Archive | अप्रैल, 2013

शिक्षक निस्संदेह ही पूजनीय एवं सर्वश्रेष्ठ हैं

22 अप्रैल

एक बार रूस के महान साहित्यकार मैक्सिम गोर्की अपने देश के एक अन्य महान रचनाकार चेखोव से मिलने उनके घर गए। चेखोव गोर्की से अत्यंत गर्मजोशी से मिले और अनेक विषयों पर उनसे चर्चा करने लगे। बातचीत के दौरान गोर्की ने चेखोव से पूछा, ‘आप समाज के विभिन्न वर्गों में किसे अधिक महत्व देते हैं?’ गोर्की की बात सुनकर चेखोव बोले, ‘वैसे तो सभी वर्गों की अपनी-अपनी जगह विशेष अहमियत है, किंतु मैं शिक्षक वर्ग को सबसे अधिक महत्व देता हूं। शिक्षक निस्संदेह ही पूजनीय एवं सर्वश्रेष्ठ हैं।’ यह सुनकर गोर्की बोले, ‘शिक्षक वर्ग की ऐसी कौन सी खासियत है जिसके कारण आप उन्हें सर्वश्रेष्ठ समझते हैं?’ इस पर चेखोव बोले, ‘किसी भी देश की नई पीढ़ी को अच्छे संस्कार देकर आदर्श नागरिक बनाने का दायित्व शिक्षकों पर ही होता है। यदि शिक्षक सुखी-समृद्ध होगा तभी तो वह निश्चिंत होकर देश की आदर्श पीढ़ी के निर्माण में पूरी तन्मयता से लगा रह सकता है।’ 

चेखोव की बातें गोर्की बड़े ध्यान से सुन रहे थे। उनकी यह बात सुनकर वह बोले, ‘तो ऐसे में आप शिक्षकों की कुछ मदद करना चाहते हैं?’ यह सुनकर चेखोव बोले, ‘मैं गुरुजन के प्रति बहुत श्रद्धा रखता हूं। यदि मेरे पास ढेर सारा धन आ जाए तो मैं उससे गांव में शिक्षकों के लिए सुविधाजनक मकान बनवाऊंगा।’ गोर्की बोले, ‘यह तो बहुत ही नेक निर्णय है।’ इस पर चेखोव बोले, ‘इतना ही नहीं, मैं एक ऐसे बड़े पुस्तकालय की व्यवस्था भी करूंगा कि अध्यापक, छात्र तथा ग्रामीण लोग पुस्तकों का अध्ययन कर ज्ञान प्राप्त कर सकें। किसी भी देश को आदर्श शिक्षकों तथा ज्ञान के भंडार की आवश्यकता पड़ती है। उसके सामाजिक-सांस्कृतिक विकास के लिए ये चीजें जरूरी हैं। इसलिए मैं तो शिक्षकों की भूमिका को सर्वाधिक महत्व देता हूं। हमें इस वर्ग के प्रति अपनी कृतज्ञता दर्शानी चाहिए।’ गोर्की यह सुनकर भावविभोर हो उठे। चेखोव के प्रति गोर्की के मन में सम्मान और बढ़ गया।

आज क्या हम कह सकते हैं कि शिक्षक पूजनीय एवं सर्वश्रेष्ठ हैं ? शायद कुछेक तो हैं या हो सकत हैं पर ज्यादातर आज शिक्षा को व्यापार बना बैठे हैं। वे ट्युशन कर नोट छापना अपना ध्येय बना बैठे हैं।अब तो हम भी इसे आम बात गिनने लगे हैं।आज की भौतिकता की दौड को देखते हुए हर अभिभावक अपने बच्चे को डाक्टर, इजनेर,वकिल,आई.पी.एस ,उच्च अधिकारी या मेनेजर बना देखना चाहता है। इस के लिये अगर 10000-12000 हजार से लेकर लाख-दो लाख भी खर्च करने पडे तो वे करने को तैयार हो जाते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि आज अगर उन से चूक हो गई तो बच्चे का भविष्य बिगड जायेगा । 

शिक्षा-प्रणाली को हमने पैसा कमाने की सोचसे जोड दिया है। इस के लिये सिर्फ शिक्षकों को दोष देना भी उचित न होगा…कहीं न कहीं हम भी दोषी हैं। हम अपने स्वार्थ को लेकर इस माहोल को पनपने दे रहें हैं। इस लेख पर जरूर गौर करें। अपने बच्चों को, विद्या को अर्चित करने का सही मार्ग दिखायें। उन की पढाई में खुद भी सम्म्लित हों। उन्हें पूरा साथ और सहकार दें। समय-समय पर उन के स्कूल  में जाकर शिक्षकों से बात करें। बच्चा किस विषय में कमजोर है उसका पता लगायें। जरुरत पडने पर शिक्षक से परामर्श करें। अगर हम अभिभावक इन बातों पर ध्यान दें तो शायद कुछ बदलाव आये।

दूसरी बात ये है कि शिक्षकों का वेतन अच्छा हो। वे देश की आनेवाली नसल के रखवाले हैं।  संस्कारी नागरिक को बनानेवाले एक ऐसे वर्ग से जूडे हैं जो देश की तकदीर को बदल कर रख सकते हैं । हम ही हैं जो निस्संदेह ही शिक्षकों को  पूजनीय एवं सर्वश्रेष्ठ बना सकते हैं…..आप का क्या मानना है ? 

कमलेश अग्रवाल

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गुड़ी पड़वा

12 अप्रैल

भारतीय संस्कृति विश्व की महान संस्कृति है। इसमें मनाए जाने वाले प्रत्येक त्यौहार का अपना महत्व है क्योंकि ये त्यौहार हमारे ऋषियों-मुनियों ने ब्राह्मांड की खगोलीय घटना, धरती के वातावरण परिवर्तन, मनुष्य के मनोविज्ञान तथा सामाजिक कर्तव्य को ध्यान में रख निर्माण किये हैं । तभी ये त्यौहार अपने आँचल में बहुत से दमकते रत्न सहेजे हुए हैं जिन के निहित गुणों का मूल्यांकन कर पाना हमारे लिये आसान नहीं है । इन सारे त्यौहारों में कई अनूठे संदेश छुपे हैं। त्योहारों एवं उत्सवों का आदि काल से ही भारत में काफी महत्व रहा है। हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहाँ पर मनाये जाने वाले सभी त्यौहार समाज में मानवीय गुणों को स्थापित करके लोगों में प्रेम, एकता एवं सद्भावना को बढ़ाते हैं। भारत में त्योहारों एवं उत्सवों का सम्बन्ध किसी जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र से न होकर समभाव से है। त्योहार और धर्म चरित्र के विकास में सहयोग करते हैं। सामाजिक सोच को बढ़ावा देते हैं। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और अगर उसकी सोच सामाजिक नहीं है तो उसका उच्च स्तरीय चरित्र कदापि नहीं हो सकता। सच्चे धर्म की झलक ‘सर्व जन हिताय’ में ही है।

इस नव संवत्सर का इतिहास बताता है कि इसका आरंभकर्ता शकरि महाराज विक्रमादित्य थे। कहा जाता है कि देश की अक्षुण्ण भारतीय संस्कृति और शांति को भंग करने के लिए उत्तर पश्चिम और उत्तर से विदेशी शासकों एवं जातियों ने इस देश पर आक्रमण किए और अनेक भूखंडों पर अपना अधिकार कर लिया और अत्याचार किए जिनमें एक क्रूर जाति के शक तथा हूण मुख्या थे। इनके कू्र अत्याचारों से जनता में त्राहि-त्राहि मच गई तो मालवा के प्रमुख नायक विक्रमादित्य के नेतृत्व में देश की जनता और राजशक्तियां उठ खड़ी हुईं और इन विदेशियों को खदेड़ कर बाहर कर दिया। इस तरह महाराज विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर एक नए युग का सूत्रपात किया इसीलिये इसे विक्रमी शक संवत्सर भी कहा जाता है। इस विक्रमसंवत की शुरुआत 57 इंसवी पूर्वमें हुई । इस के बाद 78 इंसवी में शक संवत का आरंभ हुआ।

यह भी मान्यता है कि श्री विष्णु भगवान ने वर्ष प्रतिपदा के दिन ही प्रथम जीव अवतार (मत्स्यावतार) लिया था तथा शालिवाहन ने शकों पर विजय आज के ही दिन प्राप्तकी थी इसलिए शक संवत्सर प्रारंभ हुआ।

हमारी भारतीय संस्कृति और हमारे ऋषियों-मुनियों ने चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से नववर्ष का आरंभ माना है जिसे गुड़ी पड़वा के नाम से जाना जाता रहा है। माना जाता है कि इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया था। तभी शायद इस दिन मुख्यतया ब्रह्माजी और उनकी निर्माण की हुई सृष्टि के मुख्य-मुख्य देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षस, गंधर्वों, ऋषि-मुनियों, मनुष्यों, नदियों, पर्वतों, पशु-पक्षियों और कीटाणुओं का ही नहीं, रोगों और उनके उपचारों तक का पूजन किया जाता है। 

इस दिन सुंदरकांड, रामरक्षास्तोत्र और देवी भगवती के मंत्र जाप का खास महत्व है। इस दिन सूर्योपासना के साथ आरोग्य, समृद्धि और पवित्र आचरण की कामना की जाती है और कई राज्यों में घर-घर में विजय के प्रतीक स्वरूप गुड़ी सजाई जाती है।  सूर्य को जल अर्पित करते हुए हिंदू ये कामना करते हैं कि हमारे परिवार के उत्थान का ‘सूर्य’ सदैव प्रखर और तेजस्वी बना रहें।

आज के दिन पुरुषार्थी और पराक्रमी सांस्कृतिक वीर बनने की प्रतिज्ञा करनी चाहिए।

ऐसी कई लोगों की मान्यता है कि इसी दिन श्री रामचंद्रजी ने बाली के जुल्म से दक्षिण की प्रजा को मुक्त किया था। बाली के त्रास से मुक्त हुई प्रजा ने घर-घर में उत्सव मनाकर गुड़ियां (ध्वजाएं) फहराईं। आज भी महाराष्ट्रीयन परिवारों में इस दिन बांस में नई साड़ी पहना कर उस पर तांबे या पीतल के लोटे को रखकर गुड़ी बनाई जाती है और उसकी पूजा की जाती है। गुड़ी को घरों के बाहर लगाया जाता है और सुख संपन्नता की कामना की जाती है। घर के आंगन में जो ‘गुड़ी’ खड़ी की जाती है, वह विजय का संदेश देती है। घर में बाली का (आसुरी संपत्ति का राम यानी देवी संपत्ति ने) नाश किया है, ऐसा उसमें सूचक है। यही वजह रही है कि इस दिन को ‘गुड़ी पड़वा’ नाम दिया गया है। 

चैत्र ही एक ऐसा माह है जिसमें वृक्ष तथा लताएं पल्लवित व पुष्पित होती हैं। इसी मास में उन्हें वास्तविक मधुरस पर्याप्त मात्रा में मिलता है। इसी मास में पेड़-पौधों पर नई पत्तियों आ जाती हैं तथा नया अनाज भी आ जाता है जिसका उपयोग सभी देशवासी वर्ष भर करते हैं, उसको नजर न लगे, सभी का स्वास्थ्य उत्तम रहे, पूरे वर्ष में आने वाले सुख-दुःख सभी मिलकर झेल सकें और स्वास्थ्य को अच्छा रख सकें इसीलिए नीम की कोंपलों के साथ मिश्री खाने का इस माह में प्रचलन है। इससे रक्त से संबंधित बीमारी से मुक्ति मिलती है। गुडीपडवा जैसे त्यौहार को मनाने का मतलब है भारतीय संस्कृति की धरोहर को संभालते हुए नववर्ष का स्वागत करना । 

कमलेश अग्रवाल