Archive | जनवरी, 2014

असफलता अपराध नहीं है, मात्र एक चुनौती है…

28 जनवरी

अनीशा  ने  इस बार  सी. ए. की फाइनल परीक्षा दी थी, तब उसे पुरी उम्मीद थी कि इस बार हो सकता है कि उस का टोप 20 की यादी में नाम आ जाये । उसे लग रहा था कि इस बार पेपर बहुत ही सही लिखे गये हैं । उस के माता-पिता को भी इस बात का भरोसा था । वैसे भी इस साल बी.कोम में वह अपनी युनिवर्सीटिमें छठे नंबर पर थी ।

जब वह 15 तारीख को अपना परिणाम देखने बैठी तो बैठी ही रह गई । सफल विद्यार्थियों की यादी में उस का कहीं नाम ही नहीं था..!! कहां तो उसे उम्मीद थी कि इस बार वह टोपर की यादी में होगी, पर यह क्या हो गया कि वह सफल ही न हो पाई…!! उस का रोना छूट गया । माता-पिता को भी यकीन नहीं हो रहा था ।

जब मुझे ये खबर मिली तो मैं भी असमंजस में पड़ गई । मैं सोच रही थी कि क्यों ऐसा हुआ ? क्या अनीशा ने कुछ ज्यादा ही उम्मीद बाँध ली थी ? या उसे अपने आप पर जरूरत से ज्यादा भरोसा हो चला था ? या उस का युनिवर्सीटि में छठे स्थान पर रहने ने उसे कुछ ज्यादा ही महत्वाकांक्षी बना दिया था ? जो भी रहा हो , पर अब तो यही देखना है कि वह हताश न हो ।

मैं 2-3 दिनों बाद उससे मिली तो उसे बहुत बुझा-बुझा सा पाया । मैं ने उस से कहा,” बेटे आप हताशा के गर्त में मत डूबो वरन अपनी त्रुटियों व कमजोरियों का विवेचन करो । बेटे आप कल जितने समझदार थे उससे कहीं अधिक आज समझदार होना है । मेरा तो ये मानना है कि आरंभिक जीवन में असफलता हमें बहुत बड़ा व्यवहारिक लाभ दे जाती हैं । एक बात का ध्यान रहना चाहीये कि दुनिया में कहीं ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा जो कभी असफल न हुआ हो । असफलता-सफलता जीवन में धूप-छांव की तरह है । ये भी उतना ही सही है कि सफलता के उत्साह में हम कई बार असफलता को विस्मृत कर देते हैं । मेरा मानना है कि हर असफलता हमें कुछ सबक सिखाती है, उसे स्वीकार कर यदि हम कारणों पर ध्यान दें और पुन: नये सिरे से प्रयत्न करें तो हम निश्चित ही असफलता की खाद में सफलता के पुष्प खिला सकते हैं ।

बेटे रसायन शास्त्र का एक नियम है, जो जिंदगी पर भी लागू होता है । जब कोई अणु टूटकर पुन: अपनी पूर्व अवस्था में आता है तो वह पहले से अधिक मजबूत होता है । इसी तरह हम जब किसी परेशानी का सामना करते है तो हम पहले से भी अधिक मजबूत हो जाते हैं और जीवन में और भी तरक्की करते हैं । आप को शायद पता होगा कि  भारतीय फिल्मों के महानायक अमिताभ बच्चन ने अपने करियर की शुरुआत में लगातार नौ असफल फिल्में दीं उस असफलता के बाद ही वे सफल हुए । ऐसे कई उदाहरण हैं । मेरे कहने का मतलब सिर्फ ये है कि असफलता, सफलता के साथ-साथ चलती है।

मैं अनीशा से बात कर रही थी तभी उस की माताजी मेरे लिये चाय ले कर आ गई । वे कहने लगी कि बहन जी इस बार परिणाम सिर्फ 3% रहा । 2-3 सालों से 12-13% आया करता था । क्या करें हमारे वक्त ही परिणाम को 3% आना था । हमारा ही नसीब कमजोर है..!!

मैं सोच रही थी कि इंसान भी क्या चीज है..!!  वह अपनी असफलता की झेंप मिटाने के लिये अपने नसीब, समाज, साथी-संगी, परिवार या व्यवस्था को दोष देकर संतुष्ट होने में बहुत ही माहिर है…!! वह गलत भ्रांति पाल ये सोचने लगता है कि वह तो योग्य था सफलता के लिये पर नसीब ने साथ नहीं दिया । फिर वह कुछ बहाने सुनाने लगता हैं । उस के बहानों में उस के अभिभावक भी साथ देते हुए इन बहानों का अनुमोदन व समर्थन करते हैं ।

 हम अपनी गलतियाँ व कमज़ोरियाँ जब स्वीकार नहीं करते और दोषारोपण दूसरों पर करते हैं तो आत्म संतोष तो जरूर मिलता है, सुनने वाला भी शिष्टतावश कुछ नहीं बोलता पर इससे नुकसान हमारा ही होता है । अगर हम अपनी निष्फलता के कारणों का पता न लगा सिर्फ भाग्य को कोसते रहें तो क्या हम सफलता हासिल कर पायेगें ?

असफलता बस एक छोटी बीमारी भर है । हम छोटी-छोटी बीमारियों को सदा याद नहीं रखते। वे आती हैं चली जाती है। वैसे ही असफलता स्थाई तत्व नहीं है कि उसे सदा याद रखा जाये । वह आगे कदम बढ़ाने के लिए क्षण दो क्षण का ठहराव मात्र है जिसमें उस बीमारी या असफलता का आंतरिक चिन्तन हो सके ताकि पुन: उसकी पुनरावृत्ति न हो ।

असफलता अपराध नहीं है वरन अपराध है छोटी महत्वाकांक्षा या सोच को पालना । अगर आप अपनी गलतकियों के लिए स्वयं को जिम्मेदार मान, फिर से मेहनत करने लगे तो आप स्वयं पायेगें कि आप का अगला कदम आपको सफलता की ओर ले जा रहा है । धीरे-धीरे निराशा के बादल फटते जायेगे और फिर एक नया सवेरा आप के कदम चूमता दिखाई देगा ।

डुबकियां सिंधु में ग़ोताख़ोर लगाता है,

जा जा कर खाली हाथ लौट कर आता है ।

 मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,

बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में ।

मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,

 कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती ।

 आप असफलता को किस तरह से लेते हैं, यह आप पर निर्भर करता है, क्योंकि हर असफलता आपको कुछ सिखाती है। असफलता में राह में मिलने वाली सीख को समझकर जो आगे बढ़ता जाता है वह सफलता को पा लेता है । सफलता के लिए जितना जरूरी लक्ष्य और योजना है, उतना ही जरूरी असफलता का सामना करने की ताकत भी । असफल होने पर ये सोचना कि अब ज़ीने से क्या फायदा और आत्महत्या को गले लगाना कायरता मात्र ही है । जो बच्चे असफल होने पर आत्महत्या कर लेते हैं ,मैं समझती हूं कि उस के पीछे उनके अभिभावक भी जिम्मेदार हैं क्योंकि वे अपने बच्चों को ये न समझा पाये कि असफलता अपराध नहीं वरन एक चुनौती मात्र है ।

मंजिल मिल ही जायेगी भटकते ही सही, गुमराह तो वो है जो घर से निकले ही नहीं…

कमलेश अग्रवाल

 

 

क्या अपनी ही जाल में उलझता जा रहा है अमरीका ???

9 जनवरी

न्यूयॉर्क में तैनात भारतीय उप-वाणिज्य दूत, देवयानी खोबरागडे को अपनी घरेलू नौकरानी को निर्धारित से कम वेतन देने के मामले का दोषी मानते हुए, अमरीका ने उन्हें अदालत में घसीटा है। दैनिक जागरण के पास मौजूद दस्तावेजी सुबूत बताते हैं कि अमेरिकी कानूनी क्षेत्राधिकार वाले दूतावास में काम करने वाले भारतीय नागरिकों के वेतन व सुविधाएं अमरीका में समान पद श्रेणी के मुकाबले काफी कम है ।

करीब दो वर्ष पहले तक अमेरिकी दूतावास में वीजा अधिकारी पद पर तैनात एक भारतीय कर्मचारी को मासिक वेतन 2,07,385 प्रतिवर्ष दिया गया है जो कि औसतन 40 घंटे प्रति हफ़्ते की दर से डेढ़ डॉलर प्रति घंटा ही बैठता है। 

जब की   देवयानी की घरेलू नौकरानी संगीता रिचर्ड को 30 हजार रुपये वेतन के अलावा मुफ्त आवास, भोजन तथा स्वास्थ्य सुविधाएं दी जा रही थीं। इसी लिये देवयानी के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई में, उस की नीयत पर सवाल उठ खड़े हुए हैं। 

भारतीय खेमे की ओर से जमा सूचनाओं के मुताबिक अमेरिकी दूतावास सुरक्षा गार्ड के पद पर तैनात भारतीय नागरिकों को 8 से 12 हजार रुपये देता है। वहीं घरेलू नौकरानी व ड्राइवर जैसी भूमिका निभाने वाले भारतीयों का वेतन 12 से 15 हजार रुपये प्रतिमास के करीब है। 

फिर क्यों भारतीय महिला राजनयिक देवयानी को घरेलू नौकरानी संगीता रिचर्ड के कथित कम वेतन पर अति संवेदनशीलता दिखाते हुए कोर्ट में घसीटा गया ? अब तो ये साफ लग रहा है कि भारतीय महिला राजनयिक देवयानी खोबरागडे पर वीज़ा धोखाधड़ी का मामला खोलकर अमरीका अपने ही जाल में उलझता जा रहा है….!!

अब उस कि स्थिति यह बन गई है कि माफी मांगने पर नाक कटती है और इस मामले को ज्यादा तूल देने पर विवाद खडे हो रहे हैं….!! इसी लिये अब  अमरीका इस जुगाड़ में है कि मामले को कैसे रफा दफा किया जाये ताकि सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे…!! हो सकता है कि नीयर फ्यूचरमें अदालत के बाहर समाधान की कोशिशें तेज हो…!! आप का क्या ख्याल है ?

कमलेश अग्रवाल

  

 

दाम्पत्य जीवन का संगीत बेसुरा क्यों ?

6 जनवरी

कई बार मेरे मन में ये प्रश्न उठता है कि  पति-पत्नी बने रहने की शपथ लेने वाले वर-वधू का दाम्पत्य जीवन रूपी संगीत कुछ ही दिनों में बेसुरा क्यों हो जाता है ? हम देख रहें हैं कि कई जोड़े शादी के सभी बंधन को तोड़ कर तलाक लेने पर उतारू हो जाते हैं । आखिर इस की वजह क्या है ? क्यों वे इस मोड पर आ जाते हैं ? मेरा मानना है कि ऐसे टूटते रिश्तों की वजह होती हैं……

1. वैचारिक मतभेद

2. एक-दूसरे की भावनाओं का आदर न करना

3. कहीं न कहीं अहम भाव का हावी होना

4. घर के सदस्यों की दखल-अंदाजी

5. पैसों की किल्लत

6.. बेवफाई

देखा जाये तो भारतीय सामाजिक व्यवस्था के अनुसार विवाह को एक बेहद धार्मिक संस्था का दर्जा दिया गया है और साथ ही साथ इस बंधन में बंधने वाले जोड़े को पारिवारिक और सामाजिक दोनों ही तौर पर उम्र भर साथ रहने की सीख भी दी जाती है। इतना ही नहीं फेरों के वक्त वे तन-मन से एक-दूसरे के प्रति समर्पित हो ऐसे वचनों से उन्हें बांधा भी जाता है ।

इसी लिये यहां सवाल यह है कि सगाई, सिंदूर, मंगलसूत्र, संबंधियों की उपस्थिति में सात फेरों व सात वचनों द्वारा सात जन्म तक पति-पत्नी बने रहने की शपथ लेने वाले वर-वधू के जीवन का दाम्पत्य संगीत कुछ ही समय में बेसुरा क्यों हो जाता है?

हम इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते कि कई बार दम्पतियों के बीच बढ़ते फासले का कारण परिवार वाले भी होते हैं क्योंकि विवाह न सिर्फ महिला-पुरुष के बीच का संबंध है वरन उन दोनों के परिवारों के बीच का सेतु भी है जो दोनों के परिवारों को बांधने का मार्ग है ।

सो मेरे अनुभव के तहत इतना कहना चाहूंगी कि  पति-पत्नी के बीच किसी भी तरह का मनमुटाव विकसित होता है तो उसे अपने परिवारों से शेयर करने के बदले आपस में ही बिना मामले को तूल दिए, परिपक्वता दिखाते हुए सुलझा लेना चाहिए ताकि बात इतनी न बढे कि तलाक की नौबत आये….. समय बड़ा बलवान होता है । वक्त गुजरते सब सही हो जाता है बस धीरज रखनी होती है ।

कमलेश अग्रवाल

 

छोटी सी आशा

5 जनवरी

आम आदमी पार्टी के सुकानी केजरीवाल, चले-चलो, हिंमत बहुत है आप में,

आप के अंदर भविष्य के सपने बंद हैं व उज्ज्वल भविष्य की क्षमता ,

क्या चिंता कोंग्रेस या भाजपा आप की आलोचना के घरौंदे सजायें,

 महंगाई कम होगी और भ्रष्टाचार दूर होगा,  ये आशा हमें आप सेजरूर है…..

 ये आशा हमें आप सेजरूर है…..

कमलेश अग्रवाल

क्या सुवर्ण राजनीति की शुरुआत हो चली है…?

3 जनवरी

 जो काम अंग्रेज २०० सालों में नहीं कर सके, वह काम आज हमारे देश के नेताओं ने आजादी के सिर्फ 60-65 सालों में कर दिखाया। पूरी आबादी को पहले संप्रदाय में बांटा ; इन्होंने कुछ को कहा आप हिन्दू हो, कुछ को कहा आप मुसलमान हो, कुछ को कहा आप ईशाइ हो तो कुछ को कहा आप सीख हो। अपनी घिनौनी राजनीति के तहत इन्होंने अपने ही देशवासियों के बीच वैमनस्य पैदा किया। इससे भी इन का मकसद पूरा नहीं हुआ तो फिर से इस भली जनता को यादव, जाट, बनिया, ठाकुर, पंडित जैसी छोटी-छोटी जातियों – उप जातियों में बांटना शुरू कर दिया। इतने से भी जब मन नहीं भरा तो एक और नीति बना डाली….स्वर्ण वर्ग और पिछड़े वर्ग  की…!! हरिजन, दलित, आदिवासी से कहा आप को हम पिछडे वर्ग के तहत बहुत सुविधा देंगे। भोली-भाली जनता इन के चुंगल में फँसती गई, मूर्ख बनती गई, अपनों के ही हाथों बेवकूफ बनती गई। धीरे-धीरे जनता के सेवक माने जाने वाले नेता, जनता के मालिक बन बैठे।अपनी जेबें भरनी और गुरछल्ले उड़ाने के हर रास्ते इन्हें समझ आते गये। येन-केन प्रकारेण जनता को अंधेरे में रखो और अपना उल्लू सीधा करो की राजनीति शुरू हो गई। नतीजा ये हुआ कि देश भ्रष्ट नेताओं से भर गया। नोट से वोट की गंदी नीति शुरु हुई। इस कारण सरकारी तंत्र भ्रष्ट बनता गया। सरकारी अफसर भी घूस लेने लगे… भ्रष्टाचार इतनी हद तक फैला कि आम आदमी का जीना दूभर हो चला।मंहगाई ने अपना जाल इस क़दर बिछाया कि जनता त्रस्त हो गई। सोचने पर मजबूर हो गई कि कैसे फरियाद करें ? कहां  जायें ? इस गंदगी को कैसे साफ करें ?

तभी अन्ना जनता के मसीहा बन कर आये। उन्होंने भ्रष्टाचार खत्म हो इस के चलते जंतर मंतर पर एक आंदोलन किया जिस में उन्हें जनता का पूर्ण रुप से सहकार मिला। लोग काम-काज छोड़ कर अन्ना के आंदोलन में जूड़ गये। सरकार ने पहले तो इस आंदोलन को नजर अंदाज किया। जब देखा कि लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही है तो सरकार ने अन्नाजी को गिरफ्तार कर लिया… और अन्ना ने अनशन का रुख लिया। जनता अब पीछे हटने के मूड में नहीं थी। सरकार ने एक दाव आजमाय..कहा लोगों के जरीये  चुनाव जीत कर आओ और भ्रष्टाचार को दूर करो । अन्नाजी इस के पक्ष नहीं थे। उन के आंदोलन के कुछ सदस्यों ने सरकार की इस चुनौती का स्वीकार किया। अन्नाजी को वे नाराज करना नहीं चाहते थ; कदम पीछे लेना भी नहीं चाहते थे। उन्हों ने राजनीति में आने की ठान ही ली और अपनी मुहिम शुरु कर दी।

यहीं से आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ जिसकी सुकानी थे केजरीवाल, वही केजरीवाल जिन्हों ने सूचना के अधिकार की मुहिम चलाई थी और उस मुहिम को पूरा कर के ही दम लिया था। 

असल में आम आदमी कभी भी किसी आंदोलन के पक्ष में नहीं था। वो तो हमेशा भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ था और उसे लगता था कि कोई आये और उसे भ्रष्टाचार से मुक्त कराये। कम से कम जनोपयोगी चीजें तो मिले..!! और दिल्ली की जनता को केजरीवाल मिल गये उन की परेशानीयों का हल निकालने वाले के रुप में…!!

आज ये ही केजरीवालजी को दिल्ली की जनता ने तालियों की गड़गड़ाहट, भारत माता के जयकारे के साथ अपने पूरे जुनून से मुख्यमंत्री की जवाबदारी सौंपी है.. मुझे ही नहीं बल्कि दिल्ली की जनता को भी लग रहा है कि कुछ तो बदलेगा।

क्यों न लगे ? बिना कोई सुरक्षा के बिना लाल, पीली बत्ती वाली गाड़ी के, मेट्रो द्वारा रामलीला मैदान में शपथ ग्रहण के लिए जाना … लाखों जनता के बीच शपथ ग्रहण और संबोधन ….सब कुछ अजूबा सा नहीं लगता है ? सरकार बनाने की शपथ लेने से पहले जनता दरबार लगाकर लोगों की समस्या सुनना,  कुछ नया करने की तमन्ना … रामलीला मैदान में आम आदमी, महिला, बुजुर्ग, नवयुवकों का उत्साह के साथ उपस्थिति दर्ज कराना….कोई सरल बात है ?

लोगों की बिजली, पानी, भ्रष्टाचार से मुक्ति, भ्रष्ट अफ़सरों से छुटकारा मिलने की उम्मीदों पर इन्हें खरा उतरना है। अरविन्द केजरीवाल एक नए सूरज की रोशनी के रुप में हमारे सामने उभरे हैं। इन में जोश भी है, उत्साह भी है, लोगों का साथ भी है। इन्हें सत्ता सुख का मोह नहीं है। इनका तो बस एक ही ध्येय है ‘आम आदमी’ के लिए काम करना है।आम आदमी के वर्तमान को स्वर्णिम भविष्य में बदलना।

ऐसा शायद पहली बार ही देखने में आया है कि एक सत्ताधारी पार्टी अपनी हार-जीत की परवाह किये बिना जनता की खुशी के लिये, कांटों का ताज सिर पर लिये, एक ऐसी पार्टी की बैशाखी का सहारा लिये हुए है जो उसे कभी भी गिरा सकती है…!! पर अगर नियत साफ हो, जनता साथ हो, प्रभु के आशीर्वाद हों तो फिर चिंता किस बात की…!!

 “किचड में उतर कर ही किचड को साफ करना है, यही पैगाम है इस आम आदमी पार्टी का देशवासियों से ….”

अब देखना ये है कि ये किचड को साफ कर पायेंगे….अगर ये किचड को साफ करने में सफल हो गये तो निश्चित ही, भारत एक नया इतिहास रचने में कामयाबी हांसिल कर लेगा…..क्या आप मेरे विचारों से सहमत हैं?

कमलेश अग्रवाल

 

 

 

2013 in review

1 जनवरी

The WordPress.com stats helper monkeys prepared a 2013 annual report for this blog.

Here’s an excerpt:

The concert hall at the Sydney Opera House holds 2,700 people. This blog was viewed about 9,700 times in 2013. If it were a concert at Sydney Opera House, it would take about 4 sold-out performances for that many people to see it.

Click here to see the complete report.