Archive | जुलाई, 2014

चतुर आदमी

26 जुलाई

एक आदमी की मौत हो गयी और उसे उसके कर्मों के अनुसार नर्क की प्राप्ति हुई। उसने देखा कि हर देश के लिए वहां अलग-अलग नर्क बने हुए हैं।

वह सबसे पहले अमरीकन नर्क में ले जाया गया और उस से कहा गया कि जो नर्क तुम्हें पसंद आयेगा वहीं तुम्हें रखा जायेगा क्योंकि आप के कुछ अच्छे कर्म भी चित्रगुप्त के बही खाते में जमा देखे गये हैं ।

जब उसे अमरीकन नर्क में ले जाया गया तब उस ने पूछा कि,”यहाँ आत्माओं को किस तरह की पीड़ा दी जाती है ?”

उसे बताया गया कि पहले तो यहां आपको बिजली की कुर्सी के साथ बांध दिया जायेगा, फिर इस कुर्सी में करंट छोड़ दिया जायेगा, फिर कीलों के बिस्तर पर नंगा लिटा दिया जायेगा और फिर अमरीकन जल्लाद आकर दिन भर कोड़े मारते रहेंगे । बोलो,” आप को मंजुर है ?”

आदमी यह सुनकर बहुत भयभीत हो गया और आगे बढ़ गया और बोला अभी मैं दुसरे नर्कों को देखकर ही फेसला लेना चाहूंगा । आगे जाकर उसने अलग-अलग देशों के सभी नर्क देखे लेकिन सभी जगह लगभग एक ही तरह की सजा दी जाती थी।

घूमते-घूमते वो आदमी आखिर कर भारतीय नर्क पहुंचा। वहाँ उसने देखा कि आत्माओं की लम्बी कतारें लगी हुई है वह सोचने लगा कि यहां शायद कम सजा दी जाती होनी चाहिये तभी तो इतनी लम्बी कतारें बना कर सब  खड़े हुए हैं? हैरान होकर उसने वहाँ की सजा के बारे में दूत से पूछा ।

उसे बताया गया कि, “यहाँ सबसे पहले आनेवाले को बिजली की कुर्सी के साथ बांध देते हैं फिर कुर्सी में करंट छोड़ दिया जाता है, फिर उस व्यक्ति को कीलों के बिस्तर पर नंगा लिटा दिया जाता है और फिर भारतीय जल्लाद आकर दिन भर उस व्यक्ति पर कोड़े बरसाता है।”

आदमी परेशान होकर बोला कि, “ऐसी ही सजा तो बाकी सारे देशों के नर्क में भी देखी गई है पर वहाँ तो इतनी भीड़ नहीं थी…!! यहाँ इतनी भीड़ क्यों है?”

यह सुन वहां सज़ा काट  ने वाले एक व्यक्ति ने उसकी परेशानी दूर की और उसे इसका कारण बताया, “क्योंकि इस भारतीय नर्क में भीड़ के कारण बदहाली है, व्यवस्था भी ठीक नहीं है, बिजली भी बहुत कम समय के लिये आती है जिस कारण करंट वाली कुर्सी की सजा मामुली सी होती है, कीलों वाले बिस्तर से लोग कीलें चुरा कर ले गए हैं और कोड़े लगाने वाले जल्लाद भी बस आकर अपनी हाजिरी लगा कर कैंटीन में चले जाते हैं, जिस कारण यहां सज़ा सिर्फ नाममात्र की ही है ।“

यह सुन आदमी दूत से बोला,” मैं इस नर्क में रहना चाहूंगा…”

कमलेश अग्रवाल

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शादी की कुछ नई परिभाषायें

24 जुलाई

कुछ लोग शादी को जरूरी मानते हैं और कुछ लोग इसे बेवकूफी । मेरी मनो तो शादी न तो बेवकूफी है और ना ही अफसोस करने की बात । शादी तो एक ऐसी सिड़ी है जिस पर चढ़, हम बाहरी दुनियादारी  का असली नजारा देख सकते हैं या एक ऐसी मंजिल जहां मासूमियत परिपक्वता में परिणीत होती दिखाई देती है । यहां मैं शादी की कुछ ऐसी ही परिभाषायें  बता रही हूं जिन्हें पढ़कर आप भी मेरी इस सोच से सहमत हो ही जाओगे…

शादी की परिभाषायें –

  1. शादी न तो स्वर्ग है और न ही नरक । यह तो बस एक आने वाली जिंदगी की आहट  भर है । 
  2. शादी कपड़ों को मुफ्त में धोने का एक बेहद अकसीर पाउडर है । 
  3. शादी एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें लड़का अपनी कुंवारेपन की डिग्री का लुफ्त उठाता है और लड़की मास्टर डिग्री को पाने की उम्मीद करने लगती है । 
  4. शादी जीवन का एक ऐसा मोड़ है जिसमें लड़की की सभी चिंताएं समाप्त हो जाती हैं और लड़के को अपनी चिंतायें बांटने के लिये एक सच्चा साथी । 
  5. शादी एक ऐसी किताब है जिसे पढ़कर ही पता चलता है कि ये किताब तो भविष्यकाल बताने वाली किताब है ।
  6. शादी एक ऐसी तस्वीर है जिसे जैसी नजर से देखा जाये वह वैसी ही दिखाने लगती है । झील देखना चाहो तो झील दिखाई देगी और अगर ज्वालामुखी के लावा उगलते पहाड़ देखना चाहो तो  वे दिखाई देंगे । 
  7. शादी एक ऐसी साझेदारी है, जिसमें पूंजी पति लगाता है और उस पूंजी की बढ़ौतरी पत्नी अपनी सूझबूझ से करती है ।
  8. शादी एक खुला आसमान है जिस में दो परिंदे साथ-साथ विहार करते हैं ।  
  9. शादी एक ऐसा आयोजन है जिसमें पत्नी और पति आजीवन के लिये सुखी रहने का प्रावधान करते है । 
  10. शादी एक ऐसा मिलन है जो अच्छे मित्रों की तरह रहने के इरादे से शुरू किया जाता है और दिन ब दिन मित्रता को अटूट करने का जी जान प्रयत्न।

कमलेश अग्रवाल

तीज का त्यौहार

23 जुलाई

29 जुलाई के दिन तीज का त्यौहार भारत के कोने-कोने में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण त्यौहार है । श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को महिलाएं इस त्यौहार को हरियाली तीज के रुप में मनाती हैं । यह त्यौहार भारत के उत्तरी क्षेत्र में विषेश रुप से हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है । सावन का आगमन ही इस त्यौहार के आने की आहट है । समस्त सृष्टि सावन के अदभूत सौंदर्य में भिगी हुई सी नज़र आती है । सावन के आते ही चारों ओर मनमोहक वातावरण की सुंदर छठा फैल जाती है । इस समय वर्षा ऋतु की बौछारें प्रकृति को पूर्ण रूप से भिगो देती हैं । प्रकृति में हर तरफ हरियाली की चादर सी बीछी होती है और इसी कारण से इस त्यौहार को हरियाली तीज कहा जाता है । तीज के दिन खुले स्थान पर बड़े–बड़े वृक्षों की शाखाओं पर, घर की छत की कड़ों या बरामदों के कड़ों में झूले डाले जाते हैं जिन पर स्त्रियां झूला झूलती हैं । इस दिन अनेक स्थानों पर मेले भी लगते हैं ।

इस दिन कुमारी और सौभाग्यवती महिलायें गौरी शंकर की पूजा करती हैं । आस्था, उमंग, सौंदर्य और प्रेम का यह उत्सव हमारे सर्वप्रिय पौराणिक युगल शिव-पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। तीज के बारे में हिन्दू कथा है कि सावन में कई सौ सालों बाद शिव से पार्वती का पुनर्मिलन हुआ था। पार्वतीजी के 108वें जन्म में शिवजी उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न हुए और पार्वतीजी की अपार भक्ति को जानकर उन्हें अपनी पत्नी के रुप में स्वीकार किया। जैसे वर्षाऋतु आने पर मोर नृत्य कर अपनी खुशी प्रदर्शित करते हैं, उसी प्रकार महिलाएँ भी बारिश में झूले झूलती हैं, नृत्य करती हैं और अपनी खुशी का इजहार करती हैं। इस दिन सभी हिंदू औरतें हिंदू मान्यता के अनुसार माँ पार्वती का पूजन कर जन्मों जन्मांतर अपने पति का प्यार पाना चाहती हैं ।

इस अवसर पर विवाह के पश्चात पहला सावन आने पर नव विवाहिता लड़की को ससुराल से पीहर बुला लिया जाता है । विवाहिता स्त्रियों को उनके ससुराल पक्ष की ओर से सिंधारा भिजवाया जाता है जिसमें वस्त्र, आभूषण, शृंगार का सामान, मेहंदी और मिठाई इत्यादि सामान भेजा जाता है। तीज पर हाथ-पैरों में मेहँदी लगाई जाती है। इस दिन महिलायें रंग-बिरंगे कपड़े, गहने पहन दुल्हन की तरह तैयार होती हैं। औरतें वृक्ष पर बंधे झूलों पर झूला झूलती हैं और बारिश की फुहारों में भीगते-नाचते गाते हुए तीज मनाती हैं ।भगवान शंकर और माता पार्वती को समर्पित हरियाली तीज की तैयारियां महिलाएं एक महीने पहले से ही प्रारंभ कर देती हैं। उस दिन क्या पहनना है, मेकअप कैसा होगा, चूड़ियां किस रंग की होंगी, पैरों में चप्पल किस स्टाइल की होंगी और गहने कैसे होंगे… इस तरह की तैयारियां सिर्फ विवाहित महिलाएं ही नहीं, बल्कि कुंवारी लड़कियां भी शुरू कर देती हैं। इन दिनों बाजार की रंगत भी देखते ही बनती है।

महिलाओं की हर फरमाइश और ख्वाबों को पूरा करने को तैयार बाजार में मानो प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है। उच्ची सोसाइटी की महिलाएं हों या मध्यवर्ग की या फिर छोटे तबके की… सभी के लिए यह दिन बड़ा खास होता है। लेकिन सभी तबके की महिलाओं में इस त्योहार को मनाने का ढंग अलग होता है। 

देखा जाये तो पहले हरियाली तीज के मायने ही कुछ और थे। विवाहित औरतें को पीहर से उन के भाई उन्हें लेने आ जाते थे । इतना ही नहीं, हरियाली तीज का इंतजार और उसकी तैयारियां महिलायें 15 दिन पहले से शुरू कर देती थीं ; क्योंकि इस दिन के बहाने उन्हें मायके जाने का मौका मिल जाता था और मायके में उन की और भी शादीशुदा सहेलियां इसी दिन आती थीं फिर मिल-जुल कर वे सभी झूला झूलते और बिना कोई रोक-टोक, बस एक हफ्ते मस्ती-ही मस्ती में जीते । लेकिन अब तो मानो सभी चीजें बदल-सी गई हैं। अब तो सिर्फ खाना पूर्ति कर इस त्यौहार को मनाया जाता है…!!

अगर आप चाहते हैं कि इस त्यौहार का वजूद सदा टिका रहे तो….

यदि आपने हरियाली तीज की तैयारियां नहीं की हैं तो कर लीजिए और अपने लोकल बाजार जाकर इस त्योहार के स्वागत में पहनने-ओढ़ने और सजने-संवरने की अनगिनत तरह-तरह की चीजों का जायजा लीजिए और अपनी पसंद का सामान खरीद भी लीजिए । देश के हर कोने में मनाए जाने वाले इस त्योहार में आप भी हिस्सा लिजीये और अपने मायके जाने का मौका हाथ से न जाने दिजीये ..!! साथ ही सजने संवरने का भी भरपूर लुफ्त उठाईये।

आप सभी को हरियाली तीज की ढेर सारी शुभकामनायें……

कमलेश अग्रवाल