Archive | अक्टूबर, 2014

क्या आप परेशान हैं ?

17 अक्टूबर

कुछ चीज़ें आपके काबू से बाहर होती हैं। इस बात को जितना जल्दी हो सके स्वीकार कर लें। इससे आपके लिए अपनी समस्‍याओं को काबू करना आसान होगा। बेशक यह कहना आसान है और करना जरा मुश्किल, लेकिन आपके पास इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं है !! जिन चीजों पर आपका नियंत्रण नहीं, उन्हें लेकर परेशान होने से फायदा भी क्या है ?

आजकल सामाजिक उत्कंठा एक बड़ी समस्या बन गई है। इसे हम अकसर सोशल एन्जायटी के नाम से जानते हैं। अगर आपका छोटी-छोटी बातों पर दिल घबराने लगता है या लोगों के बीच जाने पर अचानक आपके दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं, मन बेचैन हो उठता है और समझ में नहीं आता कि  क्या किया जाए या फिर अगर रात को सोते समय आप करवटें बदलते रहते हैं और किसी भी तरह आपके मन को शांति नहीं मिलती तो ये सामाजिक उत्कंठा मतलब की सोशल एन्जायटी के लक्षण हो सकते हैं। जिसे सामाजिक संत्रास (social phobia) भी कहते हैं। जिससे निपटने के लिए आपको सही रणनीति की जरूरत होती है। आज की बदलती जीवनशैली और बढ़ते तनाव के कारण लोगों में यह समस्या तेजी से बढ़ रही ।

ये क्या है संत्रास (phobia) ?

संत्रास एक प्रकार का रोग है, जिसमें इंसान को किसी खास वस्तु, कार्य एवं परिस्थिति के प्रति भय उत्पन्न हो जाता है। संत्रास में अपने खुद के द्वारा एक डर की सोच उत्पन्न हो जाती है जो व्यक्ति को इतना डरा देती है कि उसकी मानसिक व शारीरिक क्षमताओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगता है। इसमें इंसान का डर वास्तविक या काल्पनिक दोनों ही हो सकते हैं। आमतौर पर किसी भी तरह के संत्रास से ग्रस्त रोगी अपने डर पर पर्दा डाले रहते हैं। उन को लगता है कि अपना डर दूसरों को बताने से लोग उन पर हंसेंगे। इसीलिए वे अपने डर व उन परिस्थितियों से सामना करने की बजाय बचने की हर सम्भव कोशिश करते हैं।

सोशल फोबिया से ग्रस्त इंसान कुछ विशेष परिस्थितियों से डरते हैं। उन्हें लगता है कि लोग उनके बारे में बुरा सोचते हैं और पीठ पीछे उनकी बुराइयां करते हैं। ऐसे में व्यक्ति समाज के सामने अपने आपको छोटा समझने लगता है और उसका आत्मविश्वास कमजोर पड़ता जाता है। लोगों के सामने वह बोल नहीं पाता है और डरा सा रहता है।

पुरुषों की तुलना में महिलाओं में यह रोग अधिक देखा जाता है। इस रोग के होने तथा बढ़ने में पारिवारिक और आस-पास के माहौल का महत्वपूर्ण योगदान होता है। यह अनुवांशिक भी हो सकता है या फिर किसी बुरी घटना का साक्षी होने की वजह से एन्जायटी डिस्‍ऑर्डर के लक्षणों में छोटी-छोटी बात पर घबरा जाना, लोगों के बीच जाने पर या बात करने पर दिल की धड़कन बढ़ना, पसीने छूटना, दिमाग का काम न करना, फैसला करने की क्षमता कम होना, बोलते हुए घबराहट, पेट में हलचल महसूस होना तथा हाथ-पैरों में कंपन होना आदि शामिल होते हैं।

अच्छे और सकारात्मक लोगों से दोस्ती और आपकी सकारात्मक भावना और हिम्मत ही आपको सोशल एन्जायटी से बाहर आने में सबसे ज्यादा मदद कर सकती है। किसी भी घटना, किसी भी विषय और किसी भी व्यक्ति के प्रति अच्छा सोचें, उसके विपरीत न सोचे। दूसरे के प्रति अच्छा सोचेंगे, तो आप स्वयं के प्रति भी अच्छा करेंगे। कटुता से कटुता बढ़ती है। मित्रता से मित्रता का जन्म होता है। आग, आग लगाती है और बर्फ ठंडक पहुँचाती है। 

सकारात्मक सोच बर्फ की डली है जो दूसरे से अधिक खुद को ठंडक पहुँचाती है। यदि आप इस मंत्र का प्रयोग कुछ महीने तक कर सके तब आप देखेंगे कि आप के अंदर कितना बड़ा क्रांतिकारी परिवर्तन हो गया है। जो काम सैकड़ों ग्रंथों का अध्ययन नहीं कर सकता, सैकड़ों सत्संग नहीं कर सकते, सैकड़ों मंदिर की पूजा और तीर्थों की यात्राएं नहीं कर सकते, वह काम सकारात्मकता संबंधी यह मंत्र कर जाएगा। आपका व्यक्तित्व चहचहा उठेगा। आपके मित्रों और प्रशंसकों की लंबी कतार लग जाएगी और आप इस संत्रास से निजात पा सकोगे । 

अगर आपने अपना ध्यान सकारात्मकता पर केंद्रित कर लिया तब न केवल अच्छे विचार आएंगे, बल्कि आप स्वयं के प्रति दृढ़ प्रतिज्ञ हो पाएंगे। यह स्थिति आते ही आपके कार्यों पर भी इसका सकारात्मक असर पड़ना आरंभ हो जाएगा। एक बार आपके मन में सकारात्मकता के विचार आना आरंभ हो गए तब आप अपने आप में स्वयं ही परिवर्तन देखेंगे और यह परिवर्तन आपके साथियों को भी नजर आने लगेगा।

सकारात्मकता अपने आप में सफलता, संतोष और संयम लेकर आती है। व्यक्ति मूलतः सकारात्मक ही होता है, परंतु कई बार गलत कदमों के कारण असफलता हाथ लग जाती है। इस असफलता का व्यक्ति पर कई तरह से असर पड़ता है। वह भावनात्मक रूप से टूटता है, वहीं इन सभी का असर उसके व्यक्तित्व पर भी पड़ता है। व्यक्तित्व पर असर लंबे समय के लिए पड़ता है तथा वह कई बार अवसाद में भी चला जाता है और यही अवसाद संत्रास का रुप ले लेती है। 

नकारात्मकता के कारण जो संत्रास पैदा हुई उस का जवाब सकारात्मकता के अलावा कुछ भी नहीं हो सकता यह बात मन में बैठा लें। इसके बाद जो भी नकारात्मक विचार मन में आए उसके साथ तर्क करना सीखें और वह भी सकारात्मकता के साथ। जिस प्रकार से नकारात्मक विचार लगातार आते रहते हैं, ठीक उसी तरह से आप स्वयं से सकारात्मक विचारों के लिए स्वयं को प्रेरित करें और हमेशा के लिये सामाजिक संत्रास को अलविदा कह दें।

कमलेश अग्रवाल

 

 

अहोई अष्टमी

17 अक्टूबर

व्रत एवं त्योहारों की दृष्टि से कार्तिक मास की महिमा अतुलनीय है। पति की रक्षा व सम्मान के लिए जहां महिलायें कार्तिक मास की चतुर्थी को करवा चौथ का व्रत रखती हैं वहीं अपने वंश के संचालक पुत्र/पुत्री की दीर्घायु व प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए सबसे पवित्र दिन यानी कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को वे अहोई अष्टमी का व्रत रखती हैं। सदियों से ऐसी मान्यता प्रचलित है कि अहोई अष्टमी का व्रत रखने से संतान के जीवन में सुख-समृद्धि आती है। करवा चौथ के ठीक चार दिन बाद अष्टमी तिथि को देवी अहोई माता का ये व्रत किया जाता है। करवा चौथ की ही तरह यह भी एक कठिन व्रत है। महिलाएं विशेष रूप से इस व्रत को पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से करती हैं।

अहोई शब्द अनहोनी का अपभ्रंश है। इसीलिये अपने संतानों की लंबी आयु और अनहोनी से रक्षा के लिए महिलायें यह व्रत रखती हैं और साही माता एवं भगवती से प्रार्थना करती हैं कि उनकी संतान दीर्घायु हों। वस्तुतः यह व्रत दीपावली से ठीक एक सप्ताह पूर्व आता है।  इसी मान्यता को लेकर देश के कई भागों में इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र के लिए ये व्रत रखती हैं और अहोई देवी के चित्र, सेई और सेई के बच्चों के चित्र बनाकर उनकी पूजा करती हैं। 

अहोई अष्टमी की कथा के अनुसार एक साहूकार था। इस साहूकार की सात बहुएं थीं जो दीपावली में घर के आँगन को लिपने के लिये मिट्टी लाने जाती हैं। मिट्टी खोदते समय छोटी बहू के हाथों अनजाने में कांटे वाले पशु साही के बच्चों की मृत्यु हो जाती है।

नाराज साही श्राप देती है, जिससे छोटी बहू के सभी बच्चे मर जाते हैं। बच्चों को फिर से जीवित करने के लिए साहूकार की बहू साही और भगवती की पूजा करती है। इससे छोटी बहू की मृत संतान फिर से जीवित हो जाती है।

प्राचीनकाल में एक और कथा भी प्रचलित है। एक साहूकार दंपती के शिशु जन्म लेते ही अकाल मृत्यु के शिकार हो जाते थे। इससे दुखी होकर वे अपना घर-बार छोड़कर वन में चले गए। वहां उन्होंने अन्न-जल त्याग कर भगवान का ध्यान करना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद यह आकाशवाणी हुई कि तुम अपने प्राण मत त्यागो। अभी तक तुम्हें जो भी कष्ट प्राप्त हुआ है, वह तुम्हारे पूर्वजन्म के कर्मो का फल है। तुम अपनी पत्नी से कहो कि वह कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की अष्टमी को व्रत रखे। इससे अहोई माता प्रसन्न होकर तुम्हारे पास आएंगी। तब तुम दोनों उनसे अपने लिए स्वस्थ और दीर्घायु संतान का वरदान मांगना। व्रत वाले दिन तुम दोनों वृंदावन स्थित राधाकुंड में स्नान करना। इससे तुम्हारी यह मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी। इसके कुछ ही दिनों बाद साहूकार की पत्नी ने अहोई अष्टमी का व्रत रखा। अगले वर्ष उन के यहां एक स्वस्थ-सुंदर बालक ने जन्म लिया। इस चमत्कार के बाद से सभी स्त्रियां संतान सुख की प्राप्ति के लिए अहोई अष्टमी का व्रत रखने लगीं। शायद इसी लिये लगभग पूरे उत्तर भारत में यह व्रत प्रचलित है। 

ये भी माना जाता है कि इसी दिन वृंदावन में राधाकुंड का प्राकट्य हुआ था। लोगों का ऐसा विश्वास है कि राधाकुंड में स्नान करने से नि:संतान दंपतियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है। इसी कारण अहोई अष्टमी की रात्रि में राधाकुंड के स्नान का विशेष महत्व है।

अंत में सायंकाल पूजा करने के बाद अहोई माता की कथा का श्रवण कर सास-ससुर और घर में बडों के पैर छुकर आशीर्वाद लिये जाता है। तारे निकलने पर इस व्रत का समापन किया जाता है। तारों को करवे से अर्ध्य दिया जाता है और तारों की आरती उतार संतान से जल ग्रहण कर, व्रत का समापन किया जाता है।

आज के समय में भी संस्कार शील माताओं द्वारा जब अपनी संतानों की इष्ट कामना के लिए अहोई माता का व्रत रखा जाता है और सांयकाल अहोई मता की पूजा की जाती है तो निश्चित रूप से इसका शुभफल उन को मिलता ही है और संतान चाहे पुत्र हो या पुत्री, उसको भी निष्कंटक जीवन का सुख मिलता है। 

जय अहोई माता की….

कमलेश अग्रवाल

अखंड सौभाग्य की कामना व चांद के दीदार का पर्व, करवा चौथ

11 अक्टूबर

भारत त्योहारों की भूमि है। यहां हर त्योहार अपनी कुछ विशिष्ट परम्परा  लिये हुए है । करवा चौथ पर्व को मनाने के पीछे भी एक विशिष्ट कारण है । ये एक सदियों से चली आ रही परम्परा है । इस पर्व में महिलाओं के पति प्रेम, पारिवारिक सुख-समृद्धि एवं सामाजिक प्रतिष्ठा व उन के त्यागमय जीवन के दर्शन होते हैं। भारत में नारी के त्याग एवं समर्पण के कारण ही उसे देवी शक्ति के रूप में मान्यता मिली है। धार्मिक, सांस्कृतिक एवम सामाजिक प्रतिष्ठा के कार्यों द्वारा ही इन की गिनती विश्व की श्रेष्ठ नारियों में की जाती रही है । पारिवारिक संतुलन के लिए इन का धैर्य एवं सहनशीलता ही इन्हें पूजनीय बनाते हैं । 

किसी भी सुहागिन स्त्री के लिए अपने पति के लिए तैयार होने से बढ़कर और कुछ नहीं होता। करवा चौथ ऎसा ही त्यौहार है । कार्तिक माह की कृष्ण चन्द्रोदय व्यापिनी चतुर्थी यानी करक चतुर्थी के दिन ये व्रत स्त्रियां अपने अखंड सौभाग्य की कामना और अपने पति की दीर्घायु के लिए रखती हैं। इस व्रत में शिव-पार्वती, गणेश और चन्द्रमा का पूजन किया जाता है । इस शुभ दिवस के उपलक्ष्य पर सुहागन स्त्रियां पति की लंबी आयु की कामना करते हुए निर्जला व्रत रखती हैं। ये व्रत पति-पत्नी के आत्मिक रिश्ते और अटूट बंधन का प्रतीक है जो संबंधों में नई ताजगी एवं मिठास लाता है ।

इस व्रत की शुरुआत प्रातःकाल सूर्योदय से पहले ही हो जाती है । प्रात: 4 – 4:30 बजे उठ कर महिलायें सरगी खाती हैं । इस व्रत में सरगी का काफी महत्व है। सरगी सास की तरफ से अपनी बहू को दी जाने वाली आशीर्वाद रूपी अमूल्य भेंट होती है । यह सरगी, सौभाग्य और समृद्धि का रूप मानी गई है । इस सरगी में फल, मेवा, मिठाई भेजी जाती है

फिर महिलाएं मनपसंद साँड़ियाँ, गहने पहन कर सोलह शृंगार कर ये व्रत को रखती हैं ।

इस व्रत में एक और चीज का भी महत्व है जो है करवा । करवा का अर्थ होता है मिट्टी का बर्तन । मिट्टी के बर्तन को ठोकर लग जाए तो चकनाचूर हो जाता है, फिर जुड़ नहीं पाता है । इसलिए करवा चौथ के व्रत को करते समय हर महिला ये ध्यान रखती है कि करवा सलामत रहे । क्योंकि ये करवा पति-पत्नी के प्रेम और विश्वास का ही प्रतीक है सो इस प्रेम और विश्वास को ठेस नहीं लगनी चाहिये इस बात का वे पूरा-पूरा  ध्यान रखती हैं ।

करक चतुर्दशी के संदर्भ में एक कथा प्रचलित है, जिसके अनुसार करवा नाम की एक स्त्री थी । वह बहुत पतिव्रता थी। वह अपने पति के साथ तुंगभद्रा नदी के पास एक गांव में रहती थी । एक बार करवा का पति नदी के किनारे कपड़े धो रहा होता है । तभी अचानक वहां एक मगरमच्छ आता है । वह उसके पति का पांव अपने मुंह में दबा लेता है और उसे नदी में खींचकर ले जाने लगता है । तब उसका पति जोर-जोर से अपनी पत्नी को करवा-करवा कह कर मदद के लिए पुकारने लगता है । पति की आवाज सुन कर करवा भागी-भागी वहां पहुँचती है । इसी दौरान वह अपने पति को फंसा देख मगरमच्छ को कच्चे धागे से बांध देती है । फिर वह यमराज से अपने पति के जीवन की रक्षा करने को कहती है । करवा की करुण व्यथा देख कर यमराज उससे कहते हैं कि वह मगर को मृत्यु नहीं दे सकते क्योंकि उसकी आयु शेष है, परंतु करवा के पति-धर्म को देख यमराज मगरमच्छ को यमपुरी भेज देते हैं । करवा के पति को दीर्घायु प्राप्त होती है और यमराज करवा से प्रसन्न हो उसे वरदान देते हैं कि जो भी स्त्री कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को व्रत का पालन करेगी, वह सौभाग्यवती होगी । तब से करवा-चौथ व्रत को मनाने की परंपरा चली आ रही है ।

धर्म ग्रंथों में महाभारत से संबंधित एक और पौराणिक कथा का भी उल्लेख किया गया है । इसके अनुसार पांडुपुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी पर्वत पर चले जाते हैं व दूसरी ओर बाकी पांडवों पर कई प्रकार के संकट आन पड़ते हैं । यह सब देख द्रौपदी चिंता में पड़ जाती हैं । वह भगवान श्रीकृष्ण से इन सभी समस्याओं से मुक्त होने का उपाय पूछती हैं ।

महाभारत काल में पांडवों के दुख के दिनों में श्रीकृष्ण द्रौपदी से कहते हैं कि यदि वह कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन करक चतुर्थी अर्थात करवा चौथ का व्रत रखें तो उन्हें इन सभी संकटों से मुक्ति मिल जायेगी । द्रौपदी पुर्ण श्रध्धा से ये व्रत रखती हैं और अर्जून सकुशल वापस आ जाते हैं बस माना जाता है कि तभी से करवा-चौथ व्रत को मनाने की परंपरा चली आ रही है ।

करवा चौथ में छलनी लेकर चांद को देखना यह भी सिखाता है कि पतिव्रत का पालन करते हुए किसी प्रकार का छल उसे पतिव्रत से डिगा न सके।

करवा चौथ महज एक व्रत नहीं है, बल्कि सूत्र है, विश्वास का कि पति-प्त्नी साथ-साथ रहेंगे, आधार है जीने का कि पति-प्त्नी का साथ कभी न छूटे।

 करवा चौथ जबरन नहीं प्यार से, विश्वास से मनायें, इस यकीन से मनायें कि आप दोनों पति-प्त्नी का प्यार अमिट और शाश्वत रहे।

आप सभी को करव चौथ की शुभकामना…..

कमलेश अग्रवाल

 

 

 

 

 

बुराई पर अच्छाई की जीत मतलब दशहरा…

3 अक्टूबर

(आज दशहरा है , विजयदशमी का त्योहार , बुराई पर अच्छाई की जीत…बस इस हेतु ही में इस त्यौहार के बारे में कुछ लिख रही हूं )

रावण को मारने से पूर्व राम ने मां दुर्गा की आराधना की थी। मां दुर्गा ने उनकी पूजा से प्रसन्न होकर उन्हें विजय का वरदान दिया था। इसी लिये मां दुर्गा की विशेष आराधना इस त्यौहार से पूर्व देखने को मिलती है। दशमी के दिन त्योहार की समाप्ति होती है। इस दिन को दशहरा कहते हैं। 

भगवती के ‘विजया’ नाम पर से इस पर्व को ‘विजयादशमी’ भी कहते हैं। 

ऐसा माना जाता है कि आश्विन शुक्ल दशमी को तारा उदय होने के समय ‘विजय’ नामक काल होता है। यह काल सर्व कार्य सिद्धि दायक होता है। इसलिए भी इसे विजयादशमी कहते हैं।

विजयादशमी के दिन श्रीराम चौदह वर्ष का वनवास भोग कर तथा रावण का वध कर अयोध्या पहुँचे थे , इसलिए भी इस पर्व को ‘विजयादशमी’ कहा जाता है। 

पौराणिक कथा के अनुसार दुर्योधन ने पांडवों को जुए में पराजित करके बारह वर्ष के वनवास के साथ तेरहवें वर्ष में अज्ञातवास की शर्त दी थी। तेरहवें वर्ष यदि उनका पता लग जाता तो उन्हें पुनः बारह वर्ष का वनवास भोगना पड़ता। इसी अज्ञातवास में अर्जुन ने अपना धनुष एक शमी वृक्ष पर रखा था तथा स्वयं वृहन्नला वेश में राजा विराट के पास नौकरी कर ली थी। जब गौ रक्षा के लिए विराट के पुत्र कुमार ने अर्जुन को अपने साथ लिया, तब अर्जुन ने शमी वृक्ष पर से अपने हथियार उठा कर शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी। इसी कारण आज के दिन वाहन व शस्त्रों की पूजा भी की जाती है।

दशहरा का सामाजिक महत्व भी है एवं सांस्कृतिक पहलू भी है। हम जानते हैं कि भारत कृषि प्रधान देश है इसी लिये जब किसान अपने खेत में सुनहरी फसल के रुप में अनाज रूपी संपत्ति घर लाता है तो उसके उल्लास और उमंग की कोई सीमा नहीं रहती इस प्रसन्नता के अवसर पर वह भगवान की कृपा को मानता है और उसे प्रकट करने के लिए वह उसका पूजन करता है।

इतना ही नहीं भारतवर्ष में यह पर्व विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है।

हिमाचल प्रदेश में कुल्लू का दशहरा बहुत प्रसिद्ध है। करीब एक सप्ताह पहले से ही इस पर्व की तैयारी आरंभ हो जाती है। स्त्री और पुरुष सुंदर वस्त्रों से सज्जित होकर तुरही, बिगुल, ढोल, नगाड़े, बांसुरी अथवा जिसके पास जो वाद्य होता है, उसे लेकर बाहर निकलते हैं। पहाड़ी लोग अपने ग्रामीण देवता का धूमधाम से जुलूस निकाल कर पूजन करते हैं। देवताओं की मूर्तियों को बहुत ही आकर्षक पालकी में सुंदर ढंग से सजाया जाता है। साथ ही वे अपने मुख्य देवता रघुनाथ जी की भी पूजा करते हैं। इस जुलूस में प्रशिक्षित नर्तक नटी नृत्य करते हैं। इस प्रकार जुलूस बनाकर नगर के मुख्य भागों से होते हुए नगर परिक्रमा करते हैं और कुल्लू नगर में देवता रघुनाथजी की वंदना से दशहरे के उत्सव का आरंभ करते हैं।

पंजाब में दशहरा नवरात्रि के नौ दिन का उपवास रखकर मनाते हैं। इस दौरान यहां आगंतुकों का स्वागत पारंपरिक मिठाई और उपहारों से किया जाता है। यहां भी रावण-दहन के आयोजन होते हैं और मैदानों में मेले लगते हैं।

बस्तर में दशहरे के मुख्य कारण को ‘राम की रावण पर विजय’ ना मानकर, लोग इसे मां दंतेश्वरी की आराधना को समर्पित एक पर्व मानते हैं। दंतेश्वरी माता बस्तर अंचल के निवासियों की आराध्य देवी हैं, जो दुर्गा का ही रूप हैं। यहां का दशहरा श्रावण मास की अमावस से अश्विन मास की शुक्ल त्रयोदशी तक चलता है। प्रथम दिन देवी से समारोह आरंभ करने की अनुमति ली जाती है। देवी एक कांटों की सेज पर विराजमान होती हैं। यह कन्या एक अनुसूचित जाति की है, जिससे बस्तर के राजपरिवार के व्यक्ति अनुमति लेते हैं। माना जाता है कि यह समारोह लगभग पंद्रहवीं शताब्दी से शुरू हुआ था।

बंगाल, उड़ीसा और असम में यह पर्व दुर्गा पूजा के रूप में ही मनाया जाता है। यह बंगालियों, उड़ीसा और असम के लोगों का सबसे महत्वपूर्ण पर्व है। यह पर्व पूरे बंगाल में पांच दिनों के लिए मनाया जाता है। उड़ीसा और असम में चार दिन तक त्योहार चलता है। यहां देवी दुर्गा को भव्य सुशोभित पंडालों में विराजमान करते हैं देश के नामी कलाकारों को बुलवाकर दुर्गा की मूर्ति तैयार करवाई जाती हैं। इसके साथ अन्य देवी देवताओं की भी कई मूर्तियां बनाई जाती हैं। त्योहार के दौरान शहर में छोटे मोटे स्टॉल भी मिठाईयों से भरे रहते हैं। यहां षष्ठी के दिन दुर्गा देवी का बोधन, आमंत्रण एवं प्राण प्रतिष्ठा आदि का आयोजन किया जाता है। उसके उपरांत सप्तमी, अष्टमी एवं नवमी के दिन प्रातः और सायंकाल दुर्गा की पूजा में व्यतीत होते हैं। अष्टमी के दिन महा पूजा और बलि भी दी जाती है। दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। पुरुष आपस में गले मिलते हैं। स्त्रियां देवी के माथे पर सिंदूर चढ़ाती हैं और साथ ही आपस में सिंदूर भी लगाती हैं। इस दिन यहां नीलकंठ पक्षी को देखना बहुत ही शुभ माना जाता है। इसके बाद देवी की प्रतिमाओं को विसर्जित किया जाता है।

तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक में दशहरा नौ दिनों तक चलता है जिसमें तीन देवियां लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा की पूजा करते हैं। पहले तीन दिन लक्ष्मी, धन और समृद्धि की देवी, का पूजन होता है। अगले तीन दिन सरस्वती, कला और विद्या की देवी की अर्चना की जाती है और अंतिम दिन देवी दुर्गा, शक्ति की देवी की स्तुति की जाती है। पूजन स्थल को अच्छी तरह फूलों और दीपकों से सजाया जाता है। लोग एक दूसरे को मिठाइयां और कपड़े देते हैं।

कर्नाटक में मैसूर का दशहरा विशेष उल्लेखनीय है। मैसूर में दशहरे के समय पूरे शहर की गलियों को रोशनी से सज्जित किया जाता है और हाथियों का श्रृंगार कर पूरे शहर में एक भव्य जुलूस निकाला जाता है। इस समय प्रसिद्ध मैसूर महल को दीप मालिकाओं से दुल्हन की तरह सजाया जाता है। इसके साथ शहर में लोग टार्च लाइट के संग नृत्य और संगीत की शोभा यात्रा का आनंद लेते हैं। यहां एक बात आपको बता दें कि इन द्रविड़ प्रदेशों में रावण-दहन का आयोजन नहीं किया जाता है।

गुजरात में मिट्टी सुशोभित रंगीन घड़ा देवी का प्रतीक माना जाता है और इसको कुंवारी लड़कियां सिर पर रखकर एक लोकप्रिय नृत्य करती हैं जिसे गरबा कहा जाता है। गरबा नृत्य इस पर्व की शान है। इस अवसर पर भक्ति, फिल्म तथा पारंपरिक लोक-संगीत सभी का समायोजन होता है। पूजा और आरती के बाद डांडिया रास का आयोजन पूरी रात होता रहता है। पुरुष एवं स्त्रियां दो छोटे रंगीन डंडों को संगीत की लय पर आपस में बजाते हुए घूम-घूम कर नृत्य करते हैं पुरुष एवं स्त्रियां दो छोटे रंगीन डंडों को संगीत की लय पर आपस में बजाते हुए घूम-घूम कर नृत्य करते हैं। इस नवरात्रि पर्व पर सोने और गहनों की खरीद को शुभ माना जाता है। दशहरे के दिन मा का हवन भी कई जगहों पर किया जाता है। परिवारवाले इस दिन फाफाडा व जलेबी खाते है।

महाराष्ट्र में नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा को समर्पित रहते हैं, जबकि दसवें दिन ज्ञान की देवी सरस्वती की वंदना की जाती है। इस दिन विद्यालय जाने वाले बच्चे अपनी पढ़ाई में आशीर्वाद पाने के लिए मां सरस्वती के तांत्रिक चिह्नों की पूजा करते हैं। किसी भी चीज को प्रारंभ करने के लिए खासकर विद्या आरंभ करने के लिए यह दिन काफी शुभ माना जाता है। महाराष्ट्र के लोग इस दिन विवाह, गृह-प्रवेश एवं नये घर खरीदने का शुभ मुहूर्त समझते हैं।

महाराष्ट्र में इस अवसर पर सिलंगण के नाम से सामाजिक महोत्सव भी मनाया जाता है। इसमें शाम के समय सभी गांव वाले सुंदर-सुंदर नये वस्त्रों से सुसज्जित होकर गांव की सीमा पार कर शमी वृक्ष के पत्तों को लूट कर अपने ग्राम में वापस आते हैं। फिर इन पत्तों का परस्पर आदान-प्रदान किया जाता है। इन का मानना है कि ऐसा करने से घर में सुवर्ण सम संपत्ति आती है।

कश्मीर के अल्पसंख्यक हिन्दू नवरात्रि के पर्व को श्रद्धा से मनाते हैं। परिवार के सारे वयस्क सदस्य नौ दिनों तक सिर्फ पानी पीकर उपवास करते हैं। अत्यंत पुरानी परंपरा के अनुसार नौ दिनों तक लोग माता खीर भवानी के दर्शन करने के लिए जाते हैं। यह मंदिर एक झील के बीचोबीच बना हुआ है। ऐसा माना जाता है कि देवी ने अपने भक्तों से कहा हुआ है कि यदि कोई अनहोनी होने वाली होगी तो सरोवर का पानी काला हो जाएगा। कहा जाता है कि इंदिरा गांधी की हत्या के ठीक एक दिन पहले और भारत पाक युद्ध के पहले यहां का पानी सचमुच काला हो गया था।

सच कहें तो भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक है, शौर्य की उपासक है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए ही शायद हमारे पूर्वजों ने दशहरे का उत्सव रखा होगा। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है। दशहरे का उत्सव शक्ति और शक्ति का समन्वय बताने वाला उत्सव है। नवरात्रि के नौ दिन जगदम्बा की उपासना करके शक्तिशाली बना हुआ मनुष्य विजय प्राप्ति के लिए सारे साल तत्पर रहता है। इस दृष्टि से दशहरा, विजय के लिए प्रस्थान का  उत्सव है…..

आप सभी को दशहरे पर्व की  शुभकामना….

कमलेश अग्रवाल

 

 

आज जीत है…..

3 अक्टूबर
 आज जीत है सच की
आज जीत है धैर्य की
आज जीत है इन्सान की और उसकी इन्सानियत
आज जीत है विश्वास की
जीत प्रेम की….
आज वध हुआ रावण का….
आज जीत है सिया-राम की….
आज जीत है अच्छाई की बुराई पर
जमाना बदला पर आज भी रावण मरता आया है
…….और राम उसे मारता आया है
कर्म का चक्र फिर घूमेगा और हर रावण फिर मरेगा………………
(नेट से ली है क्योंकि मुझे बहुत छु गई…..रचनाकार को बधाई)