Archive | अगस्त, 2013

वह सुबहा कभी तो आयेगी….

16 अगस्त

हमारे देश-नेताओं के बुलंद इरादों और लंबे संघर्ष के बाद मिली आजादी की इस धरोहर को हरा-भरा रखने की उम्मीद के साथ 15 अगस्त का ये राष्ट्रीय पर्व हम भारतवासी मनाते हैं । आज से ठीक 66 साल पहले 15 अगस्त, 1947 के दिन  ब्रिटिश  हुकूमत के सामने हमारे देशवासियों ने एक जंग लड़ी गई थी गुलामी से बाहर निकलने की , अँग्रेज़ों को देश से खदेड़ने की । इस जंग में धर्म-संप्रदाय को भूल हिंदू, सिख, ईसाई, मुस्लिम सभी ने हिस्सा लिया था । सभी का एकमात्र लक्ष्य  था देश को आजाद कराने का और मा भारती, जिसे अँग्रेज़ों ने ज़ंजीरों से जकड़ रखा था ..उन ज़ंजीरों को तोड़ उसे आजाद करवाने का ।

जब आजाद भारत में देशवासियों ने पहली सांस ली थी, तब उन्होंने कई सपनों को भी मन ही मन संजोया था । इतना ही नहीं आजादी की जंग के नेताओं का मकसद था देश सेवा में जी-जान से जुट जाना । इस कारण उन्होंने अपने कुछ सिद्धांत, कुछ नैतिक मूल्य बनाये थे । उन्होंने जंग-ए-आजादी में लाखों शहीदों को लहू बहाते देखा था इस लिये वे इस आजादी का मूल्य जानते थे । पहचानते थे ।

आज देश आजाद हुए 66 वर्ष बीत गये हैं । इन 66 वर्षों में देश की दशा और दिशा में काफी बदलाव देखे जा रहे हैं, सुखद बदलाव बहुत कम नजर आ रहे हैं और दुखदायी बदलाव की तो बाढ़ सी आ चुकी है..!! आज के नेता देश सेवक नहीं पर सत्ता के उपासक बन गये हैं । वे येन-केन प्रकारेण सत्ता पर बने रहना चाहते हैं….!! आज हम उन पर भ्रष्टाचार का काला रंग चढ़ा देख रहे हैं..!! रोज – रोज हमारे सामने नये-नये घोटाले आ रहे है । आज हमारे नेता अँग्रेज़ों की कूटनीति..’फूट डालो और राज करो’ को पूर्ण रुप से अपना बैठे हैं । ‘फूट डालो-राज करो’ की नीति के ही रात-दिन बीज बोये जा रहे हैं । देश आज बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, जमाख़ोरी, गरीबी, अपराध, असमानता , नशाखोरी जैसे दूषणों का शिकार बनता जा  रहा है । जनता महंगाई के बोझ तले पीसती चली जा रही है ।  आजादी के वक्त जिस 1 रुपये(भारतीय) का मूल्य 1 यूरोपीय डोलर के बराबर था आज वही रुपया दिन-प्रतिदिन कमजोर होता जा रहा है । कृषि-प्रधान देश का किसान आत्महत्या करने पर मजबूर होता जा रहा है । नोट से वोट खरीदे जा रहे हैं और वोट के जरीये कुर्सी मिलने पर नोटों से तिजोरियां भरी जा रही है । धर्म-निरपेक्षता की आड में देशवासियों को गुमराह कर अपना उल्लू सीधा किया जा रहा है । कुछ धर्म के समुदाय को खुश रखने के लिये देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है । आज देश का युवा-वर्ग रोजगार पाने हेतु देश से बाहर जाने पर मजबूर है । जिस भारत में कभी विदेशी, विद्या और ज्ञान अर्जित करने आया  करते थे…आज उसी देश का युवा-वर्ग ज्ञान पाने हेतु बड़ी कीमत दे कर विदेशों में जा रहा है ।

देश की आजादी के समय की स्थितियां आज से बिल्कुल अलग थीं । मैं ने अपनी दादी को कहते सुना था कि उस वक्त एक रुपये में एक थैला भर सब्जी आती थी, दो रुपये में एक बड़ा बोरा चावल का आता जा था, एक पैसे में चार सामान खरीदे जा सकते थे, दो रुपये में एक इंसान का महीने भर का भोजन चल जाता था..!! आज दो रुपये में एक कप चाय भी नहीं मिलती..!! दाल-रोटी खाओ ,प्रभु के गुण गाओ जैसी उक्ति को गरीब भूल बैठा है । प्याज ने लोगों की आँखों में आंसू ला दिये हैं…!!

आज फिर हमारे सामने एक बड़ी चुनौती है । आज हमें अपनी युवा-शक्ति को सक्षम करना होगा । हमारे देश का युवा-वर्ग और देशों  के मुकाबले कहीं ज्यादा है …!! मान लें कि उन्हें आजादी के जंग में हुई कुर्बानियों का ख्याल न हो पर उन्हें ये तो पता ही है कि हम कई सालों  तक गुलाम थे । इतिहास इस बात का गवाह है ।

आजादी के संघर्ष से जूड़ी सत्य घटनाओं पर आधारित फिल्में युवाओं को प्रेरित करने और देशभक्ति से रुबरु कराने में अहम भूमिका निभा सकती है ।  सिनेमा ने देशप्रेम के हर रंग को छुआ और उस इतिहास को जिंदा रखने की कोशिश की है जो बलिदानों से भरा हुआ है, जो वतन पर मर मिटने वालों की कहानियों से भरा हुआ है । आज भी अपने तरीके से देश की लड़ाई में बॉलीवुड हमारा साथ दे रहा है । मैं मानती हुं कि अगर आज के नौजवनों को 1948 में बनी फिल्म शहीद दिखाई  जाये, जिस में गुलाम देश के मंजर का इस क़दर फिल्मांकन  किया है कि हर नौजवान भारतीय की आंखों में आंसू आ जाये । फिल्म का गाना वतन की राह में वतन के नौजवां शहीद हो आज भी देशभक्ति का जज्बा उन के जहन में भरता नजर आयेगा । मुझे उम्मीद ही नहीं, बल्कि यकीन है कि अगर हमारी युवा-शक्ति एकजुट हो देश के झूठे, कुर्सी-प्रिय, भ्रष्टाचारी , अपने आप को देश के ठेकेदार बनाये हुए राज – नेताओं को अगले चुनाव में खदेड़ दें । शायद हमारा देश फिर एक बार सोने की चिड़िया बना नजर आये और हमारा तिरंगा 15 अगस्त के दिन लहलहाते हुए हमारे गौरव को सही अर्थों में चार चाँद लगाते हुए अपने आजादी के पर्व को सार्थक बनाये हुए आसमान छुए ।

वह सुबहा कभी तो आयेगी….

वह सुबहा कभी तो आयेगी….

जय-हिंद

कमलेश  अग्रवाल 

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क्यों टूटा मोना के सब्र का बाँध ?

14 अगस्त

( कबीर और उन के पिता के पात्रों के माध्यम से मैं हमारे बहुतायत पुरुषों की मानसिकता को दर्शाना चाहती हूं , जो अपनी पत्नी को अपमानित करने के कृत्य को अपनी मर्दानगी मान लेते हैं और मोना और उस की सास जैसे पात्रों  के ज़रिये ऐसी औरतों को दर्शाना चाहती हूं जो अपने साथ हो रहे दुर्व्यवहार और अपमान के विरोध में अपनी आवाज कई सालों तक नहीं उठा पाती हैं… एक दिन उन के सब्र का बाँध भी टूटता नजर आता है..क्यों ? पढें इस लेख को । शायद जवाब मिल जाये  )

वैसे तो मोना को गालियां खाने की आदत हो चली थी । जब भी कबीर ग़ुस्से होते, तब अकसर मोना पर गालियों की झड़ी ही लगा दिया करते थे । मोना कबीर की गालियों की आदी हो चली थी और ये सोच गम खा जाती थी कि प्रकृति ने उसे पति कबीर की अपेक्षा शारीरिक तौर पर कमजोर बनाया है, जिसकी वजह से ही वह कबीर के क्रोध और ईर्ष्या की शिकार बन रही है । वैसे भी उस ने कई बार अपनी चाची को चाचा से मार खाते देखा था । रोते-रोते चाची को कहते हुए भी कई बार सुना था कि पति को पत्नी पर हाथ उठाने का अधिकार शादी के बाद खुद-ब-खुद  मिल ही जाता है…!! पर आज पता नहीं हर बार गम खाने वाली मोना, जब कबीर ने उसे कुत्ती औरत कहा तो सहसा  भड़क उठी । उस ने अपने अंदर साहस जुटाया और वह कबीर से बोली,” कुत्ते की तरह तो हरदम आप चिखते हैं और कुत्ती औरत मुझे कह रहें हैं ? अरे ! चाबी जगह पर नहीं मिली तो इस कदर चिखना चिल्लाना…!! तुरंत ही तो मैं ने चाबी दे दी आप को । इस तरह मुझ पर मत चिल्लाया करो । अपनी चाबियां खुद ही सँभाला करो…समझे । क्या आज के दिन भी मुझे यही तोहफा देना चाहते हैं…25 साल बाद भी आप वहीं खडे हैं…!! मैं ही पागल हूं जो यह उम्मीद किये हुए  हूं कि अब आप बदल गये हैं …। बहुत हुआ…अब आप की गालियां मैं नहीं सुनूंगी…समझे ।  “ इतना सुनते ही कबीर मोना के पास आये और हाथ उठा कर कहने लगे,” साली सामने बोलती है ? मुझ से जबान लड़ाती है ? ऐसा घूमा कर थप्पड़ लगेगा कि पता चल जायेगा, सामने जबान कैसे लड़ाई जाती है..? कुत्ती औरत ने मेरा जीना हराम कर रखा है ।“ उन का  उठा हुआ हाथ पता नहीं क्यों रुक गया ? मोना बोली,” क्या हुआ ? आप का हाथ रुक क्यों गया ? माराते न… । आज मैं भी तो मार खाकर देख ही लेती आप की मर्दानगी..!!” और कबीर झल्लाते हुए यह कह कर चल दिये….तेरी जैसी कुत्ती औरत के मुंह कौन लगे ?

कबीर के जाने के बाद मोना सोचने लगी….शादी कर के जिस दिन से वह ससुराल आई है…कितने दिन उस के अच्छे गये हैं ? और उस की आँखों के आगे एक – एक कर पुराने दिनों की तस्वीरें आती चली गई । जब मोना ससुरजी को बात बात पर मा (सास) को गाली देकर बात करते देखा करती तब उसे बहुत ही बुरा महसूस हुआ करता था । उस के दिल में एक छुपा सा डर बैठता जाता था….कहीं कबीर भी ऐसा व्यवहार तो उस के साथ नहीं करेंगे न…!! कई बार मा से वह कहती थी, “आप पिताजी से कहती क्यों नहीं हैं कि बिना गाली दिये भी तो बात हो सकती है ।“ मा कहती,” इन आदमियों की तो बहू यही आदत होवे है । कई आदमी तो हाथ तक उठा लेवें हैं । कम से कम तेरे बापू वो ना करें हैं । अपनो के जावे है, अगले को मूंढो खराब होवे है । कौन सी गाली मेरे शरीर के चिपक जावे है ।“ मोना सोचने पर मजबूर हो जाती … मा कितनी भली हैं । कितनी सरलता से पिताजी की गलत बात को भी अपना लेती हैं ।

मोना को सहसा वह दिन याद आ गया जब पिताजी को चाय देते वक्त उस के हाथों से ट्रे गिर गई थी और कप-प्लेट टूट गये थे…!! पिताजी किस क़दर उस पर चिल्लाये थे…!! हाथ टूटे पड़े हैं जो एक ट्रे भी ठीक से ना पकड़ी जावे है ? सवेरे सवेरे नुकसान कर दीया…पता नहीं पढ़-लिख के अपने आप ने के समझने लगे है,  एक काम तो ठीक से करना कोनी जाने ? मा-बाप के से ये ही सिख कर आई है ? पता नहीं कब तक ये ताना-कसी चलती अगर कबीर एन वक्त पर न आये होते तो…!! मोना की आँख में आंसू देख कबीर पूछ बैठे,” क्या बात है ? बापू क्यों जोर-जोर से बोल रहे थे ? आवाज नीचे तक सुनाई दे रही थी ।“ मा बोलीं,” ना…कुछ ना है ..बहू से चाय गिर गई । बस इस बात पर नाराज हो रहे थे । तेरे बापू ने वक्त से चाय ना मिले तो सारा मोहल्ला गजा देवें हैं । बस इत्ती सी बात थी ।“ मोना का मन हुआ कि वह सब कुछ कबीर से बताये कि पापा ने उसे कितना भला-बूरा कहा । मा-बाप तक को कोसा । पर वह चुप रही । जब कबीर घर पर न होते तब इस तरह की घटनायें अकसर होती रहती थी और मा मोना को कबीर की कसम दे-दे कर चुप रहने को कहती रहती थीं ।

मा ऐसा क्यों किया करती थी इस बात का पता मोना को बहुत जल्द ही चल गया । कबीर तो अपने पिता से भी एक हाथ ऊपर थे ग़ुस्से के मामले में । बाप-बेटे भीड़ न जायें इसी डर से मा मोना को चुप रहने को कहती थीं । एक दिन की बात है कबीर ने अपनी दूकान से नौकर के हाथ चिट्ठी भेजी थी जिस में लिखा था…शाम ठीक 6 बजे तैयार रहना । मैं ने दो सिनेमा की टिकटें मंगवाई है । मोना आगे-पीछे हो रही थी कि कैसे मा – बापू  से कहे कि उन्हें आज शाम 6 बजे सिनेमा जाना है ? उसे कबीर पर गुस्सा आ रहा था ये सोच कर कि चिट्ठी  उसे  दे ने की बजाय कबीर ने नौकर से मा को क्यों न दिलवाई…!! सारा झमेला ही मिट जाता…!!  अब वह कैसे मा से कहे कि कबीर ने उसे ठीक 6 बजे तैयार रहने को कहा है क्योंकि सिनेमा जाना है । फिर कुछ सोचा कर वह रसोई में गई और शाम के खाने की तैयारी करने लगी यह सोच कि शायद मा खुद ही पूछेंगी…क्यों अभी से खाने में लग रही है ? तब बता दूंगी । जैसे ही वह रसोई में घुसी कि पिताजी आ गये और बोले,” लगता है चाय की जगह महारानी जी शायद आज खाना ही देंगी…!!” यह सुनते ही मोना ने जल्दी से चाय का भिगोना स्टोव पर रख दिया और चाय बनाने लगी । चाय दे वह अपने कमरे में जा तैयार होने लगी । पर फिर उस ने सोचा…ब्लाऊज और पेटीकोट बदल ही लिये जायें । साड़ी कबीर के आने से कुछ मिनिटों पहले बदल लूंगी ताकि कोई झंझट ही न हो । उस ने वैसा ही किया । अभी वह साड़ी बदलने की सोच ही रही थी कि कबीर आ गये । उसे देख बोले,” अभी तक तैयार नहीं हुई ? 6 बजे सिनेमा शुरु हो जायेगा ।“ मोना कुछ कहती…उस से पहले ही कबीर ने सिनेमा की टिकटें यों कहते हुए फाड़ डाली कि जिसे समय संभालना तक न आता हो, उसे क्यों कहीं ले जाना चाहिये …!! मोना हैरान थी ये सोच कर कि यह क्या बात हुई ? कुछ पूछा ना ताछा…और टिकटें फाड़ डाली…!! अपने कमरे में आ वह सुबक ने लगी । कबीर बोले ,” एक तो वक्त पर तैयार नहीं हुईं और ऊपर से रोना-धोना…!! मैं क्या पागल था जो चिट्ठी भिजवाई ?” मोना बोली,” क्या करती ? अगर पहले से तैयार होती तो पिताजी पता नहीं क्या-क्या सुनाते..!! आप तो जानते ही हैं न पिताजी को..!! वैसे भी मैं तो तैयार ही तो हूं, बस दो मिनट ही तो लगनी है साड़ी पहनने में । मुझे साड़ी पहनने में घण्टे नहीं चाहिये । और आप हैं कि गुस्से में आग-बबूले हुए जा रहें हैं ।  टिकटें फाड़ ने की क्या जरूरत थी ?“ कबीर को लगा कि उस का गुस्सा होना सही न था । उस ने फटी टिकटें उठाई और मोना से बोले…चल जल्दी से साड़ी पहन, चलते हैं, सिनेमा वाला तो अपना यार ही है ।

मोना अपनी किस्मत पर खुश थी । पर मोना की खुशी ज्यादा दिन न टीकी । कबीर के घर आते ही मा-बापू कोई न कोई मोना की शिकायत कर ही देते और कबीर बिना मोना से बात का ताग जाने , गाली-गलोच करने लगते । ये किस्से अब आम हो चले थे । अब तो कबीर बात-बात में मोना को उस के रंग-रुप के भी ताने देने लगे थे । कई बार कहते,” अपने आप को पढ़ी-लिखि मानती है । अरे! चार पैसे कमा कर तो दिखा । बस रोटियां तोड़ना आ गया है । बूढ़े मा-बाप को भी खुश रखना सिख जाये तो बहुत है । मन करता है कि घर आया ही न करुँ ।

ऐसे किस्से निरंतर चलते ही रहे । कभी किसी बात पर तो कभी कोई और बात पर कबीर की मोना पर ताना-कसी होती ही रहती थी । मा-बापू के सामने तो कबीर कुछ ज्यादा ही मोना को अपमानित करते । यह सिलसिला नंदिनी और नीलेश के होने के बाद भी चलता ही रहा । कई बार मोना नंदिनी और नीलेश को छोड़ अपने मायके तंग आकर भी गई, पर गुस्सा उतर ने पर कबीर नंदिनी और नीलेश का वास्ता दे, उसे घर वापस ले ही आते । अब तो ना ही बापू हैं , ना ही मा है । बच्चे भी नौकरी के चक्कर में विदेश जा बसे हैं । पर कबीर की ताना-कसी, मोना से नोक-झोंक ज्यों की त्यों ही है । मोना ने अपने आप से ये सोच समझौता कर लिया है कि कबीर दिल के बुरे नहीं हैं । शायद छोटे से ही जिम्मेदारी उठाते आ रहें हैं इसलिए गुस्सा कर बैठते हैं । तो कभी-कभी सास की बात याद कर अपने आप को ढाढ़स बंधा लेती ।

दिन यूँ ही गुजरते जा रहे थे । आज उन की शादी की 25 वीं सालगिरह थी । मोना मन-ही-मन सोच रही थी 25 साल हो गये हमारी शादी को…!! आज कबीर से तोहफ़े में एक वचन ही मांगना है कि ग़ुस्से में वे अब कभी भी मुझे गाली नहीं देंगे । अभी उस ने सोचा ही था कि कबीर आ गये । बोले, “ जल्दी से तैयार हो जाओ । पहले हम लोंग ड्राईव पर चलेंगे और फिर सिनेमा । ठीक है न… ।“ मोना जल्दी से तैयार हुई । आज उस ने हलके हरे रंग की साड़ी पहनी । यह रंग कबीर को बहुत पसंद है । वह तैयार हो कबीर से बोली,” चलिये..” कबीर चाबी लेने टेबल के पास पहुँचे, देखा चाबी वहां नहीं है । बस ग़ुस्से से चिल्लाते हुए मोना को पुकारते हुए बोले,” ये औरत कभी कोई काम ठीक से कर ही नहीं सकती । अब देखो , यहां से चाबी ही नदारद है । आखिर कब तक इस कुत्ती औरत को बर्दास्त किया जाये ?” मोना के कान से जैसे ही ये शब्द टकराये…वह अपने आप का आपा खो बैठी और आज उस ने हिंमत जूटा ही ली और कबीर को कह ही दिया जो कहना था…!!

आज की  इस घटना ने आखिर मोना को क्यों विवश कर दिया कबीर को प्रत्युत्तर देने के लिये ? ऐसा तो नहीं कि उम्र के साथ, मोना की सहनशक्ति जवाब दे चुकी है ? या उस के अंदर दबा हुआ स्वाभिमान जग गया है ? या अब उसे एक तसल्ली ये भी है कि बच्चे अब अपनी-अपनी गृहस्थी में रम गये हैं …!! या फिर इस बात का शकुन कि अब मात-पिता ही नहीं रहे तो उन की इज्जत के बारे में सोचने की जरूरत नहीं है…!! ना ही अब कोई भाई-बहन कुँवारे हैं जिन की शादियों की उसे फिक्र हो..!! फिर क्यों इस जिल्लत को बर्दास्त करना ? बहुत हो गया….अब और सहन करने की जरूरत नहीं ।

आप का क्या मानना है..?

कमलेश अग्रवाल 

इज्जत की जिन्दगी

9 अगस्त
चंद सिक्को के लिये,  ईमान को बिकते देखा,
 पेट की भूख के लिये, ईमान को जूझते देखा ।
 
गरीबी ईमान को थामे,  किसी तरह जी रही है ‘
अमीरी ईमान बेच,  ठाठ से जिंदगी जी रही है ।
 
गरीबी को इज्जत के लिये बिलखते देखा ,
अमीरों के  हाथों  सरेआम लुटते  देखा ।
 
ईमान और इज्जत की रोटी के लिये ,
गरीबी को  चुपचाप यों सिसकते देखा….।।
क्मलेश अग्रवाल

कन्या की व्यथा….

4 अगस्त

कन्या मेरी अजीज सहेलियों में से एक है। शादी होने के कई सालों बाद आज हम मिले हैं। श्र्लोक उस के पति हैं। मैं ने पूछा, ”कन्या कैसे हैं तुम्हारे श्र्लोक बाबु ? जैसा तुम कहा करती थीं वैसे ही है न..!!” कन्या हँसते हुए बोली ,”तुम क्या सोचती हो.. पूरे विश्व में पाये जाने वाले पतियों से मेरे भारतीय पति की प्रजाति कुछ भिन्न है ? मेरा तो मानना है कि सभी पत्नियों को अकसर वहम होता है कि उन्हें सुंदर, सुशील,पत्नी चाहक पति मिला है…!! असल में मैं ने भी यही सोच कर श्र्लोक को पसंद किया था..!! बस तुम समझ लो कि श्र्लोक भी उसी प्रजाति से मिलते-जुलते पति हैं।“ और हम दोनों ही ठहाका मार कर हंस पड़ी।

कन्या कालेज के जमाने में बहुत खूबसूरत दिखाई देती थी। उस की गिनती सरल व सुशील लडकियों में हुआ करती थी। मैं अकसर उस से कहा करती थी कि जिस के साथ तुम ब्याह कर जाओगी उस की तो तकदीर ही खुल जायेगी। पर आज कन्या को देख कर मुझे झटका सा लगा। उस के चेहरे की रोनक जैसे की कही खो गई थी। मेरे मन ने मुझ से कहा ,कुछ तो बात जरूर है। जरूर कन्या मुझ से कुछ छुपा रही है। मुझे पता लगाना ही होगा। चाय-नाश्ता कर हम फिर से बैठे ही थे कि मैं ने उस को खँगालना चाहा। कन्या तुम इतनी लापरवाह कैसे हो गई हो ? बाल का क्या हाल बना रखा है? आईब्रो कितनी बढ़ गई हैं ? दोनों मियाँ-बीबी हो फिर भी वक्त नहीं मिलता…!! वह बस मुस्करा दी। मैं ने कहा,” मेरे पड़ोस में बहुत अच्छा पार्लर है ,चल चलते हैं।“ वह बोली,” छोड़ यार। कहीं नहीं जाना। यही बैठ कर बातें करते हैं । किस के लिये संवरना है ? ऐसे ही बहुत कुछ सुनती हू और सुनने की अब ताकत नहीं है।“ इतना कहते ही उस की आँख भर आई। उस ने मेरी ओर देख कर कहना शुरु किया …..

कमलेश तुम जानती नहीं हो इन पतियों की फितरत…!! अगर पत्नी सुंदर हो तो इस (पति) को ऐसी पत्नी चाहिए होती है जिसे कोई न देखे और वह उसकी ओर से निश्चिंत रहे। दोनों साथ जाएँ तो हर कोई कहे आप कितने हैंडसम लग रहे हैं और तब वह इतराकर पत्नी पर एक मुस्कान फेंके कि देखो तुम कितनी भाग्य शालिनी हो जो मेरे जैसा स्मार्ट पति मिला। श्र्लोक भी इसी वहम में थे  कि उन्हें  सुंदर पत्नी चाहिए। पर अब सुंदर पत्नी पाकर वे अकसर सोचते रहते हैं कि कहीं पड़ोसी की निगाह तो उस की पत्नी पर नहीं है न..!! मेरे जैसी पढ़ी-लिखी पत्नी मिल गई है तो वे बात-बात में कहने लगते हैं कि मेरे सामने हर वक्त अपना ज्ञान मत झाड़ा करो, पर जब कोई ऐसा दोस्त घर पर आ जाये कि जिस की पत्नी पढ़ी-लिखी न हो तब जोर-शोर से उस के आगे मेरी पढ़ाई के बखान करने लगते हैं। मुझे तो यही लगता है कि  केवल दूसरों को बताने के लिए ही श्र्लोक ने मेरी जैसी पढ़ी-लिखी पत्नी को पसंद किया होगा..!! श्र्लोक के लिये मेरा कम पढ़ी-लिखी होना ही अच्छा होता..!! तब शायद ये तो कह पाते “अकल है दो पैसे की?” कह कर अपनी भड़ास तो निकाल लेते..!! पत्नी के स्वाभिमान को घर के अंदर आते ही अभिमान साबित करने में इन पतियो को एक सेकंड भी नहीं लगती..!! घर के सारे सदस्य जब मेरे भोजन को अंगुलियाँ चाट कर खाते हैं तब मेरे पति श्र्लोक कहते हैं , “यह क्या बनाया है? कुछ जायका भी तो हो? सिर्फ पका देने से खाना नहीं बनता ? उस में स्वाद भी होना चाहिये…समझी। शुरु-शुरु में मैं ने एकादबार लिपिस्टीक लगा ली तो कहने लगे हमारे परिवार की महिलाये लिपस्टिक नहीं लगाती….समझी। अब तुम ही बताओ मैं क्या करुँ ? श्र्लोक की ताना-कसी अब बर्दाश्त नहीं होती।

मैं ने कन्या को शांत किया , उसे धीरज रखने की सलाह दी पर कन्या की बातो ने मुझे अदर से हिला दिया था । सोचने पर मजबूर कर दिया था ।

वैसे तो वैज्ञानिक तथ्य के आधार से देखे तो यह एक सनातन सत्य ही है कि शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्तरों पर स्त्री और पुरुष दोनों ही अधूरे होते हैं। दोनों के मिलन से ही अधूरापन भरता है। दोनों की अपूर्णता जब पूर्णता में बदल जाती है तभी दाम्पत्य की भव्य इमारत बनी नजर आती है। कन्या की बातें सुन  मैं सोच रही थी कि दाम्पत्य कहते किसे हैं? क्या सिर्फ विवाहित होना या पति-पत्नी का साथ रहना दाम्पत्य कहा जा सकता है? पति-पत्नी के बीच जो संबंध होता है वह कर्तव्य और पवित्रता पर आधारित होना चाहिये । इस संबंध की डोर जितनी कोमल होती है, उतनी ही मजबूत भी होनी चाहिये। जिंदगी की असल सार्थकता को जानने के लिये दो साथी, सहचरों का प्रतिज्ञा बद्ध होकर आगे बढऩा ही सुखी वैवाहिक जीवन का मकसद होता है। कन्या के सुखी परिवार की कामना करते हुए कब आँख लग गई पता ही न चला ।

कमलेश अग्रवाल