Archive | सितम्बर, 2013

क्यों महिलायें घरेलू हिंसा की शिकार हैं ?

10 सितम्बर

(कुछ समय पहले ही में एक सेवाभावी संगठन “ Justice on Trial” से जूड़ी हूं । ये संस्था घरेलू हिंसा पर 21 सितम्बर 2013 के दिन एक संगोष्ठी का आयोजन कर रही है । इस का मकसद है कि हमारी बहनों को इस विषय को लेकर जागृत करना । बस मन में विचार आया कि मैं भी इस विषय पर अपने विचारों को लेख में परिवर्तित करुँ और ये लेख आप के सनमुख है । पसंद आये तो अपनी टिप्पणी जरूर दें )

आज अनगिनत महिलायें घरेलू हिंसा की शिकार हैं । देश की राजधानी दिल्ली के एक सामाजिक संगठन द्वारा कराये गये सर्वेक्षण से यह बात सामने आई है कि देश में लगभग 5 करोड़ महिलायें घरेलू हिंसा की शिकार हैं लेकिन इनमें से केवल 0.1 प्रतिशत महिलाओं ने ही घरेलू हिंसा के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है । क्यों ? क्योंकि वे जानती हैं कि अगर उन्होंने ऐसा किया तो मायके और ससुराल दोनों घरों के द्वार उन के लिये सदा के लिये बंद हो जायेंगे…!! चाहे उन के लिये विवाहित जीवन में प्रवेश करने का अर्थ एक तनाव पूर्ण तथा हिंसा पूर्ण अस्तित्व की शुरुआत ही क्यों न हो …!! हमारे परंपरागत समाज में महिलाओं को हमेशा अन्याय सहन करने की शिक्षा जो दी जाती है…!! पति की सेवा और उसकी हर इच्छा को पूरा करना उन का धर्म है….!! जो समाज आज भी महिलाओं को पुराने रीति-रिवाजों का अनुसरण करने पर मजबूर करता हो, वहां महिलाओं के साथ ऐसी वारदातें हमारे समाज की मौलिक पहचान को मजबूत आधार देता है । समय परिवर्तन के बावजूद भी आज महिलायें क्या खुद को स्वतंत्र और सुरक्षित मान सकतीं ? वह कभी भी इस बात से आश्वस्त नहीं रह सकतीं कि घर और बाहर के वातावरण में वे सुरक्षित हैं ।

आज भी अधिकांश पुरुषों की मानसिकता में अपनी पत्नी को पीट देना एक शक्तिशाली पुरुष होने का मापदंड ही है । पर वे ये भूल जाते हैं कि इसका परिणाम क्या होगा ? बहुत दुर्भाग्य पूर्ण और बिखरा हुआ एक दुखी घर ही उन के हिस्से में आयेगा…!! घरेलू हिंसा की यह धारणा क्यों पनपी ? क्योंकि हमारे समाज में बेटी के पैदा होने से ही उसके साथ भेद-भाव होना शुरू हो जाता है । उसकी स्वतंत्रता को कुचल दिया जाता है । अगर वह अपनी आजादी और अस्तित्व के लिए आवाज उठाती है तो उसके साथ गलत व्यवहार और मारपीट कर उसे चुप करा दिया जाता है । पुरुष सत्ता इस अवधारणा पर ही आधारित है । आज इस धारणा को बदलने की आवश्यकता है ।

भारतीय समाज में महिला पर अत्याचार होना कोई नई बात नहीं है । यहां पुरुष वर्चस्व को बरकरार रखने  के लिए हमेशा ही महिला के स्वाभिमान और उस के निजी अस्तित्व को कुचला जाता रहा है । उस के जीवन की आहुति आम बात है । सब कुछ सहती हुई वह कभी भी अपने साथ हो रहे दुर्व्यवहार और अत्याचार के विरोध में अपनी आवाज नहीं उठा पाती ; क्योंकि वह यह जानती है कि इस पुरुष प्रधान समाज में उसकी व्यथा की न उस के मायके में सुनवाई होगी और ना ही ससुराल में । इसीलिए वह अपनी इस व्यथा को अपनी नियति मानती हुई सब कुछ सहन करती रहती है ।

हमारे सामाजिक व्यवस्था में प्राय: यह देखा गया है कि औरत परिवार के भीतर कभी पिता, तो कभी भाई, विवाह पश्चात पति या बेटा, किसी ना किसी रूप में पुरुष के सत्तात्मक रुख का शिकार होती रही है । जिसका सबसे बड़ा कारण यह है कि प्रकृति ने औरत को पुरुषों की अपेक्षा शारीरिक तौर पर कमजोर बनाया है, जिसकी वजह से वह जल्द ही पुरुषों के क्रोध का, उन के द्वारा अपमानित होना, मार खाना जैसी वृत्तियों का शिकार होती आ रही है । इतना ही नहीं हमारे समाज की सोच भी तो यही रही है कि शादी के बाद पति को पत्नी पर हाथ उठाने का अधिकार (खुद-ब-खुद)  मिल जाता है ।

बढ़ती जा रही घरेलू हिंसा को देख हमारी संवैधानिक व्यवस्था महिला पर होने वाली हिंसा और उसके शोषण के प्रति सचेत तो हो गई है पर जब तक खुद महिलायें सशक्त नहीं होगी तब तक घरेलू हिंसा को रोकना मुमकिन नहीं होगा ।  वर्ष 2006 में भारत सरकार द्वारा घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम 2005 लागू किया गया जिसके अनुसार महिला के साथ होने वाली किसी भी प्रकार के गलत व्यवहार मतलब कि मारपीट, गाली-गलोच, अपशब्द का प्रयोग, छेड़छाड़, उस के मना करने पर भी संभोग इत्यादि को अपराध की श्रेणी में रखा गया है और इसके दोषी पाए जाने वाले के लिये कड़ी से कडी सजा का भी प्रावधान रखा गया है । अर्थात कोई भी महिला यदि परिवार के पुरुष द्वारा की गई मारपीट अथवा अन्य प्रताड़ना से त्रस्त है तो वह घरेलू हिंसा की शिकार मानी जाएगी । आज यही कारण है कि अबला और असहाय समझी जाने वाली महिला आज अपने अधिकारों के प्रति सचेत होती जा रही है । इसके अंतर्गत विधवा बहन, मा, बेटी, अकेली अविवाहित महिला आदि को घरेलू संबंधों में सम्मिलित भी किया गया है । इतना ही नहीं इस संविधान के तहत उन्हें संपत्ति का अधिकार अगर नही6 भी दिया जाये, पर उस के आवास संबंधी सभी सुविधाएं मुहैया कराना की जिम्मेदारी परिवार के मुखिया की रखी गई है । इस महिला संरक्षण अधिनियम 2005 की जरूरत क्यों पड़ी  ? आखिर घरेलू हिंसा के कारण क्या हैं ? देखिये….

घरेलू हिंसा के मुख्य कारण हैं ……

  • महिलाओं में शिक्षा का अभाव
  • आर्थिक तौर पर उन का कमजोर होना
  • पति का शराबी या कोई और नशे की लत का होना
  • दहेज की कुप्रथा का होना
  • बहू बनी महिला द्वारा बार-बार बेटी पैदा करना
  • ससुराल में हो रहे दुर्व्यवहार का विरोध करना
  • पुरुष का उस के चरित्र पर शक करना

घरेलू हिंसा के प्रकार….

शारीरिक हिंसा – मारपीट करना, धकेलना, ठोकर मारना, लात मारना मुक्का मारना यानी कि उसे शारीरिक पीड़ा या क्षति पहुंचाना…..

लैंगिक हिंसा – बलात्कार करना, अश्लील साहित्य या कोई अन्य अश्लील तस्वीरों को देखने के लिए विवश करना, महिला के साथ दुर्व्यवहार करना,  अपमानित करना, महिला की पारिवारिक और सामाजिक प्रतिष्ठा को आहत करना…..

मौखिक और भावनात्मक हिंसा – अपमान करना, चरित्र पर दोषारोपण करना, पुत्र ना होने पर अपमानित करना, दहेज इत्यादि न लाने पर अपमानित करना, नौकरी ना करने या उसे छोड़ देने के लिए विवश करना, विवाह ना करने की इच्छा के विरुद्ध विवाह के लिए जबर्दस्ती करना, उसकी पसंद के व्यक्ति से विवाह ना करने देना, किसी विशेष व्यक्ति से विवाह करने के लिए विवश करना, आत्महत्या करने की धमकी देना, कोई अन्य मौखिक दुर्व्यवहार करना….

आर्थिक हिंसा – बच्चों की पढ़ाई और उनके संरक्षण के लिए धन उपलब्ध न कराना, बच्चों के लिए खाना, कपड़े, दवाइयां उपलब्ध न कराना, रोजगार चलाने से रोकना या उसमें रुकावट पैदा करना, वेतन इत्यादि से प्राप्त आय को ले लेना, घर से निकलने के लिए विवश करना, निर्धारित वेतन या पारिश्रमिक न देना….

इन सब मुद्दों को देखते हुए कुछ प्रश्न अवश्य जहन में उठते हैं कि  क्या महिलाओं के साथ शोषण होना हर समाज की एक मौलिक पहचान है ? क्या शिक्षा और आधुनिकता इन अमानवीय हालातों में कोई परिवर्तन ला सकते हैं ?

भारतदेश , जिस की तुलना माता से की गई है , इसी देश की महिलाओं के हालात हर स्वरूप में शोचनीय ही दिख रहे हैं । उनका मानसिक और शारीरिक शोषण होना एक आम बात बनती जा रही है । शैक्षिक क्षेत्र हो या फिर सामाजिक, कागजी स्तर पर सब सही दिखाया जाता रहा है ; लेकिन वास्तविक सुधार का कोई साक्ष्य कम से कम वर्तमान हालातों में तो नजर नहीं आता…!!

कमलेश अग्रवाल

 

 

Advertisements

निष्काम सेवा

8 सितम्बर

निष्काम भाव से सेवा करने को ही दूसरे शब्दों में हम स्वैच्छिक सेवा करना भी कह सकते हैं । यदि हम प्रकृति की ओर नजर करें तो हम देखेंगे कि सूर्य, चंद्र, वृक्ष, वनस्पतियां, सभी मानव के लिए निरंतर सेवा करते आ रहे हैं इसीलिये वे जीवनदायी कहलाते हैं। प्रकृति हमें कुछ न कुछ देती ही रहती है और इस के एवज में कभी किसी चीज की हम से अपेक्षा भी नहीं करती…!! यही स्वैच्छिक सेवा है, जिसे हमारे ऋषि-मुनियों ने निष्काम कर्म की संज्ञा दी है।

शायद यही कारण है कि प्राचीन आर्य संस्कृति के जीवन दर्शन और श्रुतियों में यह विद्यमान है कि मानव को प्रकृति की स्वैच्छिक सेवा करते हुए उस की रक्षाकरनी चाहिये । वेद व्यास, आदि शंकराचार्य, ईसा मसीह, पैगंबर मुहम्मद साहब, गौतम बुद्ध, स्वामी रामतीर्थ, रामकृष्ण परमहंस, गुरु नानक, महात्मा गांधी, स्वामी चिन्मयानंद, स्वामी विवेकानंद एवं मदर टेरेसा जैसी महान व्यक्तियों ने स्वैच्छिक सेवा को ही सर्वोपरि मान अपनाया ।

आज हम देख रहें हैं कि चारों तरफ अनाचार बढ़ रहा है। गरीब और ज्यादा गरीब हो रहे हैं। ज्यादातर लोग सिर्फ अपना भला चाहते हैं, दूसरों की उन्हें परवाह नहीं। क्यों ? क्योंकि मानवी अपने स्वार्थ में अंधा होता जा रहा है । अपने स्वार्थ के कारण अकारण ही प्रकृति से खिलवाड़ कर रहा है ।  स्वैच्छिक सेवा भूलता जा रहा है । जबकि अनाचार, गरीबी और स्वार्थ परायणता का समाधान स्वैच्छिक सेवा में ही है। यह एक ऐसा मानवीय मूल्य है, जिससे न सिर्फ समाज और देश का स्वरूप निखरता है, बल्कि व्यक्तिगत रूप से भी आत्मिक विकास में लाभ होता है। स्वैच्छिक सेवा से नए मित्र बनते हैं, संबंध जुड़ते हैं, कार्यकुशलता बढ़ती है, अवसाद दूर होते हैं और शरीर शक्तिशाली और स्वस्थ बनता है।

रामचरित्र मानस में गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं-

परहित सरिस धर्म नहिं भाई ।

पर पीड़ा सम नहिं अधिमाई ।।

मतलब साफ है….स्वैच्छिक सेवा को अपना कर अपने आंतरिक विकास की ओर हम अग्रसर हो सकते हैं । हमारी पूजनीय भगवत गीता इंसान को मनोविज्ञान के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटती हैं । प्रथम श्रेणी के व्यक्ति सत्वगुणी, दूसरी श्रेणी वाले रजोगुणी और तीसरी श्रेणी वाले तमोगुणी कहे गये हैं । ये तीनों गुण प्रत्येक व्यक्ति में होते हैं, परंतु उन का अनुपात अलग- अलग होता है। जिस गुण की प्रधानता अधिक होती है, उस के मुताबिक ही व्यक्ति की प्रकृति बन जाती है। निष्काम सेवा से सत्वगुण की अभिवृद्धि होती है। सो हमें चाहिये कि हम स्वैच्छिक सेवा को अपने जीवन में स्थान दें ।

कमलेश अग्रवाल