Archive | जून, 2013

नौकर पुराण

19 जून

मेरे पड़ोसिन  सविताजी बड़ी परेशान हैं । कई बार मेरे घर भी आयीं । पता चला कि उन की बाई ने काम छोड़ दिया है । वे बड़ी मुसीबत में हैं ।  बहुत खोजने पर भी उन्हें कोई काम वाली बाई नहीं मिल रही । ना  ही  कोई  नौकर ही मिल रहा है । आज संपन्न हो या सामान्य, सभी घरों में बाई या नौकर रखना आम बात है । आज हम अपने काम के लिए पूरी तरह दूसरों के सहारे रहने लगे हैं ।  इस के पीछे कई कारण हो सकते हैं । एक जमाने में ईश्वरचंद विद्यासागर जी ने कहा था, ‘अपना काम स्वयं करना चाहिए ’ । मेरा मानना  है कि नौकर का सहयोग लेना एक बात है, लेकिन अपने काम के लिए पूरी तरह उस के सहारे रहना ठीक नहीं है ।

लगता है जैसे आज समाज कामचोर या आलसी होता जा रहा है । देखा जाये तो विभक्त परिवार यानी पति, पत्नी और बच्चे वाले घर में कितना काम होता है ? पर बाई या नौकर तो चाहिए ही । दो, तीन या चार हजार रुपये भी ले, लेकिन चाहिए । सुबह घूमकर आई तो देखा कालोनी की कुछ महिलायें कालोनी  के बाग़ीचे में बैठी हैं । मैं भी उन के साथ बैठ गई । वहां बातें हो रहीं थीं ‘ भई मीसीस गुप्ता बड़ी भाग्यशाली हैं । उन  के यहां की कामवाली तो अकेले पूरा काम कर देती है । उन्हें कुछ कहना ही नहीं पड़ता …!!  रुपये भी कोई ज्यादा  नहीं लेती है । सुबह 7 बजे आती  है और शाम 7 बजे  ही जाती है, उन का  परिवार बहुत आराम से रहता है । और देखा, उर्वी के यहां सिर्फ तीन ही लोग हैं, लेकिन दो-दो नौकर रखे हुए हैं !! भई दो नंबर के पैसे डाले कहां ? हम जानते है कि  चार महिलायें जहां मिली ,ऐसी बातों का होना निश्चित है । घर में किसी बात को लेकर अगर पति नाराज है, तो चलेगा, लेकिन बाई या नौकरों को नाराज नहीं रखा जा सकता है…!! यदि ग़ुस्से में काम छोड़ दिया, तो घर का काम कैसे होगा ? नौकरों के भरोसे रहने वाले आलसी लोगों की हालत तब और खराब हो जाती है, जब नौकर काम छोड़ देते हैं या एक-दो दिन के लिए छुट्टी पर रहते हैं । मंदिर जाकर भगवान के सामने प्रमोशन पाने के लिए बॉस की भी जितनी खुशामद नहीं की जाती, उतनी अच्छे नौकरों को  पाने के लिये की जा जाती देखी गई है…!!

मैंने अपने पड़ोसिन को अपनी बाई से कहते सुना था, “देख कविता, अगर  तू छुट्टी पर रहे न, तो अपनी किसी सहेली को भेज देना, प्लीज । उसे कुछ ज्यादा के पैसे मैं अलग से दे दूंगी । समझ गई न । “ उसे बाई की मिन्नत करते हुए देख मुझे लगा जैसे बाई या नौकर के बिना उस का घर अनाथ हो जायेगा..!! मैं समझ नहीं पा रही थी कि बाई के न आने से कौन सा मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ेगा ? कुछ रोज बाद फिर से वे मिलीं । बड़ी थकी – थकी  सी लग रही थीं । मैं ने पूछ ही लिया, क्या बात आज बड़ी थकी हुई सी नजर आ रही हो ? वे बोलीं ,” बच्चे जैसे-तैसे स्कूल जा रहे हैं, । घर में पानी की भी दिक्कत हो रही है । ये भी रोज ऑफिस देर से पहुंच रहे हैं, वह भी बिना लंच बॉक्स के । घर की सफाई ठीक से नहीं हो रही है । फूलों को पानी भी नहीं दे पाती हूं । 11:00 बजने को हैं , रात के जूठे बरतन वैसे ही पड़े हैं । घर में कितने काम होते हैं ।  थकान तो  लगेगी ही न ।  मरा कोई नौकर भी तो नहीं मिल रहा । “वगैरह-वगैरह…..काफी बातें वे करती रहीं ।

पूरी जगह फैल गया कि सविताजी के यहां नौकर चाहिये..!! दूसरी तरफ सविताजी  का परिवार फोन मिलाने में व्यस्त है । वे पहचान के लोगों को फोन कर विनती करते हैं कि भाई कोई बाई या नौकर दिलवा दो ।  लगता है जब तक बाई या नौकर नहीं मिलेंगे तब तक  तो परिवारवालों के चेहरे पर बारह बजे रहेंगे…!! अब तो नौकर प्रोजेक्ट को हाथ धरना ही होगा । वरना सविता जी के इस नौकर-पुराण को सुनते रहना होगा । अगर आप के ध्यान में कोई बाई या नौकर हो तो सविताजी को अवश्य सुचित करें । उन का  E-mail ID है : savitapareshaan@naukar.com

 

कमलेश अग्रवाल 

अम्मा देख, तेरा मुन्ना बिगड़ा जाये…..

14 जून

मुझे निवृत्त हुए करीब-करीब 10-12 दिन हो गये हैं । मेरे अड़ोस-पड़ोस की सखियों ने कई बार कहा कि अब तो घर पर ही रहती हो, कभी वक्त निकाल कर हमारे साथ भी गपशप करने आ जाया करो । कल बस मन किया कि सुमी के यहां जाया जाये ।

जैसे ही मैं उस के घर पहुंची, वह बड़ी सुस्त सी, बुझी-बुझी सी नजर आई। मैं कुछ पुछती उस से पहले ही वह नम आंखों से बोली,”कमलेश अच्छा हुआ जो तुम आई , मेरा मन आज बड़ा ही उदास है ।“ काफी देर तक बस यों ही कुछ इधर-उधर की बातें होती रही । आखिर मैं ने उठते हुए पूछ ही लिया, “ भई आप ने अपनी उदासी का कारण तो बताया ही नहीं…!! “

उस ने जो कुछ कहा उससे साफ समझ आता था कि उस का छोटा बेटा गलत राह पर चल पड़ा है । शराब, क़ल्ब, लड़कियों के चक्कर के साथ-साथ अब तो वह ड्रग का भी आदी हो गया है । उस के कहने के मुताबिक उस के बेटे ने सारी हदें पार कर ली हैं । आज कल तो लडकियों को घर ले आता है । कुछ रोज पहले जब इस का विरोध सुमी ने किया तो उस पर बेटे ने हाथ भी उठा लिया । वह सुबकते हुए बोली,” पूरे हाथों पर खरोंच जो तुम देख रही हो, वह उसी की देन है ।“

तभी उस का नौकर आ गया और सहसा नौकर के मोबाइल से एक धून बजी…  अम्मा देख, तेरा मुन्ना बिगड़ा जाये….. अम्मा देख, तेरा मुन्ना बिगड़ा जाये…..

एक समय था जब ये पंक्तियों को हम में से बहुतों ने स्कूली बच्चों की जुबान से सुना होगा । इस गीत की धून पर शादी-ब्याह, जन्मदिन की पार्टियों में थिरकते, ठुमका  लगाते भी देखा होगा । हो सकता है कि कई हमारी उमर के भाई-बहनें भी जज़बाती हों थिरकते देखे  गये हों…!! पर इस गीत के शब्दों को हम ने क्या कभी गंभीरता से जाना ? अम्मा देख, तेरा मुन्ना बिगड़ा जाये…. इस गीत को क्यों रचा गया ? इस गीत के जरीये निर्देसक ने आज के समाज में स्वछंद बने बच्चों की झलक दिखानी चाही है । जिन परिवारों के बच्चे गलत रास्तों पर चल पड़े हैं उन परिवारों के अभिभावकों की वेदना इस गीत में दिखाई देती है । हंसी में कही गई इन पंक्तियों को अम्मा देख, तेरा मुन्ना बिगड़ा जाये… हमें एक सत्य के रुप में, एक चेतावनी के रुप में देखना होगा । सुमी की वेदना को यह गीत बड़े सही ढंग से बयां कर रहा था अम्मा देख, तेरा मुन्ना बिगड़ा जाये…..

सुमी ने नौकर से कहा, “ बरतन नहीं है । कल समय से आ जाना । “ नौकर के जाने के बाद फिर से हमारी बातें शुरु हुई ।  वह बोली ,” सच बता, कौन से ऐसे मा-बाप होंगे जो अपने बच्चे को बिगाड़ना चाहते होंगे ? अपने बच्चों की उन्नति न चाहते हों ? जिसे अपनी जान से भी ज्यादा चाहा उस से इस तरह का व्यवहार मेरे अंदर के खून को पानी बना रहा है । सही तो यह है कि इस में मैं भी दोषी हूं । इस के पिताजी के देहांत के बाद , इसे किसी चीज की कमी महसूस न हो ये सोच मैं ने इस की जायज-नाजायज सब ज़िदें पुरी की। अब तो मेरी जिंदगी नरक बन कर रह गई है । रात को गुस्सा हो, यह कह कर घर से चला गया है कि बोम्बे जा रहा हूं …नौकरी करने । अपने पैसों को अगरबत्ति करना… उस के रहने से जितनी दुःखी नहीं थी, आज  उस के जाने से कहीं ज्यादा दु:खी  हूं । चिंता तो इस बात की है कि कहीं किसी ओर गलत गिरोह के हाथों में न फंस जाये…!!”

मा तो मा ही होती है । बेटा नालायक है । उस पर हाथ भी उठाता है फिर भी उसी की चिंता करे बैठी है…!!

आज के उच्च घरानों की ये आम बात है कि अभिभावक अपने बच्चों को पैसे के लिये  कभी रोक-टोक करते ही नहीं हैं । अभिभावकों की ओर से जरूरत से ज्यादा अपने लाडलों पर लाड़ -प्यार जतलाने का ही ये नतीजा है । ऐसे घरानों से आने वाले बच्चों की आमदानी कुछ नहीं और मिज़ाज सेठों के…!! कारण साफ है, मा-बाप के पैसों से मौज करना ही उन का लक्ष्य जो बन गया है…!!

ऐसे बच्चे जब अपनी लक्ष्मण रेखा पार कर लेते हैं तो मजबूरन अभिभावकों को अख़बारों में इश्तिहार देने पड़ते हैं कि आज के बाद फलां-फलां नाम के व्यक्ति के साथ अगर कोई भी रुपये-पैसों का लेनदेन करता है तो वह खुद इस का जिम्मेदार होगा क्योंकि हमारा इस व्यक्ति के साथ अब कोई नाता नहीं है  यह विडंबना नहीं तो क्या है ? अपने ही बच्चों के लिये हमें इस हद तक जाना पड़ सकता है कभी क्या इन अभिभावकों ने सोचा था …!!

ऐसे अभिभावकों से कहां, कब चूक हो गई ? क्यों उन का लाड़ला गलत रास्ते चल पड़ा ? कारण तो बहुत हो सकते हैं, पर उन  लाडलों के पथभ्रष्ट होने का कारण भी उन्हें स्वयं ही ढूंढना होगा । अब उसे रास्ते पर कैसे लाया जाये, ये भी खुद ही सोचना होगा । ऐसा तो नहीं था कि दोनों अभिभावक कमाते हुए इतने व्यस्त रहे कि बच्चे पर ध्यान ही न दे पाये  ? या हो सकता है कि संयुक्त परिवार में न रहने का उन का निर्णय आज महंगा पड़ रहा है ? या अभिभावकों की  रोज-रोज की तू तू मैं मैं ने बच्चे को घर से दूर रहने पर मजबूर कर दिया या प्यार बाहर ढूँढ़ते हुए वह गलत दोस्तों के चक्कर में आ गया ?

देखा जाये तो बच्चा जब मा के पेट में होता है तभी से उस का अभ्यास शुरु हो जाता है । संसार में आने से पहले वह कई संस्कार लिये होता है । गर्भ-अवस्था में माता के द्वारा किये गये अच्छे-बुरे विचारों का उस पर प्रभाव होता है । इस के उदाहरण हमारे पास मौजूद है । अभिमन्यु और शिवाजी की कहानियां इस बात का प्रमाण हैं । मा को चाहिये कि किशोर होते वयस्क बच्चे की बदलती अभि-व्यक्तियों पर सविशेष ध्यान दे । उन के दोस्त कैसे हैं , किस परिवार से हैं  किस फितरत के हैं ? उस का ध्यान रखे । तभी उन्हें भटकाव से रोका जा सकता है ।

दूसरे कारणों को तलासा जाये तो आज की फ़िल्मों का भी युवाओं  के भटकाव में अहम भूमिका रही है । फ़िल्मी परदे और अपराध की दुनिया के नायकों की भांति वे रातों-रात उस शोहरत और मंजिल को पा लेना चाहते हैं, जो सिर्फ एक मृगतृष्णा है। ऐसे में एक तो उम्र का दोष, उस पर व्यवस्था की विसंगतियाँ, सार्वजनिक जीवन में आदर्श नेतृत्व का अभाव एवं नैतिक मूल्यों का अवमूल्यन ये सारी बातें मिलकर युवाओं को कुण्ठाग्रस्त एवं भटकाव की ओर ले जाती हैं, नतीजतन अपराध, शोषण, आतंकवाद, अशिक्षा, बेरोजगारी एवं भ्रष्टाचार जैसी समस्याएँ जन्म लेती हैं। 

क्या ये माना जाये कि जिज्ञासा, कौतूहल, ख्वाहिश, शौक या फैशन के नाम पर ये युवा  इन टेढ़ी-मेढ़ी राहों को चुन रहे हैं ? या फिर तनाव, हताशा-निराशा या कुण्ठा ने जबरन उन्हें इन रास्तों पर धकेल दिया है ? या मीडिया, टी.वी., फिल्में और आसपास का माहौल उन्हें इसके लिए प्रेरित कर रहे हैं ? या सामाजिक वातावरण इस दिशाहीनता के लिए जिम्मेदार है ? या साइबर कैफे का चलन उनके जीवन में जहर घोलने की बड़ी भूमिका निभा रहा है ? हम जानते हैं कि  विकसित राज्यों एवं बड़े शहरों में इसकी चर्चा और चलन काफी है पर नये बने राज्य एवं छोटे शहरों में भी इस की बीमारी कम नहीं है…!!  

 इन उपर्युक्त कारणों में से सुमी के बेटे के भटकाव का कोई कारण तो जरूर रहा होगा । पर ऐसा क्यूँ हुआ इसकी पड़ताल करना आज सुमी के किये बेहद ज़रूरी हो गया है । उसके बेटे के लिए नशा जुटाते कौन लोग हैं, किसने उसे इस ओर धकेला ? इन सवालों के जवाब सुमी को ढूंढने ही होंगे क्योंकि इन सवालों का अनुत्तरित रहना सुमी के बेटे के भविष्य के लिये घातक सिद्ध हो सकते  हैं और सुमी के लिये भी । अगर आप भी सुमी को कोई सुझाव देना चाहते हैं तो इस लेख के ज़रिये दे सकते हैं.. ।

कमलेश अग्रवाल

 

 

A Zillion thanks !!

3 जून

My Dear Friends…..

Thanks for always listening to me,

Supporting me,

Encouraging me,

You all are my true friends,

Today I want to say to you….

YOU ARE THE BEST….

How much I love & appreciate you…?

Thank U + Thank U + Thank U + Thank U + Thank U + Thank U

What I mean to say, just adds up more – – –

A Zillion thanks !!

For being the wonderful friends…!!

Kamlesh Agarwal

 

सखियों के नाम

3 जून

मैं  31 मई 2013 को निवृत्त हो रही हुं इस कारण मेरी सहेलियों ने आज 24/05/2013 के दिन मेरी बिदाई के उपलक्ष्य में एक छोटी सी पार्टी का आयोजन किया है । हर बार बिदाई के वक्त गीत सुनाने  को  कहा  जाता  है पर मुझे कहां गाना आयागा ये सोच मैं ने उन के लिये एक कविता लिख दी और उसे ही सुना दिया….

जो कविता सुनाई थी उसे यहां रख रही हूं । पसंद आये तो आशीर्वाद दिजीयेगा ….

प्यारी सखियों ….

आज आप से मिल सारे गीले-शिकवे दूर करने हैं,

सभी पुराने बही खाते बंध करने हैं,

फिर न जाने मौका मिले न मिले…!!

कुछ बीते लमहों की बातें , कुछ मीठी यादें,

चलो एक बार फिर से वे यादें ताज़ी कर लें,

उसे आमने-सामने बैठ फिर से गुनगुना लें…..

मकरसंक्रांति पर उंधिया,जलेबी और पुरी,

बरसात में दाल बड़ों की छीना-झपटी,

20 फरवरी के आने की खुशी,

गरबों और खेल-खुद की जोर-शोर से तैयारी ,

सेमीनार और वर्कशाप की भागादौडी,

सायंस-कोंग्रस की गहमागहमी,

हिंदी-दिवस पर निबंध प्रतियोगिता के विषय की चर्चा,

उस प्रतियोगिता में नंबर कौन लायेगा ?

इस पर कई रोज तक छिड़ती थी यूं ही चर्चा,

ICMR – शतक के आयोजन में कुछ नया कर दिखाने की कोशिश,

रोज-रोज मीटिंग और खाना  मस्ती,

मनीपाल इंटरनेशनल कोंफ्रेंस में हिस्सा लेने की जिद,

कुछ भी नहीं भूल पाई हूं …..

आज एक बार फिर ये यादें जह्न में उमड़ आई हैं…

वादा है आप से…

इन यादों को संजोय रखूंगी,

अपने दिल में बसाय रखूंगी,

 प्रभु से है बस इतनी गुजारिश…

हर लम्हा मुस्कराते हुए गजरे आप के जीवन का,

खुशियों से महकें फूल आप की जीवन-बगिया का,

जिंदगी में हो मुकद्दर का उजाला इतना,

दीप सम जगमगाता रहे जहां आपका …..

दीप सम जगमगाता रहे जहां आपका …..

कमलेश अग्रवाल