Archive | मई, 2013

आज आखिर निवृत्ति का दिन आ ही गया …..

31 मई

मेरी संस्था (राष्ट्रीय व्यावसायिक स्वास्थय संस्थान) की ओर से आज मेरे लिये विदाय समारोह का आयोजन किया गया था । आज मुझे इस संस्था में कार्य करते हुए पुरे 36 साल हो गये हैं । इस मौके पर मेरे सहकर्मियोंने मेरे बारे में इतना कुछ कहा कि मैं भावविभोर हो गई । मुझे भी कुछ कहने को कहा गया । इस मैके पर जो भी मैं ने कहा उसे आप के सन्मुख रख रही हूं ….. 

माननीय प्रभारी निदेशक श्री डॉ. सुनील कुमार, मंच पर आसीन मान्य अधिकारी – गण सभाखंड में उपस्थित मेरे मित्रो एवम आज के विशिष्ठ अतिथि व मेरे सहकर्मि Shri H.M.Patel, Shri A.A. Pandya & Shri N.V.Parmar

सर्वप्रथम मैं  मेरे  साथियों के बारे में बोलना चाहूंगी जो आज मेरे साथ ही इस संस्था से निवृत्त हो रहे हैं । उन के उज्जवल भविष्य, अच्छे स्वास्थय एवम संप्पन जीवन की कामना करना चाहूंगी । प्रभु आप सभी को उन सभी मौकों का अवसर प्रदान करें जो नौकरी की भागदौड के कारण आप को न मिल पाये हों । आप के इस नये मुकाम को खुशियों से भर दे तथा आप को इस निवृत्त समय का  सदुपयोग करने की प्रेरणा दें ताकि आप सही मायनों में कभी भी अपने आप को निवृत्त न करें , सदा प्रवृत् रहें । एकबार फिर आप सभी के सुखद निवृत्त जीवन की ईश्वर से प्रार्थना।

अब कुछ खुद के बारे में…..

मेरी यादों से 3rd मई 1977 का दिन शायद ही कभी ओझल  हो। इसी दिन इस संस्था में मैं ने अपना सफर शुरु किया था । यह भी इत्तफाक ही है कि उस दिन भी शुक्रवार था और मेरी निवृत्ति का दिन भी शुक्रवार ही है । मैं ने इस संस्था में PL-450 project के तहत प्रयोगशाला तकनीकी के पद पर अपना कदम रखा था । हालांकि मेरा यह सफर RAC टिकिट पर शुरु हुआ था और सिर्फ 6 महिनों में ही मुझे इसी पद पर 1 ऑक्टोबर 1977 में confirm  आरक्षण उपलब्ध हो गया था …..

तब से करीब-करीब 36 सालों से निरंतर इस गाडी में सफर करती आ रही हूं और आज मैं तकनीकी अधिकारी के पद से निवृत्त हो रही हूं ….सफर जनरल क्लास से जरुर हुआ था पर खत्म कर रही हूं सेकंड ए.सी क्लास से…..!!

इस सफर के दौरान मुझे कई अच्छे-बुरे, खट्टे-मीठे अनुभव हुए । इन अनुभवों से मैं ने बहुत सीखा । परिपक्वता, दुनियादारी, जिम्मेदारी आदि का ज्ञान इन अनुभवों से ही मैं ने पाया । सच कहूं तो इस संस्था ने मुझे बहुत कुछ दिया । मेरे जीवन की खुशहाली, तरक्की सब इस के ही कारण है । देखा जाये तो मैं ने अपने जीवन का 75% समय यहीं गुजारा है ।

इस सफर के दौरान मुझे कई अच्छे  दोस्त,सहकर्मि,सहधिकारी मिले । ये सभी मेरे अच्छे-बुरे दिनों में मेरा सहारा बने । इस संस्था ने मुझे एक ऐसा परिवार दिया, एक ऐसा बेंक दिया, एक ऐसा बरगद का पेड दिया जिन को साथ ले में जीवन के हर मोड पर सफल, कामयाब व उन्न्ति के शिखर सर करती चली गई….इसी के चलते कडी-से-कडी धूप भी मुझे शीतल सी लगी….

आज मैं जो भी हूं आप सभी के सहकार, मेरे परिवार का साथ व प्रभु की असिम कृपा के कारण ही हूं….

जाते-जाते बस यही कहना है कि अगर इस सफर के दौरान जाने-अनजाने में मुझ से इस संस्था के किसी भी सदस्य या साथी को कोई दु:ख पहूंचा हो, ठेस पहूंची हो तो मुझे नादान समझ माफ कर दें….

आप के आशीर्वाद, दुआ, प्यार आगे भी मुझे मिलते रहें, इस उम्मीद को साथ रख इस संस्था के अच्छे भविष्य के लिये व संस्था से जूडे मेरे साथियों की उन्नति की कामना करते हुए आप से इजाजत चाहूंगी….

कहना अब क्या….

जिन के साथ गुजरी थी कल तक ये जिंदगी,

उन रिश्तों की ठंडी छांव को, साथ ले,

आज मुझे अलविदा कहना होगा…..

धन्यवाद, शुक्रिया….

 

कमलेश अग्रवाल

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अक्षय तृतीया का महत्व

14 मई

हिंदू धर्म की मान्यताओं के मुताबिक वर्ष की कुछ तिथियां बड़ी ही शुभ मानी जाती हैं । यह माना जाता है कि ये तिथियां शुभ फलों को प्रदान करती हैं क्योंकि चारों युगों अर्थात सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलियुग में से त्रेतायुग की शुरुआत अक्षय तृतीया के दिन से ही हुई थी । इसलिए इस तिथि को युग के आरंभ की तिथि यानी युर्गाद तिथि भी कहा जाता है । वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है, किंतु वैशाख माह की अक्षय तृतीया  स्वयंसिद्ध मुहूर्तों के लिये श्रेष्ठ मानी गई है। । मान्यता के अनुसार अक्षय तृतीया सभी के जीवन में अच्छी किस्मत, खुशियां और सफलता देने वाली तिथि है। चूंकि इस को स्वयंसिद्ध अभिजीत शुभ मुहूर्त की तिथि माना जाता है इसीलिये विवाह और मांगलिक कार्य इस दिन किसी भी मुहूर्त को देखे बिना ही संपन्न किए जाते हैं। 

इस तिथि को शुभ मानने की कई और मान्यतायें भी हैं । ये वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तो में इसलिये भी मानी गई है क्योंकि ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का आविर्भाव इसी दिन हुआ था। प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री बद्रीनारायण के कपाट इसी दिन पुनः खुलते हैं और श्री बद्रीनाथजी  की और  श्री लक्ष्मी नारायण जी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है। इस दिन वृंदावन स्थित श्री विग्रह-चरण दर्शन भी भक्तों के लिये खोले जाते हैं जो 12 महीने कपडे से ढके रहते हैं ।

मानवीय मूल्यों की परंपरा बनी रहे और संस्कृति का निरन्तर वहन तथा सरंक्षण होता रहे ये सोच भारतीय मनीषियों के द्वारा  कुछ सामाजिक नियम , व्रत व पर्वो का आयोजन किया गया है जिस के चलते व्यक्ति या समाज को पथभ्रष्ट होने से बचाया जा सके । शायद इसी वजह से शुभ मांगलिक कार्यों एवम विवाह आदि को संपन्न करने हेतु मांगलिक मुहूर्त का हमारी संस्कृति में प्रावधान रखा गया है ।

भारतीय काल गणना के अनुसार चार स्वयंसिद्ध अभिजित् मुहूर्त माने गये हैं –

1.चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुडी पडवा)।
2. आखातीज (अक्षय तृतीया)।
3. दशहरा।
4. दीपावली के पूर्व की प्रदोष तिथि।

जैसे आगे कहा गया है अक्षय तृतीया तिथि भी अभिजित मुहूर्त के लिये प्रसिध्ध है । अक्षय का अर्थ है कि कभी समाप्त न होने वाला। ऐसी पौराणिक मान्यता है कि इस दिन खरीदे और धारण किए गए सोने और चांदी के गहने अखंड सौभाग्य देते हैं। मान्यताओं के मुताबिक सोने और चांदी के आभूषण खरीदने से घर में बरकत ही बरकत होती है ।

चूंकि जीवन की खुशी और बाधाओं का चोली दामन का साथ है इसलिये इन शुभातिशुभ तिथियों पर शुभ फलों की खातिर सभी अपने-अपने स्तर से कोशिशें करते है ताकी उनके जीवन में अक्षय और अखंड सुखों का आवागमन होता रहे ।

हिंदू मान्यातओं के अनुसार अगर यह तिथि सोमवार के दिन रोहिणी नक्षत्र में आती है तो उसे बडा ही शुभ माना जाता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस दिन किए गए दान, जप-तप का फल बहुत मिलता है । शायद यही कारण है कि कई लोग इस दिन  अपने पुत्र-पुत्रियों के लगन का मांगलिक कार्य आरंभ करना पसंद करते हैं और अपनेआप को बहुत भाग्यशाली महशूस करते  हैं ।

स्कंद पूराण में कहा गया है कि अक्षय तृतीया को रेणुका के गर्भ से भगवान विष्णु ने भृगुवंशी परशुराम के रुप  में जन्म लिया था जो जन्म से ब्राह्मण और कर्म से क्षत्रिय कहे गये हैं ।  एक कथा के अनुसार परशुराम की माता और विश्वामित्र की माता के पूजन के बाद प्रसाद देते समय ऋषि ने प्रसाद बदल कर दे दिया था। जिसके प्रभाव से परशुराम ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय स्वभाव के बन गये और क्षत्रिय पुत्र होने के बाद भी विश्वामित्र ब्रह्मर्षि कहलाए । उल्लेख है कि सीता स्वयंवर के समय परशुराम जी अपना धनुष बाण श्री राम को समर्पित कर सन्यासी का जीवन बिताने अन्यत्र कहीं चले गए थे । चूंकि वे अपने साथ एक फरसा रखते थे इसीलिये उनका नाम परशुराम पडा ।

इस दिन का महत्व जैन धर्म में भी बताया गया है। माना जाता है कि  इस दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकरश्री आदिनाथ भगवान ने एक वर्ष की पूर्ण तपस्या करने के पश्चात गन्ने के रस से पारायण किया था। जैन धर्म में इसे वर्षीतप से संबोधित किया जाता है। आज भी जैन धर्मावलंबी वर्षीतप की आराधना कर अपने को धन्य समझते हैं, यह तपस्या प्रति वर्ष कार्तिक के कृष्ण पक्ष की अष्टमी से आरम्भ होती है और दूसरे वर्ष वैशाख के शुक्लपक्ष की अक्षय तृतीया के दिन पारायण कर पूर्ण की जाती है।

यह भी एक मान्यता है कि इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था। शायद इसीलिये यह माना जाता है कि आज के दिन मनुष्य अपने या स्वजनों द्वारा किए गए जाने-अनजाने अपराधों की सच्चे मन से ईश्वर से क्षमा प्रार्थना करे तो भगवान उसके अपराधों को क्षमा कर देते हैं और उसे सदगुण प्रदान करते हैं ।

अतः मेरा मानना है कि आज के दिन अपने दुर्गुणों को भगवान के चरणों में सदा के लिए अर्पित कर , हम उनसे सदगुणों का वरदान मांगें ताकि इस तिथि का महत्व सदा बना रहे ।  

कमलेश अग्रवाल