Archive | जुलाई, 2013

ऐसा क्यों?

17 जुलाई

मुझे काव्या से मिले काफी वक्त हो चूका था और सुधीर भी बाहर गये हुए थे तो सोचा आज काव्या से ही मिल लिया जाये । काव्या से फोन पर पूछ लिया, वह घर पर हैं भी या नहीं ? काव्या घर पर ही थी सो मैं उस के यहां पहुंच ही गई । बड़े दिनों के बाद हम दोनों सहेलियां मिली, गपशप तो होनी ही थी । वैसे भी काव्या को दुनिया से काफी शिकायतें रहती है । उसे हर विषय की जड़ तक पहुंच ने की एक आदत सी है। जैसे ही कोई उसे ऐसा बंदा या बंदी मिले, उस ने अपना आलाप शुरु कर ही देना होता है । आज भी कुछ ऐसा ही हुआ । वह एक प्रश्न को लेकर बड़ी परेशान थी और थोड़ी ही देर में वह प्रश्न उस की जबान पर आ ही गया । उस का प्रश्न था “विवाह किसी भी औरत के लिये महत्वपूर्ण बताया जाता है लेकिन मर्द के लिये नहीं। आखिर ऐसा क्यों?”

उस का कहना है कि विवाह औरत व मर्द का होता है लेकिन विवाहित होने पर सुहाग के सभी चिह्न औरत को ही पहनने पड़ते हैं । ससुराल के सारे असूल भी उसे ही निभाने पड़ते हैं? विवाहित मर्दोके लिये विवाह होने पर कोई अंतर क्यों नहीं रखा गया ? जबकि विवाहित औरत में बहुत अंतर पाया जाता है…!! उसे ससुराल में सब का  सुनना है, मानना है लेकिन विवाहित मर्द को उस के ससुराल में न किसी का मानना है न ही सुनना है…!! इतना ही नहीं हमारे समाजों में विवाहित एवं अविवाहित औरतों के लिये अलग प्रकार के संबोधन भी रच दिये गये हैं..!! लेकिन मर्दों के संबोधन में कोई बदलाव नहीं..!!  वह तो  सारी उम्र ´मिस्टर` ही रहेगा चाहे उसका विवाह हो या वह कुंवारा हो…!! हम औरतें विवाह के बाद ´मिसेस` या श्रीमती के संबोधन से जानी जायें, जबकि पहले हमें ´मिस` या सुश्री कह कर संबोधित किया जाता रहा था…!! इतना ही नहीं औरत के नाम के पीछे पति की सर नेम लग जाती है…!!  

काव्या का ये प्रश्न हम सभी औरतों के जह्न में कभी न कभी जरूर उठा होगा । फर्क इतना ही रहा होगा कि हम ने उसे हवा नहीं दी ।

एक नजर देखें तो काव्या की सोच में वज़न है । सच तो ये है कि औरतों के लिये पहले से तैयार कर दी गई व्यवस्था को तोड़ने की हिम्मत किसी में नहीं है । क्या हमारे चाहने पर भी मर्दों के लिये नियम बन पायेगें ? क्या हमारा  समाज यह सहन करेगा कि औरत सुहाग चिह्न पहनना छोड़ दे ? या क्या हम औरतें भी सुहाग चिह्न पहनना छोड़ देगी? शायद नहीं….क्योंकि बचपन से हमने अपनी मा, बहन, भाभी को सुहाग चिह्न पहने ही देखा है ।

बस महज खाना-पूर्ती के लिये, औरत की आजादी को लेकर ढोल पिटा जाता है, उसके लिये कानून बन रहे हैं, उसके लिये संसद में हो हल्ला हो रहा है लेकिन जिस व्यवस्था के तहत उसे दबाया जा रहा है उसे बदलने के लिये क्या कभी किसी ने ईमानदारी पूर्वक पहल की है ? सच तो ये है कि  औरतों के लिये तैयार की गई व्यवस्था में खामियां ही खामियां हैं। जब काव्या को हम औरतें, ये कहतीं हैं कि क्यों इतना सोचती हो ? सदियों से यही परंपरा चली आ रही है । न ये बदली है और ना ही बदलेंगी । बेवजह ही सोच सोच कर अपना दिमाग खराब कर रही हो । पर कहीं आप भी अपने जहन में टीस तो महसूस नहीं कर ही रही होती हो ? बस इतना ही फर्क रखती हो कि उसे प्रश्न का रुप नहीं देती हो ।

हम में से कई औरतों को कभी तो कसक हुई होगी इस बात को लेकर कि हम औरतें अकेली फिल्म देखने क्यों नहीं जा सकतीं ? क्यों हम औरतें पुरुष की तरह बेधड़क पार्क में अकेली नहीं घूम सकतीं ? क्यों अजनबी शहर में कमरा लेकर अकेली रहनेवाली महिला को कमरा किराये पर देने में लोग आनाकानी करते हैं ? तपती-सुलगती गर्मी में पुरुष वस्त्र उतार कर दो-घड़ी चैन की सांस ले सकते हैं पर क्या हम औरतों के लिये ये मुमकिन है ? अरे ! कई घरों में तो उसे इस तपती गर्मी में भी सिर पर पल्लू रखना पड़ता है…!! अगर वह उक्त में से कोई भी कार्य करने लगे तो उस पर समाज द्वारा सनकी, पागल या संदिग्ध-चरित्र जैसे उपनाम दे दिये जायेंगे । सुनने-पढ़ने में यह सब अटपटा, अजीब या अश्लील लग सकता है मगर हम औरतें भी उसी हांड़-मांस की बनी हैं जिस हाड-मांस से पुरुष बना है और बिलकुल पुरुष की तरह ही हमारी भी इच्छाएं और तकलीफें हैं। हम औरतें कोई मशीन या जानवर नहीं हैं, जिन पर सर्दी-गर्मी का कोई असर ही न होता हो…!!

आज बहुत से पुरुष यह मानते और कहते हैं कि नारी तो मुक्त हो चुकी है । वह नौकरी करती है, घूमती है, खाती-पीती है, फिल्म देखती है । पुलिस में, हवाई जहाज में, पानी के जहाज पर, हर क्षेत्र में काम करती है अर्थात् पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है । आज का पुरुष इसे पूर्ण मुक्ति के संदर्भ में देख, उसकी पूर्व स्थिति की तुलना करते हुए, इसे बेहतर मानने का निष्कर्ष निकाल ले…!! पर यह सोच सत्यता से दूर ही मानी जायेगी । 30 – 50% शहरों में रह रही नारी को देख यह मान लेना कि आज की नारी स्वतंत्र हो चली है तो ये सही न होगा । आज भी कई प्रतिशत महिलायें प्रताड़ित हैं । घरेलू हिंसा, बलत्कार, कुपोषण की शिकार हैं । आज भी अपने ही घर में अपमानित हो रहीं हैं ।

काफी कुछ बदला भी है पर अभी भी पर्याप्त मात्रा में बदलाव नहीं आया है । अभी भी नारी मुक्ति की तलाश और कोशिश हम औरतों को जारी रखनी होगी । हो सकता है कि इस प्रक्रिया में अभी खासा लंबा वक्त लगे..!! पर ये काम असंभव कतई नहीं है ।  मेरा निजी तौर पर मानना है कि अगर आज से आप भी काव्या के प्रश्न को गंभीरता से लें तो शायद इस प्रश्न का हल जल्दी ही निकाल आये। अब ये तो आप पर ही निर्भर होगा…!!

कमलेश अग्रवाल

That the type of woman I am…!!

11 जुलाई

I’m the type of woman that will turn up her radio, not only to prevent others from hearing her screams but to prevent herself from hearing them too.

I’m the type of woman who keeps everything inside because she can’t trust anyone anymore, for she has been hurt too severely too often in the past.

I’m the type of woman who, once I know you, will help you through anything, even if I don’t like you, even though she’s hurting so much on the inside.

I’m the type of woman that can make your day when I talk, or smile, because the only way I can survive is to see the smile on others faces.

I’m the type of woman that gets good grades, even when she doesn’t care. The type who will do any dare, just for the rare thrill.

I’m the type of woman that is numb inside but wear a smile just so people don’t see the pain I hide.

I’m the type of woman that puts up barriers so that people can’t smuggle their way into my heart and hurt me more than I already am.

I’m the type of woman you can trust with anything, even if I don’t trust myself. Any secret will never be told.

I’m the type of woman who hates to get lost in thought, for she is afraid of memories.

I’m the type of woman that likes to do things by myself.

I’m the type of woman who is too stubborn to give up, to give into anything, no matter the cost.

I’m the type of woman that is hard, emotionless, hardhearted, apathetic . . . but doesn’t let it show.

I’m your ‘normal’ woman on the outside, but your ‘not-so-normal’ one on the inside.

I’m the type of woman that collects love and sad, touching quotes, just for fun.

That the type of woman I am…!!

 

दोस्त तुम ने देर कर दी….

9 जुलाई

( कभी-कभी कुछ ऐसी रचनायें पढ़ने में आ जाती हैं जो हमारी सामाजिक समस्या को बखूबी बया करती हैं और  मानस-पटल पर अपनी छाप छोड़ जाती हैं। ऐसी ही एक रचना यहां, आप के सनमुख रख रही हूं जो मेरी रचित नहीं है पर आज की बेकाबू समस्या बेरोजगारी को काफी अच्छी तरह पेश करती नजर आ रही है । इस कविता  के रचनाकार को शत-शत नमस्कार)

डूबते हुए आदमी ने पुल पर चलते आदमी को आवाज लगाई,

बचाओ, बचाओ…..

पुल पर चलते आदमी ने नीचे रस्सी फेंकी और कह, “आओ…”

नदी में डूबता आदमी रस्सी नहीं पकड़ पा रहा था,

रह-रह कर चिल्ला रहा था,

मैं मरना नहीं चाहता, जिंदगी बड़ी महंगी है,

कल ही तो मेरी MNC में नौकरी लगी है,

इतना सुनते ही पुल पर चलनेवाले ने अपनी रस्सी खिंच ली,

और भागते-भागते वह MNC गया,

उसने वहां के HR को बताया कि…,

अभी-अभी एक आदमी डूब कर मर गया है,

और इस तरह आपकी कंपनी में एक जगह खाली कर गया है,

मैं बेरोजगार हूं…मुझे ले लो,

HR बोली,”दोस्त, तुम ने देर कर दी ।

अब से पहले हमने उस आदमी को लगाया है,

जो उसे धक्का दे तुम से पहले यहां आया है….

जो उसे धक्का दे तुम से पहले यहां आया है….”