ने बताया कि इस ‘सिर्टी’ नाम के एन्जाइम को लक्ष्य किया गया था। कैलोरी पर रोक और अन्य तरह के उपाय के लिए ऐसा किया गया था पर पाया गया कि यह काफी ज्यादा सक्रियता दिखाने लगा। उन्होंने यह भी बताया कि रेड वाइन में रीजवर्टारोल पाया जाता है। हालांकि यह काफी कम मात्रा में पाया जाता है।यह बढ़ती उम्र से निजात पाने का बेहतर उपाय हो सकता है जब इसकी मात्रा और अच्छी सक्रियता से काम करे। इसलिए शोध में पाया गया कि अगर दवाओं में इसकी मात्रा उचित अनुपात में हो तो यह मनुष्यों के लिए काफी बेहतर साबित होगा और लोग अधिक उम्र तक जी सकेंगे। उन्होंने अपने शोध को उचित ठहराने के लिए जानवरों का भी उदाहरण दिया।

प्रोफेसर सिनक्लेयर ने बताया कि अब वो दिन दूर नहीं जब केवल एक गोली खाने से इंसान की जिंदगी में दस साल का इजाफा हो जाएगा। उन के मुताबिक मानव शरीर में एक खास एंजाइम को निशाना बनाया जाएगा, जो बढ़ती उम्र संबंधी बीमारियों को रोकेगा और लंबी आयु प्रदान कर , जिंदगी के पांच से दस साल बढ़ाने के साथ ही इंसान की उम्र को नियंत्रित कर  पाएगा। उनके अनुसार हालांकि यह दवा बूढ़े होने से तो नहीं रोक सकती लेकिन एजिंग को धीमा जरूर कर देगी। इस  के  असर  के  कारण  शरीर के जीन के सक्रिय होने से याददाश्त बढ़ने के साथ ही हाई फेट डाइट के असर कम होने के कारण बुढ़ापे की प्रक्रिया धीमी हो जाएगी।

सिनक्लेयर के मुताबिक अधिक भार वाली चुहिया में सिंथेटिक रीजवर्टारोल पाया जाता है जिससे वह एक दुबले-पतले चूहे की भांति तेज गति से दौड़ सकती है और उसकी उम्र भी 15 फीसदी अधिक होती है। अब यह देखा जा रहा है कि जो पहले से ही स्वस्थ हैं, उन पर इस दवा का क्या प्रभाव पड़ता है ?

सिनक्लेयर के मुताबिक अभी शोध में बहुत कुछ किया जाना बाकी है। जिन दवाओं के बारे में ऐसा सोचा जा रहा है कि इससे मनुष्यों की उम्र 150 तक पहुंचाई जा सकती है, वह सबके लिए कारगर साबित नहीं भी हो सकती है। इसलिए अभी और शोध किए जाने की जरूरत है जिससे यह सभी के लिए कारगर साबित हो सके । उन्होंने बताया कि फिलहाल यह दवा मुख से या स्थानिक तौर पर दी जा सकती है।

बुढ़ापे से डरने वालों के लिए यह एक खुशखबरी ही है। आप  का  क्या  सोचना  है  ? अवश्य बताईयेगा …..

कमलेश अग्रवाल 

Advertisements

भारत में महिला सशक्तिकरण आवश्यक

14 मार्च

महिला सशक्तिकरण की बात करने से पहले इस प्रश्न का उत्तर ढूंढना होगा कि क्या वास्तव में महिलायें अशक्त हैं ? कहीं ऐसा तो नहीं कि अज्ञानतावश या निहित स्वार्थों के तहत कोई षडयंत्र तो नहीं, महिलाओं को अशक्त बनाये जाने का या उसे अशक्त बताने का…!! मानव सभ्यता जब से पृथ्वी पर पनपने लगी तभी से “बलशाली को ही अधिकार” के सिध्धांत को अपनाते हुए पुरुषवर्ग ने अपने शारिरीक सामर्थ्य का फ़यदा उठाते हुऐ उस पर अपना आधिपत्य जमाना शुरु कर दिया और उसे दोयम दर्जे पर ला खडा किया | धीरे-धीरे नारी ने उसे अपना नसीब व नियति समझ, स्वीकार कर लिया |

भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में महिलाओं के प्रति भेदभाव और शोषण की नीतियों का सदियों से ही बोलबाला रहा है | इतना जरुर कह सकते हैं कि मापदंड व तरीके भिन्न-भिन्न जरुर रहे हैं | सीता से लेकर द्रौपदी तक को यहां पुरुष सत्तात्मक मानसिकता को झेलना पडा है | हर युग में पुरुष के वर्चस्व की किमत नारी ने चुकाई है या उसे चुकाने पर मजबुर होना पडा है | यही कारण रहा कि ढोल,गंवार, शुद्र, पशु नारी , ये सब ताडन के अधिकारी और नारी तेरी यही कहानी आंचल में दूध आंखों में पानी जैसी रचनायें रची गईं , जो सपष्ट इस बात की पूर्ति करती हैं कि वैदिक काल में हमारे देश में जिस नारी को पूज्यनीय माना जाता था , उसे पुरुष समान इज्जत दी जाती थी , मातृ देवो भव : कहा जाता था…..उस नारी- आदर और सम्मान का , उस की दिशा और दशा का किस तरह पतन हुआ…!! क्यों ऐसा हुआ ? क्योंकि मोगल सत्ताधीशों का आंतक इस तरह अपना सिर ऊंचा कर बैठा था कि नर को नारी को इस आतंक से बचाने के लिये पर्दा-प्रथा को लाना पडा | पति के मृत्य के बाद सती बनने की प्रथा लाई गई | दूधपीति की प्रथा का जन्म हुआ और देखते ही देखते कुरिवाजों की बाढ सी आ गई…!! जो नारी चुले से चौपाल तक जा सकने में शक्तिमान थी वह दहलिज लांघने को भी लाचार हो गई…!!

हम ये अच्छी तरह जानते हैं कि मातृत्व के आंगन में ही हमारे व्यकतित्व का विकास होता है | मा ही बच्चे की प्रथम शिक्षिका होती है | हमे ये कतई नहीं भूलना चाहिये कि…

‘सशक्त नारी, सशक्त समाज

सशक्त समाज , सशक्त देश’….

शायद इसीलिये शर-शैया पर लेटे हुए भीष्म-पितामह ने अपने अंतिम समय में पांडवों को राजनीति के पाठ पढाते हुए नसीहत दी थी कि किसी राजा की कुशलता इस तथ्य की मोहताज होती है कि उस के राज्य में महिलाओं का सम्मान कितना होता है ? यही कारण है कि आज महिला सशक्तिकरण सरकार की उपलब्धियां का सार्थक मापदंड  बना हुआ है |

वर्ष 2011 के इंदिरा गांधी शांति पुरुस्कार प्रदान करते समय भारत के वर्तमान राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा था कि राष्ट्र की आर्थिक गतिविधियां में महिलाओं की उचित भागीदारी के बिना सामाजिक प्रगति की अपेक्षा रखना तर्क संगत नहीं होगा | जहां-जहां महिलाओं की व्यापार व कॉरपरेट जगत में अहम भागीदारी रही है (एक संयुक्तराष्ट्र के सर्वेक्षण के मुताबिक) वहां करीब 53% अधिक लाभांश और करीब 24% अधिक बिक्री पाई गई है | लेकिन चंद महिलाओं को ऊंचाई पर देख, हम उन बडे प्रतिशत अशिक्षित महिलाओं को नजर  अंदाज नहीं कर सकते जो आज भी कुपोषण की शिकार हैं, घरेलू हिंसा और तानाकसी से तार-तार हो रही हैं, दहेज के लिये जलाई जा रहीं हैं , बेटी को जन्म देने के निर्णय के लिये भी वे  पुरुष पर निर्भय हैं |

सही अर्थों में देखा जाये तो महिला सशक्तिकरण का अर्थ ही है महिला को आत्म-सम्मान देना | उसे आत्मनिर्भर बनाना | उस के अस्तित्व की रक्षा करना | 8 मार्च को  महिला दिवस मनाकर या कानून या अधिनियमों को बनाकर महिला सशक्तिकरण नहीं हो पायेगा | सरकार महिलाओं को हक्क तो दे सकती है पर जब तक उनके अपनों की सोच में परिवर्तन ना आये या वे खुद अपने अंदर परिवर्तन न लायें तब तक उन  का चौखट से चौपाल तक आने का सफर आसान नहीं होगा | जब समाज में सामाजिक, पारिवारिक और वैचारिक बदलाव आयेगा,तभी शायद औरतों की समस्यायें कुछ कम हो पायेगी क्योंकि आज सिर्फ पुरुष ही दोषी नहीं हैं वरन महिलायें भी दोषी हैं | एक बहू आज भी अपने ही घर में अपनी सास-ननंद से प्रताडित होती नजर आती है |  आज बहू,बेटी,बहन अपने ही घरों में सुरक्षित नहीं हैं |

ये प्रताडना आज से नहीं सदियों से चली आ रही है | महाभारत में अपने ही देवर दुशासन के हथों द्रौपदी का चीर-हरण भरी सभा में कुटुंब के महानुभावों और खुद के ही सशक्त पांच पतियों के सन्मुख हुआ था …!!  जब कभी भी हमारे देश में महिला सशक्तिकरण की चर्चायें होती हैं तब आर्थिक और राजनैतिक उत्थान की ही बातें होती हैं | इसी कारण आज हम एक पढी-लिखी आर्थिक रुप से आत्मनिर्भर महिला को हर तरह से सशक्त और सफल मान लेते हैं |  पर क्या महिलाओं का सशक्तिकरण आर्थिक रुप से सक्षम हो  जाने से हो पायेगा ? कतई नहीं..|  ये सही है कि वे कामकाजी तो बनी हैं पर अपने घर वापस सुरक्षित पहूंच ने की गेरंटी क्या उन्हें मिल पाई है ? महिलाओ का राजनैतिक उत्थान बताने हेतु हमारी सरकार ने ग्रामीण महिलाओं को सरपंच तो बना दिया,पर वे सरपंच महिलायें अपने ही पुरुषवर्ग के हथों की कठ्पुतलियां ही मात्र बनी रहीं…!!

जब तक महिलाओं का सामाजिक, वैचारिक एवम पारिवारिक तौर पर उत्थान नहीं होगा तब तक सशक्तिकरण का ढोल पिटना एक खेल मात्र ही बना रहेगा | सामाजिक उत्थान का आधार-स्तंभ है नारी-शिक्षा| शिक्षित व्यक्ति ही अपनी समानता और स्वतंत्रता के साथ-साथ अपने कानूनी अधिकाओं का बेहतर उपयोग कर सकता है | अपने आत्मसम्मान की  रक्षा कर सकता है | अपमानित होने से बच सकता है | शायद यही वजह रही है कि हमारे भारतवर्ष में महिला-शिक्षण का प्रतिशत बहूत कम है,क्योंकि हमारे देश के शासन में बैठे मनु महाराज के वंशज ये नहीं चाहते थे कि महिला शिक्षित हो | वे जानते थे कि अगर नारी को पढने देगें तो वह अपना भला-बूरा समझ पायेगी | उन्हें इस बात की भीती भी थी कि घर को सही ढंग से चलानेवाली नारी कहीं हमे ही न चला बैठे…!! जब-जब नारी को मौका मिला है , उस ने  तब-तब अपनी शक्ति का परिचय बखुबी दिया है | पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी , पूर्व पुलिस कमिश्नर श्रीमती किरन बेदी , आई सी आई सी बेंक की निदेशक चंदा कोचर आदि इस के उदाहरण हैं |

यह एक मिथ्या  सोच ही है कि महिला सश्क्तिकरण से पुरुषों के अधिकारों का हनन होगा | सशक्तिकरण अधिकारों का बंटवारा नहीं बल्कि परिस्थितियों और मापदंडों के सुधार का पर्यायवाची है | अगर महिलाओं की स्थिति में सुधार होगा तो पुरुष की स्थिति भी कई गुणा अधिक प्रगति की राह पर अग्रसर होती दिखेगी | नारी को दुर्गा का रुप माना गया है जो शेर सवारी है और हर हाथ में अस्त्र-शस्त्र थामे हुए है | महिषासुर मर्दनी है | वह शिव की शक्ति है | शिव शक्ति बिना अघूरे हैं | नारी भी नर की शक्ति ही है |  तभी तो उसे अर्धांगिनी माना जाता रहा है..!! अगर ये सकारात्मक सोच को सामने रखेंगे तभी महिला सशक्तिकरण को बढावा मिल पायेगा |

स्वतंत्रता के पूर्व की बात को न लें और सिर्फ उसके बाद के वर्षों पर ध्यान दिया जाये तब ही हम समझ पायेगें कि स्वतंत्रता के छ: दशकों के बाद भी नारी का सशक्तिकरण क्यों न हो पाया ? कानून तो बहुत बनें…!! आजादी के बाद हमारे संविधान के निर्माण के समय हिंदू कोड बिल की भी बात उठी थी | इस बिल को सामाजिक विधि-विधान को सामने रख बनाया गया था |  दुर्भाग्यवश कुछ स्वार्थों के चलते पारित नहीं हो पाया था | पर उस  के बाद 1974-78 में पंचवर्षीय योजना के तहत महिलाओं की परिस्थिति में सुधार लाने के लिये कानून बनाये गये जो काफी सक्षम भी थे…पर सुधार हो पाया ? नहीं | फिर 1990 में राष्ट्रिय महिला आयोग का गठन किया गया | 2009-11 में  सात सूत्रीय कर्यक्रमों के तहत बहुत सी बातें को आगे रखा गया, सुरक्षित मातृत्व, समान पारिश्रमिक इत्यादि कई महिला उत्थान को ध्यान में रख कायदे बनाये गये थे | वर्ष 2010 में ‘मिशन पूर्ण शक्ति’ की स्थापना भी हो गई, पर नतीजा क्या हुआ ?

आज भी हमारी महिलाओं को घरेलू हिंसा का सामना करना पड रहा है | आज भी कार्यस्थल पर पद्दोनति के लिये पक्षपात को झेलना पड रहा है व आज अपने ही घरों में यौन शोषण का शिकार बनी देखी जा रही है |  उसे शिक्षा से वंचित रखा जा रहा है और सब से दु:खद तो ये है कि आज भी निर्भया, कामिनी ,लज्जा कुछ विकृत मानसिकता वाले भेडियों के कुकर्म का शिकार बनती देखी जा रही हैं | चौराहों पर उन  के शील का हनन किया जा रहा है…!!क्या इसे हम नारी सशक्तिकरण मान लें ? क्या कानून बनाकर भी हम नारी अस्मिता को निलाम होने से रोक पाये ? नहीं |  क्यों ? क्योंकि मानव बडा समझदार प्राणी है |  उस ने अपनी कथनी और करनी को अलग रखना सिख लिया है…!!

ये भी उतना ही सच्च है कि जब-जब अति ने सिर उठया है , उस का तब-तब नाश ही हुआ है | जब कभी धर्म पर अधर्म हावी होने लगता है तो क्रांति का जन्म हुआ है |  शायद इसीलिये दिल्ली के गैंगरेप की घटना ने सोये हुए देशवाशियों को जगा दिया | प्रशासन में बैठ जनता के हित के ठेकेदारों को चुनौती दे डाली |

ऐसी घटना क्यों घटी ? क्योंकि…..

राम मेरी नगरी में पैदा हो या न हो,

लेकिन रावण तब भी था और अब भी है |

मेरा मानना है कि हमे कानूनों की बैसाखियों का सहारा तो लेना है पर साथ-साथ अपने आप को शिक्षित कर, खुद के अस्तित्व को ऊपर उठाना है |  अपने आत्मसम्मान को बरकरार रखना है |  आत्म निर्भय हो आत्म रक्षा के लिये तैयार होना है |  मानसिक तौर पर भले ही हम सशक्त हैं , शारिरीक तौर पर भी  हमें सशक्त बनना होगा तभी सही अर्थों में हम हमारा सशक्तिकरण को सही दिशा दे पायेंगे |

अंत में इतना ही…..

आकाश मेरी बैसाखियों पर टीका है…

इंद्रधनुष मेरी आंखों का काजल है…..

सूरज की परिक्रमा मेरे गर्भ से गुजरती है….

बादलों में मेरे विचार घुमडते हैं……

पर अफसोस….

मेरी अभिव्यक्ति की बयार का आना अभी बाकी है…

मेरी अभिव्यक्ति की बयार का आना अभी बाकी है…

कमलेश अग्रवाल

 

 

 

 

खुदा की आवाज

7 मार्च

एक फकीर 50 सालों से एक ही जगह बैठकर रोज 5 वक्तकी नमाज पढता था । मी चूके या आंधी आये पर उस फकीर का नियम नहीं टूटता ।

एक दिन आकाशवाणी हुई और खुदा की आवाज आई……
“हे फकीर !! तु  50 साल से नमाज पढ रहा है, लेकिन मैं ने तेरी एक भी नमाज कबुल नही की है ।”
फकीर के साथ जो और लोग बैठे हुए थे वे यह सुन हैरत में पड गये । उन्हें दु:ख हुआ कि यह बाबा 50 साल से नमाज पढ रहे हैं और इनकी एक भी नमाज कबुल नही हुई…!!

अनायस ही उनके मुंह से निकल गया…खुदा यह तेरा कैसा न्याय?
लेकिन फकीर दु:खी होने के बजाय खुशी से नाचने लगा । फकीर को इस तरह नाचते देख हिंमत जूटा एक बंदे ने पूछ ही लिया, ,” बाबा, आपको तो दु:ख होना चाहिए , आपकी 50 साल कि बंदगी बेकार गई…..पर आप तो नाच रहे हो…!!!”

फकीर ने जवाब दिया : ” मेरी 50 साल की बंदगी भले ही कबुल ना हुई, तो क्या हुआ…!!! लेकिन खुदा को तो पता लग ही गया है ना कि मैँ 50 साल से बंदगी कर रहा हूँ “
इस बात की मुझे बेहद खुशी है…!!!

दोस्तो जब आप ने दिलोजान से मेहनत की हो और फल ना मिले तो निराश मत होना,
क्योंकि ऊपरवाले को तो पता है ही कि आप मेहनत कर रहे हैं…!!! आप की महेनत का फल तो जरुर  आप को मिलेगा ही ।

कर्म किये जा , फल की इच्छा मत कर इंसान,

जैसे कर्म करेगा वैसा फल देगा भगवान……

ये है गीता का ज्ञान, ये है गीता का ज्ञान…..!!!

कमलेश अग्रवाल