संकीर्णता की चेतना

21 मार्च

हाल ही में मेरे परिवार में भतीजे की शादी का अवसर था । सभी कुछ भली भांति चल रहा था ।  हर और आनंद ही आनंद छाया हुआ था । अचानक शादी की अगली रात मेरे  भाई और  मेरे जीजाजी में कुछ बात को ले कर कहासुनी हो गई । वैसे ये कहासुनी के पीछे ग़लतफ़हमी ही हुई थी या यूं समझे कि काफी समय से मन में चल रहे मनगढ़ंत सवालों से जूझ रहे थे दोनों के मन । जो भी हो पर कहीं न कहीं दोनों के विश्वासों पर ठेस लगी थी । मामला बिचकता जा रहा था । तभी मेरे कानों ने सुना…भई इन्हों से अपने पितृ या देवी-देवताओं के लिये कोई चूक तो नहीं हो गई ? ज्यादातर हम हिन्दू इस बात से डरते हैं कि अगर हम ने नियमित रूप से और ठीक प्रकार से अपने गाँव के देवताओं को संतुष्ट नहीं किया , तो देवता और देवियाँ परेशान हो जाएंगे और इसके कारण हमारे अच्छे बुरे अवसरों में नकारात्मक घटनाएं घट सकती है । इसलिए अवसर के मौके पर देवताओं का तुष्टीकरण करने हेतु उनकी पूजा की जानी चाहिये । इस प्रकार की पूजा के पीछे जो आधार है वो डर है, विशेष तौर से अगर हम अपने अनुष्ठान संबंधी दायित्वों में चूक करेंगे , हमें दंडित होना पड़ेगा या फिर हम किसी तरह से पीड़ा पाएंगे ।

मेरा नीजि तौर से मानना है कि हमारे भगवान क्रोध, पीड़ा पहुंचाना, न्याय , प्रतिशोध या संकीर्णता की चेतना में नहीं रह सकते । वे प्रेम एवं प्रकाश के प्राणी हैं , हम पर अपना आशीर्वाद बरसाते हैं , बावजूद इसके कि हम असफल हों, कमजोर हों या हम में और कमियाँ हों। इस विश्वास की मूल भूत भावना को रखते हुए ही हमारा हिंदू धर्मएक आनंद पर आधारित धर्म है , जिसमे किसी को पितृ या भगवान से कभी भी डर ने की आवश्यकता नहीं है , इस बात के लिए कभी परेशान होने की आवश्यकता नहीं है कि अगर हम पूजा नहीं करेंगे तो पितृ या भगवान आहत हो जाएंगे या हमें किसी तरह की सजा देंगे। पूजा उच्चतम मायनों में प्रेम का बाहर निकल कर बहना है । भगवान प्रेम हैं और कुछ और नहीं परंतु प्रेम हैं और हमारे पूर्वज तो हमारे अपने हैं वे भला हमें दुःखी कैसे कर सकते हैं ?

सही कहूं तो हमारा हिंदू धर्म एक ऐसा आनंदमय धर्म है , जो कि पश्चिम के धर्मों में प्रचलित सभी मानसिक ऋण के भार से मुक्त है । यहाँ श्रद्धा  है , ये अंधश्रध्धासे मुक्त है । जब नकारात्मक घटनाएँ घटती हैं, जैसे कि शादी में विध्न, बच्चे कि मौत , बाढ़ या अचानक बीमारी, बड़े लोग जरूरी अनुष्ठानों में हुई कमियों को ढूंढते हैं , यह मानते हुए कि देवता उनसे हुई पूजा के किसी पहलू की कमी के लिए दंडित कर रहे हैं । अगर हम इन तथ्यों में विश्वास रखें तो मुझे आशा है कि भगवानों कि प्रकृति कि बेहतर समझ से ऐसे अंधविश्वासों पर काबू करने में मदद मिलेगी ।

हिन्दू दर्शन यह सिखाता है कि हमारे जीवन में जो घटता है , वह चाहे सकारात्मक हो या नकारात्मक , वह हमारे पूर्व जन्म के किए गए कार्यों का परिणाम होता है । एक चिंताजनक स्थिति स्वयं के द्वारा पैदा किया गया दुर्भाग्य है । भगवान द्वारा दिया गया दंड नहीं । जीवन जो आनंद और दुख, उत्साह और अवसाद , सफलता और विफलता, स्वास्थ्य और बीमारी , अच्छे और बुरे समय का अनुभव होता है वह महज एक इत्तफाक ही होता है । पुजा अनुष्ठान उन्हें संतुष्ट करने या उनके गुस्से को शांत करने हेतु नहीं किए जाते बल्कि उनके प्रति प्रेम व्यक्त करने एवं उनका आशीर्वाद और मार्गदर्शन लेने का आवाहन करने हेतु किए जाते हैं ।

अनुष्ठान द्वारा तुष्टीकरण का एक शास्त्रीय उद्देश्य भी है कि  नकारात्मक ऊर्जा से बचा जाये जो हमारे जीवन को परेशान करती हैं । एक अन्य दृष्टिकोण से अगर हम देवी-देवता एवं पितृओं के दयालु स्वभाव को समझने का प्रयास करें और ऐसा करते हुए मन में बसे पुराने भय को निकाल दें , तो हमें भगवान या देवी-देवता व पितृओं को एक माता पिता के रूप में और स्वयं को एक बच्चे के रूप में देखना होगा । सच्चे मायने में तो ये हमारे लिये एक सम्पूर्ण माता पिता के समान हैं , क्योंकि चाहे हम कुछ भी करें , ये हमें सदेव आशीर्वाद और प्रेम भेजते हैं । जब हम गलती करते हैं वे कभी हम से नाराज़ नहीं होते एवं हमें कभी दंडित नहीं करते । इन का प्रेम उत्तम प्रेम है , जो हर समय मौजूद रहता है , सभी हालत में ।

 कमलेश अग्रवाल

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