Archive | अगस्त, 2014

सच्ची श्रद्धा ही अंतःकरण की सोच

27 अगस्त

श्रद्धा कोई यंत्रनहीं है, श्रद्धा कोई तंत्र नहीं है, श्रद्धा कोई मन्त्र भी नहीं है। वास्तव में श्रद्धा भावना है। हमारे मन में, हमारे अंतःकरण में एक भावना छिपी है, एक प्रेम है, एक अनुभूति है, आप उसे बयान नहीं कर सकते हैं । प्रेम की परिभाषाएँ कई दी जा सकती हैं मगर प्रेम को बया नहीं किया जा सकता । आप ये नहीं कह सकते हैं कि मेरा प्रेम सच्चा है, पवित्र है या अधिक है और दूसरे का प्रेम कम है ।

 श्रद्धा एक ऐसी अनुभूति है जो जीवन में सफलता दिलाती है, अगर सच्ची श्रद्धा हो तो कोई भी काम नामुमकिन नहीं है । धर्म और इष्ट सब से बड़े स्तोत्र हैं जो श्रद्धा के रूप में हर व्यक्ति के अंतरमन के अंदर उतर गये हैं जिन के चलते जंगली आदमी इन्सान बना । भगवत गीता में श्रीकृष्ण भगवान ने कहा है कि – ” सभी मनुष्यों की श्रद्धा, उनके अंतःकरण की सोच के अनुसार होती है । जैसी जिनकी श्रद्धा, वैसे वे होते हैं । “

 आज श्रद्धा शब्द व्यवहार में पूजा या प्रार्थना के संदर्भ में ही प्रयोग होता है, परंतु श्रद्धा का क्षेत्र बहुत व्यापक है और इसका महत्व जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में है। कोई भी कर्म संकल्प श्रद्धा पूर्वक करने से ही पूर्ण एवं सफल होता है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि बिना श्रद्धा के किया गया यज्ञ, दान, तप या कोई कर्म व्यर्थ एवं हानिकारक परिणाम देने वाला होता है।

 भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि मनुष्य का जैसा अंतस होता है वैसी ही उसकी श्रद्धा होती है और वैसा ही व्यक्ति का स्वरूप एवं व्यवहार होता है। अगर अंतस में कलुष है तो उसकी श्रद्धा भी कलुषित होगी। उसके विचारों एवं व्यवहार में भी कलुषिता दिखाई पड़ेगी । इसीलिए हमारे  शास्त्रों और ऋषियों ने आदिकाल से ही श्रद्धा को महत्व दिया है। सबसे पहले श्रद्धा के विषय में उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।

 श्रद्धा व्यक्ति को सौम्यता तथा सज्जनता प्रदान करती है। श्रद्धा के बिना भक्ति व्यर्थ है जिससे भगवान कभी प्रसन्न नहीं होते हैं। श्रद्धावान मनुष्य समाज में विश्वसनीय और प्रेरणाप्रद होता है। वह समाज में सतोगुण का विकास करता है। सबरी की श्रद्धा भगवान को खींचकर ले आई  थी और प्रभु राम ने उस  के झूठे बेर खाये थे । हनुमान जी ने रामजी की सेवा इतनी श्रद्धा से की  थी  कि वे असंभव कार्य को भी करने में समर्थ हो पाये थे ।

महापुरुषों ने कहा है कि जीवन के हर क्षेत्र में श्रद्धा महत्वपूर्ण है, जैसे विद्या अध्ययन को ही लें। स्वामी विवेकानंद जी की श्रद्धा ने देश का नाम रोशन किया और भारतीयों पर उनकी श्रद्धा ने जो सेवा कार्य प्रारंभ किए वे आज भी हो रहे हैं। महात्मा गांधी की सत्य और अहिंसा पर श्रद्धा ने देश को अँग्रेज़ों की गुलामी से आजादी दिलवाई। सीमा पर तैनात सैनिक अपने देश पर श्रद्धा रखने के कारण ही जीवन बलिदान कर देते है । महान वैज्ञानिकों की सफलता भी उनके द्वारा श्रद्ध पूर्वक किए गए शोधकार्यों का ही परिणाम है ।

पत्थर के टुकड़े केवल प्रतीक के काम आ सकते हैं, लेकिन वह रामकृष्ण परमहंस की श्रद्धा थी जिसने इस पत्थर को देवी बना दिया, माँ काली बना दिया था। मीरा की वह श्रद्धा ही थी जिसने पत्थर के टुकड़े को कृष्ण बना दिया था । एकलव्य की वह श्रद्धा ही थी जिसने मिट्टी की एक मूर्ति को साक्षात गुरु बना दिया था इतना ही नहीं उससे उसने वे सब लाभ प्राप्त कर लिए थे जो जीवित द्रोणाचार्य से अन्य शिष्यों ने, विशेषकर अर्जुन ने प्राप्त किया था । 

 सही में श्रद्धा हमारी आस्तिकता का प्राण है । हमारी अनुभूति की पहचान है । हमारे प्रेम की परिभाषा है ।

कमलेश अग्रवाल

 

 

 

 

बाल यौन शोषण

20 अगस्त

पिछले दिनों कनाडा पुलिस ने दुनिया भर में बाल यौन शोषण में लिप्त एक गिरोह का पर्दाफाश किया। उसने कई देशों के शिक्षक, डॉक्टर और अभिनेताओं समेत करीब 350 लोगों को गिरफ्तार किया और 386 बच्चों को मुक्त करवाया। कनाडा पुलिस मामले की 2010 से ही जांच कर रही थी। उसने इंटरपोल, ऑस्ट्रेलिया, स्पेन, मेक्सिको, नॉर्वे और ग्रीस सहित 50 से भी अधिक देशों के साथ मिलकर काम किया। अधिकारियों ने हज़ारों की संख्या में बच्चों के अश्लील विडियो बरामद किए।

जाहिर है ऐसे गिरोह का पकड़े जाना अपने आप में एक बहुत बड़ी कामयाबी है, लेकिन इसके साथ ही एक बहुत बड़ी गंभीर समस्या भी सामने आई है। जितने आरोपियों को गिरफ्तार किया गया, और जितने बच्चों को छुड़ाया गया यह कोई छोटी संख्या नहीं है। सोचा जा सकता है कि कितने बच्चों के साथ बहुत बड़े पैमाने पर दुष्कर्म हो रहा होगा। आज के दौर में बच्चों पर सबसे बड़ा खतरा इसी अपराध का है। बहरहाल गूगल और माइक्रोसोफ्ट मिलकर ऐसी तकनीक विकसित कर रहे हैं जिससे इंटरनेट पर बच्चों की अश्लील सामग्री को धीरे-धीरे खत्म किया जा सके।

इसे पश्चिम की समस्या समझ कर छोड़ नहीं देना चाहिए क्योंकि अपने देश में भी कितनी ही ऐसी ख़बरें आती हैं। हमारे महानगरों से, जहां कथित रूप से पढ़ा-लिखा और जागरूक वर्ग रहता है, बीते दिनों दिल दहला देने वाली ख़बरें सामने आई। एक एयर होस्टेस ने घर में काम करने वाली बच्ची को असहनीय शारीरिक प्रताडनायें दीं, उससे भी पहले के समय में जाएं तो एक डॉक्टर दंपती ख़बरों में था, जिन्होंने एक बच्ची को घर में काम करने के लिए रखा था। उसे वे घर में बंद करके जाते थे, खाने तक को तरसाते थे, मारने पीटने का तो हिसाब ही नहीं। ऐसी कुंठित और बीमार मानसिकता आखिर कहां से जन्म ले रही हैं, जो बच्चों तक को नहीं बख्श रहीं? और यह सब भी तब है, जब 14 साल से कम उम्र के बच्चों को काम पर रखने पर पाबंदी है।

आखिर रुतबे वाले लोगों में इतनी हिम्मत आती कहां से है कि वे इस कानून का उल्लंघन करें, और ऊपर से काम पर रखने के साथ-साथ उन को शारीरिक प्रताड़नाएं दें? इसका सबसे पहला जवाब यह हो सकता है कि बच्चे मासूम और निरीह होते हैं, इसलिए वे बड़े लोगों का बराबरी की ताकत से विरोध नहीं कर सकते और आसानी से डराये और धमकाए जा सकते हैं। इसलिए सस्ती लेबर का साधन अब तक बच्चे ही देखे गए हैं जिन्हें न केवल डरा कर बल्कि बिना किसी मेहनताने के आसानी से काम करवाया जाता है।

इसके साथ ही मानव तस्करी भी जीरों पर है, जिसके सबसे ज्यादा शिकार महिलाएं और बच्चे होते हैं। अख़बारों में प्राय: किसी न किसी दिन बच्चों के गायब होने की ख़बरें आम हो गई हैं। निठारी कांड अब भी हमारे जेहन में ताजा है। बलात्कार और दुष्कर्म की ख़बरें सो अलग। महानगरों से हटकर यदि ये ही बच्चे किसी गैर कानूनी संगठनों के हाथ लग गए तो स्थिति और भी बदतर होती है, क्योंकि कई आतंकवादी संगठनों में इन्हीं कोमल हाथों में बंदूक थमा कर तबाही का पाठ पढ़ाया जाता है। यह बात भी जग जाहिर है कि चाइल्ड पॉर्न के गोरखधंधे में सबसे ज्यादा तीसरी दुनिया के बच्चों का इस्तेमाल होता है।

पंचवर्षीय योजनाओं में बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर कार्यक्रम चलाए गए हैं। सरकार योजनाओं में बच्चों के हालात के प्रति जागरूक नजर आती है। पर व्यवहार में कुछ और है। दरअसल इस मामले में दोहरा रवैया अपनाया जाता है। संपन्न तबक़े के बच्चों को तो सभी सहूलियतें हासिल हैं पर गरीब बच्चों को भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है। बच्चों के लेकर कोई आवाज भी नहीं उठाई जाती। इसलिए सरकार पर कोई दबाव नहीं बन पाता। अगर वाकई सरकार अपने को लोक कल्याणकारी कहती है तो उसे सभी वर्गों के बच्चों पर समान रूप से ध्यान देना चाहिए।

( ये लेख इंटरनेट से लिया गया है….)

17th day of December Pensioners’ Day

3 अगस्त

Every year 17th day of December is celebrated as pensioners’ day since 1983. History of pension is over 150 years. The Pension system in India was introduced by the British Government after the Indian Independence struggle in 1857. This was a reflection of the Pension system then prevailing in Britain. The Government decided to provide money cover to retired employees for their post retirement life. The System was finalised by the Indian Pension Act of 1871. However, Viceroy and Governors were given the final authority for granting pension. Thus the pensioners were at mercy of Viceroy and Governors. British Government occasionally compensated pensioners through increase in their pension to neutralise effect of inflation. Even though the retirement benefits were being given by the Government, they were not incorporated in Fundamental Rules made effective from 1-1-1922. Shri D. S. Nakara Financial Advisor to Ministry of Defense, (an officer from Indian Defense Service Audit and Accounts) retired in 1972. He faced problems in getting pension like all other pensioners. Therefore, he lodged a petition in the Supreme Court. Justice Yashavantrao Chandrachud, then Chief Justice heard the petitioner and the Government and ruled that ‘Pension is neither a gift nor a reward or bounty’ Pension is the right of a retired Government servant who had served nation for a long time.

Government is bound to ensure that her employees lead a peaceful and honorable life after retirement. This historical judgment was issued on 17 Dec 1982.This is the reason why 17th December is chosen as ‘Pensioners’ Day’. Supreme Court judgment is very clear. Pension is firstly considered as right of pensioner and secondly it should be adequate for leading honorable life. However, Minister from Government gave public statements on many occasions that the government cannot carry on with burden of pension and it should be stopped after pensioner attaining age of 75 years. This had been unexpected from well-educated and capable honorable minister of Government of India. However, the government did constitute a commission (known as VIth Central Pay Commission or 6th CPC) to study in details condition of pensioners and recommend remedies in true sense of Supreme Court judgment.

The commission obtained views from various ministries, individuals and various pensioners’ organisations. All India Central Government Pensioners’ Association (Head Quarter at Pune and branches all over India) had been at forefront to provide data and recommendations for considering various grievances of pensioners in all strata

i. e. pensioners who were holding posts in all groups ‘A’ to ‘D’ during their respective service). The commission considered all recommendations and submitted its report to the Government on 31st March 2008. The government had shown true spirit of Supreme Court judgment in accepting and implementing most of the recommendations of the commission. Financially, most of the pensioners have gained between 15 to 20%. The major gain for pensioners is acceptance of responsibility of payment of pension by the government in the light of Supreme Court judgment of 17th December 1982. However, there are certain aspects which the government should have considered and benefits given to pensioners.

( This is taken from internet website….only to convey the history of pension to my friends )